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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 566 · वडहंस

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अंग
566
वडहंस
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  1. लिखे बाझहु सुरति नाही बोलि बोलि गवाईऐ ॥
  2. करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥

गुरु नानक देव जी · छंत · राग वडहंस

लिखे बाझहु सुरति नाही बोलि बोलि गवाईऐ ॥

अंग 565 से चला आ रहा अंश

लिखे बाझहु सुरति नाही बोलि बोलि गवाईऐ ॥
जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ सुरति सबदु लिखाईऐ ॥
काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥1॥
ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥
अंम्रितु हरि का नामु मेरै मनि भाइआ ॥
नामु मीठा मनहि लागा दूखि डेरा ढाहिआ ॥
सूखु मन महि आइ वसिआ जामि तै फुरमाइआ ॥
नदरि तुधु अरदासि मेरी जिंनि आपु उपाइआ ॥
ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥2॥
वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥
मंदा किसै न आखि झगड़ा पावणा ॥
नह पाइ झगड़ा सुआमि सेती आपि आपु वञावणा ॥
जिसु नालि संगति करि सरीकी जाइ किआ रूआवणा ॥
जो देइ सहणा मनहि कहणा आखि नाही वावणा ॥
वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥3॥
सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥
कउड़ा कोइ न मागै मीठा सभ मागै ॥
सभु कोइ मीठा मंगि देखै खसम भावै सो करे ॥
किछु पुंन दान अनेक करणी नाम तुलि न समसरे ॥
नानका जिन नामु मिलिआ करमु होआ धुरि कदे ॥
सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू के हुकम के बिना मनुष्य की सुरति (झूठ में से निकल के) ऊँची नहीं हो सकती। सिर्फ जबानी (ज्ञान की) बातें करके बल्कि आत्मिक जीवन और खराब करता है। जहाँ भी (भाव। साध-संगति में) जा के बैठें। प्रभू की सिफत सालाह ही करनी चाहिए। अपनी सुरति में प्रभू की सिफत सालाह की बाणी परोनी चाहिए। (नहीं तो) हृदय को माया के मोह में मैला करके (तीर्थ-) स्नान करने का क्या लाभ। 1। (पर। ये सिफत सालाह हे प्रभू ! आपकी अपनी बख्शिश है) मैं तब ही सिफत-सालाह कर सकता हूँ जब आप खुद प्रेरणा देते हैं। (प्रभू की मेहर से ही) प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम मेरे मन को प्यारा लग सकता है। जब प्रभू का नाम मन को मीठा लगता है तब दुखों ने (उस मन में से) अपना डेरा उठा लिया (समझो)। हे प्रभू ! जब आपने हुकम किया तब आत्मिक आनंद मेरे मन में आ बसता है। हे प्रभू ! जिस आप ने अपने आप को खुद ही (जगत-रूप में) प्रकट किया है। जब आप मुझे प्रेरित करते हैं तब ही मैं आपकी सिफत सालाह कर सकता हूँ। मेरी तो आपके दर पे आरजू ही होती है। मेहर की नजर (तो) आप खुद ही करते हैं। 2। जीवों के किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभू हरेक जीव को मानस जन्म की बारी देता है (पिछले कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही किसी को अच्छा और किसी को बुरा बनाता है। इस वास्ते) किसी मनुष्य को बुरा कह कह के कोई झगड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए (बुरा मनुष्य प्रभू की रजा में ही बुरा बना हुआ है) बुरे की निंदा करना प्रभू से झगड़ा करना है। (सो। हे भाई !) मालिक प्रभू से झगड़ा नहीं डालना चाहिए। इस तरह तो (हम) अपने आप को खुद ही तबाह कर लेते हैं। जिस मालिक के आसरे सदा जीना है। उसके साथ ही बराबरी करके (अगर दुख प्राप्त हुआ तो फिर उसके पास) जा के पुकार करने का कोई लाभ नहीं हो सकता। परमात्मा जो (सुख-दुख) देता है वह (खिले माथे) सहना चाहिए। गिला-श्किवा नहीं करना चाहिए। गिला-गुजारी करके व्यर्थ बोल-कुबोल नहीं बोलने चाहिए। (दरअसल बात ये है कि) हमारे किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभू हमें मानस जनम की बारी देता है। 3। सारी सृष्टि परमात्मा ने स्वयं पैदा की है। खुद ही हरेक जीव पर मेहर की निगाह करता है। (उसके दर से सब जीव दातें मांगते हैं) कड़वी चीज (कोई भी) नहीं मांगता। हरेक जीव मीठी सुखदाई वस्तुएं ही मांगता है। हरेक जीव मीठे पदार्थों की मांग ही करता है। पर पति-प्रभू वही कुछ करता है (देता है) जो उसे अच्छा लगता है। जीव (दुनिया के मीठे पदार्थों की खातिर) दान-पुंन करते हैं। ऐसे और भी धार्मिक कर्म करते हैं। पर परमात्मा के नाम के बराबर और कोई उद्यम नहीं। हे नानक ! जिन लोगों पर धुर से परमात्मा की ओर से बख्शिश होती है उन्हें नाम की दाति मिलती है। ये सारा जगत प्रभू ने खुद पैदा किया है और खुद ही सब पर मेहर की नजर करता है। 4। 1।

गुरु नानक देव जी · छंत · राग वडहंस

करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥

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वडहंसु महला 1 ॥
करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥
सभ उपाईऐ आपि आपे सरब समाणा ॥
सरबे समाणा आपि तूहै उपाइ धंधै लाईआ ॥
इकि तुझ ही कीए राजे इकना भिख भवाईआ ॥
लोभु मोहु तुझु कीआ मीठा एतु भरमि भुलाणा ॥
सदा दइआ करहु अपणी तामि नामु वखाणा ॥1॥
नामु तेरा है साचा सदा मै मनि भाणा ॥
दूखु गइआ सुखु आइ समाणा ॥
गावनि सुरि नर सुघड़ सुजाणा ॥
सुरि नर सुघड़ सुजाण गावहि जो तेरै मनि भावहे ॥
माइआ मोहे चेतहि नाही अहिला जनमु गवावहे ॥
इकि मूड़ मुगध न चेतहि मूले जो आइआ तिसु जाणा ॥
नामु तेरा सदा साचा सोइ मै मनि भाणा ॥2॥
तेरा वखतु सुहावा अंम्रितु तेरी बाणी ॥
सेवक सेवहि भाउ करि लागा साउ पराणी ॥
साउ प्राणी तिना लागा जिनी अंम्रितु पाइआ ॥
नामि तेरै जोइ राते नित चड़हि सवाइआ ॥
इकु करमु धरमु न होइ संजमु जामि न एकु पछाणी ॥
वखतु सुहावा सदा तेरा अंम्रित तेरी बाणी ॥3॥
हउ बलिहारी साचे नावै ॥

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 ॥ हे प्रभू ! मेहर करें कि मैं आपका नाम सिमर सकूँ। आपने सारी सृष्टि खुद ही पैदा की है और खुद ही सब जीवों में व्यापक हैं। आप खुद ही सब जीवों में समाए हुए हैं। पैदा करके आपने खुद ही सृष्टि को माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है। कई जीवों को आप स्वयं ही राजे बना देते हैं। और कई जीवों को (मंगते बना के) भिक्षा मांगने के वास्ते (दर-ब-दर) भटका रहे हैं। हे प्रभू ! आपने लोभ और मोह को मीठा बना दिया है। जगत इस भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर चल रहा है। अगर आप सदा अपनी मेहर करते रहें तो ही मैं आपका नाम सिमर सकता हूँ। 1। हे प्रभू ! आपका नाम सदा स्थिर रहने वाला है। आपका नाम मेरे मन को प्यारा लगता है। जो मनुष्य आपका नाम सिमरता है उसका दुख दूर हो जाता है और आत्मिक आनंद उसके अंदर आ बसता है। भाग्यशाली सदाचारी समझदार मनुष्य आपकी सिफत सालाह के गीत गाते हैं। हे प्रभू ! जो बंदे आपके मन को भाते हैं वे सुघड़ सुजान आपकी सिफत सालाह के गीत गाते हैं। पर। जो मनुष्य माया में मोहे जाते हैं वे आपको नहीं सिमरते वे अपना अमूल्य जन्म गवा लेते हैं। अनेकों ऐसे मूर्ख मनुष्य हैं जो। हे प्रभू ! आपको याद नहीं करते (वे ये नहीं समझते कि) जो जगत में पैदा हुआ है उसने (आखिर यहाँ से) चले जाना है। हे प्रभू ! आपका नाम सदा ही स्थिर रहने वाला है। आपका नाम मेरे मन को प्यारा लग रहा है। 2। हे प्रभू ! आपकी सिफत सालाह की बाणी अमृत है (अटल आत्मिक जीवन देने वाली है) वह वक्त बहुत सुहावना लगता है जब आपका नाम याद करते हैं। जिन बंदों को आपके नाम का रस आता है वह सेवक प्रेम से आपका नाम सिमरते हैं। उन ही लोगों को नाम का रस आता है जिनको ये नाम अमृत प्राप्त होता है। हे प्रभू ! जो लोग आपके नाम में जुड़ते हैं वह (आत्मिक जीवन की उन्नति में) सदा बढ़ते-फूलते रहते हैं। हे प्रभू ! जब तक मैं आपके साथ एक गहरी सांझ नहीं डालता तब तक और कोई एक भी धर्म-कर्म कोई एक भी संयम किसी अर्थ के नहीं। आपकी सिफत सालाह की बाणी आत्मिक जीवन-दाती है। वह वक्त बहुत सुहाना लगता है जब आपका नाम सिमरते हैं। 3। हे प्रभू ! आपके सदा-स्थिर रहने वाले नाम से कुर्बान जाता हूँ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 566 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।