सिरीरागु महला 3 ॥ पंखी बिरखि सुहावड़ा सचु चुगै गुर भाइ ॥ हरि रसु पीवै सहजि रहै उडै न आवै जाइ ॥ निज घरि वासा पाइआ हरि हरि नामि समाइ ॥1॥ मन रे गुर की कार कमाइ ॥ गुर कै भाणै जे चलहि ता अनदिनु राचहि हरि नाइ ॥1॥ रहाउ ॥ पंखी बिरख सुहावड़े ऊडहि चहु दिसि जाहि ॥ जेता ऊडहि दुख घणे नित दाझहि तै बिललाहि ॥ बिनु गुर महलु न जापई ना अंम्रित फल पाहि ॥2॥ गुरमुखि ब्रहमु हरीआवला साचै सहजि सुभाइ ॥ साखा तीनि निवारीआ एक सबदि लिव लाइ ॥ अंम्रित फलु हरि एकु है आपे देइ खवाइ ॥3॥ मनमुख ऊभे सुकि गए ना फलु तिंना छाउ ॥ तिंना पासि न बैसीऐ ओना घरु न गिराउ ॥ कटीअहि तै नित जालीअहि ओना सबदु न नाउ ॥4॥ हुकमे करम कमावणे पइऐ किरति फिराउ ॥ हुकमे दरसनु देखणा जह भेजहि तह जाउ ॥ हुकमे हरि हरि मनि वसै हुकमे सचि समाउ ॥5॥ हुकमु न जाणहि बपुड़े भूले फिरहि गवार ॥ मनहठि करम कमावदे नित नित होहि खुआरु ॥ अंतरि सांति न आवई ना सचि लगै पिआरु ॥6॥ गुरमुखीआ मुह सोहणे गुर कै हेति पिआरि ॥ सची भगती सचि रते दरि सचै सचिआर ॥ आए से परवाणु है सभ कुल का करहि उधारु ॥7॥ सभ नदरी करम कमावदे नदरी बाहरि न कोइ ॥ जैसी नदरि करि देखै सचा तैसा ही को होइ ॥ नानक नामि वडाईआ करमि परापति होइ ॥8॥3॥20॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ जो जीव-पंछी इस शरीर वृक्ष पर बैठा हुआ गुरू के प्रेम में रह के सदा स्थिर प्रभू के नाम का चोगा चुगता है, वह खूबसूरत जीवन वाला हो जाता है। वह परमात्मा के नाम का रस पीता है। आत्मक अडोलता में टिका रहता है। (माया पदार्थों के चोगे की तरफ) भटकता नहीं फिरता, (इस वास्ते) जनम मरण के चक्कर से बचा रहता है। उसको अपने (असल) घर में (प्रभू चरणों में) निवास मिला रहता है। वह सदा प्रभू के नाम में लीन रहता है।1। हे मेरे मन ! गुरू की बताई कार कर। अगर आप गुरू के हुकम में चलेगा, तो आप हर समय परमात्मा के नाम में जुड़ा रहेगा।1।रहाउ। जो जीव-पंछी (अपने अपने) शरीर वृक्षों पर (बैठे देखने में तो) सुंदर लगते हैं (पर माया के पदार्थों के चोगे के पीछे) उड़ते फिरते हैं, चारों तरफ भटकते हैं। वे जितना भी (चोगे के पीछे) उड़ते हैं, उतना ही ज्यादा दुख पाते हैं। सदा खिझते हैं और बिलकते हैं। गुरू की शरण के बगैर उन्हें (परमात्मा का) ठिकाना नहीं दिखता, और ना ही वह आत्मिक जीवन देने वाला नाम फल प्राप्त कर सकते हैं।2। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा का रूप हो जाता है। वह जैसे एक हरा-भरा पेड़ है। (वह भाग्यशाली मनुष्य) सदा स्थिर प्रभू में जुड़ा रहता है। आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, प्रभू के प्रेम में मगन रहता है। परमात्मा के सिफत सलाह के शबद में सुरति जोड़ के (माया के तीन रूप) तीन टहनियां उसने दूर कर ली हैं। उसको आत्मिक जीवन देने वाला सिर्फ एक नाम फल लगता है। (प्रभू मेहर करके) खुद ही (उसको यह फल) चखा देता है।3। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य, जैसे, वह वृक्ष हैं जो खड़े खड़े ही सूख गए हैं। उनको ना ही फल लगता है, ना ही उनकी छाया होती है, (भाव, ना ही उनके पास प्रभू का नाम है, और ना ही वे किसी की सेवा करते हैं)। उनके पास बैठना ही नहीं चाहिए, उनका कोई घर घाट नहीं। (उनको कोई आत्मिक सहारा नहीं मिलता)। वह (मनमुख वृक्ष) सदा काटे जाते हैं और जलाए जाते हैं (भाव, माया के मोह के कारण वे नित्य दुखी रहते हैं)। उनके पास ना प्रभू की सिफत सलाह है, ना ही प्रभू का नाम है।4। (पर, हे प्रभू ! जीवों के भी क्या बस? आपके) हुकम में ही (जीव) कर्म कमाते हैं। (आपके हुकम में ही) पिछले किये कर्मों के संस्कारों के अनुसार उनको जनम मरण का फेरा पड़ा रहता है। आपके हुकम अनुसार ही कई जीवों को आपका दर्शन प्राप्त होता है। जिधर आप भेजता है, उधर जाना पड़ता है। आपके हुकम अनुसार ही कई जीवों के मन में आपका हरि नाम बसता है। आपके हुकम में ही आपके सदा स्थिर स्वरूप में उनकी लीनता बनी रहती है।5। कई ऐसे बिचारे मनुष्य हैं जो परमात्मा का हुकम नहीं समझते, वह (माया के मोह के कारण) गलत रास्ते पर पड़के भटकते फिरते हैं। वह (गुरू का आसरा छोड़ के अपने) मन के हठ से (कई किस्म के निहित धार्मिक) कर्म करते है, (पर विकारों में फंसे हुए) सदा खुआर रहते हैं। उनके मन में शांति नहीं आती, ना ही उनका सदा स्थिर प्रभू में प्यार बनता है।6। गुरू के सन्मुख रहने वाले लोगों के मुंह (नाम की लाली से) सुंदर लगते हैं, क्योंकि वह गुरू के प्रेम में गुरू के प्यार में टिके रहते हैं। वह प्रभू की सदा स्थिर रहने वाली भक्ति करते हैं। वह सदा स्थिर प्रभू (के प्रेम रंग) में रंगे रहते हैं। (इस वास्ते वह) सदा स्थिर प्रभू के दर पे सुर्खरू रहते हैं। उन लोगों का ही जगत में आना कबूल है, वह अपने सारे कुल का भी पार उतारा कर लेते हैं।7। (पर, जीवों के भी बस की भी बात नहीं) सारे जीव परमात्मा की निगाह मुताबक ही करम करते हैं। उसकी निगाह से बाहर कोई जीव नहीं, (भाव, कोई जीव परमात्मा से आकी हो के कुछ नहीं कर सकता)। सदा स्थिर रहने वाला प्रभू जैसी निगाह करके किसी जीव की ओर देखता है, वह जीव वैसा ही बन जाता है। हे नानक ! (उस की मेहर की नजर से जो मनुष्य उसके नाम में जुड़ता है), उसको आदर सम्मान मिलता है। पर उसका नाम उसकी बख्शिश से ही मिलता है।8।3।20।
सिरीरागु महला 3 ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ मनमुखि बूझ न पाइ ॥ गुरमुखि सदा मुख ऊजले हरि वसिआ मनि आइ ॥ सहजे ही सुखु पाईऐ सहजे रहै समाइ ॥1॥ भाई रे दासनि दासा होइ ॥ गुर की सेवा गुर भगति है विरला पाए कोइ ॥1॥ रहाउ ॥ सदा सुहागु सुहागणी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ सदा पिरु निहचलु पाईऐ ना ओहु मरै न जाइ ॥ सबदि मिली ना वीछुड़ै पिर कै अंकि समाइ ॥2॥ हरि निरमलु अति ऊजला बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥ पाठु पड़ै ना बूझई भेखी भरमि भुलाइ ॥ गुरमती हरि सदा पाइआ रसना हरि रसु समाइ ॥3॥ माइआ मोहु चुकाइआ गुरमती सहजि सुभाइ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ गुरू के शरण पड़ने से (ही) परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है। अपने मन के पीछे चलने से (सिमरन की) सूझ नहीं पड़ती। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं, वह (लोक परलोक में) सदा सुर्खरू रहते हैं, उनके मन में परमात्मा आ बसता है (और उनके अंदर आत्मिक अडोलता बन जाती है)। आत्मिक अडोलता से ही आत्मिक आनंद मिलता है। (गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य सदा) आत्मिक अडोलता में लीन रहता है।1। हे भाई ! परमात्मा के सेवकों का सेवक बन- यही है गुरू की बताई सेवा, यह है गुरू की (बताई) भक्ति। (ये दात) किसी विरले (भाग्यशाली) को मिलती है।1।रहाउ। जो जीव-सि्त्रयां गुरू के प्रेम में (टिक के जीवन राह पर) चलती हैं, वे परमात्मा पति की प्रसन्नता के सौभाग्य वाली बन जाती हैं। उनका यह सौभाग्य सदा कायम रहता है। (गुरू की शरण पड़ने से) वह पति प्रभू मिल जाता है जो सदा अटल है, जो ना मरता है, ना कभी पैदा होता है। जो जीव-स्त्री गुरू के शबद द्वारा उस प्रभू में मिलती है, वह पुनः उससे कभी बिछुड़ती नहीं। वह सदा प्रभू पति की गोद में समाई रहती है।2। परमात्मा पवित्र स्वरूप है, बहुत ही पवित्र स्वरूप है। गुरू की शरण के बिना उससे मिलाप नहीं हो सकता। (जो मनुष्य धार्मिक पुस्तकों का) निरा पाठ (ही) पढ़ता है, (वह इस भेद को) नहीं समझता, (निरे) धार्मिक भेखों से (बल्कि) भटकन में पड़ कर गलत राह पर पड़ जाते हैं। गुरू की मति पर चल कर ही सदा परमात्मा मिलता है, और (मनुष्य की) जीभ में परमात्मा के नाम का स्वाद टिका रहता है।3। (जो मनुष्य) गुरू की मति के अनुसार (चलता है वह अपने अंदर से) माया का मोह मार लेता है (वह) आत्मिक अडोलता में (टिक जाता है, वह प्रभू के) प्रेम में (लीन रहता है)।
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग महला 3 ॥ जो जीव-पंछी इस शरीर वृक्ष पर बैठा हुआ गुरू के प्रेम में रह के सदा स्थिर प्रभू के नाम का चोगा चुगता है, वह खूबसूरत जीवन वाला हो जाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।