जन नानक की हरि आस पुजावहु हरि दरसनि सांति सरीर ॥4॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभु करता सभु भुगता ॥1॥ रहाउ ॥
सुनतो करता पेखत करता ॥
अद्रिसटो करता द्रिसटो करता ॥
ओपति करता परलउ करता ॥
बिआपत करता अलिपतो करता ॥1॥
बकतो करता बूझत करता ॥
आवतु करता जातु भी करता ॥
निरगुन करता सरगुन करता ॥
गुर प्रसादि नानक समद्रिसटा ॥2॥1॥
फाकिओ मीन कपिक की निआई तू उरझि रहिओ कसुंभाइले ॥
पग धारहि सासु लेखै लै तउ उधरहि हरि गुण गाइले ॥1॥
मन समझु छोडि आवाइले ॥
अपने रहन कउ ठउरु न पावहि काए पर कै जाइले ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ मैगलु इंद्री रसि प्रेरिओ तू लागि परिओ कुटंबाइले ॥
जिउ पंखी इकत्र होइ फिरि बिछुरै थिरु संगति हरि हरि धिआइले ॥2॥
जैसे मीनु रसन सादि बिनसिओ ओहु मूठौ मूड़ लोभाइले ॥
तू होआ पंच वासि वैरी कै छूटहि परु सरनाइले ॥3॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन सभि तुम॑रे जीअ जंताइले ॥
पावउ दानु सदा दरसु पेखा मिलु नानक दास दसाइले ॥4॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जीअ प्रान कीए जिनि साजि ॥
माटी महि जोति रखी निवाजि ॥
बरतन कउ सभु किछु भोजन भोगाइ ॥
सो प्रभु तजि मूड़े कत जाइ ॥1॥
पारब्रहम की लागउ सेव ॥
गुर ते सुझै निरंजन देव ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि कीए रंग अनिक परकार ॥
ओपति परलउ निमख मझार ॥
जा की गति मिति कही न जाइ ॥
सो प्रभु मन मेरे सदा धिआइ ॥2॥
आइ न जावै निहचलु धनी ॥
बेअंत गुना ता के केतक गनी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सहेलिए ! गुरू की शांति देने वाली बुद्धि ले के मुझे भी मिला कर।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।