← संग्रह
क्रियाएँ
भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

परीक्षित् की परमगति

कथा 65 · भागवतम् की कथाएँ

परीक्षित् की परमगति

सातवीं साँझ और नदी किनारे खाली आसन
स्कन्ध 12, अध्याय 5-6

व्यासनन्दन श्रीशुकदेवजी ने कथा का अंतिम सूत्र कह दिया था। समूचा भागवत, समस्त चराचर जगत् को अपनी आत्मा के रूप में अनुभव करने वाले और सबके प्रति समदृष्टि रखने वाले उन मुनि के मुख से, इन सात दिनों में इस तट पर उतर चुका था। अब एक मौन था, जिसमें केवल जल की आवाज़ थी।

राजर्षि परीक्षित ने मुनिवर के चरणों के और पास खिसककर हाथ जोड़े, आपने करुणा से श्रीहरि के स्वरूप और लीलाओं का वर्णन किया।
राजर्षि परीक्षित ने मुनिवर के चरणों के और पास खिसककर हाथ जोड़े, आपने करुणा से श्रीहरि के स्वरूप और लीलाओं का वर्णन किया।

भगवान् के शरणागत और उन्हीं के द्वारा सुरक्षित राजर्षि परीक्षित् ने वह सम्पूर्ण उपदेश बड़े ध्यान से सुना था। अब उन्होंने धीरे से सिर झुकाया, अपने आसन से तनिक खिसककर मुनिवर के चरणों के और पास आ गए, दोनों हाथ जोड़े, और बोले।

“भगवन्, आप करुणा के मूर्तिमान् स्वरूप हैं। आपने मुझ पर परम कृपा करके अनादि, अनन्त, एकरस, सत्य भगवान् श्रीहरि के स्वरूप और लीलाओं का वर्णन किया है। अब मैं आपकी कृपा से परम अनुगृहीत और कृतकृत्य हो गया हूँ।”

शुकदेव ने उनकी ओर देखा, पर कुछ कहा नहीं। परीक्षित् कहते रहे।

“संसार के प्राणी अपने स्वार्थ और परमार्थिक ज्ञान से शून्य हैं, मुनिवर, और भाँति-भाँति के दुःखों के दावानल में जल रहे हैं। उन पर आप जैसे भगवन्मय महात्माओं का अनुग्रह हो जाए, इसमें कोई नई बात अथवा आश्चर्य की बात नहीं। यह तो आप लोगों के लिए स्वाभाविक ही है। पर मेरे साथ जो हुआ, उसे मैं क्या कहूँ। आपने पद-पद पर मुझे उन्हीं की लीला सुनाई, जिनके गान में बड़े-बड़े आत्माराम मुनि रमते रहते हैं।”

“भगवन्, आपने मुझे वह अभय-पद, ब्रह्म और आत्मा की एकता का साक्षात्कार करा दिया है। अब मैं उसी परम शान्ति-स्वरूप ब्रह्म में स्थित हूँ। और अब मुझे तक्षक आदि किसी भी मृत्यु के निमित्त से, अथवा दल-के-दल मृत्युओं से भी कोई भय नहीं है। मैं अभय हो गया हूँ।”

“अब आप मुझे आज्ञा दीजिए। मैं अपनी वाणी बंद कर लूँ। मौन हो जाऊँ। और कामनाओं के जो थोड़े-बहुत संस्कार अभी भीतर कहीं दुबके बैठे हैं, उन्हें भी मिटाकर अपने इस चित्त को इन्द्रियों के पार उस परमात्मा में घोल दूँ, और अपने प्राणों को छोड़ दूँ। आपके दिए ज्ञान और विज्ञान में मैं ठहर गया हूँ, मुनिवर। मेरा अज्ञान जड़ से नष्ट हो गया। आपने मुझे भगवान् के परम कल्याणमय स्वरूप के दर्शन करा दिए।”

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। फिर उन्होंने राजा को वह अनुमति दे दी, जिसके लिए परीक्षित् ने हाथ जोड़े थे।


व्यास-नन्दन शुकदेव उठे। चारों ओर बैठे त्यागी महात्माओं ने, उन भिक्षुओं ने, राजा परीक्षित् ने, सबने उन्हें प्रणाम किया, उनकी पूजा की। और वे, जैसे आए थे वैसे ही, बिना किसी आडम्बर के, उन भिक्षुओं के साथ उठकर चल दिए। एक बार जो पाँव इस तट पर पड़े थे, अब लौट चले।

राजा ने उन्हें जाते देखा। फिर उनकी आँखें वापस अपने भीतर मुड़ गईं।

अब परीक्षित् अकेले थे। बाहर बैठा गुरु जा चुका था और पकड़ने योग्य हर सहारा छूट गया था। और इसी अकेलेपन में उन्होंने वह किया जो वे सात दिन से सुनते आए थे। उन्होंने अपनी ही आत्मा के द्वारा अपने ही अन्तःकरण को उस परमात्मा के चिन्तन में जोड़ दिया, और ध्यानमग्न हो गए।

परीक्षित् की परमगति की कथा का यह प्रसंग, जहाँ आगे की बात खुलती है।
परीक्षित् की परमगति की कथा का यह प्रसंग, जहाँ आगे की बात खुलती है।

उनका शरीर वहीं बैठा रहा। गंगा के तट पर उन्होंने पहले से ही कुश बिछा रखे थे, जिनका अगला सिरा पूर्व की ओर था, और स्वयं उत्तर मुँह करके उन पर बैठ गए। आसक्ति और संशय तो पहले ही मिट चुके थे। अब वे ब्रह्म और आत्मा की एकता में इस तरह स्थिर हुए कि उनका श्वास-प्रश्वास भी ठहर गया। पास से देखने वाले को लगता, मानो कोई वृक्ष का सूखा ठूँठ हो, जो स्थिर और श्वासहीन रहता है। भीतर जो ज्योति जल रही थी, वह बाहर किसी को दीखती न थी।

ऋषियों की पाँत चुप थी। हवा रुकी-सी थी। तट पर बस वही एक बैठी हुई आकृति थी और जल की लगातार बहती आवाज़।

उधर रास्ते पर एक और प्राणी अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहा था।

तक्षक। नागों का राजा। मुनिकुमार शृंगी ने क्रोध में आकर जो शाप दिया था, उसी शाप का भेजा हुआ दूत। सात दिन पूरे होने को थे, और तक्षक राजा परीक्षित् को डसने के लिए चला आ रहा था।

तक्षक शाप का दूत बनकर परीक्षित् को डसने चला जा रहा है, राह में वैद्य कश्यप को धन देकर लौटा देता है।
तक्षक शाप का दूत बनकर परीक्षित् को डसने चला जा रहा है, राह में वैद्य कश्यप को धन देकर लौटा देता है।

रास्ते में उसे कश्यप नाम का एक ब्राह्मण मिला। यह ब्राह्मण साँप के ज़हर की चिकित्सा करने में बहुत निपुण था। वह भी इसी ओर जा रहा था, इस ख़याल से कि राजा को डसा जाएगा, तो वह अपनी विद्या से ज़हर उतार देगा और बड़ा धन पाएगा।

तक्षक ठिठका। उसने इस ब्राह्मण को पहचान लिया। फिर उसने एक काम किया जो साँप का नहीं, किसी चतुर दरबारी का था। उसने कश्यप को बहुत-सा धन भेंट किया और मीठी बातों से समझा-बुझाकर उसे वहीं से लौटा दिया, राजा के पास जाने ही न दिया। ज़हर उतारने वाला, धन लेकर, अपने रास्ते मुड़ गया।

अब तक्षक के और राजा के बीच कोई न बचा।

तक्षक इच्छानुसार रूप धारण कर सकता था। उसने अपना असली रूप छिपा लिया और एक ब्राह्मण का वेश बना लिया। इसी भेस में, औरों के साथ घुलकर, वह उस तट तक आ पहुँचा जहाँ राजा ध्यान में बैठे थे।

राजा को कुछ ख़बर न थी। और होती भी, तो अब क्या फ़र्क़ पड़ता। तक्षक के डसने से बहुत पहले ही परीक्षित् ब्रह्म में स्थित हो चुके थे। जिस शरीर को डसा जाना था, उसमें बैठने वाला तो कब का उसके पार चला गया था।

फिर वह घड़ी आई जिसके लिए सात दिन गिने जा रहे थे।

तक्षक ने राजा को डस लिया।

गंगा तट पर बैठे परीक्षित् शुकदेव से कथा सुनते हुए अपनी अंतिम सात दिनों की यात्रा में लीन थे।
गंगा तट पर बैठे परीक्षित् शुकदेव से कथा सुनते हुए अपनी अंतिम सात दिनों की यात्रा में लीन थे।

उसके दाँतों के विष की आग एक पल में परीक्षित् के शरीर में फैल गई। और सबके देखते-देखते, वहीं तट पर, ब्रह्मभूत राजर्षि का वह शरीर तत्काल जलकर भस्म हो गया। जो कभी एक राजर्षि का शरीर था, वह कुश के आसन पर मुट्ठी-भर राख रह गया।

पर जो भीतर बैठा था, उसे यह आग छू भी न सकी।

क्योंकि वह तो पहले ही वहाँ जा चुका था, जहाँ कोई विष नहीं पहुँचता। जिस पुकार से सात दिन पहले उन्होंने पूछा था कि मरते हुए मनुष्य को क्या करना चाहिए, उसी प्रश्न का उत्तर अब उनका अपना अंत-काल बन गया था। मन पूरा का पूरा भगवान् पर टिका था, एक कण भी कहीं और न था, और उसी टिके हुए मन के साथ परीक्षित् ने परमगति पा ली।

तक्षक ने राजा को नहीं मारा। तक्षक तो केवल वह द्वार था जिससे होकर राजा को जाना ही था। दरवाज़ा कौन-सा है, यह राजा के लिए अब कोई प्रश्न न रह गया था।

पृथ्वी पर, आकाश में, और सब दिशाओं में एक साथ “हाय-हाय” की ध्वनि उठी। यह राजा के लिए शोक न था, यह तो उस विस्मय की आवाज़ थी जो ऐसी परमगति देखकर सहसा निकल पड़ती है। देवता, असुर, मनुष्य, सब-के-सब परीक्षित् की इस गति को देखकर अवाक रह गए।

फिर आकाश में देवताओं की दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं। गन्धर्व और अप्सराएँ गाने लगीं। और देवता “साधु, साधु” का घोष करते हुए ऊपर से फूल बरसाने लगे।


यह समाचार जब राजा जनमेजय तक पहुँचा कि तक्षक ने उनके पिता को डस लिया है, तो उस तरुण राजा का हृदय क्रोध से भर उठा।

जनमेजय बुद्धिमान भी थे और वीर भी, पर पिता की मृत्यु का यह रूप उनसे सहा न गया। उन्होंने ब्राह्मणों के साथ मिलकर विधिपूर्वक एक सर्प-सत्र आरम्भ कर दिया, एक ऐसा यज्ञ जिसमें संसार के सारे साँप आहुति बनकर अग्नि-कुण्ड में खिंचे चले आएँ और भस्म हो जाएँ।

परीक्षित् की परमगति की कथा में उनकी अन्तिम मुक्ति से जुड़ा यह अंश।
परीक्षित् की परमगति की कथा में उनकी अन्तिम मुक्ति से जुड़ा यह अंश।

यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित हुई। ब्राह्मणों के मन्त्र गूँजने लगे, और उन मन्त्रों के बल से बड़े-बड़े महासर्प खिंचे चले आए और कुण्ड में गिरकर भस्म होने लगे।

तक्षक ने यह देखा। उसने देखा कि जनमेजय के इस सर्प-सत्र की धधकती आग में एक-एक करके महासर्प जलकर राख हो रहे हैं। तब वही तक्षक, जिसके दाँतों की आग ने एक राजा को भस्म कर दिया था, स्वयं भय से थरथरा उठा और भागकर देवराज इन्द्र की शरण में जा छिपा।

बहुत साँप भस्म हो गए, पर तक्षक न आया। जनमेजय ने ब्राह्मणों से पूछा, “यह तक्षक अब तक इस अग्नि-कुण्ड में क्यों नहीं गिर रहा?” ब्राह्मणों ने कहा, “राजन्, तक्षक इस समय इन्द्र की शरण में जा बैठा है, और इन्द्र स्वयं उसकी रक्षा कर रहे हैं। उन्हीं ने उसे थाम रखा है, इसीलिए वह कुण्ड में नहीं गिर रहा।”

यह सुनकर जनमेजय ने ब्राह्मणों से कहा कि तब उसे इन्द्र समेत ही अग्नि में खींच लाओ। ब्राह्मणों ने मन्त्र में इन्द्र का नाम जोड़ दिया। मन्त्र की वह आकर्षण-शक्ति ऐसी थी कि इन्द्र अपने स्थान से, स्वर्गलोक से ही विचलित हो उठे। विमान पर बैठे इन्द्र तक्षक के साथ ही घबरा गए, और उनका विमान आकाश में चक्कर खाने लगा। तक्षक को थामे हुए इन्द्र स्वयं अग्नि-कुण्ड की ओर खिंचने लगे।

तभी अंगिरा-नन्दन बृहस्पति ने देखा कि देवराज इन्द्र विमान और तक्षक के साथ नीचे, अग्नि-कुण्ड की ओर गिरते आ रहे हैं। देवगुरु राजा जनमेजय के पास आए और बोले।

राजा परीक्षित् की परमगति से जुड़ी इस अन्तिम कथा का एक क्षण।
राजा परीक्षित् की परमगति से जुड़ी इस अन्तिम कथा का एक क्षण।

“नरेन्द्र, सर्पराज तक्षक को मार डालना आपके योग्य काम नहीं है। यह अमृत पी चुका है, इसलिए यह अजर और अमर है। और इससे बड़ी बात, राजन्, सुनिए। जगत् के प्राणी अपने-अपने कर्म के अनुसार ही जीते हैं, मरते हैं, और मरण के बाद की गति पाते हैं। कर्म के सिवा कोई दूसरा किसी को सुख या दुःख देने वाला नहीं है।”

जनमेजय सुन रहे थे, और उनके भीतर कहीं वह आग, जो पिता के लिए जली थी, अब टटोल रही थी कि वह किस पर बरसे।

“राजन्, यों तो बहुत-से लोगों की मृत्यु साँप, चोर, आग, बिजली, भूख-प्यास, रोग, ऐसे न जाने कितने निमित्तों से होती हुई दीखती है। पर ये सब तो कहने की बातें हैं। वास्तव में तो हर प्राणी अपने ही प्रारब्ध-कर्म का भोग करता है। तक्षक तो केवल वह निमित्त था जिसके बहाने आपके पिता को वहाँ जाना था, जहाँ वे चले गए।”

“इसलिए, राजन्, इस अभिचार-यज्ञ को बन्द कर दीजिए। आपने बहुत-से निरपराध सर्पों को जला दिया है। इस यज्ञ का फल केवल प्राणियों की हिंसा है, और कुछ नहीं। जगत् के सभी प्राणी अपने-अपने प्रारब्ध का ही भोग कर रहे हैं। आपके पिता उस पार चले गए। उन्हें वहाँ से लौटाने का कोई मार्ग इस अग्नि में नहीं है।”

बृहस्पति की बात जनमेजय के भीतर उतर गई। जो आग पिता के लिए जली थी, उसे यह समझ आ गया कि वह आग किसी को लौटा न सकेगी, केवल और साँपों को जलाएगी। उन्होंने महर्षि की बात का सम्मान किया और कहा, “आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।” और उन्होंने वह सर्प-सत्र वहीं बन्द कर दिया, और देवगुरु बृहस्पति की विधिपूर्वक पूजा की।

अग्नि-कुण्ड की आग धीरे-धीरे बैठ गई। इन्द्र का विमान फिर सीधा होकर स्वर्ग की ओर लौटा, तक्षक उनके साथ बचकर निकल गया, और कुण्ड में बची राख ठंडी होने लगी।

जिस तक्षक के नाम से एक राजा को मृत्यु का भय दिखाया गया था, वही तक्षक स्वयं भय से थरथराकर इन्द्र के पीछे जा छिपा। और जिस राजा को उसका विष डसने आया था, वह राजा अभय होकर, अपने ही मन से अपने प्राणों को परमात्मा में घोलकर जा चुका था। भय किसके पास बैठा रहा और किसके पास से उठ गया, यह उस यज्ञ की राख में लिखा रह गया।

साहित्यिक-संदर्भ

परीक्षित् की परमगति, जनमेजय का सर्प-सत्र और बृहस्पति का हस्तक्षेप श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध, अध्याय 6 में आते हैं। यही अध्याय शुकदेव-परीक्षित् संवाद का, और इस प्रकार समूचे ग्रन्थ की भीतरी कथा-कड़ी का, समापन करता है। परीक्षित् का कुश-आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर श्वास तक रोककर ब्रह्म-स्थित हो जाना (12.6.10), और कर्म के सिवा कोई सुख-दुःख का दाता न होने की बृहस्पति-वाणी (12.6.25), इसी अध्याय के मर्म हैं।

English