जालउ ऐसी रीति जितु मै पिआरा वीसरै ॥
नानक साई भली परीति जितु साहिब सेती पति रहै ॥2॥
हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥
हरि इको दाता मंगीऐ मन चिंदिआ पाईऐ ॥
जे दूजे पासहु मंगीऐ ता लाज मराईऐ ॥
जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ तिसु जन की सभ भुख गवाईऐ ॥
नानकु तिन विटहु वारिआ जिन अनदिनु हिरदै हरि नामु धिआईऐ ॥10॥
भगत जना कंउ आपि तुठा मेरा पिआरा आपे लइअनु जन लाइ ॥
पातिसाही भगत जना कउ दितीअनु सिरि छतु सचा हरि बणाइ ॥
सदा सुखीए निरमले सतिगुर की कार कमाइ ॥
राजे ओइ न आखीअहि भिड़ि मरहि फिरि जूनी पाहि ॥
नानक विणु नावै नकंी वढंी फिरहि सोभा मूलि न पाहि ॥1॥
सुणि सिखिऐ सादु न आइओ जिचरु गुरमुखि सबदि न लागै ॥
सतिगुरि सेविऐ नामु मनि वसै विचहु भ्रमु भउ भागै ॥
जेहा सतिगुर नो जाणै तेहो होवै ता सचि नामि लिव लागै ॥
नानक नामि मिलै वडिआई हरि दरि सोहनि आगै ॥2॥
गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥
हरि नामु वणंजहि रंग सिउ लाहा हरि नामु लै जावहि ॥
गुरसिखा के मुख उजले हरि दरगह भावहि ॥
गुरु सतिगुरु बोहलु हरि नाम का वडभागी सिख गुण सांझ करावहि ॥
तिना गुरसिखा कंउ हउ वारिआ जो बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवहि ॥11॥
नानक नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
मनमुख घरि होदी वथु न जाणनी अंधे भउकि मुए बिललाइ ॥1॥
कंचन काइआ निरमली जो सचि नामि सचि लागी ॥
निरमल जोति निरंजनु पाइआ गुरमुखि भ्रमु भउ भागी ॥
नानक गुरमुखि सदा सुखु पावहि अनदिनु हरि बैरागी ॥2॥
से गुरसिख धनु धंनु है जिनी गुर उपदेसु सुणिआ हरि कंनी ॥
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ तिनि हंउमै दुबिधा भंनी ॥
बिनु हरि नावै को मित्रु नाही वीचारि डिठा हरि जंनी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! सतिगुरू की सेवा के बिना काले मुँह (संसार से) चले जाते हैं और जम-पुरी में बँधे हुए मार खाते हैं (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।