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सिरी राग
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पंच भूत सचि भै रते जोति सची मन माहि ॥
पंच भूत सचि भै रते जोति सची मन माहि ॥
नानक अउगण वीसरे गुरि राखे पति ताहि ॥4॥15॥
नानक अउगण वीसरे गुरि राखे पति ताहि ॥4॥15॥
हिन्दी अर्थ: उसका सारा शरीर प्रभू की याद में प्रभू के अदब में रंगा रहता है। सदा स्थिर प्रभू की ज्योति सदा उसके मन में टिकी रहती है। हे नानक! जिस मनुष्य की गुरू ने रक्षा की, उसको (लोक-परलोक) में इज्जत मिली। विकार उस से परे हट गये ।4।15।
नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि ॥
सिरीरागु महला 1 ॥
नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि ॥
इकि आवहि इकि जावही पूरि भरे अहंकारि ॥
मनहठि मती बूडीऐ गुरमुखि सचु सु तारि ॥1॥
गुर बिनु किउ तरीऐ सुखु होइ ॥
जिउ भावै तिउ राखु तू मै अवरु न दूजा कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
आगै देखउ डउ जलै पाछै हरिओ अंगूरु ॥
जिस ते उपजै तिस ते बिनसै घटि घटि सचु भरपूरि ॥
आपे मेलि मिलावही साचै महलि हदूरि ॥2॥
साहि साहि तुझु संमला कदे न विसारेउ ॥
जिउ जिउ साहबु मनि वसै गुरमुखि अंम्रितु पेउ ॥
मनु तनु तेरा तू धणी गरबु निवारि समेउ ॥3॥
जिनि एहु जगतु उपाइआ त्रिभवणु करि आकारु ॥
गुरमुखि चानणु जाणीऐ मनमुखि मुगधु गुबारु ॥
घटि घटि जोति निरंतरी बूझै गुरमति सारु ॥4॥
गुरमुखि जिनी जाणिआ तिन कीचै साबासि ॥
सचे सेती रलि मिले सचे गुण परगासि ॥
नानक नामि संतोखीआ जीउ पिंडु प्रभ पासि ॥5॥16॥
नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि ॥
इकि आवहि इकि जावही पूरि भरे अहंकारि ॥
मनहठि मती बूडीऐ गुरमुखि सचु सु तारि ॥1॥
गुर बिनु किउ तरीऐ सुखु होइ ॥
जिउ भावै तिउ राखु तू मै अवरु न दूजा कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
आगै देखउ डउ जलै पाछै हरिओ अंगूरु ॥
जिस ते उपजै तिस ते बिनसै घटि घटि सचु भरपूरि ॥
आपे मेलि मिलावही साचै महलि हदूरि ॥2॥
साहि साहि तुझु संमला कदे न विसारेउ ॥
जिउ जिउ साहबु मनि वसै गुरमुखि अंम्रितु पेउ ॥
मनु तनु तेरा तू धणी गरबु निवारि समेउ ॥3॥
जिनि एहु जगतु उपाइआ त्रिभवणु करि आकारु ॥
गुरमुखि चानणु जाणीऐ मनमुखि मुगधु गुबारु ॥
घटि घटि जोति निरंतरी बूझै गुरमति सारु ॥4॥
गुरमुखि जिनी जाणिआ तिन कीचै साबासि ॥
सचे सेती रलि मिले सचे गुण परगासि ॥
नानक नामि संतोखीआ जीउ पिंडु प्रभ पासि ॥5॥16॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे नानक! (संसार एक अथाह समुंद्र है) अगर गुरू की शिक्षा पर चल के सिमरन की किश्ती बना लें तो (इस संसार समुंद्र से) पार हो सकते हैं। पर अनेकों ही अहंकारी जीव हैं (जो अपनी ही अक्ल पे गर्व में रहके कुमार्ग पड़ के) पैदा होते हैं और मरते हैं (जनम मरन के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं) अपनी अक्ल के हठ पर चलने से (संसार समुंद्र के विकारों में) मनुष्य डूबता ही है। जो मनुष्य गुरू की राह पर चलता है उस को परमात्मा पार लंघा लेता है।1। गुरू की शरण के बिना ना ही (इस संसार समुंद्र से) पार लाँघ सकते हैं, ना ही आत्मिक आनंद ही मिलता है। (इसलिए, हे मन, प्रभु के दर पर अरदास कीजिए और कहिए: हे प्रभु!) जैसे भी हो सके, आप हमें गुरु की शरण में रखिए, (इस संसार सागर से पार लंघाने के वास्ते) हमें कोई और आसरा नहीं सूझता ।1। (जगत एक जंगल के समान है जिस में आगे आगे तो आग लगी हुई है जो पले पलाए बड़े बड़े वृक्षों को जलाती जा रही है; और पीछे पीछे नये नये कोमल पौधे उगते जा रहे हैं), पीछे पीछे नये कोमल बच्चे पैदा होते आ रहे हैं। जिस परमात्मा से यह जगत पैदा होता जाता है, उसी के (हुकम) अनुसार नाश भी होता रहता है। और, सदा स्थिर प्रभू हरेक शरीर में प्रचुर लबा-लॅब भरपूर है। हे प्रभू! आप खुद ही जीवों को अपने चरणों में जोड़ते हैं, आप खुद ही अपने सदा स्थिर महल में हजूरी में रखते हैं।2। (हे प्रभु, मेहर कीजिए) हम हरेक साँस के साथ आपको याद करते रहें, आपको कभी भी न भुलाएँ। हे भाई, मालिक प्रभु की कृपा हो तो गुरु की शरण में आकर ज्यों-ज्यों वे हमारे मन में बसते जाएँ, त्यों-त्यों हम उनका आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहें। हे प्रभु, हमारा मन और हमारा तन आपका ही दिया हुआ है। आप ही हमारे मालिक हैं। (मेहर कीजिए, हम अपने भीतर से) अहंकार दूर करके आपकी याद में लीन रहें।3। जिस (ज्योति-स्वरूप प्रभू) ने यह जगत पैदा किया है, ये त्रिभवणी स्वरूप बनाया है, गुरू की शरण पड़ने से उस ज्योति से सांझ बनाई जा सकती है (उससे संपर्क साधा जा सकता है)। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को ये ज्योति नहीं दिखती, उसे तो आत्मिक अंधकार ही अंधकार है। (यद्यपि) ईश्वरीय-ज्योति हरेक शरीर में एकरस व्यापक है, (पर) गुरू के मार्ग दर्शन से ही (गुरू की मति लेने से ये) असलियत समझी जा सकती है। जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ के सर्व-व्यापी ज्योति से सांझ बना ली, उन्हें साबाश मिलती है। वे सदा स्थिर प्रभू के साथ ऐक-मेक हो जाते हैं, सदा स्थिर प्रभू के गुण उनमें अंकुरित हो उठते हैं। हे नानक! नाम में जुड़ के वे मनुष्य आत्मिक शांति का आनंद लेते हैं, वे अपनी जीवात्मा अपना शरीर प्रभू के हवाले किए रहते हैं।5।16।
सुणि मन मित्र पिआरिआ मिलु वेला है एह ॥
सिरीरागु महला 1 ॥
सुणि मन मित्र पिआरिआ मिलु वेला है एह ॥
जब लगु जोबनि सासु है तब लगु इहु तनु देह ॥
बिनु गुण कामि न आवई ढहि ढेरी तनु खेह ॥1॥
मेरे मन लै लाहा घरि जाहि ॥
गुरमुखि नामु सलाहीऐ हउमै निवरी भाहि ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि गंढणु गंढीऐ लिखि पड़ि बुझहि भारु ॥
त्रिसना अहिनिसि अगली हउमै रोगु विकारु ॥
ओहु वेपरवाहु अतोलवा गुरमति कीमति सारु ॥2॥
लख सिआणप जे करी लख सिउ प्रीति मिलापु ॥
बिनु संगति साध न ध्रापीआ बिनु नावै दूख संतापु ॥
हरि जपि जीअरे छुटीऐ गुरमुखि चीनै आपु ॥3॥
तनु मनु गुर पहि वेचिआ मनु दीआ सिरु नालि ॥
त्रिभवणु खोजि ढंढोलिआ गुरमुखि खोजि निहालि ॥
सतगुरि मेलि मिलाइआ नानक सो प्रभु नालि ॥4॥17॥
सुणि मन मित्र पिआरिआ मिलु वेला है एह ॥
जब लगु जोबनि सासु है तब लगु इहु तनु देह ॥
बिनु गुण कामि न आवई ढहि ढेरी तनु खेह ॥1॥
मेरे मन लै लाहा घरि जाहि ॥
गुरमुखि नामु सलाहीऐ हउमै निवरी भाहि ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि गंढणु गंढीऐ लिखि पड़ि बुझहि भारु ॥
त्रिसना अहिनिसि अगली हउमै रोगु विकारु ॥
ओहु वेपरवाहु अतोलवा गुरमति कीमति सारु ॥2॥
लख सिआणप जे करी लख सिउ प्रीति मिलापु ॥
बिनु संगति साध न ध्रापीआ बिनु नावै दूख संतापु ॥
हरि जपि जीअरे छुटीऐ गुरमुखि चीनै आपु ॥3॥
तनु मनु गुर पहि वेचिआ मनु दीआ सिरु नालि ॥
त्रिभवणु खोजि ढंढोलिआ गुरमुखि खोजि निहालि ॥
सतगुरि मेलि मिलाइआ नानक सो प्रभु नालि ॥4॥17॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे प्यारे मन, हे मित्र, हमारा उपदेश सुनिए। परमात्मा से मिलिए; यही मानव जन्म उस मिलन का अवसर है। जब तक हम जवान हैं और साँस चल रही है, तब तक यह शरीर काम दे रहा है। यदि प्रभू के गुण अपने अंदर ना बसाए, तो ये शरीर किस काम का? ये तो आखिर गिर के मिट्टी की ढेरी ही हो जाएगा ।1। हे मन, यहाँ से आत्मिक लाभ कमाकर अपने परलोक के घर में जाइए। गुरू की शरण पड़ कर (यहाँ) प्रभू का नाम सलाहना चाहिए। नाम की बरकति से अहंकार की आग अंदर से मिट जाती है (आग ये कि मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा बन जाऊँ- बुझ जाती है)।1। रहाउ। (पढ़े-लिखे लोग) बेअंत पुस्तकें लिख लिख के पढ़-पढ़ के विचारते हैं, (ज्ञान की बातें) सुन-सुन के लोगों की नजरों में विचारवान (दिखने का) व्यर्थ यतन करते हैं। पर अन्दर दिन-रात तृष्णा व्याप रही है। अहम् रोग, अहंकार के विकार अन्दर कायम हैं। (दूसरी तरफ) वह परमात्मा (इस थोथी ज्ञान चातुर्य की) परवाह नहीं करता, (हमारे ज्ञान) उस को तौल भी नहीं सकते। (इसलिए) गुरु की मति लेकर उनकी क़द्र समझिए।2। यदि हम लाख चतुराइयाँ करें, लाखों लोगों से प्रीत करें, मिलाप पैदा करें, गुरू की संगत के बिना अंदर की तृष्णा खतम नहीं होती। प्रभू का नाम जपे बिना दुख-कलेश बना ही रहता है। हे जीवात्मा! परमात्मा का नाम जप के ही (इस तृष्णा से) मुक्ति मिल सकती है। (क्यूँकि) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर नाम जपता है, वह अपने असल को पहचान लेता है।3। जिस मनुष्य ने (नाम के बदले) अपना तन और अपना मन गुरू के हवाले कर दिया, जिसने मन हवाले किया और सिर भी हवाले कर दिया, उसने गुरू के द्वारा खोज करके उस प्रभू को (अपने अंदर ही) देख लिया, जिसको ढूँढने के लिए सारा जहान तलाश लिया था। हे नानक! शरण आए को गुरू ने अपने चरणों में जोड़ के प्रभू से मिला दिया, और वह प्रभू (अपने अंदर) अंग-संग ही दिखा दिया।4।17।
मरणै की चिंता नही जीवण की नही आस ॥
सिरीरागु महला 1 ॥
मरणै की चिंता नही जीवण की नही आस ॥
तू सरब जीआ प्रतिपालही लेखै सास गिरास ॥
अंतरि गुरमुखि तू वसहि जिउ भावै तिउ निरजासि ॥1॥
जीअरे राम जपत मनु मानु ॥
अंतरि लागी जलि बुझी पाइआ गुरमुखि गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
मरणै की चिंता नही जीवण की नही आस ॥
तू सरब जीआ प्रतिपालही लेखै सास गिरास ॥
अंतरि गुरमुखि तू वसहि जिउ भावै तिउ निरजासि ॥1॥
जीअरे राम जपत मनु मानु ॥
अंतरि लागी जलि बुझी पाइआ गुरमुखि गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (जो मनुष्य गुरू के संमुख रहता है, सिमरन की बरकत से उसको) मौत का डर नहीं रहता, और अधिक लम्बी उम्र की आकांक्षाएँ नहीं बनाता, (उसे यकीन होता है कि हे प्रभू!) आप सारे जीवों की पालना करते हैं, जीवों के हरेक स्वास हरेक ग्रास आपके हिसाब में (आपकी नजर में) है। (हे प्रभू !) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर आप प्रकट हो जाते हैं, (उसको ये यकीन बना रहता है कि) जैसे आपकी रजा है तैसे ही आप सबकी सँभाल करते हैं।1। हे जीवात्मा! (ऐसा उद्यम कीजिए कि) परमात्मा का नाम सिमरते सिमरते मन (सिमरन में) पसीज जाए। गुरू की शरण पड़ के (सिमरन के द्वारा) जिस मनुष्य ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना ली है, उसके अंदर की तृष्णा की जलन बुझ जाती है।1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 20 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।