अंग
724
तिलंग
अंग बदलें या अंश चुनें · ५ अंश
है तूहै तू होवनहार ॥ अगम अगाधि ऊच आपार ॥
है तूहै तू होवनहार ॥ अगम अगाधि ऊच आपार ॥
जो तुधु सेवहि तिन भउ दुखु नाहि ॥
गुर परसादि नानक गुण गाहि ॥2॥
जो दीसै सो तेरा रूपु ॥ गुण निधान गोविंद अनूप ॥
सिमरि सिमरि सिमरि जन सोइ ॥
नानक करमि परापति होइ ॥3॥
जिनि जपिआ तिस कउ बलिहार ॥
तिस कै संगि तरै संसार ॥
कहु नानक प्रभ लोचा पूरि ॥
संत जना की बाछउ धूरि ॥4॥2॥
जो तुधु सेवहि तिन भउ दुखु नाहि ॥
गुर परसादि नानक गुण गाहि ॥2॥
जो दीसै सो तेरा रूपु ॥ गुण निधान गोविंद अनूप ॥
सिमरि सिमरि सिमरि जन सोइ ॥
नानक करमि परापति होइ ॥3॥
जिनि जपिआ तिस कउ बलिहार ॥
तिस कै संगि तरै संसार ॥
कहु नानक प्रभ लोचा पूरि ॥
संत जना की बाछउ धूरि ॥4॥2॥
हिन्दी अर्थ: हर जगह हर वक्त आप ही आप हैं। आप ही सदा कायम रहने वाले हैं। हे अपहुँच प्रभू ! हे अथाह प्रभू ! हे सबसे ऊँचे और बेअंत प्रभू ! हे प्रभू ! जो मनुष्य आपको सिमरते हैं।उनको कोई डर।कोई दुख छू नहीं सकता। हे नानक ! गुरू की कृपा से ही (मनुष्य परमात्मा के) गुण गा सकते हैं। 2। (जगत में) जो कुछ दिखता है आपका ही स्वरूप है। हे गुणों के खजाने ! हे सुंदर गोबिंद ! हे मनुष्य ! सदा उस परमात्मा का सिमरन करता रह। हे नानक ! (परमात्मा का सिमरन) परमात्मा की कृपा से ही मिलता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है।उससे कुर्बान होना चाहिए। उस मनुष्य की संगति में (रह के) सारा जगत संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! मेरी तमन्ना पूरी कर। मैं (आपके दर से) आपके संत जनों के चरणों की धूल माँगता हूँ। 4। 2।
मिहरवानु साहिबु मिहरवानु ॥
तिलंग महला 5 घरु 3 ॥
मिहरवानु साहिबु मिहरवानु ॥
साहिबु मेरा मिहरवानु ॥
जीअ सगल कउ देइ दानु ॥ रहाउ ॥
तू काहे डोलहि प्राणीआ तुधु राखैगा सिरजणहारु ॥
जिनि पैदाइसि तू कीआ सोई देइ आधारु ॥1॥
जिनि उपाई मेदनी सोई करदा सार ॥
घटि घटि मालकु दिला का सचा परवदगारु ॥2॥
कुदरति कीम न जाणीऐ वडा वेपरवाहु ॥
करि बंदे तू बंदगी जिचरु घट महि साहु ॥3॥
तू समरथु अकथु अगोचरु जीउ पिंडु तेरी रासि ॥
रहम तेरी सुखु पाइआ सदा नानक की अरदासि ॥4॥3॥
मिहरवानु साहिबु मिहरवानु ॥
साहिबु मेरा मिहरवानु ॥
जीअ सगल कउ देइ दानु ॥ रहाउ ॥
तू काहे डोलहि प्राणीआ तुधु राखैगा सिरजणहारु ॥
जिनि पैदाइसि तू कीआ सोई देइ आधारु ॥1॥
जिनि उपाई मेदनी सोई करदा सार ॥
घटि घटि मालकु दिला का सचा परवदगारु ॥2॥
कुदरति कीम न जाणीऐ वडा वेपरवाहु ॥
करि बंदे तू बंदगी जिचरु घट महि साहु ॥3॥
तू समरथु अकथु अगोचरु जीउ पिंडु तेरी रासि ॥
रहम तेरी सुखु पाइआ सदा नानक की अरदासि ॥4॥3॥
हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 5 घरु 3 ॥ हे भाई ! मेरा मालिक प्रभू सदा दया करने वाला है। सदा दयालु है।सदा दयालु है। वह सारे जीवों को (सब पदार्थों का) दान देता है।रहाउ। हे भाई ! आप क्यों घबराते हैं।पैदा करने वाला प्रभू आपकी (जरूर) रक्षा करेगा। जिस (प्रभू) ने आपको पैदा किया है।वही (सारी सृष्टि को) आसरा (भी) देता है। 1। हे भाई ! जिस परमात्मा ने सृष्टि पैदा की है।वही (इसकी) संभाल करता है। हरेक शरीर में बसने वाला प्रभू (सारे जीवों के) दिलों का मालिक है।वह सदा कायम रहने वाला है।और।सब की पालना करने वाला है। 2। हे भाई ! उस मालिक की कुदरत का मूल्य नहीं समझा जा सकता।वह सबसे बड़ा है उसे किसी की मुथाजी नहीं। हे बँदे ! जब तक आपके शरीर में सांस चलती है तब तक उस मालिक की बँदगी करता रह। 3। हे प्रभू ! आप सब ताकतों के मालिक हैं।आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।ज्ञानेन्दिंयों के द्वारा आप तक पहुँच नहीं की जा सकती। (हम जीवों का ये) शरीर और जिंद आपकी ही दी हुई पूँजी है। जिस मनुष्य पर आपकी मेहर हो उस को (आपके दर से बँदगी का) सुख मिलता है।नानक की भी सदा आपके दर पे यही अरदास है (कि आपकी बँदगी का सुख मिले)। 4। 3।
करते कुदरती मुसताकु ॥
तिलंग महला 5 घरु 3 ॥
करते कुदरती मुसताकु ॥
दीन दुनीआ एक तूही सभ खलक ही ते पाकु ॥ रहाउ ॥
खिन माहि थापि उथापदा आचरज तेरे रूप ॥
कउणु जाणै चलत तेरे अंधिआरे महि दीप ॥1॥
खुदि खसम खलक जहान अलह मिहरवान खुदाइ ॥
दिनसु रैणि जि तुधु अराधे सो किउ दोजकि जाइ ॥2॥
अजराईलु यारु बंदे जिसु तेरा आधारु ॥
गुनह उस के सगल आफू तेरे जन देखहि दीदारु ॥3॥
दुनीआ चीज फिलहाल सगले सचु सुखु तेरा नाउ ॥
गुर मिलि नानक बूझिआ सदा एकसु गाउ ॥4॥4॥
करते कुदरती मुसताकु ॥
दीन दुनीआ एक तूही सभ खलक ही ते पाकु ॥ रहाउ ॥
खिन माहि थापि उथापदा आचरज तेरे रूप ॥
कउणु जाणै चलत तेरे अंधिआरे महि दीप ॥1॥
खुदि खसम खलक जहान अलह मिहरवान खुदाइ ॥
दिनसु रैणि जि तुधु अराधे सो किउ दोजकि जाइ ॥2॥
अजराईलु यारु बंदे जिसु तेरा आधारु ॥
गुनह उस के सगल आफू तेरे जन देखहि दीदारु ॥3॥
दुनीआ चीज फिलहाल सगले सचु सुखु तेरा नाउ ॥
गुर मिलि नानक बूझिआ सदा एकसु गाउ ॥4॥4॥
हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 5 घरु 3 ॥ हे करतार ! आपकी कुदरत को देख के मैं दशनों का चाहवान हो गया हूँ। मेरे दीन और दुनिया की दौलत एक आप ही हैं।आप सारी ख़लकत से निर्लिप्त रहते हैं।रहाउ। हे करतार ! आप एक-छिन में (जीवों को) बना के नाश भी कर देते हैं आपके स्वरूप हैरान कर देने वाले हैं। कोई जीव आपके करिश्मों को समझ नहीं सकता।(अज्ञानता के) अंधेरे में (आप खुद ही जीवों के वास्ते) रौशनी हैं। 1। हे अल्लाह ! हे मेहरवान ख़ुदा ! सारी ख़लकत का सारे जहान का आप खुद ही मालिक हैं। जो मनुष्य दिन-रात आपको आराधता है।वे दोज़क कैसे जा सकता है। 2। हे प्रभू !मौत का फरिश्ता उस मनुष्य का मित्र बन जाता है (उसे मौत का डर नहीं रहता) (क्योंकि) जिस मनुष्य को आपका आसरा मिल जाता है। उस मनुष्य के सारे पाप बख्शे जाते हैं। 3। हे प्रभू ! दुनिया के (और) सारे पदार्थ जल्दी ही नाश हो जाने वाले हैं।सदा कायम रहने वाला सुख आपका नाम (ही बख्शता) है। हे नानक ! कह, ये बात (मैंनें गुरू को मिल के समझी है।इस वास्ते) मैं सदा एक परमात्मा का ही यश गाता रहता हूँ। 4। 4।
मीरां दानां दिल सोच ॥
तिलंग महला 5 ॥
मीरां दानां दिल सोच ॥
मुहबते मनि तनि बसै सचु साह बंदी मोच ॥1॥ रहाउ ॥
दीदने दीदार साहिब कछु नही इस का मोलु ॥
पाक परवदगार तू खुदि खसमु वडा अतोलु ॥1॥
दस्तगीरी देहि दिलावर तूही तूही एक ॥
करतार कुदरति करण खालक नानक तेरी टेक ॥2॥5॥
मीरां दानां दिल सोच ॥
मुहबते मनि तनि बसै सचु साह बंदी मोच ॥1॥ रहाउ ॥
दीदने दीदार साहिब कछु नही इस का मोलु ॥
पाक परवदगार तू खुदि खसमु वडा अतोलु ॥1॥
दस्तगीरी देहि दिलावर तूही तूही एक ॥
करतार कुदरति करण खालक नानक तेरी टेक ॥2॥5॥
हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 5 ॥ हे सरदार ! हे समझदार ! हे (जीवों के) दिल को पवित्र करने वाले ! हे सदा स्थिर शाह ! हे बँधनों से छुड़ाने वाले ! आपकी मुहब्बत मेरे मन में मेरे दिल में बस रही है। 1।रहाउ। हे मालिक ! आपके दर्शन करना (एक अमोलक दाति है)।आपके इस (दर्शन) का कोई मुल्य नहीं आँका जा सकता। हे पवित्र ! हे पालणहार ! आप खुद (हमारे) पति हैं आप सबसे बड़े हैं।आपकी बड़ी हस्ती को तोला नहीं जा सकता। 1। हे सूरमे प्रभू ! मेरी सहायता कर।एक आप ही (मेरा आसरा) हैं। हे नानक ! (कह) हे करतार ! हे कुदरति के रचनहार ! हे ख़लकत के मालिक ! मुझे आपका सहारा है। 2। 5।
जिनि कीआ तिनि देखिआ किआ कहीऐ रे भाई ॥
तिलंग महला 1 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ किआ कहीऐ रे भाई ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ किआ कहीऐ रे भाई ॥
हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 1 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने (ये जगत) बनाया है।उसने ही (सदा) इसकी संभाल की है।ये कहा नहीं जा सकता (कि वह कैसे संभाल करता है)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७२४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।