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अंग ९०६ · रामकली

अंग
906
रामकली
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  1. तीरथि भरमसि बिआधि न जावै ॥
  2. जिउ आइआ तिउ जावहि बउरे जिउ जनमे तिउ मरणु भइआ ॥

तीरथि भरमसि बिआधि न जावै ॥

अंग ९०५ से चला आ रहा अंश

तीरथि भरमसि बिआधि न जावै ॥
नाम बिना कैसे सुखु पावै ॥4॥
जतन करै बिंदु किवै न रहाई ॥
मनूआ डोलै नरके पाई ॥
जम पुरि बाधो लहै सजाई ॥
बिनु नावै जीउ जलि बलि जाई ॥5॥
सिध साधिक केते मुनि देवा ॥
हठि निग्रहि न त्रिपतावहि भेवा ॥
सबदु वीचारि गहहि गुर सेवा ॥
मनि तनि निरमल अभिमान अभेवा ॥6॥
करमि मिलै पावै सचु नाउ ॥
तुम सरणागति रहउ सुभाउ ॥
तुम ते उपजिओ भगती भाउ ॥
जपु जापउ गुरमुखि हरि नाउ ॥7॥
हउमै गरबु जाइ मन भीनै ॥
झूठि न पावसि पाखंडि कीनै ॥
बिनु गुर सबद नही घरु बारु ॥
नानक गुरमुखि ततु बीचारु ॥8॥6॥

हिन्दी अर्थ: किसी तीर्थ पर (भी स्नान वास्ते) जाता है (इस तरह) उसका कामादिक रोग दूर नहीं हो सकता। परमात्मा के नाम के बिना कोई मनुष्य आत्मिक आनंद नहीं पा सकता। 4। (बनवास। डूगर वास। हठ। निग्रह। तीर्थ स्नान आदि) यतन मनुष्य करता है। ऐसे किसी भी तरीके से काम-वासना रोकी नहीं जा सकती। मन डोलता ही रहता है और जीव नर्क में ही पड़ा रहता है। काम-वासना आदि विकारों में बँधा हुआ जमराज की पुरी में (आत्मिक कलेशों की) सजा भुगतता है। परमात्मा के नाम के बिना जीवात्मा विकारों में जलती-भुजती रहती है। 5। अनेकों सिद्ध-साधिक ऋषि-मुनि (हठ निग्रह आदि करते हैं पर) हठ निग्रह से अंदरूनी विक्षेपता को मिटा नहीं सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने विचार-मण्डल में टिका के गुरू की (बताई) सेवा (का उद्यम) ग्रहण करते हैं उनके मन में उनके शरीर में (भाव। इन्द्रियों में) पवित्रता आ जाती है। उनके अंदर अहंकार का अभाव हो जाता है। 6। जिस मनुष्य को अपनी मेहर से परमात्मा मिलाता है वह सदा-स्थिर-प्रभू-नाम (की दाति) प्राप्त करता है। (हे प्रभू !) मैं भी आपकी शरण आ टिका हूँ (ताकि आपके चरणों का) श्रेष्ठ प्रेम (मैं हासिल कर सकूँ)। (जीव के अंदर) आपकी भक्ति आपका प्रेम आपकी मेहर से ही पैदा होते हैं। हे हरी ! (अगर आपकी मेहर हो तो) मैं गुरू की शरण पड़ के आपके नाम का जाप जपता रहूँ। 7। अगर जीव का मन परमात्मा के नाम-रस में भीग जाए तो अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। पर (नाम-रस में भीगने की यह दाति) झूठ से अथवा पाखण्ड करके कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता। गुरू के शबद के बिना परमात्मा का दरबार नहीं मिल सकता। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह जगत के मूल प्रभू को मिल जाता है। वह प्रभू के गुणों की विचार (का स्वभाव) प्राप्त कर लेता है। 8। 6।

जिउ आइआ तिउ जावहि बउरे जिउ जनमे तिउ मरणु भइआ ॥

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रामकली महला 1 ॥
जिउ आइआ तिउ जावहि बउरे जिउ जनमे तिउ मरणु भइआ ॥
जिउ रस भोग कीए तेता दुखु लागै नामु विसारि भवजलि पइआ ॥1॥
तनु धनु देखत गरबि गइआ ॥
कनिक कामनी सिउ हेतु वधाइहि की नामु विसारहि भरमि गइआ ॥1॥ रहाउ ॥
जतु सतु संजमु सीलु न राखिआ प्रेत पिंजर महि कासटु भइआ ॥
पुंनु दानु इसनानु न संजमु साधसंगति बिनु बादि जइआ ॥2॥
लालचि लागै नामु बिसारिओ आवत जावत जनमु गइआ ॥
जा जमु धाइ केस गहि मारै सुरति नही मुखि काल गइआ ॥3॥
अहिनिसि निंदा ताति पराई हिरदै नामु न सरब दइआ ॥
बिनु गुर सबद न गति पति पावहि राम नाम बिनु नरकि गइआ ॥4॥
खिन महि वेस करहि नटूआ जिउ मोह पाप महि गलतु गइआ ॥
इत उत माइआ देखि पसारी मोह माइआ कै मगनु भइआ ॥5॥
करहि बिकार विथार घनेरे सुरति सबद बिनु भरमि पइआ ॥
हउमै रोगु महा दुखु लागा गुरमति लेवहु रोगु गइआ ॥6॥
सुख संपति कउ आवत देखै साकत मनि अभिमानु भइआ ॥
जिस का इहु तनु धनु सो फिरि लेवै अंतरि सहसा दूखु पइआ ॥7॥
अंति कालि किछु साथि न चालै जो दीसै सभु तिसहि मइआ ॥
आदि पुरखु अपरंपरु सो प्रभु हरि नामु रिदै लै पारि पइआ ॥8॥
मूए कउ रोवहि किसहि सुणावहि भै सागर असरालि पइआ ॥
देखि कुटंबु माइआ ग्रिह मंदरु साकतु जंजालि परालि पइआ ॥9॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ हे पागल जीव ! जैसे आप (जगत में) आया है वैसे ही (यहाँ से) चला भी जाएगा। जैसे आपको जनम मिला है वैसे ही मौत भी हो जाएगी (यहाँ किसी भी हालत में सदा बैठे नहीं रहना)। ज्यों-ज्यों आप दुनिया के रसों को भोग भोगता है। त्यों-त्यों उतना ही (आपके शरीर को और आत्मा को) दुख-रोग चिपक रहा है। (इन भोगों में मस्त हो के) परमात्मा का नाम बिसार के आप जनम-मरण के चक्कर में पड़ा समझ। 1। (हे जीव !) अपना शरीर और धन देख के आप अहंकार में आया रहता है। सोने और स्त्री से आप मोह बढ़ाए जा रहा है। आप क्यों परमात्मा का नाम बिसार रहा है। और। क्यों भटकना में पड़ रहा है। 1। रहाउ। (हे जीव ! आपने अपने आप को) काम-वासना से नहीं बचाया। आपने ऊँचा आचरण नहीं बनाया। आपने इन्द्रियों को बुरी तरफ से रोकने का प्रयत्न नहीं किया। आपने मीठा स्वभाव नहीं बनाया। (विकारों के कारण) अपवित्र हुए शरीर पिंजर में आप लकड़ी (की तरह सूखा हुआ कठोर-दिल) हो चुका है। आपके अंदर ना दूसरों की भलाई का ख्याल है। ना दूसरों की सेवा की तमन्ना है। ना आचरणिक पवित्रता है। ना ही कोई संयम है। साध-संगति से दूर रह के आपका मानस जनम व्यर्थ जा रहा है। 2। (हे जीव !) आप माया की लालच में लगा हुआ है। परमात्मा का नाम आपने भुला दिया है। माया की खातिर दौड़ते-भागते आपका जीवन (व्यर्थ) चला जाता है। जब अचनचेत जम आ के आपको केसों से पकड़ के पटका के मारेगा। काल के मुँह में पहुँचे हुए आपको (सिमरन की) सुरति नहीं आ सकेगी। 3। दिन-रात आप पराई निंदा करता है। दूसरों के साथ ईरखा करता है। आपके हृदय में ना परमात्मा का नाम है और ना ही सब जीवों के लिए दया-प्यार । गुरू के शबद के बिना ना आप ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकेगा ना ही (लोक-परलोक की) इज्जत। परमात्मा के नाम से टूट के आप नर्क में ही पड़ा हुआ है। 4। (हे जीव ! माया की खातिर) आप छिन-पल में आप स्वांगी की तरह कई रूप धारण करता है। आप मोह में पापों में गलतान हुआ पड़ा है। हर तरफ़ माया का प्सारा देख के आप माया के मोह में मस्त हो रहा है। 5। (हे पागल जीव !) आप विकारों की खातिर अनेकों पसारे पसारता है गुरू के शबद की लगन के बिना आप (विकारों की) भटकना में भटकता है। आपको अहंकार का बड़ा रोग बड़ा दुख चिपका हुआ है। अगर आप चाहते हैं ये रोग दूर हो जाए तो गुरू की शिक्षा ले। 6। माया-ग्रसित जीव जब सुखों को और धन को आता देखता है तो इसके मन में अहंकार पैदा होता है। पर जिस परमात्मा का दिया हुआ ये शरीर और धन है वह दोबारा वापस ले लेता है। माया-ग्रसित जीव को सदा यही सहम खाए जाता है। 7। (हे जीव ! ये शरीर। ये धन। ये सोना। ये स्त्री) जो कुछ दिखाई दे रहा है। ये सब कुछ उस परमात्मा की मेहर सदका ही मिला हुआ है। पर आखिरी वक्त में इनमें से भी (किसी के) साथ नहीं जा सकता। (दुनिया के ये पदार्थ देने वाला) वह परमात्मा सारे जगत का मूल है। सब में व्यापक है। बेअंत है। जो मनुष्य उसका नाम अपने हृदय में टिकाता है। वह (संसार-समुंद्र की मोह की लहरों में से) पार लांघ जाता है। 8। (हे साकत जीव ! मरना तो सबने है। फिर आप अपने किसी) मरे हुए सन्बंधी को रोता है और (रो-रो के) किस को सुनाता है। (परमात्मा की याद से टूट के) आप बड़े भयानक (डरावने) संसार-समुंदर में गोते खा रहा है। माया-ग्रसित जीव अपने परिवार को। धन को। सुंदर घरों को देख-देख के निकम्मे जंजाल में फसा हुआ है। 9।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 906 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९०६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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