नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: प्रभू के हुकम के बिना मनुष्य की सुरति (झूठ में से निकल के) ऊँची नहीं हो सकती।सिर्फ जबानी (ज्ञान की) बातें करके बल्कि आत्मिक जीवन और खराब करता है। जहाँ भी (भाव।साध-संगति में) जा के बैठें।प्रभू की सिफत सालाह ही करनी चाहिए।अपनी सुरति में प्रभू की सिफत सालाह की बाणी परोनी चाहिए। (नहीं तो) हृदय को माया के मोह में मैला करके (तीर्थ-) स्नान करने का क्या लाभ। 1।(पर। ये सिफत सालाह हे प्रभू ! आपकी अपनी बख्शिश है) मैं तब ही सिफत-सालाह कर सकता हूँ जब आप खुद प्रेरणा करता है। (प्रभू की मेहर से ही) प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम मेरे मन को प्यारा लग सकता है। जब प्रभू का नाम मन को मीठा लगता है तब दुखों ने (उस मन में से) अपना डेरा उठा लिया (समझो)। हे प्रभू ! जब तूने हुकम किया तब आत्मिक आनंद मेरे मन में आ बसता है। हे प्रभू ! जिस आप ने अपने आप को खुद ही (जगत-रूप में) प्रकट किया है।जब आप मुझे प्ररणा करता है तब ही मैं आपकी सिफत सालाह कर सकता हूँ। मेरी तो आपके दर पे आरजू ही होती है।मेहर की नजर (तो) आप खुद ही करता है। 2। जीवों के किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभू हरेक जीव को मानस जन्म की बारी देता है (पिछले कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही किसी को अच्छा और किसी को बुरा बनाता है। इस वास्ते) किसी मनुष्य को बुरा कह कह के कोई झगड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए (बुरा मनुष्य प्रभू की रजा में ही बुरा बना हुआ है) बुरे की निंदा करना प्रभू से झगड़ा करना है।(सो। हे भाई !) मालिक प्रभू से झगड़ा नहीं डालना चाहिए।इस तरह तो (हम) अपने आप को खुद ही तबाह कर लेते हैं। जिस मालिक के आसरे सदा जीना है।उसके साथ ही बराबरी करके (अगर दुख प्राप्त हुआ तो फिर उसके पास) जा के पुकार करने का कोई लाभ नहीं हो सकता। परमात्मा जो (सुख-दुख) देता है वह (खिले माथे) सहना चाहिए।गिला-श्किवा नहीं करना चाहिए। गिला-गुजारी करके व्यर्थ बोल-कुबोल नहीं बोलने चाहिए।(दरअसल बात ये है कि) हमारे किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभू हमें मानस जनम की बारी देता है। 3। सारी सृष्टि परमात्मा ने स्वयं पैदा की है।खुद ही हरेक जीव पर मेहर की निगाह करता है। (उसके दर से सब जीव दातें मांगते हैं) कड़वी चीज (कोई भी) नहीं मांगता।हरेक जीव मीठी सुखदाई वस्तुएं ही मांगता है। हरेक जीव मीठे पदार्थों की मांग ही करता है।पर पति-प्रभू वही कुछ करता है (देता है) जो उसे अच्छा लगता है। जीव (दुनिया के मीठे पदार्थों की खातिर) दान-पुंन करते हैं।ऐसे और भी धार्मिक कर्म करते हैं।पर परमात्मा के नाम के बराबर और कोई उद्यम नहीं। हे नानक ! जिन लोगों पर धुर से परमात्मा की ओर से बख्शिश होती है उन्हें नाम की दाति मिलती है। ये सारा जगत प्रभू ने खुद पैदा किया है और खुद ही सब पर मेहर की नजर करता है। 4। 1।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 ॥ हे प्रभू ! मेहर कर कि मैं आपका नाम सिमर सकूँ। तूने सारी सृष्टि खुद ही पैदा की है और खुद ही सब जीवों में व्यापक है। आप खुद ही सब जीवों में समाया हुआ है।पैदा करके तूने खुद ही सुष्टि को माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है। कई जीवों को आप स्वयं ही राजे बना देता है।और कई जीवों को (मंगते बना के) भिक्षा मांगने के वास्ते (दर-ब-दर) भटका रहा है। हे प्रभू ! तूने लोभ और मोह को मीठा बना दिया है।जगत इस भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर चल रहा है। अगर आप सदा अपनी मेहर करता रहे तो ही मैं आपका नाम सिमर सकता हूँ। 1। हे प्रभू ! आपका नाम सदा स्थिर रहने वाला है।आपका नाम मेरे मन को प्यारा लगता है। जो मनुष्य आपका नाम सिमरता है उसका दुख दूर हैं जाता है और आत्मिक आनंद उसके अंदर आ बसता है। भाग्यशाली सदाचारी समझदार मनुष्य आपकी सिफत सालाह के गीत गाते हैं। हे प्रभू ! जो बंदे आपके मन को भाते हैं वे सुघड़ सुजान आपकी सिफत सालाह के गीत गाते हैं।पर। जो मनुष्य माया में मोहे जाते हैं वे आपको नहीं सिमरते वे अपना अमूल्य जन्म गवा लेते हैं। अनेकों ऐसे मूर्ख मनुष्य हैं जो।हे प्रभू ! आपको याद नहीं करते (वे ये नहीं समझते कि) जो जगत में पैदा हुआ है उसने (आखिर यहाँ से) चले जाना है। हे प्रभू ! आपका सदा ही स्थिर रहने वाला है।आपका नाम मेरे मन को प्यारा लग रहा है। 2। हे प्रभू ! आपकी सिफत सालाह की बाणी अमृत है (अटल आत्मिक जीवन देने वाली है) वह वक्त बहुत सुहावना लगता है जब आपका नाम याद करते हैं। जिन बंदों को आपके नाम का रस आता है वह सेवक प्रेम से आपका नाम सिमरते हैं। उन ही लोगों को नाम का रस आता है जिनको ये नाम अमृत प्राप्त होता है। हे प्रभू ! जो लोग आपके नाम में जुड़ते हैं वह (आत्मिक जीवन की उन्नति में) सदा बढ़ते-फूलते रहते हैं। हे प्रभू ! जब तक मैं आपके साथ एक गहरी सांझ नहीं डालता तब तक और कोई एक भी धर्म-कर्म कोई एक भी संयम किसी अर्थ के नहीं। आपकी सिफत सालाह की बाणी आत्मिक जीवन-दाती है।वह वक्त बहुत सुहाना लगता है जब आपका नाम सिमरते हैं। 3। हे प्रभू ! आपके सदा-स्थिर रहने वाले नाम से कुर्बान जाता हूँ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू के हुकम के बिना मनुष्य की सुरति (झूठ में से निकल के) ऊँची नहीं हो सकती।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।