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आसा
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· अष्टपदी · राग आसा
आपणै हथि वडिआईआ दे नामे लाए ॥
आपणै हथि वडिआईआ दे नामे लाए ॥
नानक नामु निधानु मनि वसिआ वडिआई पाए ॥8॥4॥26॥
नानक नामु निधानु मनि वसिआ वडिआई पाए ॥8॥4॥26॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें, हे भाई! सारी) महानताएं (वडिआईयां) परमात्मा के अपने हाथ में हैं। वह स्वयं ही (आदर) बख्श के (जीव को) अपने नाम में जोड़ता है। (जिस मनुष्य के) मन में उस का नाम खजाना आ बसता है (वह मनुष्य लोक-परलोक में) आदर-मान पाता है। 8। 4। 26।
· अष्टपदी · राग आसा
सुणि मन मंनि वसाइ तूं आपे आइ मिलै मेरे भाई ॥
आसा महला 3 ॥
सुणि मन मंनि वसाइ तूं आपे आइ मिलै मेरे भाई ॥
अनदिनु सची भगति करि सचै चितु लाई ॥1॥
एको नामु धिआइ तूं सुखु पावहि मेरे भाई ॥
हउमै दूजा दूरि करि वडी वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥
इसु भगती नो सुरि नर मुनि जन लोचदे विणु सतिगुर पाई न जाइ ॥
पंडित पड़दे जोतिकी तिन बूझ न पाइ ॥2॥
आपै थै सभु रखिओनु किछु कहणु न जाई ॥
आपे देइ सु पाईऐ गुरि बूझ बुझाई ॥3॥
जीअ जंत सभि तिस दे सभना का सोई ॥
मंदा किस नो आखीऐ जे दूजा होई ॥4॥
इको हुकमु वरतदा एका सिरि कारा ॥
आपि भवाली दितीअनु अंतरि लोभु विकारा ॥5॥
इक आपे गुरमुखि कीतिअनु बूझनि वीचारा ॥
भगति भी ओना नो बखसीअनु अंतरि भंडारा ॥6॥
गिआनीआ नो सभु सचु है सचु सोझी होई ॥
ओइ भुलाए किसै दे न भुलन॑ी सचु जाणनि सोई ॥7॥
घर महि पंच वरतदे पंचे वीचारी ॥
नानक बिनु सतिगुर वसि न आवन॑ी नामि हउमै मारी ॥8॥5॥27॥
सुणि मन मंनि वसाइ तूं आपे आइ मिलै मेरे भाई ॥
अनदिनु सची भगति करि सचै चितु लाई ॥1॥
एको नामु धिआइ तूं सुखु पावहि मेरे भाई ॥
हउमै दूजा दूरि करि वडी वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥
इसु भगती नो सुरि नर मुनि जन लोचदे विणु सतिगुर पाई न जाइ ॥
पंडित पड़दे जोतिकी तिन बूझ न पाइ ॥2॥
आपै थै सभु रखिओनु किछु कहणु न जाई ॥
आपे देइ सु पाईऐ गुरि बूझ बुझाई ॥3॥
जीअ जंत सभि तिस दे सभना का सोई ॥
मंदा किस नो आखीऐ जे दूजा होई ॥4॥
इको हुकमु वरतदा एका सिरि कारा ॥
आपि भवाली दितीअनु अंतरि लोभु विकारा ॥5॥
इक आपे गुरमुखि कीतिअनु बूझनि वीचारा ॥
भगति भी ओना नो बखसीअनु अंतरि भंडारा ॥6॥
गिआनीआ नो सभु सचु है सचु सोझी होई ॥
ओइ भुलाए किसै दे न भुलन॑ी सचु जाणनि सोई ॥7॥
घर महि पंच वरतदे पंचे वीचारी ॥
नानक बिनु सतिगुर वसि न आवन॑ी नामि हउमै मारी ॥8॥5॥27॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ हे मेरे मन! (मेरी बात) सुनें; आप अपने अंदर (परमात्मा का नाम) टिकाए रखें। हे मेरे वीर! (इस तरह वह परमात्मा) स्वयं ही आ मिलता है। हे भाई! हर समय परमात्मा की भक्ति करते रहें। यही सदा-स्थिर रहने वाली चीज है। सदा कायम रहने वाले परमात्मा में सदा चित्त जोड़े रखें। 1। हे मेरे भाई! एक परमात्मा का नाम सिमरा करें (इस तरह) सुख हासिल करेंगे। (अपने अंदर से अहंकार और माया का प्यार दूर करके लोक-परलोक में) बहुत आदर मिलेगा। 1। रहाउ। हे भाई! देवते और ऋषि-मुनि भी ये हरी-भक्ति करने की तमन्ना करते हैं। पर गुरू की शरण पड़े बिना ये दाति नहीं मिलती। पण्डित लोग (वेद-शास्त्र आदि) पढ़ते रहे। ज्योतिषी (ज्योतिष के ग्रंथ) पढ़ते रहे। पर हरि भक्ति की सूझ उन्हें भी नहीं पड़ी। 2। पर, हे भाई! परमात्मा ने ये सब कुछ अपने हाथ मेंरखा हुआ है। कुछ नहीं कहा जा सकता (कि वह भक्ति की दाति किस को देता है और किस को नहीं देता। हाँ) गुरू ने ये बात समझाई है कि जो कुछ वह प्रभू स्वयं ही देता है वही हमें मिल सकता है। 3। हे भाई! जगत के सारे जीव-जंतु उस प्रभू के बनाए हुए हैं। वह स्वयं ही सभी का पति है। किसी जीव को बुरा नहीं कहा जा सकता (बुरा तभी कहा जाए। अगर परमात्मा के बिना उनमें) कोई और बसता है। 4। हे भाई! जगत में एक परमात्मा का ही हुकम चल रहा है। हरेक ने वही काम करना है जो परमात्मा द्वारा उस के सिर पर (लिखा गया) है। जिन जीवों को परमात्मा ने स्वयं (माया के मोह की) चक्कर में डाल दिया। उनके अंदर लोभ आदि विकार जोर पकड़ गए। 5। (हे भाई!) कई मनुष्यों को प्रभू ने स्वयं ही गुरू के सन्मुख रहने वाले बना दिया वह (सही आत्मिक जीवन की) विचार समझने लग पड़े। उनको परमात्मा ने अपनी भक्ति की दाति भी दे दी। उनके अंदरनाम-धन के खजाने भर गए। 6। हे भाई! सही आत्मि्क जीवन की सूझ वाले बंदों को हर जगह सदा-स्थिर प्रभू ही दिखता है (प्रभू की मेहर से ही उन्हें) ये समझ आ जाती है। अगर कोई मनुष्य उनको (इस निश्चय से) तोड़ना चाहे (भटकाना चाहे) तो वे गलती नहीं खाते। वे (हर जगह) सदा-स्थिर प्रभू को ही बसता समझते हैं। 7। (हे भाई! कामादिक) पाँचों उन ज्ञानियों के हृदय में भी बसते हैं। पर वह पाँचों ज्ञानवान हो जाते हैं। (अपनी योग्य सीमा से बाहर नहीं जाते)। हे नानक! (ये पाँचों कामादिक विकार) गुरू की शरण में पड़े बिना काबू में नहीं आते। हे भाई! परमात्मा के नाम में जुड़ के ही अहंकार दूर किया जा सकता है। 8। 5। 27।
· अष्टपदी · राग आसा
घरै अंदरि सभु वथु है बाहरि किछु नाही ॥
आसा महला 3 ॥
घरै अंदरि सभु वथु है बाहरि किछु नाही ॥
गुर परसादी पाईऐ अंतरि कपट खुलाही ॥1॥
सतिगुर ते हरि पाईऐ भाई ॥
अंतरि नामु निधानु है पूरै सतिगुरि दीआ दिखाई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का गाहकु होवै सो लए पाए रतनु वीचारा ॥
अंदरु खोलै दिब दिसटि देखै मुकति भंडारा ॥2॥
अंदरि महल अनेक हहि जीउ करे वसेरा ॥
मन चिंदिआ फलु पाइसी फिरि होइ न फेरा ॥3॥
पारखीआ वथु समालि लई गुर सोझी होई ॥
नामु पदारथु अमुलु सा गुरमुखि पावै कोई ॥4॥
बाहरु भाले सु किआ लहै वथु घरै अंदरि भाई ॥
भरमे भूला सभु जगु फिरै मनमुखि पति गवाई ॥5॥
घरु दरु छोडे आपणा पर घरि झूठा जाई ॥
चोरै वांगू पकड़ीऐ बिनु नावै चोटा खाई ॥6॥
जिन॑ी घरु जाता आपणा से सुखीए भाई ॥
अंतरि ब्रहमु पछाणिआ गुर की वडिआई ॥7॥
आपे दानु करे किसु आखीऐ आपे देइ बुझाई ॥
नानक नामु धिआइ तूं दरि सचै सोभा पाई ॥8॥6॥28॥
घरै अंदरि सभु वथु है बाहरि किछु नाही ॥
गुर परसादी पाईऐ अंतरि कपट खुलाही ॥1॥
सतिगुर ते हरि पाईऐ भाई ॥
अंतरि नामु निधानु है पूरै सतिगुरि दीआ दिखाई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का गाहकु होवै सो लए पाए रतनु वीचारा ॥
अंदरु खोलै दिब दिसटि देखै मुकति भंडारा ॥2॥
अंदरि महल अनेक हहि जीउ करे वसेरा ॥
मन चिंदिआ फलु पाइसी फिरि होइ न फेरा ॥3॥
पारखीआ वथु समालि लई गुर सोझी होई ॥
नामु पदारथु अमुलु सा गुरमुखि पावै कोई ॥4॥
बाहरु भाले सु किआ लहै वथु घरै अंदरि भाई ॥
भरमे भूला सभु जगु फिरै मनमुखि पति गवाई ॥5॥
घरु दरु छोडे आपणा पर घरि झूठा जाई ॥
चोरै वांगू पकड़ीऐ बिनु नावै चोटा खाई ॥6॥
जिन॑ी घरु जाता आपणा से सुखीए भाई ॥
अंतरि ब्रहमु पछाणिआ गुर की वडिआई ॥7॥
आपे दानु करे किसु आखीऐ आपे देइ बुझाई ॥
नानक नामु धिआइ तूं दरि सचै सोभा पाई ॥8॥6॥28॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ (हे भाई! परमात्मा का नाम-) खजाना सारा (मनुष्य के) हृदय के अंदर ही है। बाहर जंगल आदि में (ढूँढने से) कुछ नहीं मिलता। (पर, हां) ये मिलता है गुरू की कृपा से। (जिसे गुरू मिल जाए उसके) अंदर के किवाड़ (जो पहले माया के मोह के कारण बंद थे) खुल जाते हैं। 1। हे भाई! गुरू से ही परमात्मा मिलता है (वैसे तो हरेक मनुष्य के) अंदर (परमात्मा का) नाम खजाना मौजूद है। पर गुरू ने ही (ये खजाना) दिखाया है। 1। रहाउ। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-धन का गाहक बनता है वह (गुरू के माध्यम से) हासिल कर लेता है वह आत्मिक जीवन का कीमती विचार प्राप्त कर लेता है। (माया के मोह के ताले से बंद हुआ अपना) हृदय वह (गुरू की कृपा से) खोल लेता है। आत्म दृष्टि से देखता है कि माया के मोह से निजात दिलाने वाले नाम-धन के खजाने भरे पड़े हैं। 2। हे भाई! मनुष्य के हृदय में नाम-धन के अनेकों खजाने मौजूद हैं। जीवात्मा भी अंदर ही बसती है (जब गुरू की मेहर से समझ आती है तब) मनोच्छित फल पाती है। और पुनः इसे जनम-मरण का चक्कर नहीं रहता। 3। हे भाई! जिन्हें गुरू की दी हुई सूझ मिल गई उन आत्मिक जीवन की परख करने वालों ने नाम-खजाना अपने हृदय में संभाल लिया। प्रभू का नाम-खजाना किसी दुनियावी कीमत से नहीं मिल सकता। गुरू की शरण पड़ के ही मनुष्य पा सकता है। 4। हे भाई! नाम-खजाना हृदय के अंदर ही है। जो मनुष्य जंगल आदि में तलाशता फिरता है उसे कुछ नहीं मिलता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (अपनी समझ के) भुलेखे में गलत मार्ग पर पड़ा हुआ सारा जगत तलाशता फिरता है और इज्जत गवा लेता है। 5। (हे भाई! जैसे कोई) झूठा (ठॅग) मनुष्य अपना घर-घाट छोड़ देता है (और धन आदि की खातिर) पराए घर में जाता है वह चोर की तरह पकड़ा जाता है (इसी तरह) परमात्मा के नाम से टूट के मनुष्य (लोक-परलोक में) चोटें खाता है। 6। हे भाई! जिन मनुष्यों ने अपने (हृदय-) घर को अच्छी तरह समझ लिया है वही सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। (पर, (जिन्होंने) ये पहचान लिया है कि परमात्मा (हमारे) अंदर ही बसता है। हे भाई!) ये सतिगुरू की ही मेहर है (गुरू की कृपा करे तभी ये समझ पड़ती है)। 7। हे भाई! परमात्मा स्वयं ही नाम की दाति करता है। और किसी को कहा नहीं जा सकता। वह प्रभू खुद ही नाम की समझ बख्शता है। हे नानक! आप सदा हरि-नाम सिमरते रहें। (जो मनुष्य हरि-नाम सिमरता है वह) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू के दर पर शोभा पाता है। 8। 6। 28।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 425 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।