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अंग 1344

अंग
1344
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
प्रभाती महला 1 दखणी ॥
गोतमु तपा अहिलिआ इसत्री तिसु देखि इंद्रु लुभाइआ ॥
सहस सरीर चिहन भग हूए ता मनि पछोताइआ ॥1॥
कोई जाणि न भूलै भाई ॥
सो भूलै जिसु आपि भुलाए बूझै जिसै बुझाई ॥1॥ रहाउ ॥
तिनि हरी चंदि प्रिथमी पति राजै कागदि कीम न पाई ॥
अउगणु जाणै त पुंन करे किउ किउ नेखासि बिकाई ॥2॥
करउ अढाई धरती मांगी बावन रूपि बहानै ॥
किउ पइआलि जाइ किउ छलीऐ जे बलि रूपु पछानै ॥3॥
राजा जनमेजा दे मतंी बरजि बिआसि पड़॑ाइआ ॥
तिनि॑ करि जग अठारह घाए किरतु न चलै चलाइआ ॥4॥
गणत न गणंी हुकमु पछाणा बोली भाइ सुभाई ॥
जो किछु वरतै तुधै सलाहंी सभ तेरी वडिआई ॥5॥
गुरमुखि अलिपतु लेपु कदे न लागै सदा रहै सरणाई ॥
मनमुखु मुगधु आगै चेतै नाही दुखि लागै पछुताई ॥6॥
आपे करे कराए करता जिनि एह रचना रचीऐ ॥
हरि अभिमानु न जाई जीअहु अभिमाने पै पचीऐ ॥7॥
भुलण विचि कीआ सभु कोई करता आपि न भुलै ॥
नानक सचि नामि निसतारा को गुर परसादि अघुलै ॥8॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 दखणी ॥ गौतम (एक प्रसिद्ध) तपस्वी (था)। अहिल्या (उसकी) स्त्री (थी)। उसका रूप देख के (देवताओं का राजा कहलवाने वाला) इन्द्र मोहित हो गया। (गौतम के श्राप से) (उसके इन्द्र के) शरीर पर हजार भगों के निशान बन गए। तब इन्द्र अपने मन में (उस कुकर्म पर) पछताया। 1। हे भाई ! कोई भी जीव जान-बूझ के गलत राह पर नहीं पड़ता (जीव के वश की बात नहीं)। वही मनुष्य कुमार्ग पर पड़ता है जिसको परमात्मा स्वयं कुमार्ग पर डालता है। वही मनुष्य (सही जीवन राह को) समझता है। जिसको परमात्मा स्वयं समझ बख्शता है। 1। रहाउ। धरती के राजे उस राजा हरी चंद ने (इतने दान-पुन्य किए कि उनका) मूल्य कागज़ पर नहीं पड़ सकता। अगर (राजा हरी चंद उन दान-पुन्यों को) बुरा काम समझता तो दान-पुन्य करता ही क्यों। (ना वह दान पुन्य करता) और ना ही मंडी में बिकता। 2। (विष्णू ने) बौने रूप में (आ के) बहाने से राजा बलि से ढाई करम धरती (का दान अपनी कुटिया बनाने के लिए) माँगा। अगर बलि राजा बौने रूप को पहचान लेता। तो ना ही ठगा जाता और ना ही पाताल में जाता। 3। ब्यास ऋषि ने राजा जनमेजा को खूब समझाया और मना किया (कि उस अप्सरा को अपने घर ना लाना। पर। परमात्मा ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट की हुई थी। उसने ऋषि का कहना नहीं माना। अप्सरा को ले आया। फिर) उसने अठारह यज्ञ करके अठराह ब्राहमण मार दिए (क्योंकि वह बहुत ही बारीक कपड़ों में आई अर्ध-नग्न अप्सरा देख के हॅस पड़े थे)। किए कर्मों के फल को कोई मिटा नहीं सकता। 4। हे प्रभू ! मैं और कोई सोचें नहीं सोचता। मैं तो आपकी रज़ा को समझने का यतन करता हूँ। और आपके प्रेम में (मगन हैं के) आपके गुण उचारता हूँ। मैं तो आपकी ही सिफतसालाह करता हूँ। जो कुछ जगत में हैं रहा है आपकी ताकत का जहूर हैं रहा है। 5। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह जगत में निर्लिप रहता है। उस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता। वह सदा परमात्मा की ओट पकड़ता है। पर अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (जिंदगी में) समय सिर परमात्मा को याद नहीं करता। जब (अपनी इस मूर्खता के कारण) दुख में फसता है तो हाथ मलता है। 6। जिस परमात्मा ने यह जगत रचना रची है वह स्वयं ही सब कुछ करता है वह स्वयं ही जीवों से सब कुछ कराता है। हे प्रभू ! (हम जीव मूर्ख हैं। हम यह गुमान करते हैं कि हम ही सब कुछ करते हैं और कर सकते हैं) हमारे दिलों में से अहंकार दूर नहीं होता। अहंकार में पड़ कर दुखी होते हैं। 7। ईश्वर स्वयं कभी गलती नहीं करता। पर। हरेक जीव जो उसने पैदा किया है भूलों में फसता रहता है। हे नानक ! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ने से इन भूलों से बचा जा सकता है। गुरू की कृपा से ही कोई विरला जीव कुमार्ग पर पड़ने से बचता है। 8। 4।
प्रभाती महला 1 ॥
आखणा सुनणा नामु अधारु ॥
धंधा छुटकि गइआ वेकारु ॥
जिउ मनमुखि दूजै पति खोई ॥
बिनु नावै मै अवरु न कोई ॥1॥
सुणि मन अंधे मूरख गवार ॥
आवत जात लाज नही लागै बिनु गुर बूडै बारो बार ॥1॥ रहाउ ॥
इसु मन माइआ मोहि बिनासु ॥
धुरि हुकमु लिखिआ तां कहीऐ कासु ॥
गुरमुखि विरला चीन॑ै कोई ॥
नाम बिहूना मुकति न होई ॥2॥
भ्रमि भ्रमि डोलै लख चउरासी ॥
बिनु गुर बूझे जम की फासी ॥
इहु मनूआ खिनु खिनु ऊभि पइआलि ॥
गुरमुखि छूटै नामु सम॑ालि ॥3॥
आपे सदे ढिल न होइ ॥
सबदि मरै सहिला जीवै सोइ ॥
बिनु गुर सोझी किसै न होइ ॥
आपे करै करावै सोइ ॥4॥
झगड़ु चुकावै हरि गुण गावै ॥
पूरा सतिगुरु सहजि समावै ॥
इहु मनु डोलत तउ ठहरावै ॥
सचु करणी करि कार कमावै ॥5॥
अंतरि जूठा किउ सुचि होइ ॥
सबदी धोवै विरला कोइ ॥
गुरमुखि कोई सचु कमावै ॥
आवणु जाणा ठाकि रहावै ॥6॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सुनने व सुनाने को अपने आत्मिक जीवन का सहारा बना लिया है। उसकी माया की खातिर हर वक्त की व्यर्थ दौड़-भाग समाप्त हो जाती है। पर अपने मन के पीछे चलने वाला बँदा परमात्मा के बिना और-और आसरे की झाक में (दौड़-भाग करता) है और इज्जत गवा लेता है। (हे मेरे मन !) मुझे तो परमात्मा के नाम के बिना कोई और आसरा नहीं सूझता। 1। हे (माया के मोह में) अंधे हुए मन ! हे मूर्ख मन ! हे गवार मन ! सुन (जो व्यक्ति माया के मोह में अंधा हो जाता है। और बार-बार माया के मोह में फंसने से बाज़ नहीं आता। उसको सिर्फ) माया की खातिर दौड़-भाग करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। गुरू की शरण से वंचित रह के वह बार-बार माया के मोह में ही डूबता है (हे मन ! याद रख कि आप भी ऐसा ही निर्लज हैं जाएगा)। 1। रहाउ। (हे भाई !) माया के मोह में (फस के) इस मन की आत्मिक मौत हो जाती है (पर। जीव के क्या वश।) जब धुर से ही यह हुकम चला तो किसी और के आगे पुकार नहीं की जा सकती (भाव। माया का मोह आत्मिक मौत का कारण बनता है- ये नियम अटल है। कोई इसकी उलंघना नहीं कर सकता)। कोई विरला व्यक्ति ही गुरू की शरण में पड़ कर समझता है कि प्रभू के नाम के बिना माया के मोह से खलासी नहीं हो सकती। 2। माया के मोह में भटक-भटक के जीव चौरासी लाख जूनियों के चक्करों में धक्के खाता फिरता है। गुरू के बिना सही जीवन-राह को नहीं समझता और जम का फंदा (इसके गले में पड़ा रहता है)। (माया के असर में) यह मन कभी आकाश में जा चढ़ता है और कभी पाताल में गिर जाता है। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है वह परमात्मा का नाम सिमर के इस चक्कर में से बच निकलता है। 3। जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही (अपने चरणों में जुड़ने के लिए) बुलाता है उसको मिलते हुए समय नहीं लगता। वह मनुष्य गुरू के शबद से माया के मोह से उपराम हो जाता है (भाव। माया उस पर प्रभाव नहीं डाल सकती) और वह बड़ा आसान जीवन बिताता है। गुरू की शरण पड़े बिना किसी को आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती (गुरू से भी प्रभू स्वयं ही मिलाता है) प्रभू स्वयं ही ये सब कुछ करता है और जीवों से करवाता है। 4। जिस मनुष्य का माया के मोह का लंबा चक्र प्रभू खत्म कर देता है वह मनुष्य प्रभू के गुण गाता है। पूरा गुरू उसके सिर पर रखवाला बनता है और वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। तब मनुष्य का यह मन माया के पीछे भटकने से हट जाता है। तब मनुष्य सदा-स्थिर-नाम के सिमरन को अपना कर्तव्य जान के सिमरन की कार करता है। 5। पर जिस मनुष्य का मन (विकारों से) मैला हो चुका हो उसके अंदर (बाहरी स्नान आदि से) पवित्रता नहीं आ सकती। कोई विरला मनुष्य गुरू के शबद के साथ ही (मन को) साफ करता है। कोई विरला ही गुरू की शरण पड़ कर सदा-स्थिर-हरी-नाम को सिमरने का कार्य करता है और अपने मन की भटकना को रोक के रखता है। 6।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभाती महला 1 दखणी ॥ गौतम (एक प्रसिद्ध) तपस्वी (था)।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।