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अंग 712

अंग
712
राग टोडी
राग: टोडी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिनु सिमरन जो जीवनु बलना सरप जैसे अरजारी ॥
नव खंडन को राजु कमावै अंति चलैगो हारी ॥1॥
गुण निधान गुण तिन ही गाए जा कउ किरपा धारी ॥
सो सुखीआ धंनु उसु जनमा नानक तिसु बलिहारी ॥2॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा के नाम-सिमरन के बिना जितनी भी जिंदगी गुजारनी है (वो ऐसे होती है) जैसे साँप (अपनी) उम्र गुजारता है (उम्र चाहे लंबी होती है।पर वह सदा अपने अंदर जहर पैदा करता रहता है)। (सिमरन से वंचित रहने वाला मनुष्य अगर) सारी धरती का राज भी करता रहे।तो भी आखिर मानस जीवन की बाजी हार के ही जाता है। 1। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुणों के खजाने हरी के गुण उस मनुष्य ने ही गाए हैं जिस पर हरी ने मेहर की है। वह मनुष्य सदा सुखी जीवन व्यतीत करता है।उसकी जिंदगी सदा मुबारिक होती है।ऐसे मनुष्य से कुर्बान होना चाहिए। 2। 2।
टोडी महला 5 घरु 2 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धाइओ रे मन दह दिस धाइओ ॥
माइआ मगन सुआदि लोभि मोहिओ तिनि प्रभि आपि भुलाइओ ॥ रहाउ ॥
हरि कथा हरि जस साधसंगति सिउ इकु मुहतु न इहु मनु लाइओ ॥
बिगसिओ पेखि रंगु कसुंभ को पर ग्रिह जोहनि जाइओ ॥1॥
चरन कमल सिउ भाउ न कीनो नह सत पुरखु मनाइओ ॥
धावत कउ धावहि बहु भाती जिउ तेली बलदु भ्रमाइओ ॥2॥
नाम दानु इसनानु न कीओ इक निमख न कीरति गाइओ ॥
नाना झूठि लाइ मनु तोखिओ नह बूझिओ अपनाइओ ॥3॥
परउपकार न कबहू कीए नही सतिगुरु सेवि धिआइओ ॥
पंच दूत रचि संगति गोसटि मतवारो मद माइओ ॥4॥
करउ बेनती साधसंगति हरि भगति वछल सुणि आइओ ॥
नानक भागि परिओ हरि पाछै राखु लाज अपुनाइओ ॥5॥1॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 घरु 2 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मन ! जीव दसों दिशाओं में दौड़ता-फिरता है। माया के स्वाद में मस्त रहता है।लोभ में मोहा रहता है।(पर जीव के भी क्या वश।) उस प्रभू ने खुद ही उसे गलत रास्ते पर डाल रखा है।रहाउ। मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह की बातों से।साध-संगति से।एक पल के लिए भी अपना ये मन नहीं जोड़ता। कुसंभ के फूल के रंग देख के खुश होता है।पराया घर देखने को चल पड़ता है। 1। हे मन ! तूने प्रभू के सोहणें चरनों से प्यार नहीं डाला।तूने गुरू को प्रसन्न नहीं किया। नाशवंत पदार्थों की खातिर आप दौड़ता फिरता है (ये आपकी भटकना कभी समाप्त नहीं होती) जैसे तेली का बैल (कोल्हू के आगे जुत के) चलता रहता है (उस कोल्हू के इर्द-गिर्द ही उसका रास्ता समाप्त नहीं होता।बारंबार उसके ही चक्कर लगाता रहता है)। 2। हे मन ! (माया के स्वाद में मस्त मनुष्य) प्रभू का नाम नहीं जपता।सेवा नहीं करता।जीवन पवित्र नहीं बनाता।एक पल भी प्रभू की सिफत सालाह नहीं करता। कई किस्म के नाशवंत (जगत) में अपने मन को जोड़ के संतुष्ट रहता है।अपने असल पदार्थ को नहीं पहचानता। 3। हे मन ! (माया-मगन मनुष्य) कभी औरों की सेवा-भलाई नहीं करता।गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम नहीं सिमरता। (कामादिक) पाँचों वैरियों का साथ बनाए रखता है।मेल-मिलाप रखता है।माया के नशे में मस्त रहता है। 4। हे नानक ! (कह) मैं (तो) साध-संगति में जा के विनती करता हूँ- हे हरी ! मैं ये सुन के आपकी शरण आया हूँ कि आप भगती से प्यार करने वाला है। मैं दौड़ के प्रभू के दर पर आ पड़ा हूँ (और विनती करता हूँ- हे प्रभू !) मुझे अपना बना के मेरी इज्जत रख। 5। 1। 3।
टोडी महला 5 ॥
मानुखु बिनु बूझे बिरथा आइआ ॥
अनिक साज सीगार बहु करता जिउ मिरतकु ओढाइआ ॥ रहाउ ॥
धाइ धाइ क्रिपन स्रमु कीनो इकत्र करी है माइआ ॥
दानु पुंनु नही संतन सेवा कित ही काजि न आइआ ॥1॥
करि आभरण सवारी सेजा कामनि थाटु बनाइआ ॥
संगु न पाइओ अपुने भरते पेखि पेखि दुखु पाइआ ॥2॥
सारो दिनसु मजूरी करता तुहु मूसलहि छराइआ ॥
खेदु भइओ बेगारी निआई घर कै कामि न आइआ ॥3॥
भइओ अनुग्रहु जा कउ प्रभ को तिसु हिरदै नामु वसाइआ ॥
साधसंगति कै पाछै परिअउ जन नानक हरि रसु पाइआ ॥4॥2॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! (जनम मनोरथ को) समझे बिना मनुष्य (जगत में) आया व्यर्थ ही जानो। (जनम-मनोरथ की सूझ के बिना मनुष्य अपने शरीर के लिए) अनेकों श्रृंगार की बनावटें करता है (तो ये ऐसे ही है) जैसे मुर्दे को कपड़े डाले जा रहे हैं।रहाउ। (हे भाई ! जीवन-उद्देश्य की समझ के बिना मनुष्य ऐसे ही है।जैसे) कोई कंजूस दौड़-भाग कर-कर के मेहनत करता है।माया जोड़ता है। (पर उस माया से) वह दान-पुंन नहीं करता।संत जनों की सेवा भी नहीं करता।वह धन उसके किसी भी काम नहीं आता। 1। (हे भाई ! आत्मिक जीवन की सूझ के बिना मनुष्य यूँ ही है।जैसे) कोई स्त्री गहने पहन के सेज सवाँरती है।(सुंदरता का) आडंबर करती है। पर उसे अपने पति का मिलाप हासिल नहीं होता।(उन गहने आदि को) देख-देख के उसे बल्कि अफसोस ही होता है। 2। (ठीक ऐसे ही है नाम-हीन मनुष्य।जैसे) कोई मनुष्य सारा दिन (ये) मजदूरी करता है (कि) मूसली से तूह ही छोड़ता रहता है (अथवा) किसी वेगारी को (वेगार में निरा) कष्ट ही मिलता है। (मजदूर की मजदूरी या वेगारी की वेगार में से) उनके अपने काम कुछ भी नहीं आता। 3। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) जिस मनुष्य पर परमात्मा की कृपा होती है।उसके हृदय में (परमात्मा अपना) नाम बसाता है। वह मनुष्य साध-संगति की शरण पड़ता है।वह परमात्मा के नाम का आनंद लेता है। 4। 2। 4।
टोडी महला 5 ॥
क्रिपा निधि बसहु रिदै हरि नीत ॥
तैसी बुधि करहु परगासा लागै प्रभ संगि प्रीति ॥ रहाउ ॥
दास तुमारे की पावउ धूरा मसतकि ले ले लावउ ॥
महा पतित ते होत पुनीता हरि कीरतन गुन गावउ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे कृपा के खजाने प्रभू ! मेरे हृदय में बसता रह। हे प्रभू ! मेरे अंदर ऐसी बुद्धि का प्रकाश कर।कि आपके साथ मेरी प्रीति बनी रहे।रहाउ। हे प्रभू ! मैं आपके सेवक की चरण-धूल प्राप्त करूँ।(वह चरण-धूल) ले ले के मैं (अपने) माथे पर लगाता रहूँ। (जिसकी बरकति से) बड़े-बड़े विकारी भी पवित्र हो जाते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा के नाम-सिमरन के बिना जितनी भी जिंदगी गुजारनी है (वो ऐसे होती है) जैसे साँप (अपनी) उम्र गुजारता है (उम्र चाहे लंबी होती है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।