गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: किसी तीर्थ पर (भी स्नान वास्ते) जाता है (इस तरह) उसका कामादिक रोग दूर नहीं हो सकता। परमात्मा के नाम के बिना कोई मनुष्य आत्मिक आनंद नहीं पा सकता। 4। (बनवास। डूगर वास। हठ। निग्रह। तीर्थ स्नान आदि) यतन मनुष्य करता है। ऐसे किसी भी तरीके से काम-वासना रोकी नहीं जा सकती। मन डोलता ही रहता है और जीव नर्क में ही पड़ा रहता है। काम-वासना आदि विकारों में बँधा हुआ जमराज की पुरी में (आत्मिक कलेशों की) सजा भुगतता है। परमात्मा के नाम के बिना जीवात्मा विकारों में जलती-भुजती रहती है। 5। अनेकों सिद्ध-साधिक ऋषि-मुनि (हठ निग्रह आदि करते हैं पर) हठ निग्रह से अंदरूनी विक्षेपता को मिटा नहीं सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने विचार-मण्डल में टिका के गुरू की (बताई) सेवा (का उद्यम) ग्रहण करते हैं उनके मन में उनके शरीर में (भाव। इन्द्रियों में) पवित्रता आ जाती है। उनके अंदर अहंकार का अभाव हो जाता है। 6। जिस मनुष्य को अपनी मेहर से परमात्मा मिलाता है वह सदा-स्थिर-प्रभू-नाम (की दाति) प्राप्त करता है। (हे प्रभू !) मैं भी आपकी शरण आ टिका हूँ (ताकि आपके चरणों का) श्रेष्ठ प्रेम (मैं हासिल कर सकूँ)। (जीव के अंदर) आपकी भक्ति आपका प्रेम आपकी मेहर से ही पैदा होते हैं। हे हरी ! (अगर आपकी मेहर हैं तो) मैं गुरू की शरण पड़ के आपके नाम का जाप जपता रहूँ। 7। अगर जीव का मन परमात्मा के नाम-रस में भीग जाए तो अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। पर (नाम-रस में भीगने की यह दाति) झूठ से अथवा पाखण्ड करके कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता। गुरू के शबद के बिना परमात्मा का दरबार नहीं मिल सकता। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह जगत के मूल प्रभू को मिल जाता है। वह प्रभू के गुणों की विचार (का स्वभाव) प्राप्त कर लेता है। 8। 6।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ हे पागल जीव ! जैसे आप (जगत में) आया है वैसे ही (यहाँ से) चला भी जाएगा। जैसे आपको जनम मिला है वैसे ही मौत भी हैं जाएगी (यहाँ किसी भी हालत में सदा बैठे नहीं रहना)। ज्यों-ज्यों आप दुनिया के रसों को भोग भोगता है। त्यों-त्यों उतना ही (आपके शरीर को और आत्मा को) दुख-रोग चिपक रहा है। (इन भोगों में मस्त हैं के) परमात्मा का नाम बिसार के आप जनम-मरण के चक्कर में पड़ा समझ। 1। (हे जीव !) अपना शरीर और धन देख के आप अहंकार में आया रहता है। सोने और स्त्री से आप मोह बढ़ाए जा रहा है। आप क्यों परमात्मा का नाम बिसार रहा है। और। क्यों भटकना में पड़ रहा है। 1। रहाउ। (हे जीव ! तूने अपने आप को) काम-वासना से नहीं बचाया। तूने ऊँचा आचरण नहीं बनाया। तूने इन्द्रियों को बुरी तरफ से रोकने का प्रयत्न नहीं किया। तूने मीठा स्वभाव नहीं बनाया। (विकारों के कारण) अपवित्र हुए शरीर पिंजर में आप लकड़ी (की तरह सूखा हुआ कठोर-दिल) हैं चुका है। आपके अंदर ना दूसरों की भलाई का ख्याल है। ना दूसरों की सेवा की तमन्ना है। ना आचरणिक पवित्रता है। ना ही कोई संयम है। साध-संगति से दूर रह के आपका मानस जनम व्यर्थ जा रहा है। 2। (हे जीव !) आप माया की लालच में लगा हुआ है। परमात्मा का नाम तूने भुला दिया है। माया की खातिर दौड़ते-भागते आपका जीवन (व्यर्थ) चला जाता है। जब अचनचेत जम आ के आपको केसों से पकड़ के पटका के मारेगा। काल के मुँह में पहुँचे हुए आपको (सिमरन की) सुरति नहीं आ सकेगी। 3। दिन-रात आप पराई निंदा करता है। दूसरों के साथ ईरखा करता है। आपके हृदय में ना परमात्मा का नाम है और ना ही सब जीवों के लिए दया-प्यार । गुरू के शबद के बिना ना आप ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकेगा ना ही (लोक-परलोक की) इज्जत। परमात्मा के नाम से टूट के आप नर्क में ही पड़ा हुआ है। 4। (हे जीव ! माया की खातिर) आप छिन-पल में आप स्वांगी की तरह कई रूप धारण करता है। आप मोह में पापों में गलतान हुआ पड़ा है। हर तरफ़ माया का प्सारा देख के आप माया के मोह में मस्त हैं रहा है। 5। (हे पागल जीव !) आप विकारों की खातिर अनेकों पसारे पसारता है गुरू के शबद की लगन के बिना आप (विकारों की) भटकना में भटकता है। आपको अहंकार का बड़ा रोग बड़ा दुख चिपका हुआ है। अगर आप चाहता है ये रोग दूर हैं जाए तो गुरू की शिक्षा ले। 6। माया-ग्रसित जीव जब सुखों को और धन को आता देखता है तो इसके मन में अहंकार पैदा होता है। पर जिस परमात्मा का दिया हुआ ये शरीर और धन है वह दोबारा वापस ले लेता है। माया-ग्रसित जीव को सदा यही सहम खाए जाता है। 7। (हे जीव ! ये शरीर। ये धन। ये सोना। ये स्त्री) जो कुछ दिखाई दे रहा है। ये सब कुछ उस परमात्मा की मेहर सदका ही मिला हुआ है। पर आखिरी वक्त में इनमें से भी (किसी के) साथ नहीं जा सकता। (दुनिया के ये पदार्थ देने वाला) वह परमात्मा सारे जगत का मूल है। सब में व्यापक है। बेअंत है। जो मनुष्य उसका नाम अपने हृदय में टिकाता है। वह (संसार-समुंद्र की मोह की लहरों में से) पार लांघ जाता है। 8। (हे साकत जीव ! मरना तो सबने है। फिर आप अपने किसी) मरे हुए सन्बंधी को रोता है और (रो-रो के) किस को सुनाता है। (परमात्मा की याद से टूट के) आप बड़े भयानक (डरावने) संसार-समुंदर में गोते खा रहा है। माया-ग्रसित जीव अपने परिवार को। धन को। सुंदर घरों को देख-देख के निकम्मे जंजाल में फसा हुआ है। 9।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “किसी तीर्थ पर (भी स्नान वास्ते) जाता है (इस तरह) उसका कामादिक रोग दूर नहीं हो सकता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।