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अंग 20

अंग
20
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पंच भूत सचि भै रते जोति सची मन माहि ॥
नानक अउगण वीसरे गुरि राखे पति ताहि ॥4॥15॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: उसका सारा शरीर प्रभू की याद में प्रभू के अदब में रंगा रहता है। सदा स्थिर प्रभू की ज्योति सदा उसके मन में टिकी रहती है हे नानक! जिस मनुष्य की गुरू ने रक्षा की, उसको (लोक-परलोक) में इज्जत मिली। विकार उस से परे हट गये ।4।15।
सिरीरागु महला 1 ॥
नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि ॥
इकि आवहि इकि जावही पूरि भरे अहंकारि ॥
मनहठि मती बूडीऐ गुरमुखि सचु सु तारि ॥1॥
गुर बिनु किउ तरीऐ सुखु होइ ॥
जिउ भावै तिउ राखु तू मै अवरु न दूजा कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
आगै देखउ डउ जलै पाछै हरिओ अंगूरु ॥
जिस ते उपजै तिस ते बिनसै घटि घटि सचु भरपूरि ॥
आपे मेलि मिलावही साचै महलि हदूरि ॥2॥
साहि साहि तुझु संमला कदे न विसारेउ ॥
जिउ जिउ साहबु मनि वसै गुरमुखि अंम्रितु पेउ ॥
मनु तनु तेरा तू धणी गरबु निवारि समेउ ॥3॥
जिनि एहु जगतु उपाइआ त्रिभवणु करि आकारु ॥
गुरमुखि चानणु जाणीऐ मनमुखि मुगधु गुबारु ॥
घटि घटि जोति निरंतरी बूझै गुरमति सारु ॥4॥
गुरमुखि जिनी जाणिआ तिन कीचै साबासि ॥
सचे सेती रलि मिले सचे गुण परगासि ॥
नानक नामि संतोखीआ जीउ पिंडु प्रभ पासि ॥5॥16॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे नानक! (संसार एक अथाह समुंद्र है) अगर गुरू की शिक्षा पर चल के सिमरन की किश्ती बना लें तो (इस संसार समुंद्र से) पार हो सकते हैं। पर अनेकों ही अहंकारी जीव है (जो अपनी ही अक्ल पे गर्व में रहके कुमार्ग पड़ के) पैदा होते हैं और मरते हैं (जनम मरन के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं) अपनी अक्ल के हठ पर चलने से (संसार समुंद्र के विकारों में) मनुष्य डूबता ही है। जो मनुष्य गुरू की राह पर चलता है उस को परमात्मा पार लंघा लेता है।1। गुरू की शरण के बिना ना ही (इस संसार समुंद्र से) पार लांघ सकते है, ना ही आत्मिक आनंद ही मिलता है। (इस वास्ते, हे मन! प्रभू दर पे अरदास कर और कह, हे प्रभू!) जैसे भी हो सके आप मुझे (गुरू की शरण में) रख, (इस संसार सागर से पार लंघाने के वास्ते) मुझे कोई और (आसरा) नहीं सूझता ।1। (जगत एक जंगल के समान है जिस में आगे आगे तो आग लगी हुई है जो पले पलाए बड़े बड़े वृक्षों को जलाती जा रही है; और पीछे पीछे नये नये कोमल पौधे उगते जा रहे हैं), पीछे पीछे नये कोमल बच्चे पैदा होते आ रहे हैं। जिस परमात्मा से यह जगत पैदा होता जाता है, उसी के (हुकम) अनुसार नाश भी होता रहता है। और, सदा स्थिर प्रभू हरेक शरीर में प्रचुर लबा-लॅब भरपूर है। हे प्रभू! आप खुद ही जीवों को अपने चरणों में जोड़ता है, आप खुद ही अपने सदा स्थिर महल में हजूरी में रखता है।2। (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं हरेक साँस के साथ आपको याद करता रहूँ, आपको कभी भी ना भुलाऊँ। (हे भाई! अगर मालिक प्रभू की मेहर हो तो) गुरू की शरण पड़ के (वह) ज्यों-ज्यों मालिक (मेरे) मन में बसता जाए, और मैं आत्मिक जीवन देने वाला (उसका) नाम-जल पीता रहूँ। (हे प्रभू! मेरा) मन (मेरा) तन, आपका ही दिया हुआ है, आप ही मेरा मालिक है। (मेहर कर, मैं अपने अंदर से) अहंकार दूर करके (आपकी याद में) लीन रहूँ।3। जिस (ज्योति-स्वरूप प्रभू) ने यह जगत पैदा किया है, ये त्रिभवणी स्वरूप बनाया है, गुरू की शरण पड़ने से उस ज्योति से सांझ बनाई जा सकती है (उससे संपर्क साधा जा सकता है)। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को ये ज्याति नहीं दिखती, उसे तो आत्मिक अंधकार ही अंधकार है। (यद्यपि) ईश्वरीय-ज्योति हरेक शरीर में एकरस व्यापक है, (पर) गुरू के मार्ग दर्शन से ही (गुरू की मति लेने से ये) असलियत समझी जा सकती है। जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ के सर्व-व्यापी ज्योति से सांझ बना ली, उन्हें साबाश मिलती है। वे सदा स्थिर प्रभू के साथ ऐक-मेक हो जाते हैं, सदा स्थिर प्रभू के गुण उनमें अंकुरित हो उठते हैं। हे नानक! नाम में जुड़ के वे मनुष्य आत्मिक शांति का आनंद लेते हैं, वे अपनी जीवात्मा अपना शरीर प्रभू के हवाले किए रहते हैं।5।16।
सिरीरागु महला 1 ॥
सुणि मन मित्र पिआरिआ मिलु वेला है एह ॥
जब लगु जोबनि सासु है तब लगु इहु तनु देह ॥
बिनु गुण कामि न आवई ढहि ढेरी तनु खेह ॥1॥
मेरे मन लै लाहा घरि जाहि ॥
गुरमुखि नामु सलाहीऐ हउमै निवरी भाहि ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि गंढणु गंढीऐ लिखि पड़ि बुझहि भारु ॥
त्रिसना अहिनिसि अगली हउमै रोगु विकारु ॥
ओहु वेपरवाहु अतोलवा गुरमति कीमति सारु ॥2॥
लख सिआणप जे करी लख सिउ प्रीति मिलापु ॥
बिनु संगति साध न ध्रापीआ बिनु नावै दूख संतापु ॥
हरि जपि जीअरे छुटीऐ गुरमुखि चीनै आपु ॥3॥
तनु मनु गुर पहि वेचिआ मनु दीआ सिरु नालि ॥
त्रिभवणु खोजि ढंढोलिआ गुरमुखि खोजि निहालि ॥
सतगुरि मेलि मिलाइआ नानक सो प्रभु नालि ॥4॥17॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे प्यारे मित्र मन! (मेरा उपदेश) सुन। परमात्मा को मिल, (मिलने का) यही (मानव जन्म) ही समय है। जब तक जवानी में (हूँ, और) सांस चल रही है, तब तक ये शरीर काम दे रहा है। यदि प्रभू के गुण अपने अंदर ना बसाए, तो ये शरीर किस काम का? ये तो आखिर गिर के मिट्टी की ढेरी ही हो जाएगा ।1। हे मेरे मन ! (यहाँ से आत्मिक) लाभ कमा के (अपने परलोक) घर में जा। गुरू की शरण पड़ कर (यहाँ) प्रभू का नाम सलाहना चाहिए। नाम की बरकति से अहंकार की आग अंदर से मिट जाती है (आग ये कि मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा बन जाऊँ- बुझ जाती है)।1। रहाउ। (पढ़े-लिखे लोग) बेअंत पुस्तकें लिख लिख के पढ़-पढ़ के विचारते हैं, (ज्ञान की बातें) सुन-सुन के लोगों की नजरों में विचारवान (दिखने का) व्यर्थ यतन करते हैं। परअंदर से दिन रात त्रिष्णा व्याप रही है। अहम् रोग, अहंकार के विकार अंदर (कायम) है। (दूसरी तरफ) वह परमात्मा (इस थोथी ज्ञान चातुर्य की) परवाह नहीं करता, (हमारे ज्ञान) उस को तौल भी नहीं सकते। (इसलिए) गुरू की मति ले के उस की कद्र समझ।2। यदि मैं लाख चतुराईआं करूँ, अगर मैं लाखों लोगों के साथ प्रीत करूँ, मिलाप पैदा करूँ, गुरू की संगत के बिना अंदर की तृष्णा खतम नहीं होती। प्रभू का नाम जपे बिना दुख-कलेश बना ही रहता है। हे मेरी जीवात्मा! परमात्मा का नाम जप के ही (इस तृष्णा से) मुक्ति मिल सकती है। (क्यूँकि) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर नाम जपता है, वह अपने असल को पहचान लेता है।3। जिस मनुष्य ने (नाम के बदले) अपना तन और अपना मन गुरू के हवाले कर दिया, जिसने मन हवाले किया और सिर भी हवाले कर दिया, उसने गुरू के द्वारा खोज करके उस प्रभू को (अपने अंदर ही) देख लिया, जिसको ढूँढने के लिए सारा जहान तलाश लिया था। हे नानक! शरण आए को गुरू ने अपने चरणों में जोड़ के प्रभू से मिला दिया, और वह प्रभू (अपने अंदर) अंग-संग ही दिखा दिया।4।17।
सिरीरागु महला 1 ॥
मरणै की चिंता नही जीवण की नही आस ॥
तू सरब जीआ प्रतिपालही लेखै सास गिरास ॥
अंतरि गुरमुखि तू वसहि जिउ भावै तिउ निरजासि ॥1॥
जीअरे राम जपत मनु मानु ॥
अंतरि लागी जलि बुझी पाइआ गुरमुखि गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (जो मनुष्य गुरू के संमुख रहता है, सिमरन की बरकत से उसको) मौत का डर नहीं रहता, और और लम्बी उम्र की वो आकांक्षाएं नहीं बनाता, (उसे यकीन होता है कि हे प्रभू!) आप सारे जीवों की पालना करता है, जीवों के हरेक स्वास हरेक ग्रास आपके हिसाब में (आपकी नजर में) है। (हे प्रभू !) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर आप प्रगट हैं जाता है, (उसको ये यकीन बना रहता है कि) जैसे आपकी रजा है तैसे ही आप (सभ की) संभाल करता है।1। हे (मेरी) जीवात्मा! (ऐसा उद्यम कर कि) प्रमात्मा का नाम सिमरते सिमरते मन (सिमरन में) पसीज जाए। गुरू की शरण पड़ के (सिमरन के द्वारा) जिस मनुष्य ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना ली है, उसके अंदर की तृष्णा की जलन बुझ जाती है।1।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसका सारा शरीर प्रभू की याद में प्रभू के अदब में रंगा रहता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।