करि किरपा दास नदरि निहाले ॥
गुण गावहि पूरन अबिनासी कहि सुणि तोटि न आवणिआ ॥4॥
ऐथै ओथै तूंहै रखवाला ॥
मात गरभ महि तुम ही पाला ॥
माइआ अगनि न पोहै तिन कउ रंगि रते गुण गावणिआ ॥5॥
किआ गुण तेरे आखि समाली ॥
मन तन अंतरि तुधु नदरि निहाली ॥
तूं मेरा मीतु साजनु मेरा सुआमी तुधु बिनु अवरु न जानणिआ ॥6॥
जिस कउ तूं प्रभ भइआ सहाई ॥
तिसु तती वाउ न लगै काई ॥
तू साहिबु सरणि सुखदाता सतसंगति जपि प्रगटावणिआ ॥7॥
तूं ऊच अथाहु अपारु अमोला ॥
तूं साचा साहिबु दासु तेरा गोला ॥
तूं मीरा साची ठकुराई नानक बलि बलि जावणिआ ॥8॥3॥37॥
नित नित दयु समालीऐ ॥
मूलि न मनहु विसारीऐ ॥ रहाउ ॥
संता संगति पाईऐ ॥
जितु जम कै पंथि न जाईऐ ॥
तोसा हरि का नामु लै तेरे कुलहि न लागै गालि जीउ ॥1॥
जो सिमरंदे सांईऐ ॥
नरकि न सेई पाईऐ ॥
तती वाउ न लगई जिन मनि वुठा आइ जीउ ॥2॥
सेई सुंदर सोहणे ॥
साधसंगि जिन बैहणे ॥
हरि धनु जिनी संजिआ सेई गंभीर अपार जीउ ॥3॥
हरि अमिउ रसाइणु पीवीऐ ॥
मुहि डिठै जन कै जीवीऐ ॥
कारज सभि सवारि लै नित पूजहु गुर के पाव जीउ ॥4॥
जो हरि कीता आपणा ॥ तिनहि गुसाई जापणा ॥
सो सूरा परधानु सो मसतकि जिस दै भागु जीउ ॥5॥
मन मंधे प्रभु अवगाहीआ ॥
एहि रस भोगण पातिसाहीआ ॥
मंदा मूलि न उपजिओ तरे सची कारै लागि जीउ ॥6॥
करता मंनि वसाइआ ॥
जनमै का फलु पाइआ ॥
मनि भावंदा कंतु हरि तेरा थिरु होआ सोहागु जीउ ॥7॥
अटल पदारथु पाइआ ॥
भै भंजन की सरणाइआ ॥
लाइ अंचलि नानक तारिअनु जिता जनमु अपार जीउ ॥8॥4॥38॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माझ महला 5 घरु 3 ॥
हरि जपि जपे मनु धीरे ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि गुरदेउ मिटि गए भै दूरे ॥1॥
सरनि आवै पारब्रहम की ता फिरि काहे झूरे ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माया के मोह के अंधे कूएं में से निकाल के बाहर किनारे पर चढ़ा देता हैं (हे भाई !) परमात्मा अपने सेवकों पर मेहर करता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।