बिखै बाचु हरि राचु समझु मन बउरा रे ॥ निरभै होइ न हरि भजे मन बउरा रे गहिओ न राम जहाजु ॥1॥ रहाउ ॥ मरकट मुसटी अनाज की मन बउरा रे लीनी हाथु पसारि ॥ छूटन को सहसा परिआ मन बउरा रे नाचिओ घर घर बारि ॥2॥ जिउ नलनी सूअटा गहिओ मन बउरा रे माया इहु बिउहारु ॥ जैसा रंगु कसुंभ का मन बउरा रे तिउ पसरिओ पासारु ॥3॥ नावन कउ तीरथ घने मन बउरा रे पूजन कउ बहु देव ॥ कहु कबीर छूटनु नही मन बउरा रे छूटनु हरि की सेव ॥4॥1॥6॥57॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे मूर्ख मन ! समझदार बन। विषियों से बचा रह और प्रभू में जुड़ा कर। आप सहम छोड़ के क्यूँ परमात्मा को नहीं सिमरता और क्यूँ प्रभू का आसरा नहीं लेता?। 1। रहाउ। हे कमले मन ! बंदर ने हाथ पसार के दानों की मुट्ठी भर ली और उसे डर पड़ गया कि कैद में से कैसे निकले। (उस लालच के कारण अब) हरेक घर के दरवाजे पर नाचता फिरता है। 2। हे झल्ले मना ! जगत की माया का ऐसा ही वरतारा है (भाव। माया जीव को ऐसे ही मोह में फंसाती है) जैसे तोता नलिनी (पर बैठ के) फस जाता है। हे कमले मन ! जैसे कुसंभ कारंग (थोड़े ही दिन रहता) है। इसी तरह जगत का पसारा (चार दिन के लिए ही) खिलरा हुआ है। 3। हे कबीर ! कह, हे झल्ले मन ! (हलांकि) स्नान करने के लिए बहुत सारे तीर्थ हैं। और पूजने के लिए बहुत सारे देवते हैं (भाव। चाहे लोग कई तीर्थों पर जा के स्नान करते हैं और कई देवतों की पूजा करते हैं) पर (पर इस सहम से और माया के मोह से) खलासी नहीं हो सकती। निजात सिर्फ प्रभू का सिमरन करने से ही मिलनी है। 4। 1। 6। 57।
गउड़ी ॥ अगनि न दहै पवनु नही मगनै तसकरु नेरि न आवै ॥ राम नाम धनु करि संचउनी सो धनु कत ही न जावै ॥1॥ हमरा धनु माधउ गोबिंदु धरणीधरु इहै सार धनु कहीऐ ॥ जो सुखु प्रभ गोबिंद की सेवा सो सुखु राजि न लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥ इसु धन कारणि सिव सनकादिक खोजत भए उदासी ॥ मनि मुकंदु जिहबा नाराइनु परै न जम की फासी ॥2॥ निज धनु गिआनु भगति गुरि दीनी तासु सुमति मनु लागा ॥ जलत अंभ थंभि मनु धावत भरम बंधन भउ भागा ॥3॥ कहै कबीरु मदन के माते हिरदै देखु बीचारी ॥ तुम घरि लाख कोटि अस्व हसती हम घरि एकु मुरारी ॥4॥1॥7॥58॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ इस धन को ना आग जला सकती है। ना हवा उड़ा के ले जा सकती है। और ना ही कोई चोर इसके नजदीक फटक सकता है। (हे भाई !) परमात्मा का नाम रूपी धन एकत्र कर। यह कहीं नाश नहीं होता। 1। हमारा धन तो माधव गोबिंद ही है जो सारी धरती का आसरा है। (हमारे मत में तो) इसी धन को सब धनों से श्रेष्ठ। अच्छा और बढ़िया कहा जाता है। जो सुख परमात्मा गोबिंद के भजन में मिलता है। वह सुख राज में (भी) नहीं मिलता। 1। रहाउ। इस (नाम) धन की खातिर शिव और सनक आदि (ब्रहमा के चारों पुत्र) तलाश करते-करते जगत से विरक्त हुए। जिस मनुष्य के मन में मुक्तिदाता प्रभू बसता है। जिसकी जीभ पे अकाल-पुरख टिका है। उसे जम की (मोह रूपी) फांसी पड़ नहीं सकती। 2। प्रभू की भक्ति। प्रभू का ज्ञान ही। (जीव का) निरोल अपना धन (हो सकता) है। जिस सुचॅजी मति वाले को गुरू ने (ये दात) दी है। उसका मन उस प्रभू में टिकता है। (माया की तृष्णा की आग में) जलते हुए के लिए (ये नाम-धन) पानी है। और भटकते मन के लिए स्तम्भ (थंमी। सहारा) है। (नाम की बरकति से) भरमों के बंधनों का डर दूर हो जाता है। 3। कबीर कहता है, हे काम वासना में मस्ताए हुए (राजन !) मन में सोच के देख। अगर आपके घर में लाखों करोड़ों घोड़े और हाथी हैं तो हमारे (हृदय) घर में (ये सारे पदार्थ देने वाला) एक परमात्मा (बसता) है। 4। 1। 7। 58।
गउड़ी ॥ जिउ कपि के कर मुसटि चनन की लुबधि न तिआगु दइओ ॥ जो जो करम कीए लालच सिउ ते फिरि गरहि परिओ ॥1॥ भगति बिनु बिरथे जनमु गइओ ॥ साधसंगति भगवान भजन बिनु कही न सचु रहिओ ॥1॥ रहाउ ॥ जिउ उदिआन कुसम परफुलित किनहि न घ्राउ लइओ ॥ तैसे भ्रमत अनेक जोनि महि फिरि फिरि काल हइओ ॥2॥ इआ धन जोबन अरु सुत दारा पेखन कउ जु दइओ ॥ तिन ही माहि अटकि जो उरझे इंद्री प्रेरि लइओ ॥3॥ अउध अनल तनु तिन को मंदरु चहु दिस ठाटु ठइओ ॥ कहि कबीर भै सागर तरन कउ मै सतिगुर ओट लइओ ॥4॥1॥8॥59॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ जैसे (किसी) बंदर के हाथ (भुने हुए) चनों की मुट्ठी आ गई। पर लोभी बंदर ने (कुज्जे में हाथ फसा हुआ पा के भी चनों की मुट्ठी) नहीं छोड़ी (और काबू आ गया। इसी तरह) लोभ वश हो के जो जो काम जीव करता है। वह सारे दुबारा (मोह के बंधन रूप जंजीर बन के इस के) गले में पड़ते हैं। 1। परमात्मा की भक्ति के बिना मानस जनम व्यर्थ ही जाता है (क्योंकि हृदय में प्रभू आ के नहीं बसता)। और। साध-संगति में (आ के) भगवान का सिमरन करे बिना वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभू किसी के दिल में टिक नहीं सकता। 1। रहाउ। जैसे जंगल में खिले हुए फूलों की सुगंधि कोई भी नहीं ले सकता (वह फूल उजाड़ में किसी प्राणी को सुगंधि ना देने के कारण अपना खिलना व्यर्थ में ही खेल जाते हैं)। वैसे ही। (प्रभू की बंदगी के बगैर) जीव अनेकों जूनियों में भटकते रहते हैं। और बार-बार काल-वश पड़ते रहते हैं। 2। धन-जवानी-पुत्र और स्त्री यह सारे प्रभू ने (जीव को किसी तमाशे में निर्लिप सा रहने की तरह) देखने के लिए दिए हैं (कि इस जगत तमाशे में ये निर्लिप ही रहे)। पर जीव इनमें ही रुक के फस जाते हैं; इंद्रियां जीव को खींच लेती है। 3। कबीर कहता है, यह शरीर (मानों) तीलों का बना हुआ कोठा है। उम्र (के दिन बीतते जाने हैं इस कोठे को) आग लगी हुई है। हर तरफ यही बनतर बनी हुई है। (पर कोई भी इस तरफ ध्यान नहीं देता; क्या आश्चर्यजनक भयानक दृश्य है !)। इस भयानक संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए मैंने तो सतिगुरू का आसरा लिया है। 4। 1। 59।
गउड़ी ॥ पानी मैला माटी गोरी ॥ इस माटी की पुतरी जोरी ॥1॥ मै नाही कछु आहि न मोरा ॥ तनु धनु सभु रसु गोबिंद तोरा ॥1॥ रहाउ ॥ इस माटी महि पवनु समाइआ ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ (हे अहंकारी जीव ! आप किस बात का गुमान करता है?) पिता की गंदी बूँद और माँ के रक्त- (इन दोनों से तो परमात्मा ने) जीव का यह मिट्टी का बुत बनाया है। 1। हे मेरे गोबिंद ! (आपसे अलग) मेरी कोई हस्ती नहीं है और कोई मेरी मल्कियत नहीं। ये शरीर धन और ये जिंद सब आपके ही दिए हुए हैं। 1। रहाउ। इस मिट्टी (के पुतले) में (इसे खड़ा करने के लिए) प्राण टिके हुए हैं।
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।