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अंग 4

अंग
4
राग Jap
राग: Jap · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जपजी साहिब का हिस्सा। पूरी 38 पउड़ियों की commentary /japji/ पर है।
असंख भगत गुण गिआन वीचार ॥
असंख सती असंख दातार ॥
असंख सूर मुह भख सार ॥
असंख मोनि लिव लाइ तार ॥
कुदरति कवण कहा वीचारु ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥17॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (अकाल-पुरख की कुदरत में) अनगिनत भक्त हैं, जो अकाल-पुरख के गुणों और ज्ञान की विचार कर रहे है, अनेकों ही दानी व दाते हैं। (अकाल-पुरख की रचना में) बेअंत शूरवीर हैं जो अपने मुँह पे (भाव, सनमुख हो के) शास्त्रों के वार सहन करते हैं, अनेकों मौनी हैं, जो निरंतर बिर्ती (ध्यान) जोड़ के बैठे हैं। मेरी क्या ताकत है कि मैं करते की कुदरत की विचार कर सकूँ? (हे अकाल-पुरख!) मैं तो आप पर एक बार भी सदके होने के लायक नहीं हूँ (भाव मेंरी हस्ती बहुत तुच्छ है)। जो आपको ठीक लगता है वही काम भला है (भाव, आपकी रजा में रहना ही ठीक है) हे निरंकार! आप सदा अटल रहने वाला है ।17।
असंख मूरख अंध घोर ॥
असंख चोर हरामखोर ॥
असंख अमर करि जाहि जोर ॥
असंख गलवढ हतिआ कमाहि ॥
असंख पापी पापु करि जाहि ॥
असंख कूड़िआर कूड़े फिराहि ॥
असंख मलेछ मलु भखि खाहि ॥
असंख निंदक सिरि करहि भारु ॥
नानकु नीचु कहै वीचारु ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥18॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (निरंकार की रची हुई सृष्टि में) अनेकों ही महामूर्ख हैं, अनेको ही चोर हैं, जो पराया माल (चुरा चुरा के) इस्तेमाल कर रहे हैं और अनेकों ही ऐसे मनुष्य भी हैं जो (दूसरों पे) हुकम चला के ज़ोर जबरदस्ती कर करके (अंत में इस संसार से) चले जाते हैं। अनेकों ही खूनी मनुष्य लोगों का गला काट रहे हैं और अनेकों ही पापी मनुष्य पाप कमा के (आखिर) इस दुनिया से चले जाते हैं। अनेकां ही झूठ बोलने वाले स्वभावके मनुष्य झूठ में ही लिप्त रहते हैं और अनेकों ही खोटी बुद्धि वाले मनुष्य मल (अभक्ष) ही खाए जा रहे हैं। अनेकों ही निंदक (निंदा कर के) अपने सिर ऊपर (निंदा का) भार उठा रहे हैं। (हे निरंकार!) अनेकों और जीव कई और कुकर्मों में फसे होंगे, मेरी क्या ताकत है कि आपकी कुदरत का पूरा विचार कर सकूँ? नानक विचारा (तो) ये (उपरोक्त तुच्छ सी) विचार पेश करता है। (हे अकाल-पुरख!) मैं तो आप पर एक बार भी सदके होने के लायक नहीं हूँ (भाव, मैं आपकी बेअंत कुदरत का पूरा विचार करने के लायक नहीं हूँ)। जो आपको ठीक लगता है वही काम भला है (भाव, आपकी रजा में रहना ही ठीक है; आपकी उस्तति करते रहें हम जीवों के लिए यही भली बात है कि आपकी रज़ा में रहें)। हे निरंकार! आप सदा अटल रहने वाला है।18।
असंख नाव असंख थाव ॥
अगंम अगंम असंख लोअ ॥
असंख कहहि सिरि भारु होइ ॥
अखरी नामु अखरी सालाह ॥
अखरी गिआनु गीत गुण गाह ॥
अखरी लिखणु बोलणु बाणि ॥
अखरा सिरि संजोगु वखाणि ॥
जिनि एहि लिखे तिसु सिरि नाहि ॥
जिव फुरमाए तिव तिव पाहि ॥
जेता कीता तेता नाउ ॥
विणु नावै नाही को थाउ ॥
कुदरति कवण कहा वीचारु ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥19॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (कुदरत के अनेकों जीवों व अन्य बेअंत पदार्थों के) असंखों ही नाम हैं। असंखों ही (उनके) स्थान-ठिकाने हैं। (कुदरत में) असंखों ही भवण हैं जिन तक मनुष्य की पहुँच नहीं हो सकती। (पर, यदि मनुष्य कुदरत का लेखा करने के वास्ते शब्द्) असंख (भी) कहते हैं, (उनके) सिर पे भार ही होता है (भाव, वो भी भूल करते हैं, ‘असंख’ शब्द् भी प्रयाप्त नहीं है)। (हलांकि, अकाल-पुरख की कुदरत का लेखा करने के लिए शब्द् ‘असंख’ तो कहां रहा, कोई भी शब्द् काफी नहीं है, पर) अकाल-पुरख का नाम भी अक्षरों द्वारा ही (लिया जा सकता है), उसकी उस्तति भी अक्षरों द्वारा ही की जा सकती है। अकाल-पुरख का ज्ञान भी अक्षरों द्वारा ही (विचारा जा सकता है)। अक्षरों के द्वारा ही असके गीत और गुणों से वाकिफ हो सकते हैं। बोली का लिखना और बोलना भी अक्षरों के द्वारा ही संभव है। (इस लिए शब्द् ‘असंख’ इस्तेमाल किया गया है, वैसे) जिस अकाल-पुरख ने (जीवों के संजोग के) ये अक्षर लिखे हैं, उसके स्वयं के सिर पर कोई लेख नहीं है (भाव, कोई मनुष्य उस अकाल-पुरख का लेखा नहीं कर सकता)। जैसे जैसे वह अकाल-पुरख हुकम करता है वैसे ही (जीव अपने संजोग) भोगते हैं। ये सारा संसार, जो अकाल-पुरख ने बनाया है, ये उसका स्वरूप है (‘इह विसु संसारु आप देखदे, इहु हरि का रूपु है, हरि रूपु नदरी आइआ’)। कोई भी जगह अकाल-पुरख के स्वरूप से खाली नहीं है, (भाव, जो भी जगह या पदार्थ देखें वही अकाल-पुरख का स्वरूप दिखाई देता है, सृष्टि का ज़ॅरा-जॅ़रा ईश्वर का ही स्वरूप है)। मेरी क्या ताकत है कि मैं कुदरत का विचार कर सकूँ? (हे अकाल-पुरख!) मैं तो आपके ऊपर एक बार भी सदके होने के लायक नहीं हूँ। (भाव, मेरी हस्ती तो बहुत तुच्छ है)। जो आपको ठीक लगता है वही काम भला है, (भाव, आपकी रज़ा में रहना ही हम जीवों के लाभदायक है) हे निरंकार! आप सदैव स्थिर रहने वाला है ।19।
भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥
पाणी धोतै उतरसु खेह ॥
मूत पलीती कपड़ु होइ ॥
दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ ॥
भरीऐ मति पापा कै संगि ॥
ओहु धोपै नावै कै रंगि ॥
पुंनी पापी आखणु नाहि ॥
करि करि करणा लिखि लै जाहु ॥
आपे बीजि आपे ही खाहु ॥
नानक हुकमी आवहु जाहु ॥20॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: अगर हाथ या पैर या शरीर मैला हो जाए, तो पानी से धोने से वह मैल उतर जाती है। अगर (कोई) कपड़ा मूत्र से गंदा हो जाए, तो साबुन लगा के उसको धो लेते हैं। (पर) यदि (मनुष्य की) बुद्धि पापों से मलीन हो जाए, तो वह पाप अकाल-पुरख के नाम में प्यार करने से ही धोया जा सकता है। हे नानक! ‘पुनी’ या ‘पापी’ निरे नाम नहीं हैं (भाव, निरे कहने की बातें नहीं है, सच-मुच ही) जिस तरह के कर्म आप करेगा वैसे ही संस्कार अपने अंदर अंकुरित करके साथ ले कर अंकुरित करके ले कर जाएगा। जो कुछ आप खुद बीजेगा, उसका फल स्वयं ही खाएगा। (अपने बीजे मुताबिक) अकाल पुरख के हुकम में जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहेगा।20।
तीरथु तपु दइआ दतु दानु ॥
जे को पावै तिल का मानु ॥
सुणिआ मंनिआ मनि कीता भाउ ॥
अंतरगति तीरथि मलि नाउ ॥
सभि गुण तेरे मै नाही कोइ ॥
विणु गुण कीते भगति न होइ ॥
सुअसति आथि बाणी बरमाउ ॥
सति सुहाणु सदा मनि चाउ ॥
कवणु सु वेला वखतु कवणु कवण थिति कवणु वारु ॥
कवणि सि रुती माहु कवणु जितु होआ आकारु ॥
वेल न पाईआ पंडती जि होवै लेखु पुराणु ॥
वखतु न पाइओ कादीआ जि लिखनि लेखु कुराणु ॥
थिति वारु ना जोगी जाणै रुति माहु ना कोई ॥
जा करता सिरठी कउ साजे आपे जाणै सोई ॥
किव करि आखा किव सालाही किउ वरनी किव जाणा ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: तीर्तों, यात्राएं, तपों की साधना, (जीवों पे) दया करनी, दिया हुआ दान- (इन कर्मों के बदले) अगर किसी मनुष्य को कोई आदर-सत्कार मिल भी जाए, तो वह नाम मात्र ही है। (पर जिस मनुष्य ने अकाल-पुरख के नाम में) सुरति जोड़ी है, (जिस का मन नाम में) पतीज गया है, (और जिस ने अपने मन) में (अकाल-पुरख का) प्यार पैदा किया है, उस मनुष्य ने (मानों) अपने भीतर के तीर्थ में मलमल के स्नान कर लिया है (भाव, उस मनुष्य ने अपने अंदर बस रहे अकाल-पुरख में जुड़ के अच्छी तरह अपने मन की मैल उतार ली है)। हे सर्गुण स्वरूप ! समस्त गुण आप में हैं, मुझ में शुभ-गुण कोई भी नहीं। (हे अकाल-पुरख!) अगर आप (स्वयं खुद) गुण (मेरे में) पैदा ना करें तो मुझसे आपकी भक्ति नहीं हैं सकती। मेरी कोई बिसात नहीं है (कि मैं आपके गुण गा सकूँ)। ये सब आपकी ही महानता है। (हे निरंकार !) आपकी सदा जै हैं! आप स्वयं ही माया है। आप स्वयं ही बाणी है, आप सवयं ही ब्रह्मा है। वह कौन सा वक्त व समय था, कौन सी तिथि थी, कौन सा दिन था, कौन सी ऋतुऐं थीं और वह कौन सा महीना था, जब ये संसार बना था? (कब ये संसार बना?) उस समय का पण्डितों को भी पता ना लगा, नहीं तो (इस मसले पे भी) एक पुराण लिखा होता। उस समय के काजि़यों को भी ख़बर ना लगी वर्ना वे भी लिख देते जैसे उन्होंने (आयतें इकट्ठी करके) कुरान (लिखी थी)। (जब जगत बना था तब) कौन सी तिथि थी, (कौन सा) दिन वार था, ये बात कोई जोगी भी नहीं जानता। कोई मनुष्य नहीं (बता सकता) कि तब कौन सी ऋतु थी और कौन सा महीना था। जो सृजनहार इस जगत को पैदा करता है, वह स्वयं ही जानता है (कि जगत कब रचा)। मैं किस तरह (अकाल-पुरख की वडियाई) बताऊँ, किस तरह अकाल-पुरख की सिफत-सालाह करूँ, किस तरह (अकाल-पुरख की वडिआई) का वर्णन करूँ और किस तरह उसे समझ सकूँ?

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ये नित्य की प्रार्थनाएँ हैं, अधिकांश पन्द्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी की शुरुआत में रची गयीं।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(अकाल-पुरख की कुदरत में) अनगिनत भक्त हैं, जो अकाल-पुरख के गुणों और ज्ञान की विचार कर रहे है, अनेकों ही दानी व दाते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।