नव खंडन को राजु कमावै अंति चलैगो हारी ॥1॥
गुण निधान गुण तिन ही गाए जा कउ किरपा धारी ॥
सो सुखीआ धंनु उसु जनमा नानक तिसु बलिहारी ॥2॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धाइओ रे मन दह दिस धाइओ ॥
माइआ मगन सुआदि लोभि मोहिओ तिनि प्रभि आपि भुलाइओ ॥ रहाउ ॥
हरि कथा हरि जस साधसंगति सिउ इकु मुहतु न इहु मनु लाइओ ॥
बिगसिओ पेखि रंगु कसुंभ को पर ग्रिह जोहनि जाइओ ॥1॥
चरन कमल सिउ भाउ न कीनो नह सत पुरखु मनाइओ ॥
धावत कउ धावहि बहु भाती जिउ तेली बलदु भ्रमाइओ ॥2॥
नाम दानु इसनानु न कीओ इक निमख न कीरति गाइओ ॥
नाना झूठि लाइ मनु तोखिओ नह बूझिओ अपनाइओ ॥3॥
परउपकार न कबहू कीए नही सतिगुरु सेवि धिआइओ ॥
पंच दूत रचि संगति गोसटि मतवारो मद माइओ ॥4॥
करउ बेनती साधसंगति हरि भगति वछल सुणि आइओ ॥
नानक भागि परिओ हरि पाछै राखु लाज अपुनाइओ ॥5॥1॥3॥
मानुखु बिनु बूझे बिरथा आइआ ॥
अनिक साज सीगार बहु करता जिउ मिरतकु ओढाइआ ॥ रहाउ ॥
धाइ धाइ क्रिपन स्रमु कीनो इकत्र करी है माइआ ॥
दानु पुंनु नही संतन सेवा कित ही काजि न आइआ ॥1॥
करि आभरण सवारी सेजा कामनि थाटु बनाइआ ॥
संगु न पाइओ अपुने भरते पेखि पेखि दुखु पाइआ ॥2॥
सारो दिनसु मजूरी करता तुहु मूसलहि छराइआ ॥
खेदु भइओ बेगारी निआई घर कै कामि न आइआ ॥3॥
भइओ अनुग्रहु जा कउ प्रभ को तिसु हिरदै नामु वसाइआ ॥
साधसंगति कै पाछै परिअउ जन नानक हरि रसु पाइआ ॥4॥2॥4॥
क्रिपा निधि बसहु रिदै हरि नीत ॥
तैसी बुधि करहु परगासा लागै प्रभ संगि प्रीति ॥ रहाउ ॥
दास तुमारे की पावउ धूरा मसतकि ले ले लावउ ॥
महा पतित ते होत पुनीता हरि कीरतन गुन गावउ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा के नाम-सिमरन के बिना जितनी भी जिंदगी गुजारनी है (वो ऐसे होती है) जैसे साँप (अपनी) उम्र गुजारता है (उम्र चाहे लंबी होती है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।