दुखि लगै बिललाणिआ नरकि घोरि सुते ॥
कंठि लाइ दास रखिअनु नानक हरि सते ॥20॥
रामु जपहु वडभागीहो जलि थलि पूरनु सोइ ॥
नानक नामि धिआइऐ बिघनु न लागै कोइ ॥1॥
कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥
नानक अनदिनु बिलपते जिउ सुंञै घरि काउ ॥2॥
सिमरि सिमरि दातारु मनोरथ पूरिआ ॥
इछ पुंनी मनि आस गए विसूरिआ ॥
पाइआ नामु निधानु जिस नो भालदा ॥
जोति मिली संगि जोति रहिआ घालदा ॥
सूख सहज आनंद वुठे तितु घरि ॥
आवण जाण रहे जनमु न तहा मरि ॥
साहिबु सेवकु इकु इकु द्रिसटाइआ ॥
गुर प्रसादि नानक सचि समाइआ ॥21॥1॥2॥ सुधु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
स्री कबीर जीउ का चउपदा घरु 2 दूजा ॥
चारि पाव दुइ सिंग गुंग मुख तब कैसे गुन गईहै ॥
ऊठत बैठत ठेगा परिहै तब कत मूड लुकईहै ॥1॥
हरि बिनु बैल बिराने हुईहै ॥
फाटे नाकन टूटे काधन कोदउ को भुसु खईहै ॥1॥ रहाउ ॥
सारो दिनु डोलत बन महीआ अजहु न पेट अघईहै ॥
जन भगतन को कहो न मानो कीओ अपनो पईहै ॥2॥
दुख सुख करत महा भ्रमि बूडो अनिक जोनि भरमईहै ॥
रतन जनमु खोइओ प्रभु बिसरिओ इहु अउसरु कत पईहै ॥3॥
भ्रमत फिरत तेलक के कपि जिउ गति बिनु रैनि बिहईहै ॥
कहत कबीर राम नाम बिनु मूंड धुने पछुतईहै ॥4॥1॥
मुसि मुसि रोवै कबीर की माई ॥
ए बारिक कैसे जीवहि रघुराई ॥1॥
तनना बुनना सभु तजिओ है कबीर ॥
हरि का नामु लिखि लीओ सरीर ॥1॥ रहाउ ॥
जब लगु तागा बाहउ बेही ॥
तब लगु बिसरै रामु सनेही ॥2॥
ओछी मति मेरी जाति जुलाहा ॥
हरि का नामु लहिओ मै लाहा ॥3॥
कहत कबीर सुनहु मेरी माई ॥
हमरा इन का दाता एकु रघुराई ॥4॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।