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अंग 904

अंग
904
रामकली
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
माइआ मोहु बिवरजि समाए ॥
सतिगुरु भेटै मेलि मिलाए ॥
नामु रतनु निरमोलकु हीरा ॥
तितु राता मेरा मनु धीरा ॥2॥
हउमै ममता रोगु न लागै ॥
राम भगति जम का भउ भागै ॥
जमु जंदारु न लागै मोहि ॥
निरमल नामु रिदै हरि सोहि ॥3॥
सबदु बीचारि भए निरंकारी ॥
गुरमति जागे दुरमति परहारी ॥
अनदिनु जागि रहे लिव लाई ॥
जीवन मुकति गति अंतरि पाई ॥4॥
अलिपत गुफा महि रहहि निरारे ॥
तसकर पंच सबदि संघारे ॥
पर घर जाइ न मनु डोलाए ॥
सहज निरंतरि रहउ समाए ॥5॥
गुरमुखि जागि रहे अउधूता ॥
सद बैरागी ततु परोता ॥
जगु सूता मरि आवै जाइ ॥
बिनु गुर सबद न सोझी पाइ ॥6॥
अनहद सबदु वजै दिनु राती ॥
अविगत की गति गुरमुखि जाती ॥
तउ जानी जा सबदि पछानी ॥
एको रवि रहिआ निरबानी ॥7॥
सुंन समाधि सहजि मनु राता ॥
तजि हउ लोभा एको जाता ॥
गुर चेले अपना मनु मानिआ ॥
नानक दूजा मेटि समानिआ ॥8॥3॥

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य माया का मोह रोक के प्रभू-नाम में लीन हो जाता है- जिस मनुष्य को गुरू मिलता है गुरू उसको संगति से मिलाता है परमात्मा का नाम (मानो। एक) रतन है (एक ऐसा) हीरा है जिसका मूल्य नहीं आँका जा सकता। (गुरू की शरण पड़ के) मेरा मन भी उस नाम में रंगा गया है उस नाम में टिक गया है। 2। अहंकार-रोग। माया की ममता वाला रोग (मन को) नहीं चिपकता। (गुरू के द्वारा) परमात्मा की भक्ति करने से मौत का डर दूर हो जाता है। (गुरू की कृपा से) भयानक जम भी मुझे नहीं छूता (क्योंकि) परमात्मा का पवित्र नाम मेरे हृदय में सुशोभित है। 3। गुरू के शबद को सोच-मण्डल में टिका के परमात्मा के ही (सेवक) हो जाना है। मन में गुरू की शिक्षा प्रबल हो जाती है और दुर्मति दूर हो जाती है। जो मनुष्य प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ के हर वक्त (माया के हमलों की ओर से) सचेत रहते हैं। वे अपने अंदर वह ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेते हैं जिससे (वे) माया में कार्य-व्यवहार करते हुए भी (उन्हें) माया के बँधनों से आजाद कर देती है। 4। (गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग) शरीर-गुफा के अंदर ही माया से निर्लिप रहते हैं माया के प्रभाव से अलग रहते हैं। गुरू के शबद द्वारा वे कामादिक पाँच चोरों को मार लेते हैं। (गुरू की शरण पड़ कर सिमरन करने वाला सख्श) अपने मन को पराए घर की ओर जा के डोलने नहीं देता। (गुरू की कृपा से ही सिमरन करके) मैं अडोल आत्मिक अवस्था मेंएक रस लीन रहता हूँ। 5। असल त्यागी वही है जो गुरू की शरण पड़ कर (सिमरन के द्वारा माया के हमलों की ओर से) सचेत रहता है। जो मनुष्य जगत के मूल परमात्मा को अपने हृदय में परोए रखता है वह सदा ही (माया से) वैरागवान रहता है। जगत माया के मोह की नींद में (परमात्मा की याद की ओर से) सोया रहता है। और। आत्मिक मौत सहेड़ के जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। (माया की नींद में सोए हुए को) गुरू के शबद के बिना ये समझ नहीं पड़ती। 6॥ दिन-रात अनहद शब्द बजता रहता है, गुरुमुख ही परमात्मा की गति को जानता है। जिसने शब्द को पहचान लिया है, उसे ही इस रहस्य का ज्ञान हुआ है कि एक निर्लिप्त परमात्मा कण-कण में विद्यमान है॥ 7 ॥ (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की भक्ति करता है उसका) मन उस एकाग्रता में टिका रहता है जहाँ माया के विचारों की शून्यता बनी रहती है (अफुर अवस्था। सुंन समाधि) और (मन) अडोल आत्मिक अवस्था (के रंग) में रंगा जाता है। अहंकार और लोभ को त्याग के वह मनुष्य एक परमात्मा के साथ ही गहरी सांझ डाले रखता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़े हुए सिख का अपना मन गुरू की शिक्षा में पतीज जाता है। वह परमात्मा के बिना और झाक मिटा के परमात्मा में ही लीन रहता है। 8। 3।
रामकली महला 1 ॥
साहा गणहि न करहि बीचारु ॥
साहे ऊपरि एकंकारु ॥
जिसु गुरु मिलै सोई बिधि जाणै ॥
गुरमति होइ त हुकमु पछाणै ॥1॥
झूठु न बोलि पाडे सचु कहीऐ ॥
हउमै जाइ सबदि घरु लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
गणि गणि जोतकु कांडी कीनी ॥
पड़ै सुणावै ततु न चीनी ॥
सभसै ऊपरि गुर सबदु बीचारु ॥
होर कथनी बदउ न सगली छारु ॥2॥
नावहि धोवहि पूजहि सैला ॥
बिनु हरि राते मैलो मैला ॥
गरबु निवारि मिलै प्रभु सारथि ॥
मुकति प्रान जपि हरि किरतारथि ॥3॥
वाचै वादु न बेदु बीचारै ॥
आपि डुबै किउ पितरा तारै ॥
घटि घटि ब्रहमु चीनै जनु कोइ ॥
सतिगुरु मिलै त सोझी होइ ॥4॥
गणत गणीऐ सहसा दुखु जीऐ ॥
गुर की सरणि पवै सुखु थीऐ ॥
करि अपराध सरणि हम आइआ ॥
गुर हरि भेटे पुरबि कमाइआ ॥5॥
गुर सरणि न आईऐ ब्रहमु न पाईऐ ॥
भरमि भुलाईऐ जनमि मरि आईऐ ॥
जम दरि बाधउ मरै बिकारु ॥
ना रिदै नामु न सबदु अचारु ॥6॥
इकि पाधे पंडित मिसर कहावहि ॥
दुबिधा राते महलु न पावहि ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ हे पण्डित ! आप (विवाह आदि समयों में जजमानों के लिए) शुभ-लगन गिनता है। पर आप ये विचार नहीं करता कि शुभ-समय बनाने। ना बनाने वाला परमात्मा (स्वयं ही) है। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाए वह जानता है (कि विवाह आदि का समय किस) ढंग (से शुभ बन सकता है)। जब मनुष्य को गुरू की शिक्षा प्राप्त हो जाए तब वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है (और रज़ा को समझना ही शुभ-महूरत का मूल है)। 1। हे पण्डित ! (अपनी आजीविका की खातिर जजमानों को खुश करने के लिए विवाह आदि के समय में शुभ-महूरत आदि ढूँढने का) झूठ ना बोल। सच बोलना चाहिए। जब गुरू के शबद में जुड़ के (अंदर ही) अहंकार दूर हो जाता है तब वह घर (सहज ही) मिल जाता है (जहाँ आत्मिक और सांसारिक सारे पदार्थ मिलते हैं)। 1। रहाउ। (पण्डित) ज्योतिष (के लेखे) गिन-गिन के (किसी जजमान के पुत्र की) जनम-पत्री बनाता है। (ज्योतिष का हिसाब खुद) पढ़ता है और (जजमान को) सुनाता है पर अस्लियत को नहीं पहचानता। (शुभ-महूरत आदि के) सारे विचारों से उक्तम श्रेष्ठ विचार ये है कि मनुष्य गुरू के शबद को मन में बसाए। मैं (गुरू-शबद के मुकाबले में शुभ-महूरत व जनम-पत्री आदि किसी) और बात की परवाह नहीं करता। और सारी विचारें व्यर्थ हैं। 2। (हे पण्डित !) आप (तीर्थ आदि पर) स्नान करता है (शरीर मल-मल के) धोता है। और पत्थर (के देवी-देवते) पूजता है। पर परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाए बिना (मन विकारों से) सदा मैला रहता है। (हे पण्डित !) जीवात्मा को विकारों से निजात दिलाने वाले और जीवन को सफल करने वाले परमात्मा का नाम जप। (नाम जप के) अहंकार दूर करने से (जीवन-रथ का) रथ-वाह (सारथी) प्रभू मिल जाता है। 3। (पण्डित) वेद (आदिक धर्म-पुस्तकों) को (जीवन की अगुवाई के लिए) नहीं बिचारता। (अर्थ व कर्म-काण्ड आदि की) बहस को ही पढ़ता है (इस तरह संसार-समुंद्र की विकार-लहरों में डूबा रहता है)। जो मनुष्य खुद डूबा रहे वह अपने (गुजर चुके) बुर्जुगों को (संसार-समुंदर में से) कैसे पार लंघा सकता है। कोई विरला मनुष्य ही पहचानता है कि परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाए। उसको ये (बात) समझ में आ जाती है। 4। जैसे जैसे शुभ-अशुभ-महूरतों के लेखे गिनते रहें वैसे-वैसे जीवात्मा को हमेशा सहम का रोग लगा रहता है। जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है तब इसको आत्मिक आनंद मिलता है। पाप-अपराध करके भी जब हम परमात्मा की शरण आते हैं। तो परमात्मा हमारे पूर्बले कर्मों के अनुसार गुरू को मिला देता है (और गुरू सही जीवन-राह दिखाता है)। 5। जब तक गुरू की शरण ना आएं तब तक परमात्मा नहीं मिलता। भटकना में गलत रास्ते पड़ के आत्मिक मौत ले के बार-बार जनम में आते रहते हैं। (गुरू की शरण के बिना जीव) जम के दर से बँधा हुआ व्यर्थ ही आत्मिक मौत मरता है। उसके हृदय में ना प्रभू का नाम बसता है ना गुरू का शबद बसता है। ना ही उसका अच्छा आचरण बनता है। 6। अनेकों (कुलीन और विद्वान ब्राहमण) अपने आप को पांधे-पण्डित व मिश्र कहलवाते हैं। पर परमात्मा के बिना और ही आसरों की झाक में गलतान रहते हैं। परमात्मा दर-घर नहीं पा सकते।

यह रामकली राग के क्रम का अंग 904 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 904 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।

इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
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