राम कितने वर्ष जिए
एक पाठक देखता है कि संख्याएँ नहीं बैठतीं, और वही ठोकर चार तरह के समय खोल देती है
ज़रा रुकिए, साहब। एक पाठक रामायण पढ़ते हुए ठिठकता है, क्योंकि संख्याएँ आपस में नहीं बैठतीं। कहीं ग्यारह हज़ार वर्ष, कहीं पच्चीस, कहीं सौ। यह उलझन झुँझलाने की जगह नहीं, एक दरवाज़ा है, जो समय के चार अलग मतलबों में खुलता है। आइए, चारों को अलग-अलग देखें, और अंत में उन्हें साथ थामने का एक तरीक़ा निकालें।
कब के चार मतलब
एक पाठक देखता है कि रामायण की संख्याएँ आपस में नहीं बैठतीं, और यही ठोकर चार तरह के समय खोल देती है। कब के चार अलग मतलब हैं। वह तारीख़ जब पाठ अपने रूप में आया। उसके पीछे की पुरानी मौखिक धारा। कथा के भीतर का वह समय जो कहानी ख़ुद गिनती है। और परंपरा का खगोलीय युग-समय। ये अलग सवालों के जवाब हैं, और एक-दूसरे में बदले नहीं जाते।
भीतर की संख्याएँ
कथा के भीतर की संख्याएँ साफ़ और चौंकाने वाली हैं। राम का राज्य, दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च (daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca), दस हज़ार वर्ष और एक हज़ार और, यानी ग्यारह हज़ार वर्ष (बाल कांड 1.97, और एक छोटा दस हज़ार युद्ध कांड 128.106 में)। दशरथ बाल कांड में अपने को साठ हज़ार वर्ष का बताते हैं, जब विश्वामित्र राम को माँगने आते हैं। फिर भी सीता वनवास के आरंभ में उम्र बताती हैं, राम पच्चीस और वे स्वयं अठारह (अरण्य कांड), और काव्य सौ वर्ष की मनुष्य-आयु को सामान्य मानता है (सुंदर कांड, जीवेत् शरदः शतम्, jīvet śaradaḥ śatam)। संख्याएँ काव्य के भीतर भी एक कैलेंडर नहीं बनातीं।
युग का ढाँचा, और बीच की खाई
रामायण त्रेता युग में बैठती है, और महाभारत का युद्ध द्वापर और कलि की संधि पर, जहाँ कृष्ण का जाना कलि का आरंभ बनता है, सूर्य सिद्धांत के हिसाब से 3102 ई.पू.। युगों की लंबाई मानव-वर्षों में, मनुस्मृति (1.68-71) और पुराणों से, 4:3:2:1 के अनुपात में, सत्य 1,728,000, त्रेता 1,296,000, द्वापर 864,000, कलि 432,000, और एक महायुग 4,320,000। दोनों महाकाव्यों के बीच की दूरी त्रेता का बचा हिस्सा और पूरा द्वापर है, यानी लाखों वर्षों के पैमाने पर।
कथा के पुल भी हैं। हनुमान भीम को युगों का भेद समझाते हैं (महाभारत, वन पर्व)। परशुराम दोनों महाकाव्यों में त्रेता-द्वापर की संधि पर खड़े मिलते हैं। और महाभारत स्वयं पांडवों को उनके वनवास में रामायण सुनाता है। एक बारीक़ी विद्वान जोड़ते हैं, कि महाकाव्यों को नामित युगों में बिठाना अपने आप में एक बाद की व्यवस्था है, जो पुराणों के साथ लगभग 500 ई. के बाद मानक बनी (देवदत्त पटनायक)।
आयु का सिद्धांत
एक पुराण-योजना आयु को हर युग में दस गुना घटाती है, सत्य में एक लाख वर्ष, त्रेता में दस हज़ार, द्वापर में एक हज़ार, कलि में सौ। इस हिसाब से लंबी आयु त्रेता का सामान्य पैमाना है, और सौ वर्ष कलि का अंक, यानी हमारा। राम का ग्यारह हज़ार वर्ष का राज्य त्रेता के स्तर पर बैठता है। एक झोल है, कि दशरथ का साठ हज़ार त्रेता को लाँघ कर सत्य की ओर चला जाता है। यह योजना सर्वसम्मत भी नहीं, क्योंकि मनुस्मृति (1.83) एक छोटी सीढ़ी देती है, कृत युग में चार सौ वर्ष, हर युग में सौ कम, जो त्रेता को तीन सौ पर रखेगी और इन बड़ी संख्याओं को नहीं सँभालेगी।
अब इसे कैसे थामें
यहीं इस पन्ने का दिल है। सौ वर्ष वाली पंक्ति अधिकतर एक भरे-पूरे जीवन का मुहावरा है, इसलिए हो सकता है वह ग्यारह हज़ार की प्रतिद्वंद्वी संख्या हो ही नहीं, और दोनों अलग-अलग सुरों में ठहर सकती हैं। कौन-सा पाठ पुराना है, यह सवाल जहाँ तक तय हो सकता है, पांडुलिपियों से तय होता है, बड़ौदा के समीक्षित संस्करण (जी. एच. भट्ट और अन्य) और ज्ञात पाठ-भेदों तथा प्रक्षेपों से, इस आधार पर नहीं कि कौन-सा पाठ हमें छू जाता है। विस्मय के लिए पढ़ना एक ईमानदार और पुराना ढंग है।
एक खुली नज़र यह पूछती है कि हर संख्या कर क्या रही है। ग्यारह हज़ार कहता है, एक ऐसा युग जिसमें धर्म का राज पूरा था, समय उदार बना दिया गया। सौ कहता है, कि एक भरा हुआ मनुष्य-जीवन भी, ठीक से जिया जाए, तो काफ़ी है। दोनों को साथ थामा जा सकता है, और विस्मय भी बचा रहता है, बिना किसी एक को भूल ठहराए। एक बात और, आधुनिक खगोलीय-तिथि का प्रयास (पुष्कर भटनागर, नीलेश ओक) ग्रहों के वर्णन को पढ़ कर लगभग पाँचवीं से सातवीं सहस्राब्दी ई.पू. की एक तारीख़ निकालता है, जो विवादित है, मुख्यधारा की पाठ-विद्या से बाहर है, और युग की संख्याओं के पास भी नहीं ठहरती।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राम ने कितने वर्ष राज किया?
काव्य के भीतर ग्यारह हज़ार वर्ष (बाल कांड 1.97), और एक जगह दस हज़ार (युद्ध कांड)। यह त्रेता युग के आयु-पैमाने पर बैठता है।
फिर सीता राम को पच्चीस का क्यों बताती हैं?
क्योंकि कथा एक कैलेंडर नहीं है। पच्चीस और सौ वर्ष वाली पंक्ति एक भरे जीवन के मुहावरे हैं, और ग्यारह हज़ार युग के पैमाने का अंक। दोनों अलग सुरों में हैं।
कौन-सा पाठ सही है?
कौन-सा पुराना है, यह पांडुलिपियों और समीक्षित संस्करण से तय होता है, इससे नहीं कि कौन-सा हमें छू जाता है। और हर संख्या क्या कह रही है, यह पूछना ज़्यादा काम का है।
क्या इसकी कोई पक्की ऐतिहासिक तारीख़ है?
मुख्यधारा की पाठ-विद्या इसे लाखों वर्ष के युग-ढाँचे में रखती है। आधुनिक खगोलीय-तिथि के प्रयास विवादित हैं और उस ढाँचे से मेल नहीं खाते।
पढ़ने के लिए
- वाल्मीकि रामायण, बाल, अरण्य, सुंदर व युद्ध कांड, उद्धृत श्लोकों के अनुसार
- मनुस्मृति, 1.68-71 और 1.83
- महाभारत, वन पर्व
- देवदत्त पटनायक, युग-व्यवस्था के बाद के मूल पर
- बड़ौदा का समीक्षित रामायण, जी. एच. भट्ट और अन्य
जो तंत्र में सोचता है, उसके लिए यह पन्ना एक आदत देता है। संख्याओं को आपस में जोड़ कर एक हिसाब बनाने की जल्दी छोड़ दीजिए, और हर संख्या से पूछिए कि वह किस सुर में बोल रही है। ग्यारह हज़ार एक उदार युग का सुर है, सौ एक भरे जीवन का। दोनों को साथ रखने से न हिसाब बिगड़ता है, न विस्मय।