जीवन का अर्थ, और चार राही

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Reflections · चिंतन

जीवन का अर्थ, और चार राही

हर जीवन जिस एक सवाल से मिलता है, और चार जो उसे चार सड़कों पर ले गए

ज़रा बैठिए, साहब। एक सवाल है जो देर-सबेर हर दरवाज़े पर दस्तक देता है, इस सब का अर्थ क्या है। पहले हम उस सवाल का ढाँचा देखेंगे, और फिर चार राहियों के साथ चलेंगे जिन्होंने इसे चार अलग सड़कों पर ढोया, और एक ही क्षितिज की ओर बढ़े।

भाग एक · वही एक सवाल

हर जीवन एक न एक दिन इस सवाल से मिलता है, इस सब का अर्थ क्या है। भारतीय परंपरा इसका एक ढाँचा देती है। चार पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, जीवन के जायज़ लक्ष्य, जिनमें सांसारिक लक्ष्य धर्म के भीतर रह कर माने जाते हैं और मोक्ष आख़िरी लक्ष्य है। चार आश्रम, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास (पैट्रिक ओलिवेल, The Asrama System)। मोक्ष यहाँ का मुख्य उत्तर है, अद्वैत में आत्मा और ब्रह्म का एक होना, और भक्ति में किसी सगुण ईश्वर से प्रेम-भरा मिलन। और गीता की तीन राहें, ज्ञान, कर्म और भक्ति।

इसके आगे एक चौड़ा मैदान भी है, जिसे यहाँ एक नक़्शे की तरह रखा है, फ़ैसले की तरह नहीं। किसी के लिए उत्तर है उस परम से मिलना या उसकी सेवा। किसी के लिए दुख का थम जाना। किसी के लिए दूसरों के साथ सही रिश्ता और उनका फलना-फूलना। और किसी के लिए अर्थ ख़ुद चुनने और जवाब देने से बनता है, यह अस्तित्ववादी उत्तर है (विक्टर फ़्रैंकल, Man’s Search for Meaning)।

भाग दो · चार जिन्होंने इसे ढोया

अब चार शिक्षक, हर एक की एक छोटी कथा, और फिर उसके उत्तर की बनावट। इतिहास की एहतियातें साथ रखते हुए।

बुद्ध
सवाल

दुख क्यों है, और क्या वह मिट सकता है?

राह

चार आर्य सत्य, और अष्टांगिक मार्ग

ईसा
सवाल

परमेश्वर क्या माँगता है, जब उसका राज्य पास है?

राह

पश्चात्ताप, और ईश्वर तथा पड़ोसी से प्रेम

कृष्ण
सवाल

कर्तव्य, अपनों और मृत्यु के सामने क्या करूँ?

राह

अनासक्त कर्म, और देहातीत आत्मा में ठहराव

गुरु नानक
सवाल

उस एक निराकार को कैसे जानूँ?

राह

नाम-सिमरन, ईमानदार गृहस्थी, हउमै का गलना

चार शिक्षक, एक-सा सवाल, चार राहें

बुद्ध

राजकुमार ने महल के बाहर चार दृश्य देखे, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, और एक संन्यासी। सवाल उठा, दुख क्यों है, और क्या वह मिट सकता है। उत्तर चार आर्य सत्यों में आया, कि साधारण जीवन में एक बेचैनी है, उसकी जड़ तृष्णा है, उसका थमना हो सकता है, और उस तक अष्टांगिक मार्ग ले जाता है। साथ में प्रतीत्यसमुत्पाद और अनात्म, कि कुछ भी अपने आप अलग नहीं, और कोई स्थिर मैं नहीं। पहला उपदेश धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त है (संयुक्त निकाय 56.11)।

ईसा

एक एहतियात पहले। इतिहास की पुनर्रचना उन्हें दूसरे मंदिर-काल के यहूदी समाज में रखती है, एक यहूदी सर्वनाश-भविष्यवक्ता, जिसका सवाल है कि परमेश्वर क्या माँगता है, जब उसका राज्य पास आ रहा है। उत्तर है पश्चात्ताप, ईश्वर और पड़ोसी से प्रेम (मरकुस 12:28-31), उन उलट-फेरों में जो धन्य-वचनों में हैं (मत्ती 5), और एक आख़िरी न्याय में भरोसा। एहतियात यह कि स्रोत वही सुसमाचार हैं, जो दशकों बाद उन समुदायों ने लिखे जो उनकी आराधना करते थे।

कृष्ण

एहतियात पहले, कि यह गीता का दैवी वक्ता है, कोई इतिहास में दर्ज शिक्षक नहीं। संकट अर्जुन का है, अपनों, कर्तव्य और मृत्यु के सामने एक नैतिक जड़ता। उत्तर हैं, वह देहातीत आत्मा जो शरीर नहीं है (अध्याय 2), फल की आसक्ति छोड़ कर किया गया कर्म, कर्म-योग (अध्याय 2 और 3), और प्रेम-भरा समर्पण उस विराट रूप के दर्शन के साथ (अध्याय 11)।

गुरु नानक

सवाल यह कि उस एक निराकार सत्य को कैसे जानें, और अड़चन है हउमै, वह आत्म-केंद्रित अहं। जपजी और मूल मंत्र के सिर पर इक ओंकार है, यहाँ देवनागरी में, सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु। राह है नाम-सिमरन, यानी नाम का स्मरण, एक ईमानदार गृहस्थ जीवन में जिया हुआ, किरत करो, वंड छको, नाम जपो। और वह वचन कि न कोई हिन्दू है न कोई मुसलमान। एहतियात यह कि जन्मसाखी की जीवन-कथाएँ भक्ति-भाव से लिखी गई हैं (डब्ल्यू. एच. मैक्लाउड)।

और अंत में

हर एक उसी एक हालत के किसी चेहरे से मिलता है, कि हम दुख पाते हैं, कि हम मरते हैं, कि हमें बिना पक्के पते के कर्म करना है, कि हम परम से कटा हुआ महसूस करते हैं। बुद्ध इसे तृष्णा मानते हैं, जिसे छोड़ देना है। ईसा इसे एक रिश्ता मानते हैं, जिसे आते न्याय से पहले फिर जोड़ना है। कृष्ण की गीता इसे एक पुकार मानती है, कि देहातीत आत्मा में ठहर कर ठीक कर्म करो। नानक इसे एक अहं मानते हैं, जिसे उस एक में गला देना है। चारों उत्तर सच्चे हैं, और किसी एक सिद्धांत में मिल कर एक नहीं हो जाते।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चार पुरुषार्थ क्या हैं?

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, जीवन के चार जायज़ लक्ष्य। सांसारिक लक्ष्य धर्म के भीतर रह कर, और मोक्ष आख़िरी लक्ष्य।

क्या इन चारों शिक्षकों का उत्तर एक ही है?

नहीं। चारों एक ही हालत के किसी चेहरे से मिलते हैं, पर उनके उत्तर अलग हैं, और किसी एक सिद्धांत में घुल कर एक नहीं होते।

इसमें इतिहास की एहतियात क्यों रखी है?

क्योंकि कृष्ण गीता के दैवी वक्ता हैं, ईसा के स्रोत बाद के सुसमाचार हैं, और नानक की जीवन-कथाएँ भक्ति-भाव की हैं। इन फ़र्क़ों को साफ़ रखना ज़रूरी है।

पढ़ने के लिए

  • रूपर्ट गेथिन, The Foundations of Buddhism
  • वालपोल राहुल, What the Buddha Taught
  • ई. पी. सैंडर्स, The Historical Figure of Jesus
  • बार्ट एरमन, Jesus: Apocalyptic Prophet of the New Millennium
  • अंगेलिका मालिनार, The Bhagavadgita
  • रिचर्ड डेविस, The Bhagavad Gita: A Biography
  • डब्ल्यू. एच. मैक्लाउड, Guru Nanak and the Sikh Religion
  • पैट्रिक ओलिवेल, The Asrama System
  • विक्टर फ़्रैंकल, Man’s Search for Meaning

जो तंत्र में सोचता है, उसके लिए इस पन्ने का काम यह है। एक ही हालत को चार तरह से नाम दिया जा सकता है, तृष्णा, टूटा रिश्ता, जड़ता, या अहं, और हर नाम अपनी एक राह खोलता है। इन्हें एक में मिलाने की जल्दी मत कीजिए। चारों को अलग-अलग, पूरे आदर के साथ, अपनी-अपनी जगह रहने दीजिए।