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बाबा जुगता जीउ जुगह जुग जोगी परम तंत महि जोगं ॥
बाबा जुगता जीउ जुगह जुग जोगी परम तंत महि जोगं ॥
अंम्रितु नामु निरंजन पाइआ गिआन काइआ रस भोगं ॥1॥ रहाउ ॥
सिव नगरी महि आसणि बैसउ कलप तिआगी बादं ॥
सिंङी सबदु सदा धुनि सोहै अहिनिसि पूरै नादं ॥2॥
पतु वीचारु गिआन मति डंडा वरतमान बिभूतं ॥
हरि कीरति रहरासि हमारी गुरमुखि पंथु अतीतं ॥3॥
सगली जोति हमारी संमिआ नाना वरन अनेकं ॥
कहु नानक सुणि भरथरि जोगी पारब्रहम लिव एकं ॥4॥3॥37॥
अंम्रितु नामु निरंजन पाइआ गिआन काइआ रस भोगं ॥1॥ रहाउ ॥
सिव नगरी महि आसणि बैसउ कलप तिआगी बादं ॥
सिंङी सबदु सदा धुनि सोहै अहिनिसि पूरै नादं ॥2॥
पतु वीचारु गिआन मति डंडा वरतमान बिभूतं ॥
हरि कीरति रहरासि हमारी गुरमुखि पंथु अतीतं ॥3॥
सगली जोति हमारी संमिआ नाना वरन अनेकं ॥
कहु नानक सुणि भरथरि जोगी पारब्रहम लिव एकं ॥4॥3॥37॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य का परमेश्वर के चरणों में जोड़ (योग) हो गया वही जुड़ा हुआ है। वही असल जोगी है। जिसकी समाधि सदा लगी रहती है। जिस मनुष्य ने माया-रहित परमात्मा का अटल आत्मिक जीवन देने वाला नाम प्राप्त कर लिया है वह परमात्मा के साथ गहरी जान-पहचान के आत्मिक आनंद अपने हृदय में (सदा) भोगता है। 1। रहाउ। (हे जोगी !) मैं भी आसन पर बैठता हूँ। मैं मन की कल्पनाएं और दुनिया वाले झगड़े-झमेले छोड़ के कल्याण-स्वरूप प्रभू के देश में (प्रभू के चरणों में) टिक के बैठता हूँ (ये है मेरा आसन पर बैठना)। हे जोगी ! आप सिंगी (बजाते हैं) मेरे अंदर गुरू का शबद (गूँज रहा) है; ये ही सिंगी के मीठे और सुहाने सुर। जो मेरे अंदर चल रहे हैं। दिन-रात मेरा मन गुरू-शबद का नाद बजा रहा है। 2। (हे जोगी ! आप हाथ में खप्पर ले के घर-घर से भिक्षा मांगते हैं। पर मैं प्रभू के दर से उसके गुणों की) विचार (मांगता हूँ। ये) है मेरा खप्पर (कासा)। परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखने वाली मति (मेरे हाथ में) डण्डा है (जो किसी विकार को नजदीक नहीं फटकने देता)। प्रभू को हर जगह मौजूद देखना मेरे वास्ते शरीर पर मलने वाली राख है। अकाल पुरख की सिफत सालाह (मेरे वास्ते) जोग की (प्रभू से मिलाप की) मर्यादा है। गुरू के सन्मुख टिके रहना ही हमारा धर्म-रास्ता है जो हमें माया से विरक्त रखता है। 3। सब जीवों में अनेकों रूपों-रंगों में प्रभू की ज्योति को देखना- हे नानक ! (कह) हे भरथरी योगी ! सुन। ये है हमारी बैरागण (संमिया) जो हमें प्रभू-चरणों में जुड़ने के लिए सहारा देती है। 4। 3। 37।
गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि धावै करि करणी कसु पाईऐ ॥
आसा महला 1 ॥
गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि धावै करि करणी कसु पाईऐ ॥
भाठी भवनु प्रेम का पोचा इतु रसि अमिउ चुआईऐ ॥1॥
बाबा मनु मतवारो नाम रसु पीवै सहज रंग रचि रहिआ ॥
अहिनिसि बनी प्रेम लिव लागी सबदु अनाहद गहिआ ॥1॥ रहाउ ॥
पूरा साचु पिआला सहजे तिसहि पीआए जा कउ नदरि करे ॥
अंम्रित का वापारी होवै किआ मदि छूछै भाउ धरे ॥2॥
गुर की साखी अंम्रित बाणी पीवत ही परवाणु भइआ ॥
दर दरसन का प्रीतमु होवै मुकति बैकुंठै करै किआ ॥3॥
सिफती रता सद बैरागी जूऐ जनमु न हारै ॥
कहु नानक सुणि भरथरि जोगी खीवा अंम्रित धारै ॥4॥4॥38॥
गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि धावै करि करणी कसु पाईऐ ॥
भाठी भवनु प्रेम का पोचा इतु रसि अमिउ चुआईऐ ॥1॥
बाबा मनु मतवारो नाम रसु पीवै सहज रंग रचि रहिआ ॥
अहिनिसि बनी प्रेम लिव लागी सबदु अनाहद गहिआ ॥1॥ रहाउ ॥
पूरा साचु पिआला सहजे तिसहि पीआए जा कउ नदरि करे ॥
अंम्रित का वापारी होवै किआ मदि छूछै भाउ धरे ॥2॥
गुर की साखी अंम्रित बाणी पीवत ही परवाणु भइआ ॥
दर दरसन का प्रीतमु होवै मुकति बैकुंठै करै किआ ॥3॥
सिफती रता सद बैरागी जूऐ जनमु न हारै ॥
कहु नानक सुणि भरथरि जोगी खीवा अंम्रित धारै ॥4॥4॥38॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (हे जोगी !) परमात्मा के साथ गहरी सांझ को गुड़ बना। प्रभू चरणों में जुड़ी सुरति को महूए के फूल बना। उच्च आचरण को बबूल की छाल बना के (इनमें) मिला दे। शारीरिक मोह को जला- ऐसी शराब निकालने की भट्ठी तैयार कर। प्रभू चरणों में प्यार जोड़- ये है वह ठण्डा पोचा जो अर्क वाली नाली पर फेरना है। इस सारे मिलवें रस में से (अटॅल आत्मिक जीवन दाता) अमृत निकलेगा। 1। हे जोगी ! (आप सुरति को टिकाने के लिए शराब पीते हैं। ये नशा उतर जाता है; और सुरति दुबारा उखड़ जाती है) असल मस्ताना वह मन है जो परमात्मा के सिमरन का रस पीता है (सिमरन का आनंद लेता है) जो (सिमरन की बरकति से) अडोलता के हुलारों में टिका रहता है। जिसे प्रभू-चरणों के प्रेम की इतनी लिव लगती है कि दिन-रात बनी रहती है। जो अपने गुरू के शबद को सदा एक-रस अपने अंदर टिकाए रखता है। 1। रहाउ। (हे जोगी !) ये है वह प्याला जिसकी मस्ती सदा टिकी रहती है। सब गुणों का मालिक प्रभू अडोलता में रख के उस मनुष्य को (ये प्याला) पिलाता है जिस पर खुद मेहर की नजर करता है। जो मनुष्य अटॅल आत्मिक जीवन देने वाले इस रस का व्यापारी बन जाए वह (आपकी वाली इस) होछी शराब से प्यार नहीं करता। 2। जिस मनुष्य ने अटॅल आत्मिक जीवन देने वाली गुरू की शिक्षा भरी बाणी का रस पीया है। वह पीते ही प्रभू की नजरों में कबूल हो जाता है। वह परमात्मा के दर के दीदार का प्रेमी बन जाता है। उसे फिर ना मुक्ति की जरूरत रहती है ना बैकुण्ठ की। 3। हे नानक ! (कह) हे भरथरी जोगी ! जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह में रंगा गया है वह सदा (माया के मोह से) विरक्त रहता है। वह आत्मिक मानस जीवन जूए में (भाव। व्यर्थ) नहीं गवाता। वह तो अटॅल आत्मिक जीवन दाते आनंद में मस्त रहता है। 4। 4। 38।
खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ ॥
आसा महला 1 ॥
खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ ॥
आपै दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ ॥
एती मार पई करलाणे तैं की दरदु न आइआ ॥1॥
करता तूं सभना का सोई ॥
जे सकता सकते कउ मारे ता मनि रोसु न होई ॥1॥ रहाउ ॥
सकता सीहु मारे पै वगै खसमै सा पुरसाई ॥
रतन विगाड़ि विगोए कुतंी मुइआ सार न काई ॥
आपे जोड़ि विछोड़े आपे वेखु तेरी वडिआई ॥2॥
जे को नाउ धराए वडा साद करे मनि भाणे ॥
खसमै नदरी कीड़ा आवै जेते चुगै दाणे ॥
मरि मरि जीवै ता किछु पाए नानक नामु वखाणे ॥3॥5॥39॥
खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ ॥
आपै दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ ॥
एती मार पई करलाणे तैं की दरदु न आइआ ॥1॥
करता तूं सभना का सोई ॥
जे सकता सकते कउ मारे ता मनि रोसु न होई ॥1॥ रहाउ ॥
सकता सीहु मारे पै वगै खसमै सा पुरसाई ॥
रतन विगाड़ि विगोए कुतंी मुइआ सार न काई ॥
आपे जोड़ि विछोड़े आपे वेखु तेरी वडिआई ॥2॥
जे को नाउ धराए वडा साद करे मनि भाणे ॥
खसमै नदरी कीड़ा आवै जेते चुगै दाणे ॥
मरि मरि जीवै ता किछु पाए नानक नामु वखाणे ॥3॥5॥39॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ खुरासान की सुपुर्दगी (किसी और को) कर के (बाबर मुग़ल ने हमला करके) हिन्दुस्तान को सहमा दिया है। (जो लोग अपने फर्ज भुला के रंग-रलियों में पड़ जाते हें उन्हें सजा भुगतनी ही पड़ती है। इस बारे) ईश्वर अपने ऊपर दोष नहीं आने देता। (सो। फर्ज भुला के विकारों में मस्त पड़े पठान हाकमों को दण्ड देने के लिए करतार ने) मुग़ल बाबर को यमराज बना के (हिन्दोस्तान पर) चढ़ाई करवा दी। (पर। हे ईश्वर ! बद-मस्त पठान हाकिमों के साथ गरीब निहत्थे भी पीसे गए) इतनी मार पड़ी कि वे (हाय-हाय) पुकार उठे, क्या (ये सब कुछ देख के) आपको उन पे तरस नहीं आया। 1। हे करतार ! आप सभी जीवों की सार रखने वाले हैं। अगर कोई ताकतवान किसी ताकतवाले की मार-कुटाई करे तो (देखने वालों के) मन में गुस्सा-गिला नहीं होता (क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे को करारे हाथ दिखा लेते हैं)। 1। रहाउ। पर अगर कोई शेर (जैसा) शक्तिशाली गायों के झुंड (जैसे कमजोर निहत्थों) पर हमला करके मारने लगे। तो इसकी पूछ-पड़ताल (तो झुंड के) मालिक खसम से ही होती है (इसीलिए। हे करतार ! मैं आपके आगे पुकार करता हूँ)। (कुत्ते बाहर के कुत्तों को देख के बर्दाश्त नहीं कर सकते। फाड़ खाते हैं। इसी तरह मनुष्य को फाड़ खाने वाले इन मनुष्य-रूपी मुग़ल) कुत्तों ने (आपके बनाए) सुंदर लोगों को मार-मार के मिट्टी में मिला दिया है। मरे हुओं की कोई सार नहीं लेता। (हे करतार ! आपकी रजा आप ही जाने) आप खुद ही (संबंध) जोड़ के खुद ही (इनको मौत के घाट उतार के आपस में) विछोड़ देते हैं। देख ! हे करतार ! ये आपकी ताकत का करिश्मा है। 2। (धन-पदार्थ-हकूमत आदि के नशे में मनुष्य अपनी हस्ती को भूल जाता है और बड़ी अकड़ दिखा-दिखा के औरों को दुख देता है। पर ये नहीं समझता कि) अगर कोई मनुष्य अपने आप को बड़ा कहलवा ले। और मन-मर्जी की रंग-रलियां कर ले। तो भी वह खसम-प्रभू की नजरों में एक कीड़े समान ही है जो (धरती से) दाने चुग-चुग के निरवाह करता है (अहम् की बद्-मस्ती में वह मनुष्य जिंदगी बेकार ही गवा लेता है)। हे नानक ! जो मनुष्य विकारों की ओर से खुद को मार के (आत्मिक जीवन) जीता है। और प्रभू का नाम सिमरता है वही यहाँ से कुछ कमाता है। 3। 5। 39।
हरि दरसनु पावै वडभागि ॥
रागु आसा घरु 2 महला 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि दरसनु पावै वडभागि ॥
गुर कै सबदि सचै बैरागि ॥
खटु दरसनु वरतै वरतारा ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि दरसनु पावै वडभागि ॥
गुर कै सबदि सचै बैरागि ॥
खटु दरसनु वरतै वरतारा ॥
हिन्दी अर्थ: रागु आसा घरु 2 महला 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। मनुष्य बड़ी किस्मत से परमात्मा का (मिलाप करवाने वाला गुर-) शास्त्र प्राप्त करता है गुरू के शबद में (जुड़ के) सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लगन जोड़ के (जगत में वेदांत आदि) छे शास्त्रों (की विकार) का रिवाज चल रहा है पर
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 360 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।