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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

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  1. असंख भगत गुण गिआन वीचार ॥
  2. असंख मूरख अंध घोर ॥
  3. असंख नाव असंख थाव ॥
  4. भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥
  5. तीरथु तपु दइआ दतु दानु ॥

असंख भगत गुण गिआन वीचार ॥

अंग 3 से चला आ रहा अंश

असंख भगत गुण गिआन वीचार ॥
असंख सती असंख दातार ॥
असंख सूर मुह भख सार ॥
असंख मोनि लिव लाइ तार ॥
कुदरति कवण कहा वीचारु ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥17॥

हिन्दी अर्थ: (अकाल-पुरख की कुदरत में) अनगिनत भक्त हैं, जो अकाल-पुरख के गुणों और ज्ञान की विचार कर रहे है, अनेकों ही दानी व दाते हैं। (अकाल-पुरख की रचना में) बेअंत शूरवीर हैं जो अपने मुँह पे (भाव, सनमुख हो के) शास्त्रों के वार सहन करते हैं, अनेकों मौनी हैं, जो निरंतर बिर्ती (ध्यान) जोड़ के बैठे हैं। मेरी क्या ताकत है कि मैं करते की कुदरत की विचार कर सकूँ? (हे अकाल-पुरख!) मैं तो आप पर एक बार भी सदके होने के लायक नहीं हूँ (भाव मेंरी हस्ती बहुत तुच्छ है)। जो आपको ठीक लगता है वही काम भला है (भाव, आपकी रजा में रहना ही ठीक है) हे निरंकार! आप सदा अटल रहने वाले हैं ।17।

असंख मूरख अंध घोर ॥

असंख मूरख अंध घोर ॥
असंख चोर हरामखोर ॥
असंख अमर करि जाहि जोर ॥
असंख गलवढ हतिआ कमाहि ॥
असंख पापी पापु करि जाहि ॥
असंख कूड़िआर कूड़े फिराहि ॥
असंख मलेछ मलु भखि खाहि ॥
असंख निंदक सिरि करहि भारु ॥
नानकु नीचु कहै वीचारु ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥18॥

हिन्दी अर्थ: (निरंकार की रची हुई सृष्टि में) अनेकों ही महामूर्ख हैं, अनेको ही चोर हैं, जो पराया माल (चुरा चुरा के) इस्तेमाल कर रहे हैं और अनेकों ही ऐसे मनुष्य भी हैं जो (दूसरों पे) हुकम चला के ज़ोर जबरदस्ती कर करके (अंत में इस संसार से) चले जाते हैं। अनेकों ही खूनी मनुष्य लोगों का गला काट रहे हैं और अनेकों ही पापी मनुष्य पाप कमा के (आखिर) इस दुनिया से चले जाते हैं। अनेकां ही झूठ बोलने वाले स्वभावके मनुष्य झूठ में ही लिप्त रहते हैं और अनेकों ही खोटी बुद्धि वाले मनुष्य मल (अभक्ष) ही खाए जा रहे हैं। अनेकों ही निंदक (निंदा कर के) अपने सिर ऊपर (निंदा का) भार उठा रहे हैं। (हे निरंकार!) अनेकों और जीव कई और कुकर्मों में फसे होंगे, मेरी क्या ताकत है कि आपकी कुदरत का पूरा विचार कर सकूँ? नानक विचारा (तो) ये (उपरोक्त तुच्छ सी) विचार पेश करता है। (हे अकाल-पुरख!) मैं तो आप पर एक बार भी सदके होने के लायक नहीं हूँ (भाव, मैं आपकी बेअंत कुदरत का पूरा विचार करने के लायक नहीं हूँ)। जो आपको ठीक लगता है वही काम भला है (भाव, आपकी रजा में रहना ही ठीक है; आपकी उस्तति करते रहें हम जीवों के लिए यही भली बात है कि आपकी रज़ा में रहें)। हे निरंकार! आप सदा अटल रहने वाले हैं।18।

असंख नाव असंख थाव ॥

असंख नाव असंख थाव ॥
अगंम अगंम असंख लोअ ॥
असंख कहहि सिरि भारु होइ ॥
अखरी नामु अखरी सालाह ॥
अखरी गिआनु गीत गुण गाह ॥
अखरी लिखणु बोलणु बाणि ॥
अखरा सिरि संजोगु वखाणि ॥
जिनि एहि लिखे तिसु सिरि नाहि ॥
जिव फुरमाए तिव तिव पाहि ॥
जेता कीता तेता नाउ ॥
विणु नावै नाही को थाउ ॥
कुदरति कवण कहा वीचारु ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥19॥

हिन्दी अर्थ: (कुदरत के अनेकों जीवों व अन्य बेअंत पदार्थों के) असंखों ही नाम हैं। असंखों ही (उनके) स्थान-ठिकाने हैं। (कुदरत में) असंखों ही भवण हैं जिन तक मनुष्य की पहुँच नहीं हो सकती। (पर, यदि मनुष्य कुदरत का लेखा करने के वास्ते शब्द्) असंख (भी) कहते हैं, (उनके) सिर पे भार ही होता है (भाव, वो भी भूल करते हैं, ‘असंख’ शब्द् भी प्रयाप्त नहीं है)। (हलांकि, अकाल-पुरख की कुदरत का लेखा करने के लिए शब्द् ‘असंख’ तो कहां रहा, कोई भी शब्द् काफी नहीं है, पर) अकाल-पुरख का नाम भी अक्षरों द्वारा ही (लिया जा सकता है), उसकी उस्तति भी अक्षरों द्वारा ही की जा सकती है। अकाल-पुरख का ज्ञान भी अक्षरों द्वारा ही (विचारा जा सकता है)। अक्षरों के द्वारा ही असके गीत और गुणों से वाकिफ हो सकते हैं। बोली का लिखना और बोलना भी अक्षरों के द्वारा ही संभव है। (इस लिए शब्द् ‘असंख’ इस्तेमाल किया गया है, वैसे) जिस अकाल-पुरख ने (जीवों के संजोग के) ये अक्षर लिखे हैं, उसके स्वयं के सिर पर कोई लेख नहीं है (भाव, कोई मनुष्य उस अकाल-पुरख का लेखा नहीं कर सकता)। जैसे जैसे वह अकाल-पुरख हुकम करता है वैसे ही (जीव अपने संजोग) भोगते हैं। ये सारा संसार, जो अकाल-पुरख ने बनाया है, ये उसका स्वरूप है (‘एहु विसु संसारु तुम देखदे एहु हरि का रूपु है हरि रूपु नदरी आइआ ॥’)। कोई भी जगह अकाल-पुरख के स्वरूप से खाली नहीं है, (भाव, जो भी जगह या पदार्थ देखें वही अकाल-पुरख का स्वरूप दिखाई देता है, सृष्टि का ज़ॅरा-जॅ़रा ईश्वर का ही स्वरूप है)। मेरी क्या ताकत है कि मैं कुदरत का विचार कर सकूँ? (हे अकाल-पुरख!) मैं तो आपके ऊपर एक बार भी सदके होने के लायक नहीं हूँ। (भाव, मेरी हस्ती तो बहुत तुच्छ है)। जो आपको ठीक लगता है वही काम भला है, (भाव, आपकी रज़ा में रहना ही हम जीवों के लाभदायक है) हे निरंकार! आप सदैव स्थिर रहने वाले हैं ।19।

भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥

भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥
पाणी धोतै उतरसु खेह ॥
मूत पलीती कपड़ु होइ ॥
दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ ॥
भरीऐ मति पापा कै संगि ॥
ओहु धोपै नावै कै रंगि ॥
पुंनी पापी आखणु नाहि ॥
करि करि करणा लिखि लै जाहु ॥
आपे बीजि आपे ही खाहु ॥
नानक हुकमी आवहु जाहु ॥20॥

हिन्दी अर्थ: अगर हाथ या पैर या शरीर मैला हो जाए, तो पानी से धोने से वह मैल उतर जाती है। अगर (कोई) कपड़ा मूत्र से गंदा हो जाए, तो साबुन लगा के उसको धो लेते हैं। (पर) यदि (मनुष्य की) बुद्धि पापों से मलीन हो जाए, तो वह पाप अकाल-पुरख के नाम में प्यार करने से ही धोया जा सकता है। हे नानक! ‘पुनी’ या ‘पापी’ निरे नाम नहीं हैं (भाव, निरे कहने की बातें नहीं है, सच-मुच ही) जैसे कर्म आप करेंगे, उनके संस्कार अपने भीतर अंकित करके साथ ले जाएँगे। जो बोएँगे, उसका फल भी स्वयं ही पाएँगे। अपने कर्मों के अनुसार अकाल पुरख के हुकम में जन्म-मरण के चक्कर में पड़े रहेंगे।20।

तीरथु तपु दइआ दतु दानु ॥

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तीरथु तपु दइआ दतु दानु ॥
जे को पावै तिल का मानु ॥
सुणिआ मंनिआ मनि कीता भाउ ॥
अंतरगति तीरथि मलि नाउ ॥
सभि गुण तेरे मै नाही कोइ ॥
विणु गुण कीते भगति न होइ ॥
सुअसति आथि बाणी बरमाउ ॥
सति सुहाणु सदा मनि चाउ ॥
कवणु सु वेला वखतु कवणु कवण थिति कवणु वारु ॥
कवणि सि रुती माहु कवणु जितु होआ आकारु ॥
वेल न पाईआ पंडती जि होवै लेखु पुराणु ॥
वखतु न पाइओ कादीआ जि लिखनि लेखु कुराणु ॥
थिति वारु ना जोगी जाणै रुति माहु ना कोई ॥
जा करता सिरठी कउ साजे आपे जाणै सोई ॥
किव करि आखा किव सालाही किउ वरनी किव जाणा ॥

हिन्दी अर्थ: तीर्तों, यात्राएं, तपों की साधना, (जीवों पे) दया करनी, दिया हुआ दान- (इन कर्मों के बदले) अगर किसी मनुष्य को कोई आदर-सत्कार मिल भी जाए, तो वह नाम मात्र ही है। (पर जिस मनुष्य ने अकाल-पुरख के नाम में) सुरति जोड़ी है, (जिस का मन नाम में) पतीज गया है, (और जिस ने अपने मन) में (अकाल-पुरख का) प्यार पैदा किया है, उस मनुष्य ने (मानों) अपने भीतर के तीर्थ में मलमल के स्नान कर लिया है (भाव, उस मनुष्य ने अपने अंदर बस रहे अकाल-पुरख में जुड़ के अच्छी तरह अपने मन की मैल उतार ली है)। हे सर्गुण स्वरूप ! समस्त गुण आप में हैं, मुझ में शुभ-गुण कोई भी नहीं। (हे अकाल-पुरख!) अगर आप (स्वयं खुद) गुण (मेरे में) पैदा ना करें तो मुझसे आपकी भक्ति नहीं हो सकती। मेरी कोई बिसात नहीं है (कि मैं आपके गुण गा सकूँ)। ये सब आपकी ही महानता है। (हे निरंकार !) आपकी सदा जय हो! आप स्वयं ही माया हैं। आप स्वयं ही वाणी हैं, आप स्वयं ही ब्रह्मा हैं। वह कौन सा वक्त व समय था, कौन सी तिथि थी, कौन सा दिन था, कौन सी ऋतुऐं थीं और वह कौन सा महीना था, जब ये संसार बना था? (कब ये संसार बना?) उस समय का पण्डितों को भी पता ना लगा, नहीं तो (इस मसले पे भी) एक पुराण लिखा होता। उस समय के काजि़यों को भी ख़बर ना लगी वर्ना वे भी लिख देते जैसे उन्होंने (आयतें इकट्ठी करके) कुरान (लिखी थी)। (जब जगत बना था तब) कौन सी तिथि थी, (कौन सा) दिन वार था, ये बात कोई जोगी भी नहीं जानता। कोई मनुष्य नहीं (बता सकता) कि तब कौन सी ऋतु थी और कौन सा महीना था। जो सृजनहार इस जगत को पैदा करता है, वह स्वयं ही जानता है (कि जगत कब रचा)। मैं किस तरह (अकाल-पुरख की वडियाई) बताऊँ, किस तरह अकाल-पुरख की सिफत-सालाह करूँ, किस तरह (अकाल-पुरख की वडिआई) का वर्णन करूँ और किस तरह उसे समझ सकूँ?

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 4 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।