Lulla Family

अंग ४६१ · आसा

अंग
461
आसा
अंग बदलें या अंश चुनें · ३ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. निधि सिधि चरण गहे ता केहा काड़ा ॥
  2. दिनु राति कमाइअड़ो सो आइओ माथै ॥
  3. कमला भ्रम भीति कमला भ्रम भीति हे तीखण मद बिपरीति हे अवध अकारथ जात ॥

निधि सिधि चरण गहे ता केहा काड़ा ॥

अंग ४६० से चला आ रहा अंश

निधि सिधि चरण गहे ता केहा काड़ा ॥
सभु किछु वसि जिसै सो प्रभू असाड़ा ॥
गहि भुजा लीने नाम दीने करु धारि मसतकि राखिआ ॥
संसार सागरु नह विआपै अमिउ हरि रसु चाखिआ ॥
साधसंगे नाम रंगे रणु जीति वडा अखाड़ा ॥
बिनवंति नानक सरणि सुआमी बहुड़ि जमि न उपाड़ा ॥4॥3॥12॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जब किसी मनुष्य ने उस परमात्मा के चरण पकड़ लिए जो सारी निधियों का सारी सिद्धियों का मालिक है उसे तब कोई चिंता-फिक्र नहीं रह जाता (क्योंकि। हे भाई !) हमारे सिर पर वह परमात्मा रखवाला है जिसके वश में हरेक चीज है। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) बाँह से पकड़ कर (परमात्मा अपने में) लीन कर लेता है।जिस को अपने नाम की दाति देता है।उसके माथे पर हाथ रख के उसको (विकारों से) बचा लेता है। (हे भाई ! परमात्मा की कृपा से जिस मनुष्य ने) आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस का स्वाद चख लिया।उस पर संसार-समुंदर अपना जोर नहीं डाल सकता। उसने साध-संगति में टिक के।हरि-नाम के प्रेम में लीन हो के ये रण जीत लिया ये बड़ा अखाड़ा फतह कर लिया (जहाँ कामादिक पहलवानों से सदा युद्ध चलता रहता है)। नानक विनती करता है, जो मनुष्य मालिक प्रभू की शरण पड़ा रहता है उसको (इस जीवन-युद्ध में) दुबारा कभी जम पैरों से उखाड़ नहीं सकता। 4। 3। 12।

दिनु राति कमाइअड़ो सो आइओ माथै ॥

आसा महला 5 ॥
दिनु राति कमाइअड़ो सो आइओ माथै ॥
जिसु पासि लुकाइदड़ो सो वेखी साथै ॥
संगि देखै करणहारा काइ पापु कमाईऐ ॥
सुक्रितु कीजै नामु लीजै नरकि मूलि न जाईऐ ॥
आठ पहर हरि नामु सिमरहु चलै तेरै साथे ॥
भजु साधसंगति सदा नानक मिटहि दोख कमाते ॥1॥
वलवंच करि उदरु भरहि मूरख गावारा ॥
सभु किछु दे रहिआ हरि देवणहारा ॥
दातारु सदा दइआलु सुआमी काइ मनहु विसारीऐ ॥
मिलु साधसंगे भजु निसंगे कुल समूहा तारीऐ ॥
सिध साधिक देव मुनि जन भगत नामु अधारा ॥
बिनवंति नानक सदा भजीऐ प्रभु एकु करणैहारा ॥2॥
खोटु न कीचई प्रभु परखणहारा ॥
कूड़ु कपटु कमावदड़े जनमहि संसारा ॥
संसारु सागरु तिन॑ी तरिआ जिन॑ी एकु धिआइआ ॥
तजि कामु क्रोधु अनिंद निंदा प्रभ सरणाई आइआ ॥
जलि थलि महीअलि रविआ सुआमी ऊच अगम अपारा ॥
बिनवंति नानक टेक जन की चरण कमल अधारा ॥3॥
पेखु हरिचंदउरड़ी असथिरु किछु नाही ॥
माइआ रंग जेते से संगि न जाही ॥
हरि संगि साथी सदा तेरै दिनसु रैणि समालीऐ ॥
हरि एक बिनु कछु अवरु नाही भाउ दुतीआ जालीऐ ॥
मीतु जोबनु मालु सरबसु प्रभु एकु करि मन माही ॥
बिनवंति नानकु वडभागि पाईऐ सूखि सहजि समाही ॥4॥4॥13॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! जो कुछ दिन-रात हर वक्त अच्छे-बुरे काम आपने किए हैं वे संस्कार-रूप बन के आपके मन में उकरे गए हैं। हे भाई ! जिससे आप (अपने किए कर्म) छुपाते रहे हैं वह तो आपके साथ ही बैठा देखता जा रहा है। हे भाई ! सृजनहार (हरेक जीव के) साथ (बैठा हरेक किए काम) देखता रहता है।सो।कोई बुरा काम नहीं करना चाहिए। (बल्कि) भले कर्म करने चाहिए।परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए (नाम की बरकति से) नर्क में कभी नहीं जाते। हे भाई ! आठों पहर परमात्मा का नाम सिमरता रह।परमात्मा का नाम आपका साथ देगा। हे नानक ! (कह, हे भाई !) साध-संगति में टिक के परमात्मा का भजन किया कर (भजन की बरकति से पिछले) किए हुए विकार मिट जाते हैं। 1। हे मूर्ख ! हे गवार ! आप (औरों से) छल-कपट करके (अपना) पेट भरते हैं।(रोजी कमाते हैं। आपको ये बात भूल चुकी हुई है कि) हरी दातार (सब जीवों को) हरेक चीज दे रहा है। हे भाई ! सब दातें देने वालामालिक सदा दयावान रहता है।उसको कभी भी अपने मन से भुलाना नहीं चाहिए। हे भाई ! साध-संगति में मिल (-बैठ)।शर्म उतार के उसका भजन किया कर (भजन की बरकति से अपनी) सारी कुलों का उद्धार कर लेनी हैं। जोग-साधना में पहुँचे हुए जोगी।योग-साधना करने वाले।भगत-देवते।समाधियां लगाने वाले- सभी की जिंदगी का हरि-नाम ही सहारा बना चला । नानक विनती करता है, हे भाई ! सदा उस परमात्मा का भजन करना चाहिए जो खुद ही सारे संसार को पैदा करने वाला है। 2। (हे भाई ! कभी किसी के साथ) धोखा नहीं करना चाहिए (परमात्मा खोटे-खरे की) पहचान करने के समर्थ है। जो मनुष्य (को ठगने के लिए) झूठ बोलते हैं।वह संसार में बारंबार जन्मते (मरते) रहते हैं। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने एक परमात्मा का सिमरन किया है।वे संसार समुंद्र से पार हो गए। जो काम-क्रोध त्याग के भले लोगों की निंदा छोड़ के प्रभू की शरण आ गए हैं। नानक विनती करता है (-हे भाई !) जो परमात्मा पानी में।धरती में।आकाश में हर जगह मौजूद है।जो सबसे ऊँचा है।जो अपहुँच है और बेअंत है। वह अपने सेवकों (की जिंदगी) का सहारा है।उसके सोहाने कोमल चरण उसके सेवकों के लिए आसरा हैं। 3। (हे भाई ! ये सारा संसार जो दिख रहा है इसे) धूँए का पहाड़ (करके) देख (इस में) कोई भी चीज सदा कायम रहने वाली नहीं। माया के जितने भी मौज-मेले हैं वह सारे (किसी के) साथ नहीं जाते। हे भाई ! परमात्मा ही आपके साथ निभने वाला साथी है।दिन-रात हर समय उसको अपने हृदय में संभाल के रखना चाहिए। एक परमात्मा के बिना और कुछ भी (सदा टिके रहना वाला) नहीं (इस वास्ते परमात्मा के बिना) कोई और प्यार (मन में से) जला देना चाहिए। हे भाई ! मित्र।जवानी।धन।अपना और सब कुछ- ये सब कुछ (के होते हुए भी) एक परमात्मा को ही अपने मन में समझ। नानक विनती करता है (-हे भाई !) परमात्मा बड़ी किस्मत से मिलता है (जिन्हें मिलता है वे सदा) आनंद में आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं। 4। 4। 13।

कमला भ्रम भीति कमला भ्रम भीति हे तीखण मद बिपरीति हे अवध अकारथ जात ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

आसा महला 5 छंत घरु 8
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कमला भ्रम भीति कमला भ्रम भीति हे तीखण मद बिपरीति हे अवध अकारथ जात ॥
गहबर बन घोर गहबर बन घोर हे ग्रिह मूसत मन चोर हे दिनकरो अनदिनु खात ॥
दिन खात जात बिहात प्रभ बिनु मिलहु प्रभ करुणा पते ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 छंत घरु 8 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) माया भटकना में डालने वाली दीवार है (जिसने परमात्मा से जीवों की दूरी बना रखी है)।माया भटकना में डालने वाली (और प्रभू से पर्दा बनाए रखने वाली) दीवार है।इस माया का नशा तेज है।पर (जीवन राह से) उलटी तरफ ले जाने वाला है।(माया में बसने से) मनुष्य की उम्र व्यर्थ चली जाती है। (हे भाई ! ये संसार एक) भयानक संघना जंगल है।(यहाँ मनुष्य के हृदय-) घर को (मनुष्य का अपना ही) चोर मन लूटे जा रहा है।और।सूरज (भाव।समय) हर वक्त (इसकी उम्र को) खत्म किए जा रहा है। (हे भाई ! गुजरते जा रहे) दिन (मनुष्य की उम्र को) खाए जाते हैं।परमात्मा के भजन बिना (मनुष्य की उम्र व्यर्थ) बीतती जा रही है। हे प्रभू ! हे तरस स्वरूप पति ! (मेरे पर तरस कर।और मुझे) मिल।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४६१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English