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अंग 724

अंग
724
राग तिलंग
राग: तिलंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
है तूहै तू होवनहार ॥ अगम अगाधि ऊच आपार ॥
जो तुधु सेवहि तिन भउ दुखु नाहि ॥
गुर परसादि नानक गुण गाहि ॥2॥
जो दीसै सो तेरा रूपु ॥ गुण निधान गोविंद अनूप ॥
सिमरि सिमरि सिमरि जन सोइ ॥
नानक करमि परापति होइ ॥3॥
जिनि जपिआ तिस कउ बलिहार ॥
तिस कै संगि तरै संसार ॥
कहु नानक प्रभ लोचा पूरि ॥
संत जना की बाछउ धूरि ॥4॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हर जगह हर वक्त आप ही आप है। आप ही सदा कायम रहने वाला है। हे अपहुँच प्रभू ! हे अथाह प्रभू ! हे सबसे ऊँचे और बेअंत प्रभू ! हे प्रभू ! जो मनुष्य आपको सिमरते हैं।उनको कोई डर।कोई दुख छू नहीं सकता। हे नानक ! गुरू की कृपा से ही (मनुष्य परमात्मा के) गुण गा सकते हैं। 2। (जगत में) जो कुछ दिखता है आपका ही स्वरूप है। हे गुणों के खजाने ! हे सुंदर गोबिंद ! हे मनुष्य ! सदा उस परमात्मा का सिमरन करता रह। हे नानक ! (परमात्मा का सिमरन) परमात्मा की कृपा से ही मिलता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है।उससे कुर्बान होना चाहिए। उस मनुष्य की संगति में (रह के) सारा जगत संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! मेरी तमन्ना पूरी कर। मैं (आपके दर से) आपके संत जनों के चरणों की धूल माँगता हूँ। 4। 2।
तिलंग महला 5 घरु 3 ॥
मिहरवानु साहिबु मिहरवानु ॥
साहिबु मेरा मिहरवानु ॥
जीअ सगल कउ देइ दानु ॥ रहाउ ॥
तू काहे डोलहि प्राणीआ तुधु राखैगा सिरजणहारु ॥
जिनि पैदाइसि तू कीआ सोई देइ आधारु ॥1॥
जिनि उपाई मेदनी सोई करदा सार ॥
घटि घटि मालकु दिला का सचा परवदगारु ॥2॥
कुदरति कीम न जाणीऐ वडा वेपरवाहु ॥
करि बंदे तू बंदगी जिचरु घट महि साहु ॥3॥
तू समरथु अकथु अगोचरु जीउ पिंडु तेरी रासि ॥
रहम तेरी सुखु पाइआ सदा नानक की अरदासि ॥4॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 5 घरु 3 ॥ हे भाई ! मेरा मालिक प्रभू सदा दया करने वाला है। सदा दयालु है।सदा दयालु है। वह सारे जीवों को (सब पदार्थों का) दान देता है।रहाउ। हे भाई ! आप क्यों घबराता है।पैदा करने वाला प्रभू आपकी (जरूर) रक्षा करेगा। जिस (प्रभू) ने आपको पैदा किया है।वही (सारी सृष्टि को) आसरा (भी) देता है। 1। हे भाई ! जिस परमात्मा ने सृष्टि पैदा की है।वही (इसकी) संभाल करता है। हरेक शरीर में बसने वाला प्रभू (सारे जीवों के) दिलों का मालिक है।वह सदा कायम रहने वाला है।और।सब की पालना करने वाला है। 2। हे भाई ! उस मालिक की कुदरत का मूल्य नहीं समझा जा सकता।वह सबसे बड़ा है उसे किसी की मुथाजी नहीं। हे बँदे ! जब तक आपके शरीर में सांस चलती है तब तक उस मालिक की बँदगी करता रह। 3। हे प्रभू ! आप सब ताकतों का मालिक है।आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।ज्ञानेन्दिंयों के द्वारा आप तक पहुँच नहीं की जा सकती। (हम जीवों का ये) शरीर और जिंद आपकी ही दी हुई पूँजी है। जिस मनुष्य पर आपकी मेहर हैं उस को (आपके दर से बँदगी का) सुख मिलता है।नानक की भी सदा आपके दर पे यही अरदास है (कि आपकी बँदगी का सुख मिले)। 4। 3।
तिलंग महला 5 घरु 3 ॥
करते कुदरती मुसताकु ॥
दीन दुनीआ एक तूही सभ खलक ही ते पाकु ॥ रहाउ ॥
खिन माहि थापि उथापदा आचरज तेरे रूप ॥
कउणु जाणै चलत तेरे अंधिआरे महि दीप ॥1॥
खुदि खसम खलक जहान अलह मिहरवान खुदाइ ॥
दिनसु रैणि जि तुधु अराधे सो किउ दोजकि जाइ ॥2॥
अजराईलु यारु बंदे जिसु तेरा आधारु ॥
गुनह उस के सगल आफू तेरे जन देखहि दीदारु ॥3॥
दुनीआ चीज फिलहाल सगले सचु सुखु तेरा नाउ ॥
गुर मिलि नानक बूझिआ सदा एकसु गाउ ॥4॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 5 घरु 3 ॥ हे करतार ! आपकी कुदरत को देख के मैं दशनों का चाहवान हैं गया हूँ। मेरे दीन और दुनिया की दौलत एक आप ही है।आप सारी ख़लकत से निर्लिप रहता है।रहाउ। हे करतार ! आप एक-छिन में (जीवों को) बना के नाश भी कर देता है आपके स्वरूप हैरान कर देने वाले हैं। कोई जीव आपके करिश्मों को समझ नहीं सकता।(अज्ञानता के) अंधेरे में (आप खुद ही जीवों के वास्ते) रौशनी है। 1। हे अल्लाह ! हे मेहरवान ख़ुदा ! सारी ख़लकत का सारे जहान का आप खुद ही मालिक है। जो मनुष्य दिन-रात आपको आराधता है।वे दोज़क कैसे जा सकता है। 2। हे प्रभू !मौत का फरिश्ता उस मनुष्य का मित्र बन जाता है (उसे मौत का डर नहीं रहता) (क्योंकि) जिस मनुष्य को आपका आसरा मिल जाता है। उस मनुष्य के सारे पाप बख्शे जाते हैं। 3। हे प्रभू ! दुनिया के (और) सारे पदार्थ जल्दी ही नाश हो जाने वाले हैं।सदा कायम रहने वाला सुख आपका नाम (ही बख्शता) है। हे नानक ! कह, ये बात (मैंनें गुरू को मिल के समझी है।इस वास्ते) मैं सदा एक परमात्मा का ही यश गाता रहता हूँ। 4। 4।
तिलंग महला 5 ॥
मीरां दानां दिल सोच ॥
मुहबते मनि तनि बसै सचु साह बंदी मोच ॥1॥ रहाउ ॥
दीदने दीदार साहिब कछु नही इस का मोलु ॥
पाक परवदगार तू खुदि खसमु वडा अतोलु ॥1॥
दस्तगीरी देहि दिलावर तूही तूही एक ॥
करतार कुदरति करण खालक नानक तेरी टेक ॥2॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 5 ॥ हे सरदार ! हे समझदार ! हे (जीवों के) दिल को पवित्र करने वाले ! हे सदा स्थिर शाह ! हे बँधनों से छुड़ाने वाले ! आपकी मुहब्बत मेरे मन में मेरे दिल में बस रही है। 1।रहाउ। हे मालिक ! आपके दर्शन करना (एक अमोलक दाति है)।आपके इस (दर्शन) का कोई मुल्य नहीं आँका जा सकता। हे पवित्र ! हे पालणहार ! आप खुद (हमारा) पति है आप सबसे बड़ा है।आपकी बड़ी हस्ती को तोला नहीं जा सकता। 1। हे सूरमे प्रभू ! मेरी सहायता कर।एक आप ही (मेरा आसरा) है। हे नानक ! (कह) हे करतार ! हे कुदरति के रचनहार ! हे ख़लकत के मालिक ! मुझे आपका सहारा है। 2। 5।
तिलंग महला 1 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ किआ कहीऐ रे भाई ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 1 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने (ये जगत) बनाया है।उसने ही (सदा) इसकी संभाल की है।ये कहा नहीं जा सकता (कि वह कैसे संभाल करता है)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।