पृष्ठभूमि
गुरु अर्जुन देव जी सिख परंपरा के पहले शहीद हैं। उनकी शहादत 30 मई, 1606 को लाहौर में हुई। यह कहानी श्रद्धा, राजनीति और अटूट विश्वास की कहानी है।
गुरु अर्जुन देव जी ने दो ऐसे कार्य किए जिन्होंने सिख पंथ को एक संगठित शक्ति के रूप में स्थापित किया। पहला, उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन किया और 1604 में उसे श्री हरमंदिर साहिब में प्रतिष्ठित किया। यह पहली बार था कि किसी धर्म का पवित्र ग्रंथ उसके संस्थापकों के जीवनकाल में ही लिपिबद्ध हुआ, और उसमें हिंदू भक्तों और मुस्लिम सूफियों दोनों की वाणी सम्मिलित की गई। दूसरा, उन्होंने अमृतसर को सिखों के आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया, हरमंदिर साहिब का निर्माण पूर्ण किया, और मसंद प्रथा (दशांश संग्रह) को व्यवस्थित किया। इससे सिख समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त हुआ।
1605 में मुगल सम्राट अकबर की मृत्यु हुई। अकबर अपेक्षाकृत संयत और नपे-तुले शासक थे। उनके पुत्र जहाँगीर ने गद्दी संभाली। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा “तुज़ुक-ए-जहाँगीरी” में स्वयं लिखा कि वह बहुत समय से गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करना चाहता था। उसने लिखा कि “इस दुकान को बंद करना चाहिए, या इसे इस्लाम में लाना चाहिए।”
तत्काल कारण यह बना कि जहाँगीर का पुत्र खुसरो, जिसने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था, लाहौर से भागते हुए गुरु अर्जुन देव जी से मिला। गुरु साहिब ने उसे आशीर्वाद दिया (कुछ इतिहासकारों के अनुसार आर्थिक सहायता भी दी)। जहाँगीर ने इसे राजद्रोह माना।
लाहौर के दीवान (राजस्व अधिकारी) चंदू शाह की गुरु साहिब से व्यक्तिगत शत्रुता थी। एक विवाह प्रस्ताव के अपमान को लेकर चंदू शाह ने गुरु साहिब के विरुद्ध जहाँगीर को भड़काया और उनकी गिरफ्तारी तथा दंड की व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाई। चंदू शाह पंजाबी खत्री वंश से थे। खत्री पंजाब का एक प्रमुख व्यापारिक और प्रशासनिक समुदाय है। उनके नाम में “शाह” खत्री समुदाय की एक उपजाति (गोत्र) का सूचक है। इसे फ़ारसी या सिंधी उपाधि समझ लेना ग़लती है। वे मूल रूप से पंजाब के निवासी थे, लेकिन मुगल दरबार में अपने पद के कारण लाहौर और दिल्ली दोनों में रहते थे। वे लाहौर के सूबेदार (गवर्नर) के अधीन दीवान (राजस्व अधिकारी) थे। साथ ही वे एक धनी साहूकार भी थे।
एक उल्लेखनीय बात यह है कि स्वयं सिख गुरु भी खत्री थे: गुरु नानक देव जी बेदी खत्री थे, गुरु अंगद देव जी त्रेहन खत्री, गुरु अमरदास जी भल्ला खत्री, और गुरु रामदास जी से गुरु गोबिंद सिंह जी तक सभी सोढी खत्री थे। इसलिए चंदू शाह और गुरु अर्जुन देव जी एक ही पंजाबी खत्री समुदाय से आते थे। यही कारण है कि सिख इतिहास में चंदू शाह के विश्वासघात को और भी अधिक पीड़ादायक माना जाता है: यह अपने ही समुदाय के एक व्यक्ति का कुकर्म था, किसी बाहरी शत्रु के अत्याचार से कहीं ज़्यादा खटकने वाला।
यातना और शहादत:
गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में कई दिनों तक यातनाएँ दी गईं। उन्हें तपती लोहे की तवी (गर्म लोहे की चादर) पर बैठाया गया। उनके शरीर पर जलती हुई रेत डाली गई। उन्हें उबलते पानी में डुबोया गया। May की भीषण गर्मी में यह सब किया गया। अंत में उन्हें रावी नदी में स्नान करने दिया गया, जहाँ उनके प्राण निकल गए। तिथि थी 30 मई, 1606।
शहादत का प्रभाव:
गुरु अर्जुन देव जी की शहादत ने सिख इतिहास की दिशा बदल दी। उनके पुत्र गुरु हरगोबिंद साहिब ने गद्दी संभालते ही दो तलवारें धारण कीं, मीरी (सांसारिक सत्ता) और पीरी (आध्यात्मिक सत्ता), और अकाल तख्त की स्थापना की। यह क्षण सिख पंथ के शांत भक्ति आंदोलन से सशस्त्र योद्धा परंपरा में परिवर्तन का आरंभ था।
रचना का ऐतिहासिक संदर्भ
सुखमनी साहिब की रचना अमृतसर के रामसर सरोवर के किनारे, क़रीब 1602-03 ईस्वी में हुई। उस-समय गुरु अर्जुन देव जी की आयु लगभग चालीस वर्ष थी। चार वर्ष पहले, 1598 में, अकबर बादशाह ने स्वयं हरमंदिर साहिब आ कर लंगर में बैठ कर भोजन किया था, और गुरु-घर का आदर-व्यवहार किया था। अकबर की 1605 में मृत्यु हुई, जहाँगीर गद्दी पर बैठा, और 1606 में गुरु अर्जुन देव जी की शहादत। सुखमनी इस तीन-वर्षीय खिड़की में रची गयी, जब मुग़ल-सिख-सम्बन्ध अभी संतुलित थे, मगर बदलने को थे।
परम्परा कहती है कि बाबा बुद्ध जी, जिन्हें छहों गुरुओं (नानक से हरगोबिंद तक) से दीक्षा का सौभाग्य मिला, सुखमनी-पाठ के प्रथम-श्रोता थे। आज भी सिख घरों में बच्चे के जन्म के बाद के चालीस-दिन, बीमारी के समय, और परिवार में किसी की मृत्यु के बाद, सुखमनी का अखंड-पाठ करवाया जाता है।
आदि शंकराचार्य की पाँच-शताब्दी पुरानी विवेक-चूड़ामणि और गुरु अर्जुन देव की सुखमनी, दोनों का केन्द्रीय-विषय एक ही है, मन की शान्ति का सूत्र। दोनों के बीच पाँच-सौ साल का अन्तर है, और भाषाएँ अलग, मगर पाठ-शैली में एक-तरह की संगति है, प्रत्येक खंड एक सूत्र-वाक्य के चारों ओर बँधा। यह तुलना आज भी तुलनात्मक-दर्शन के विद्वानों के बीच रोचक मानी जाती है।