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अंग 132

अंग
132
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंध कूप ते कंढै चाड़े ॥
करि किरपा दास नदरि निहाले ॥
गुण गावहि पूरन अबिनासी कहि सुणि तोटि न आवणिआ ॥4॥
ऐथै ओथै तूंहै रखवाला ॥
मात गरभ महि तुम ही पाला ॥
माइआ अगनि न पोहै तिन कउ रंगि रते गुण गावणिआ ॥5॥
किआ गुण तेरे आखि समाली ॥
मन तन अंतरि तुधु नदरि निहाली ॥
तूं मेरा मीतु साजनु मेरा सुआमी तुधु बिनु अवरु न जानणिआ ॥6॥
जिस कउ तूं प्रभ भइआ सहाई ॥
तिसु तती वाउ न लगै काई ॥
तू साहिबु सरणि सुखदाता सतसंगति जपि प्रगटावणिआ ॥7॥
तूं ऊच अथाहु अपारु अमोला ॥
तूं साचा साहिबु दासु तेरा गोला ॥
तूं मीरा साची ठकुराई नानक बलि बलि जावणिआ ॥8॥3॥37॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माया के मोह के अंधे कूएं में से निकाल के बाहर किनारे पर चढ़ा देता हैं (हे भाई !) परमात्मा अपने सेवकों पर मेहर करता है। उनको मेहर की नजर के साथ देखता है, वह सेवक अविनाशी प्रभू के गुण गाते रहते हैं। (हे भाई ! प्रभू के गुण बेअंत हैं) कहने से, सुनने से (उसके गुणों का) खात्मा नहीं हो सकता है। 4। हे प्रभू ! इस लोक में परलोक में आप ही (सब जीवों का) रक्षक है। माँ के पेट में ही (जीवों की) पालना करता है। उन लोगों को माया (की तृष्णा) की आग छू नहीं सकती, जो आपके प्रेम रंग में रंगे हुए आपके गुण गाते रहते हैं। 5। हे प्रभू ! मैं आपके कौन कौन से गुण कह के याद करूँ? मैं अपने मन में तन में तूझे ही बसता देख रहा हूँ। हे प्रभू ! आप ही मेरा मालिक है। आपके बिना मैं किसी और को (आपके जैसा मित्र) नहीं समझता। 6। हे प्रभू ! जिस मनुष्य वास्ते आप रक्षक बन जाता है, उसे कोई दुख कलेष छू नहीं सकता। आप ही उसका मालिक है, आप ही उसका रक्षक है, आप ही उसे सुख देने वाला है। साध-संगति में आपका नाम जप के वह आपको अपने हृदय में प्रत्यक्ष देखता है। 7। हे प्रभू ! (आत्मिक जीवन में) आप (सब जीवों से) ऊँचा है, आप (मानो, गुणों का समुंद्र) है, जिसकी गहराई नहीं मापी जा सकती। आपकी हस्ती का परला छोर नहीं ढूँढा जा सकता। आपका मुल्य नहीं पड़ सकता (किसी भी पदार्थ के बदले आपकी प्राप्ति नहीं हैं सकती)। आप सदा कायम रहने वाला मालिक है। मैं आपका दास हूँ, गुलाम हूँ। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) आप (मेरा) मालिक है; आपकी मल्कियत सदा कायम रहने वाली है। मैं आपसे सदा सदके हूँ, कुर्बान हूँ। 8। 3। 37।
माझ महला 5 घरु 2 ॥
नित नित दयु समालीऐ ॥
मूलि न मनहु विसारीऐ ॥ रहाउ ॥
संता संगति पाईऐ ॥
जितु जम कै पंथि न जाईऐ ॥
तोसा हरि का नामु लै तेरे कुलहि न लागै गालि जीउ ॥1॥
जो सिमरंदे सांईऐ ॥
नरकि न सेई पाईऐ ॥
तती वाउ न लगई जिन मनि वुठा आइ जीउ ॥2॥
सेई सुंदर सोहणे ॥
साधसंगि जिन बैहणे ॥
हरि धनु जिनी संजिआ सेई गंभीर अपार जीउ ॥3॥
हरि अमिउ रसाइणु पीवीऐ ॥
मुहि डिठै जन कै जीवीऐ ॥
कारज सभि सवारि लै नित पूजहु गुर के पाव जीउ ॥4॥
जो हरि कीता आपणा ॥ तिनहि गुसाई जापणा ॥
सो सूरा परधानु सो मसतकि जिस दै भागु जीउ ॥5॥
मन मंधे प्रभु अवगाहीआ ॥
एहि रस भोगण पातिसाहीआ ॥
मंदा मूलि न उपजिओ तरे सची कारै लागि जीउ ॥6॥
करता मंनि वसाइआ ॥
जनमै का फलु पाइआ ॥
मनि भावंदा कंतु हरि तेरा थिरु होआ सोहागु जीउ ॥7॥
अटल पदारथु पाइआ ॥
भै भंजन की सरणाइआ ॥
लाइ अंचलि नानक तारिअनु जिता जनमु अपार जीउ ॥8॥4॥38॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माझ महला 5 घरु 3 ॥
हरि जपि जपे मनु धीरे ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि गुरदेउ मिटि गए भै दूरे ॥1॥
सरनि आवै पारब्रहम की ता फिरि काहे झूरे ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 घरु 2 ॥ (हे भाई !) सदा ही उस परमात्मा को हृदय में बसाना चाहिए जो सब जीवों पे तरस करता है, उसे अपने मन से भुलाना नहीं चाहिए। रहाउ। (हे भाई !) संत जनों की संगति में रहने से परमात्मा का नाम मिलता है। साध-संगति की बरकति से आत्मिक मौत की ओर ले जाने वाले रास्ते पर नहीं पड़ते। (हे भाई ! जीवन सफर वास्ते) परमात्मा का नाम खर्च (अपने पल्ले बांध) ले, (इस तरह) आपकी कुल को (भी) कोई बदनामी नहीं आएगी। 1। जो मनुष्य खसम परमात्मा का सिमरन करते हैं उन्हें नर्क में नहीं डाला जाता। (हे भाई !) जिनके मन में परमात्मा आ बसता है, उन्हें कोई दुख कलेष छू नहीं सकता। 2। वही मनुष्य सोहने सुंदर (जीवन वाले) हैं, जिनका उठना बैठना साधसंगति में है। जिन लोगों ने परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर लिया, वे बेअंत गहरे जिगरे वाले बन जाते हैं। 3। (हे भाई !) परमात्मा का नाम अमृत पीना चाहिए। (ये नाम अमृत) सारे रसों का श्रोत है। (हे भाई !) परमात्मा के सेवक का दर्शन करने से आत्मिक जीवन मिलता है, (इस वास्ते आप भी) सदा गुरू के पैर पूज (गुरू की शरण पड़ा रह, और इस तरह) अपने सारे काम सर कर ले। 4। जिस मनुष्य को परमात्मा ने अपना (सेवक) बना लिया है, उसने ही पति प्रभू का सिमरन करते रहना है। जिस मनुष्य के माथे पे (प्रभू की इस दाति के) भाग्य जाग जाएं, वह (विकारों से टक्कर ले सकने के स्मर्थ) शूरवीर बन जाते हैं। वह (मनुष्यों में) श्रेष्ठ मनुष्य माने जाते हैं। 5। हे भाई ! अपने मन में ही डुबकी लगाओ और प्रभू के दर्शन करो- यही है दुनिया के सारे रसों का भोग। यही है दुनिया की बादशाहियां। (जिन मनुष्यों ने परमात्मा को अपने अंदर ही देख लिया, उनके मन में) कभी कोई विकार पैदा नहीं होता। वह सिमरन की सच्ची कार में लग के (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 6। जिस मनुष्य ने करतार को अपने मन में बसा लिया, उसने मानस जनम का फल प्राप्त कर लिया। (हे जीव स्त्री !) अगर आपको कंत हरी अपने मन में प्यारा लगने लग जाए, तो आपका ये सुहाग सदा के लिए (आपके सिर पर) कायम रहेगा। 7। (परमात्मा का नाम सदा कायम रहने वाला धन है, जिन्होंने) यह सदा कायम रहने वाला धन ढूँढ लिया, जो लोग सदा डर नाश करने वाले परमात्मा की शरण में आ गए, उन्हें, हे नानक ! परमात्मा ने अपने साथ लगा के (संसार समुंद्र से) पार लंघा लिया। उन्होंने मानस जन्म की बाजी जीत ली। 8। 4। 38। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। माझ महला 5 घरु 3 ॥ परमात्मा का नाम जप जप के (मनुष्य का) मन धैर्यवान हो जाता है (दुनियां के सुखों दुखों में डोलता नहीं)। रहाउ। सबसे बड़े अकाल-पुरख को सिमर सिमर के सारे डर सहम मिट जाते हैं; दूर हो जाते हैं। 1। जब मनुष्य परमात्मा का आसरा ले लेता है, उसे कोई चिंता, फिक्र छू नहीं सकती। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माया के मोह के अंधे कूएं में से निकाल के बाहर किनारे पर चढ़ा देता हैं (हे भाई !) परमात्मा अपने सेवकों पर मेहर करता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।