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अंग 130

अंग
130
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तिसु रूपु न रेखिआ घटि घटि देखिआ गुरमुखि अलखु लखावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
तू दइआलु किरपालु प्रभु सोई ॥
तुधु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
गुरु परसादु करे नामु देवै नामे नामि समावणिआ ॥2॥
तूं आपे सचा सिरजणहारा ॥
भगती भरे तेरे भंडारा ॥
गुरमुखि नामु मिलै मनु भीजै सहजि समाधि लगावणिआ ॥3॥
अनदिनु गुण गावा प्रभ तेरे ॥
तुधु सालाही प्रीतम मेरे ॥
तुधु बिनु अवरु न कोई जाचा गुर परसादी तूं पावणिआ ॥4॥
अगमु अगोचरु मिति नही पाई ॥
अपणी क्रिपा करहि तूं लैहि मिलाई ॥
पूरे गुर कै सबदि धिआईऐ सबदु सेवि सुखु पावणिआ ॥5॥
रसना गुणवंती गुण गावै ॥
नामु सलाहे सचे भावै ॥
गुरमुखि सदा रहै रंगि राती मिलि सचे सोभा पावणिआ ॥6॥
मनमुखु करम करे अहंकारी ॥
जूऐ जनमु सभ बाजी हारी ॥
अंतरि लोभु महा गुबारा फिरि फिरि आवण जावणिआ ॥7॥
आपे करता दे वडिआई ॥ जिन कउ आपि लिखतु धुरि पाई ॥
नानक नामु मिलै भउ भंजनु गुर सबदी सुखु पावणिआ ॥8॥1॥34॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: उस परमात्मा का कोई खास रूप नहीं, कोई खास चक्र चिन्ह नहीं बयान किया जा सकता। (वैसे) वह हरेक शरीर में बसता दिखाई देता है। उस अदृष्ट प्रभू को गुरू की शरण पड़ के ही समझा जा सकता है। 1। रहाउ। (हे प्रभू !) आप दया का घर है, कृपा का श्रोत है। आप ही सब जीवों का मालिक है। आपके बगैर आपके बिना और कोई जीव नहीं। (जिस मनुष्य पे) गुरू कृपा करता है उसे आपका नाम बख्शता है। वह मनुष्य आपके नाम में ही मस्त रहता है। 2। (हे प्रभू !) आप स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है, आप खुद ही सब को पैदा करने वाला है (आपके पास) आपकी भगती के खजाने भरे पड़े हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, उसे (गुरू की ओर से) आपका नाम मिल जाता है। उसका मन (आपके नाम की याद में) रसा रहता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में समाधि लगाए रखता है (टिका रहता है)। 3। हे प्रभू ! हे मेरे प्रीतम ! (मेरे पर मेहर कर) मैं हर रोज (हर वक्त) आपके गुण गाता रहूँ। मैं आपकी ही सिफत सालाह करता रहूँ। आपके बिना मैं किसी और से कुछ ना मांगू। (हे मेरे प्रीतम !) गुरू की कृपा से ही तूझे मिला जा सकता है। 4। (हे प्रभू !) आप अपहुँच है। मनुष्य की ज्ञानेंद्रियां की आपके तक पहुँच नहीं हैं सकती। आप कितना बड़ा है, ये बात कोई जीव नही बता सकता। जिस मनुष्य पे (हे प्रभू !) आप मेहर करता है, उसे आप अपने (चरणों) में मिला लेता है। (हे भाई !) उस प्रभू को पूरे गुरू के शबद के द्वारा ही सिमरा जा सकता है। मनुष्य सतिगुरू के शबद को हृदय में धार के आत्मिक आनंद ले सकता है। 5। वह जीभ भाग्यशाली है जो परमात्मा के गुण गाती है। वह मनुष्य सदा स्थिर परमात्मा को प्यारा लगता है, जो परमात्मा के नाम को सलाहते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य की जीभ सदा प्रभू के नाम रंग में रंगी रहती है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सदा स्थिर प्रभू (के चरणों) में मिल के (लोक परलोक में) शोभा कमाता है। 6। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (चाहे अपने द्वारा निर्धारित धार्मिक) कर्म करता है। पर, अहंकार में ग्रस्त रहता है (कि मैं धर्मी हूँ), वह मनुष्य (जैसे) जूए में अपना जीवन हार देता है। वह मनुष्य जीवन की बाजी हार जाता है। उसके अंदर माया का लोभ (प्रबल रहता) है। उसके अंदर माया के मोह का घोर अंधकार बना रहता है। वह बारंबर जनम मरण के चक्र में पड़ा रहता है। 7। उन्हें वह करतार स्वयं ही (नाम सिमरन की) वडिआई बख्शता है। जिन मनुष्यों के भाग्यों में परमात्मा ने खुद ही अपनी दरगाह से ही नाम सिमरन की दाति का लेख लिख दिया है, हे नानक ! उन (भाग्यशालियों) को (दुनिया के सारे) डर दूर करने वाला प्रभू का नाम मिल जाता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह आत्मि्क आनंद लेते हैं। 8। 1। 34। नोट: अंक 1 बताता है कि से अष्टपदी महले 4 की है। कुल जोड़ 34। गुरू नानक देव जी ———–01गुरू अमरदास जी————–32कुल —————————-34 शबद। गुरू राम दास जी————–01
माझ महला 5 घरु 1 ॥
अंतरि अलखु न जाई लखिआ ॥
नामु रतनु लै गुझा रखिआ ॥
अगमु अगोचरु सभ ते ऊचा गुर कै सबदि लखावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी कलि महि नामु सुणावणिआ ॥
संत पिआरे सचै धारे वडभागी दरसनु पावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
साधिक सिध जिसै कउ फिरदे ॥
ब्रहमे इंद्र धिआइनि हिरदे ॥
कोटि तेतीसा खोजहि ता कउ गुर मिलि हिरदै गावणिआ ॥2॥
आठ पहर तुधु जापे पवना ॥
धरती सेवक पाइक चरना ॥
खाणी बाणी सरब निवासी सभना कै मनि भावणिआ ॥3॥
साचा साहिबु गुरमुखि जापै ॥
पूरे गुर कै सबदि सिञापै ॥
जिन पीआ सेई त्रिपतासे सचे सचि अघावणिआ ॥4॥
तिसु घरि सहजा सोई सुहेला ॥
अनद बिनोद करे सद केला ॥
सो धनवंता सो वड साहा जो गुर चरणी मनु लावणिआ ॥5॥
पहिलो दे तैं रिजकु समाहा ॥
पिछो दे तैं जंतु उपाहा ॥
तुधु जेवडु दाता अवरु न सुआमी लवै न कोई लावणिआ ॥6॥
जिसु तूं तुठा सो तुधु धिआए ॥
साध जना का मंत्रु कमाए ॥
आपि तरै सगले कुल तारे तिसु दरगह ठाक न पावणिआ ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 घरु 1 ॥ अदृष्ट परमातमा (हरेक जीव के) अंदर (बसता है, पर हरेक जीव अपने अंदर उसके अस्तित्व को) जाच नहीं सकता। (हरेक जीव के अंदर) परमात्मा का श्रेष्ठ अमोलक नाम मौजूद है (परमातमा ने हरेक के अंदर) छुपा के रख दिया है (हरेक जीव को उसकी कद्र नहीं)। (सब जीवों के अंदर बसा हुआ भी परमात्मा) जीवों की पहुँच से परे है। जीवों की ज्ञानेंद्रियों की पहुँच से परे है। सब जीवों की आत्मिक उड़ान से ऊँचा है। (हां) गुरू के शबद में जुड़ने से (जीव को अपने अंदर उसके अस्तित्व की) समझ आ सकती है। 1। मैं उन मनुष्यों से सदके कुर्बान जाता हूं, जो मानस जनम में (आ के परमात्मा का नाम सुनते हैं तथा औरों को) नाम सुनाते हैं। सदा स्थिर परमात्मा ने जिन्हें (अपने नाम का) सहारा दिया है, वह संत बन गए। वे उसके प्यारे हो गए। उन भाग्यशालियों ने परमात्मा के दर्शन पा लिए। 1। रहाउ। योग साधना करने वाले योगी, योग साधना में माहिर योगी, जिस परमात्मा (की प्राप्ति) की खातिर (जंगलों पहाड़ों में भटकते) फिरते हैं। ब्रह्मा इन्द्र (आदि देवते) जिसको अपने हृदय में सिमरते हैं। तैंतीस करोड़ देवते भी उसकी तलाश करते हैं (पर दीदार नहीं कर सकते। भाग्यशाली मनुष्य) गुरू को मिल के अपने हृदय में (उसके गुण) गाते हैं। 2। (हे प्रभू ! आपकी बनायी हुई) हवा आठों पहर आपके हुकम में चलती है। (आपकी पैदा की हुई) धरती आपके चरणों की टहिलन है सेविका है। चारों खाणियों में पैदा हुए और भांति भांति की बोलियां बोलने वाले सब जीवों के अंदर आप बस रहा है। आप सब जीवों के मन में प्यारा लगता है। 3। (हे भाई !) मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है। गुरू की शरण पड़ने से उसकी सूझ आती है। पूरे गुरू के शबद में जुड़ने से ही उसके साथ जान पहिचान बनती है। जिन मनुष्यों ने उसका नाम अंमृत पिया है, वही (माया की तृष्णा की तरफ से) तृप्त हैं। 4। उसके हृदय घर में आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है। वह मनुष्य सुखी (जीवन व्यतीत करता) है। वह सदा आत्मिक खुशियां आत्मिक आनंद हासिल करता है। वह मनुष्य (असल) धन का मालिक हो गया है। वह मनुष्य बड़ा व्यापारी बन गया है, जो मनुष्य गुरू के चरणों में अपना मन जोड़ता है। 5। (हे प्रभू ! जीव को पैदा करने से) पहले आप (माँ के थनों में उसके वास्ते दूध) रिजक का प्रबंध करता है। फिर आप जीव को पैदा करता है। हे स्वामी ! आपके जितना बड़ा और कोई दाता नहीं है, कोई आपकी बराबरी नहीं कर सकता। 6। (हे प्रभू ! जिस मनुष्य पे आप प्रसन्न होता है वह आपका ध्यान धरता है। वह उन गुरमुखों का उपदेश कमाता है जिन्होंने अपने मन को साधा हुआ है। वह मनुष्य (संसार समुंद्र में से) स्वयं पार लांघ जाता है, अपनी सारी कुलों को भी पार लंघा लेता है। आपकी हजूरी में पहुँचने के राह में उसे कोई रोक नही सकता। 7।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस परमात्मा का कोई खास रूप नहीं, कोई खास चक्र चिन्ह नहीं बयान किया जा सकता।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।