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अंग 524

अंग
524
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मथे वालि पछाड़िअनु जम मारगि मुते ॥
दुखि लगै बिललाणिआ नरकि घोरि सुते ॥
कंठि लाइ दास रखिअनु नानक हरि सते ॥20॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: (निंदकों को। मानो) उसने केसों से पकड़ के जमीन पे पटका के मारा है और जम के राह पर निरआसरा ही छोड़ दिया है; इस तरह दुख लगने के कारण वह बिलकते हैं।और मानो। घोर नर्क में पड़ते हैं। पर हे नानक ! सच्चे प्रभू ने अपने सेवकों को (विकारों दुखों से।मानो) गले से लगा के बचा लिया है। 20।
सलोक मः 5 ॥
रामु जपहु वडभागीहो जलि थलि पूरनु सोइ ॥
नानक नामि धिआइऐ बिघनु न लागै कोइ ॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे बड़े भाग्य वालो ! उस प्रभू को जपो जो पानी में।धरती पर (हर जगह) मौजूद है; हे नानक ! अगर प्रभू का नाम सिमरें तो (जीवन के राह में) कोई रुकावट नहीं पड़ती।
मः 5 ॥
कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥
नानक अनदिनु बिलपते जिउ सुंञै घरि काउ ॥2॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम बिसर जाता है उसको करोड़ों बिघन आ घेरते हैं; हे नानक ! (ऐसे लोग) हर रोज यूँ बिलकते हैं जैसे सूने घर में कौआ पुकारता है। 2।
पउड़ी ॥
सिमरि सिमरि दातारु मनोरथ पूरिआ ॥
इछ पुंनी मनि आस गए विसूरिआ ॥
पाइआ नामु निधानु जिस नो भालदा ॥
जोति मिली संगि जोति रहिआ घालदा ॥
सूख सहज आनंद वुठे तितु घरि ॥
आवण जाण रहे जनमु न तहा मरि ॥
साहिबु सेवकु इकु इकु द्रिसटाइआ ॥
गुर प्रसादि नानक सचि समाइआ ॥21॥1॥2॥ सुधु
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सब दातें देने वाले परमात्मा को सिमर सिमर के (मन के) मनोरथ पूरे हो जाते हैं मन में उठतीं आशाएं और इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।और (दुनियावी) दुख-चिंताएं झोरे मिट जाते हैं (क्योंकि सिमरन की बरकति से ‘माया’ की तलाश मिट जाती है।आशा-तृष्णा समाप्त हो जाती है। इसकी जगह) जिस ‘नाम’-खजाने की तलाश में लगता है वह इसे प्राप्त हो जाता है। मनुष्य की आत्मा प्रभू की ज्योति में लीन हो जाती है और (माया की खातिर) दौड़-भाग भटकना रह जाती है। (जो मनुष्य सिमरन की कमाई करता है) उस (के) हृदय-घर में सुख।अडोलता।खुशी आ बसते हैं। उसके जनम-मरण समाप्त हो जाते हैं।वहाँ जनम और मौत नहीं रह जाते। क्योंकि (इस अवस्था में पहुँचते हुए) सेवक और मालिक प्रभू एक-रूप नजर आते हैं। हे नानक ! (ऐसा सेवक) सतिगुरू की कृपा से सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में लीन हो जाता है। 21। 1। 2।सुधु।
रागु गूजरी भगता की बाणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
स्री कबीर जीउ का चउपदा घरु 2 दूजा ॥
चारि पाव दुइ सिंग गुंग मुख तब कैसे गुन गईहै ॥
ऊठत बैठत ठेगा परिहै तब कत मूड लुकईहै ॥1॥
हरि बिनु बैल बिराने हुईहै ॥
फाटे नाकन टूटे काधन कोदउ को भुसु खईहै ॥1॥ रहाउ ॥
सारो दिनु डोलत बन महीआ अजहु न पेट अघईहै ॥
जन भगतन को कहो न मानो कीओ अपनो पईहै ॥2॥
दुख सुख करत महा भ्रमि बूडो अनिक जोनि भरमईहै ॥
रतन जनमु खोइओ प्रभु बिसरिओ इहु अउसरु कत पईहै ॥3॥
भ्रमत फिरत तेलक के कपि जिउ गति बिनु रैनि बिहईहै ॥
कहत कबीर राम नाम बिनु मूंड धुने पछुतईहै ॥4॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: रागु गूजरी भगता की बाणी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्री कबीर जीउ का चउपदा घरु 2 दूजा ॥ (हे भाई किसी पशु जूनि में पड़ के जब आपके) चार पैर और दो सींग होंगे।और मुँह से गूँगा होंगे।तब आप किस तरह प्रभू के गुण गा सकेगा। उठते बैठते (आपके सिर पर) डंडा पड़ेगा।तब आप कहाँ सिर छुपाएगा। 1। (हे भाई ! प्रभू का सिमरन किए बिना) बैल (आदि पशु बन के) पराधीन हो जाएगा। (नथ से) नाक छेद दिया जाएगा।कान (जूले से) फिसे हुए होंगे और कोदरे की भूसी खाएगा। 1।रहाउ। जंगल (जूह) में सारा दिन भटकते हुए भी पेट नहीं भरेगा। अब इस वक्त आप भक्त जनों का वचन नहीं मानता।(उम्र बीत जाने पर) अपना किया पाएगा। 2। अब बुरे हाल में दिन गुजार के गलत रास्ते पर गर्क हुआ पड़ा है।(आखिर) अनेकों जूनियों में भटकेगा। तूने प्रभू को विसार दिया है।और श्रेष्ठ मनुखा जनम गवा लिया है।ये समय फिर कहीं नहीं मिलेगा। 3। आपकी जिंदगी रूपी सारी रात तेली के बैल और बंदर की तरह भटकती विकारों से मुक्ति के बिना ही गुजर जाएगी। कबीर कहता है कि प्रभू का नाम भुला के आखिर सिर मार मार के पछताएगा। 4। 1।
गूजरी घरु 3 ॥
मुसि मुसि रोवै कबीर की माई ॥
ए बारिक कैसे जीवहि रघुराई ॥1॥
तनना बुनना सभु तजिओ है कबीर ॥
हरि का नामु लिखि लीओ सरीर ॥1॥ रहाउ ॥
जब लगु तागा बाहउ बेही ॥
तब लगु बिसरै रामु सनेही ॥2॥
ओछी मति मेरी जाति जुलाहा ॥
हरि का नामु लहिओ मै लाहा ॥3॥
कहत कबीर सुनहु मेरी माई ॥
हमरा इन का दाता एकु रघुराई ॥4॥2॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गूजरी घरु 3 ॥ कबीर की माँ (कबीर कहता है कि मेरी माँ) ढुसक-ढुसक के रोती है (और कहती है) हे परमात्मा ! (कबीर के) अंजान बच्चे कैसे जीएंगे। 1। (क्योंकि मेरे) कबीर ने (ताणा) तनना और (कपड़ा) बुनना सब कुछ छोड़ दिया है। हर वक्त हरी का नाम जपता रहता है। 1।रहाउ। जितने समय में मैं नाल के छेद में धागा बहाता हूँ। उतने वक्त में मुझे मेरा प्यारा प्रभू विसर जाता है (भाव।मुझे इतने समय के लिए भी प्रभू का विसरना अच्छा नहीं लगता)। 2। (क्या हुआ अगर लोगों के मुताबिक) मेरी तुच्छ अक्ल है और मैं जाति का (नीच गरीब) जुलाहा हूँ। पर मैं परमात्मा का नाम-रूपी लाभ (इस मानस जनम के व्यापार में) कमा लिया है (सो।मैं मूर्ख और नीच जाति का नहीं रह गया)। 3। कबीर कहता है, हे मेरी माँ ! सुन। हमारा और हमारे इन बच्चों का रिजक देने वाला एक ही परमात्मा है (भाव।अगर उसने मुझे पाला है।तो इनको भी जरूर पालेगा)। 4। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।