Lulla Family

अंग 423

अंग
423
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ता के रूप न जाही लखणे किआ करि आखि वीचारी ॥2॥
तीनि गुणा तेरे जुग ही अंतरि चारे तेरीआ खाणी ॥
करमु होवै ता परम पदु पाईऐ कथे अकथ कहाणी ॥3॥
तूं करता कीआ सभु तेरा किआ को करे पराणी ॥
जा कउ नदरि करहि तूं अपणी साई सचि समाणी ॥4॥
नामु तेरा सभु कोई लेतु है जेती आवण जाणी ॥
जा तुधु भावै ता गुरमुखि बूझै होर मनमुखि फिरै इआणी ॥5॥
चारे वेद ब्रहमे कउ दीए पड़ि पड़ि करे वीचारी ॥
ता का हुकमु न बूझै बपुड़ा नरकि सुरगि अवतारी ॥6॥
जुगह जुगह के राजे कीए गावहि करि अवतारी ॥
तिन भी अंतु न पाइआ ता का किआ करि आखि वीचारी ॥7॥
तूं सचा तेरा कीआ सभु साचा देहि त साचु वखाणी ॥
जा कउ सचु बुझावहि अपणा सहजे नामि समाणी ॥8॥1॥23॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) उस परमात्मा के अनेकों ही रूपों का बयान नहीं किया जा सकता।मैं क्या कह के उनके बारे में कोई विचार रखूँ। 2। हे प्रभू ! इस जगत में (माया के) तीन गुण आपके ही पैदा किए हुए हैं।(जगत उत्पत्ति की) चारों खाणियां आपकी ही रची हुई हैं। आपकी मेहर हैं तब ही सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल हैं सकती है।तब ही आपके अकथ स्वरूप की कोई बातें कर सकता है। 3। हे प्रभू ! आप सारी सृष्टि का रचनहार है।सारा जगत आपका ही पैदा किया हुआ है।आपके हुकम के बिना कोई जीव कुछ नहीं कर सकता। जिस जीव-स्त्री पे आप मेहर भरी नजर करता हैवह आपके सदा-स्थिर नाम में लीन रहती है। 4। हे प्रभू ! जितनी भी आवागवन में पड़ी हुई सृष्टि है इसमें हरेक जीव (अपनी ओर से) आपका ही नाम जपता है। पर जब आपको अच्छा लगता है गुरू की शरण पड़ा हुआ ही कोई जीव (इस भेद को) समझता है।अपने मन के पीछे चलने वाली अन्य मूर्ख दुनिया तो भटकती ही फिरती है। 5। (हे भाई ! ब्रहमा इतना बड़ा देवता माना गया है।कहते हैं परमात्मा ने) चारों वेद ब्रहमा को दिए (ब्रहमा ने चारों वेद रचे।वह इन को) बार-बार पढ़के इनकी ही विचार करता रहा। वह बिचारा ना ये समझ सका कि प्रभू का हुकम मानना ही जीवन-राह है।वह नर्क-स्वर्ग की विचारों में टिका रहा। 6। (हे भाई ! परमात्मा ने राम-कृष्ण आदि) अपने-अपने युगों के महापुरख पैदा किए।लोग उन्हें (परमात्मा का) अवतार मान के सलाहते आ रहे हैं। उन्होंने भी उस परमात्मा के गुणों का अंत ना पाया।(मैं बिचारा क्या हूँ।) मैं क्या कह के उसके गुणों का विचार कर सकता हूँ। 7। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला है।आपका पैदा किया हुआ जगत आपकी सदा-स्थिर हस्ती का स्वरूप है।अगर आप खुद (अपने नाम की दाति) दे।तो ही मैं आपका सदा-स्थिर नाम उचार सकता हूँ। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप अपना सदा-स्थिर नाम जपने की सूझ बख्शता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के आपके नाम में लीन रहता है। 8। 1। 23।
आसा महला 3 ॥
सतिगुर हमरा भरमु गवाइआ ॥
हरि नामु निरंजनु मंनि वसाइआ ॥
सबदु चीनि सदा सुखु पाइआ ॥1॥
सुणि मन मेरे ततु गिआनु ॥
देवण वाला सभ बिधि जाणै गुरमुखि पाईऐ नामु निधानु ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर भेटे की वडिआई ॥
जिनि ममता अगनि त्रिसना बुझाई ॥
सहजे माता हरि गुण गाई ॥2॥
विणु गुर पूरे कोइ न जाणी ॥
माइआ मोहि दूजै लोभाणी ॥
गुरमुखि नामु मिलै हरि बाणी ॥3॥
गुर सेवा तपां सिरि तपु सारु ॥
हरि जीउ मनि वसै सभ दूख विसारणहारु ॥
दरि साचै दीसै सचिआरु ॥4॥
गुर सेवा ते त्रिभवण सोझी होइ ॥
आपु पछाणि हरि पावै सोइ ॥
साची बाणी महलु परापति होइ ॥5॥
गुर सेवा ते सभ कुल उधारे ॥
निरमल नामु रखै उरि धारे ॥
साची सोभा साचि दुआरे ॥6॥
से वडभागी जि गुरि सेवा लाए ॥
अनदिनु भगति सचु नामु द्रिड़ाए ॥
नामे उधरे कुल सबाए ॥7॥
नानकु साचु कहै वीचारु ॥
हरि का नामु रखहु उरि धारि ॥
हरि भगती राते मोख दुआरु ॥8॥2॥24॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ (हे भाई !) गुरू ने मेरी भटकना समाप्त कर दी है। निर्लिप प्रभू का नाम मेरे मन में बसा दिया है। जब मैं गुरू के शबद को पहचान के (शबद की कद्र समझ के) सदा टिके रहने वाला आत्मिक आनंद ले रहा हूँ। 1। हे मेरे मन ! (परमात्मा के बारे में ये) सच्चाई सुन (ये) जानने की बात सुन- वह सारे पदार्थ देने की समर्था वाला परमात्मा हरेक ढंग जानता है।(सारे सुखों का) खजाना (उसका) नाम गुरू की शरण पड़ने से मिलता है। 1।रहाउ। (हे मेरे मन !) गुरू को मिलने (से पैदा हुई) आत्मिक उच्चता (की बात सुन) कि उस गुरू ने (जिस मनुष्य की) अपनत्व दूर कर दी तृष्णा की आग बुझा दी। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में मस्त रह के परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। 2। (हे मेरे मन !) गुरू को मिले बिना कोई मनुष्य (प्रभू के बारे में तत्व-ज्ञान) नहीं जान सकता (क्योंकि गुरू की शरण पड़े बिना) मनुष्य माया के मोह में और ही लोभों में फसा रहता है। गुरू की शरण पड़े रहने पर ही नाम मिलता है।प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी (की कद्र) पड़ती है। 3। (हे मेरे मन !) गुरू की बताई सेवा सबसे श्रेष्ठ तप है। सारे दुख दूर करने वाला परमात्मा (गुरू की कृपा से ही) मन में आ बसता है। और मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर सुर्ख-रू दिखता है। 4। (हे मेरे मन !) गुरू की बताई सेवा की बरकति से तीनों भवनों में व्यापक परमात्मा की सूझ प्राप्त होती है और वह मनुष्य अपना आत्मिक जीवन पड़ताल के परमात्मा को मिल लेता है। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी की बरकति से उसे परमात्मा के चरणों में जगह मिल जाती है। 5। (हे मेरे मन !) गुरू की बताई सेवा का सदका मनुष्य अपनी सारी कुलों को भी बिकारों से बचा लेता है। मनुष्य परमात्मा के पवित्र नाम को अपने हृदय में टिकाए रखता है। उसको सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर सदा टिकवीं वडिआई मिल जाती है। 6। (हे मेरे मन !) उन मनुष्यों को बहुत भाग्यशाली (समझो) जिन्हें गुरू ने परमात्मा की सेवा-भक्ति में जोड़ दिया। गुरू उनके हृदय में हर वक्त परमात्मा की भक्ति और सदा-स्थिर नाम का सिमरन पक्का कर देता है। (हे मन !) हरि-नाम की बरकति से।उनके सारे कुल भी विकारों से बच जाते हैं। 7। (हे भाई !) नानक (आपको) अटॅल (नियम की) विचार बताता है (और वह विचार ये है कि) परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में टिकाए रख। जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति (के रंग) में रंगे जाते हैं उनको (विकारों से) खलासी पाने का दरवाजा मिल जाता है। 8। 2। 24।
आसा महला 3 ॥
आसा आस करे सभु कोई ॥
हुकमै बूझै निरासा होई ॥
आसा विचि सुते कई लोई ॥
सो जागै जागावै सोई ॥1॥
सतिगुरि नामु बुझाइआ विणु नावै भुख न जाई ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ (हे भाई ! दुनिया में) हरेक जीव आशाएं ही आशाएं बनाता रहता है। जो मनुष्य परमात्मा की रजा को समझ लेता है वह आशाओं के जाल में से निकल जाता है। (हे भाई !) बेअंत दुनिया आशाओं (के जाल) में (फस के माया के मोह की नींद में) सो रही है। वही मनुष्य (इस नींद में से) जागता है जिस को (गुरू की शरण में ला के) परमात्मा स्वयं जगाता है। 1। गुरू ने (जिस को) हरि-नाम (सिमरना) सिखा दिया (उसकी माया वाली भूख मिट गई)।(हे भाई !) हरि-नाम के बिना (माया वाली) भूख दूर नहीं होती।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) उस परमात्मा के अनेकों ही रूपों का बयान नहीं किया जा सकता।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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