ऊतम जगंनाथ जगदीसुर हम पापी सरनि रखे ॥
तुम वड पुरख दीन दुख भंजन हरि दीओ नामु मुखे ॥1॥
हरि गुन ऊच नीच हम गाए गुर सतिगुर संगि सखे ॥
जिउ चंदन संगि बसै निंमु बिरखा गुन चंदन के बसखे ॥2॥
हमरे अवगन बिखिआ बिखै के बहु बार बार निमखे ॥
अवगनिआरे पाथर भारे हरि तारे संगि जनखे ॥3॥
जिन कउ तुम हरि राखहु सुआमी सभ तिन के पाप क्रिखे ॥
जन नानक के दइआल प्रभ सुआमी तुम दुसट तारे हरणखे ॥4॥3॥
मेरे मन जपि हरि हरि राम रंगे ॥
हरि हरि क्रिपा करी जगदीसुरि हरि धिआइओ जन पगि लगे ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के भूल चूक हम अब आए प्रभ सरनगे ॥
तुम सरणागति प्रतिपालक सुआमी हम राखहु वड पापगे ॥1॥
तुमरी संगति हरि को को न उधरिओ प्रभ कीए पतित पवगे ॥
गुन गावत छीपा दुसटारिओ प्रभि राखी पैज जनगे ॥2॥
जो तुमरे गुन गावहि सुआमी हउ बलि बलि बलि तिनगे ॥
भवन भवन पवित्र सभि कीए जह धूरि परी जन पगे ॥3॥
तुमरे गुन प्रभ कहि न सकहि हम तुम वड वड पुरख वडगे ॥
जन नानक कउ दइआ प्रभ धारहु हम सेवह तुम जन पगे ॥4॥4॥
मेरे मन जपि हरि हरि नामु मने ॥
जगंनाथि किरपा प्रभि धारी मति गुरमति नाम बने ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन हरि जसु हरि हरि गाइओ उपदेसि गुरू गुर सुने ॥
किलबिख पाप नाम हरि काटे जिव खेत क्रिसानि लुने ॥1॥
तुमरी उपमा तुम ही प्रभ जानहु हम कहि न सकहि हरि गुने ॥
जैसे तुम तैसे प्रभ तुम ही गुन जानहु प्रभ अपुने ॥2॥
माइआ फास बंध बहु बंधे हरि जपिओ खुल खुलने ॥
जिउ जल कुंचरु तदूऐ बांधिओ हरि चेतिओ मोख मुखने ॥3॥
सुआमी पारब्रहम परमेसरु तुम खोजहु जुग जुगने ॥
तुमरी थाह पाई नही पावै जन नानक के प्रभ वडने ॥4॥5॥
मेरे मन कलि कीरति हरि प्रवणे ॥
हरि हरि दइआलि दइआ प्रभ धारी लगि सतिगुर हरि जपणे ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर जिसने भी) परमात्मा का नाम (जपा है) गुरू की कृपा से ही जपा है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।