Lulla Family

अंग 438

अंग
438
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु आसा महला 1 छंत घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं सभनी थाई जिथै हउ जाई साचा सिरजणहारु जीउ ॥
सभना का दाता करम बिधाता दूख बिसारणहारु जीउ ॥
दूख बिसारणहारु सुआमी कीता जा का होवै ॥
कोट कोटंतर पापा केरे एक घड़ी महि खोवै ॥
हंस सि हंसा बग सि बगा घट घट करे बीचारु जीउ ॥
तूं सभनी थाई जिथै हउ जाई साचा सिरजणहारु जीउ ॥1॥
जिन॑ इक मनि धिआइआ तिन॑ सुखु पाइआ ते विरले संसारि जीउ ॥
तिन जमु नेड़ि न आवै गुर सबदु कमावै कबहु न आवहि हारि जीउ ॥
ते कबहु न हारहि हरि हरि गुण सारहि तिन॑ जमु नेड़ि न आवै ॥
जंमणु मरणु तिन॑ा का चूका जो हरि लागे पावै ॥
गुरमति हरि रसु हरि फलु पाइआ हरि हरि नामु उर धारि जीउ ॥
जिन॑ इक मनि धिआइआ तिन॑ सुखु पाइआ ते विरले संसारि जीउ ॥2॥
जिनि जगतु उपाइआ धंधै लाइआ तिसै विटहु कुरबाणु जीउ ॥
ता की सेव करीजै लाहा लीजै हरि दरगह पाईऐ माणु जीउ ॥
हरि दरगह मानु सोई जनु पावै जो नरु एकु पछाणै ॥
ओहु नव निधि पावै गुरमति हरि धिआवै नित हरि गुण आखि वखाणै ॥
अहिनिसि नामु तिसै का लीजै हरि ऊतमु पुरखु परधानु जीउ ॥
जिनि जगतु उपाइआ धंधै लाइआ हउ तिसै विटहु कुरबानु जीउ ॥3॥
नामु लैनि सि सोहहि तिन सुख फल होवहि मानहि से जिणि जाहि जीउ ॥
तिन फल तोटि न आवै जा तिसु भावै जे जुग केते जाहि जीउ ॥
जे जुग केते जाहि सुआमी तिन फल तोटि न आवै ॥
तिन॑ जरा न मरणा नरकि न परणा जो हरि नामु धिआवै ॥
हरि हरि करहि सि सूकहि नाही नानक पीड़ न खाहि जीउ ॥
नामु लैनि॑ सि सोहहि तिन॑ सुख फल होवहि मानहि से जिणि जाहि जीउ ॥4॥1॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 छंत घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू मैं जहाँ भी जाता हूँ आप सब जगह मौजूद है।आप सदा-स्थिर रहने वाला है।आप सारे जगत को पैदा करने वाला है। आप जीवों के किए कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला है और सब दुखों का नाश करने वाला है। जिस प्रभू का किया हुआ ही सब कुछ होता है वह सबका मालिक है वह सबके दुख नाश करने के समर्थ है। जीवों के पापों के ढेरों के ढेर एक पलक में नाश कर देता है। जीव चाहे श्रेष्ठ से श्रेष्ठ हों चाहे निखिध से निखिध।प्रभू हरेक की संभाल करता है। हे प्रभू ! मैं जहाँ भी जाता हूँ।आप हर जगह मौजूद है आप सदा-स्थिर रहने वाला है।आप सबको पैदा करने वाला है। 1। जिन मनुष्यों ने एकाग्र हैं के प्रभू को सिमरा है उन्होंने आत्मिक आनंद पाया है।पर ऐसे लोग संसार में बहुत कम हैं। जो जो लोग गुरू का शबद कमाते हैं (भाव।गुरू के शबद अनुसार जीवन बनाते हैं) जम उनके नजदीक नहीं फटकता (उन्हें मौत का डर नहीं सता सकता) वे कभी भी मानस जनम की बाजी हार के नहीं आते। जो मनुष्य परमात्मा का गुण हृदय में बसाते हैं।वे (विकारों से मुकाबले में) कभी नहीं हारते।आत्मिक मौत तो उनके नजदीक नहीं फटकती। जो लोग परमात्मा के चरणों में लगते हैं उनके जनम-मरन का चक्कर खत्म हो जाता है। गुरू की मति ले के जिन्होंने प्रभू के नाम का रस चखा है।नाम फल प्राप्त किया है।प्रभू का नाम हृदय में टिकाया है। एकाग्र हो के प्रभू को सिमरा है उन्होंने आत्मिक आनंद पाया है।पर ऐसे लोग जगत में विरले ही हैं। 2। मैं उस प्रभू से सदके हूँ जिसने जगत पैदा किया है ओर इसे माया की दौड़-भाग में लगा दिया है। (हे भाई !) उस प्रभू की सेवा-भक्ति करनी चाहिए।यही लाभ जगत में कमाना चाहिए।(इस तरह) प्रभू की दरगाह में आदर मिलता है। वही मनुष्य परमात्मा की हजूरी में आदर पाता है जो एक परमात्मा को (अपने अंग-संग) पहचानता है। जो मनुष्य गुरू की मति ले के प्रभू का सिमरन करता है परमात्मा की सिफत सालाह करता है वह (मानो) जगत के नौ खजाने हासिल करलेता है। (हे भाई !) दिन-रात उस परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए जो सबसे श्रेष्ठ है जो सबमें व्यापक है जो सबसे बड़ा है। मैं उस परमात्मा से सदके जाता हूँ जिसने जगत पैदा किया है और इसे माया की दौड़-भाग में लगा रखा है। 3। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं वह (लोक-परलोक में) शोभा पाते हैं।उनको आत्मिक आनंद रूपी फल मिलता है।वे (हर जगह) आदर पाते हैं। वे (मनुष्य जन्म की बाजी) जीत के (यहाँ से) जाते हैं।उनको (आत्मिक सुख का) फल इतना मिलता है कि परमात्मा की रजा के अनुसार वह कभी भी घटता नहीं चाहे अनेकों युग बीत जाएं। हे प्रभू स्वामी ! भले ही अनेकों ही युग बीत जाएं सिमरन करने वालों को आत्मिक आनन्द का मिला फल कभी नहीं कम होता। जो जो आदमी हरी का नाम सिमरता है उन्हें प्राप्त हुई उच्च आत्मिक अवस्था को ना बुढ़ापा आता है ना मौत सताती है।वह कभी नर्क में भी नहीं पड़ते। हे नानक ! जो लोग परमात्मा का नाम सिमरन करते हैं वे कभी सूखते नहीं हैं (भाव।उनका अंतरात्मक खिलाव कभी सूखता नहीं।आनंद कभी खत्म नहीं होता) वे कभी दुखी नहीं होते। जो मनुष्य नाम सिमरते हैं वे (लोक-परलोक में) शोभा पाते हैं।उन्हें आत्मिक आनंद रूपी फल मिलता है।वे (हर जगह) आदर पाते हैं।वे (मनुष्य जनम की बाजी) जीत के (यहाँ से) जाते हैं। 4। 1। 4।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा महला 1 छंत घरु 3 ॥
तूं सुणि हरणा कालिआ की वाड़ीऐ राता राम ॥
बिखु फलु मीठा चारि दिन फिरि होवै ताता राम ॥
फिरि होइ ताता खरा माता नाम बिनु परतापए ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा महला 1 छंत घरु 3 ॥ हे काले हिरन ! (हे काले हिरन की तरह संसार रूपी वन में बेपरवाह हो के खरमस्तियां करने वाले मन !) आप (मेरी बात) सुन ! आप इस (जगत-) फुलवाड़ी में क्यों मस्त हैं रहा है। (इस फुलवाड़ी का) फल जहर है।(भाव।आत्मिक मैत पैदा करता है) ये थोड़े दिन ही स्वादिष्ट लगता है।फिर ये दुखदाई बन जाता है। जिस में आप इतना मस्त है ये आखिर दुखदाई हैं जाता है।परमात्मा के नाम के बिना ये बहुत दुख देता है।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु आसा महला 1 छंत घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English