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अंग 1276

अंग
1276
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मलार महला 3 असटपदीआ घरु 1 ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करमु होवै ता सतिगुरु पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥
सतिगुरु मिलिऐ कंचनु होईऐ जां हरि की होइ रजाइ ॥1॥
मन मेरे हरि हरि नामि चितु लाइ ॥
सतिगुर ते हरि पाईऐ साचा हरि सिउ रहै समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर ते गिआनु ऊपजै तां इह संसा जाइ ॥
सतिगुर ते हरि बुझीऐ गरभ जोनी नह पाइ ॥2॥
गुर परसादी जीवत मरै मरि जीवै सबदु कमाइ ॥
मुकति दुआरा सोई पाए जि विचहु आपु गवाइ ॥3॥
गुर परसादी सिव घरि जंमै विचहु सकति गवाइ ॥
अचरु चरै बिबेक बुधि पाए पुरखै पुरखु मिलाइ ॥4॥
धातुर बाजी संसारु अचेतु है चलै मूलु गवाइ ॥
लाहा हरि सतसंगति पाईऐ करमी पलै पाइ ॥5॥
सतिगुर विणु किनै न पाइआ मनि वेखहु रिदै बीचारि ॥
वडभागी गुरु पाइआ भवजलु उतरे पारि ॥6॥
हरि नामां हरि टेक है हरि हरि नामु अधारु ॥
क्रिपा करहु गुरु मेलहु हरि जीउ पावउ मोख दुआरु ॥7॥
मसतकि लिलाटि लिखिआ धुरि ठाकुरि मेटणा न जाइ ॥
नानक से जन पूरन होए जिन हरि भाणा भाइ ॥8॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 असटपदीआ घरु 1 ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जब परमात्मा की मेहर होती है तब गुरू मिलता है। परमात्मा की मेहर के बिना गुरू नहीं मिल सकता। अगर गुरू मिल जाए तो मनुष्य (शुद्ध) सोना बन जाता है। (पर। ये तब ही होता है) जब परमात्मा की रज़ा हो। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा के नाम में सुरति जोड़े रख। सदा कायम रहने वाला परमात्मा गुरू के द्वारा मिलता है। (जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है वह मनुष्य) परमात्मा में लीन रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जब गुरू के द्वारा (मनुष्य के अंदर) आत्मिक जीवन की सूझ पैदा होती है। तब मनुष्य के मन की भटकना दूर हो जाती है। हे भाई ! गुरू के माध्यम से ही परमात्मा के साथ सांझ बनती है। और। मनुष्य पैदा होने-मरने के चक्करों में नहीं पड़ता। 2। हे भाई ! गुरू की कृपा से मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही माया के मोह से बचा रहता है। गुरू के शबद के अनुसार अपना जीवन बना के मनुष्य विकारों से हट के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। हे भाई ! वही मनुष्य विकारों से निजात का रास्ता पा सकता है। जो अपने अंदर से स्वै-भाव दूर करता है। 3। हे भाई ! गुरू की कृपा से मनुष्य अपने अंदर से माया का प्रभाव दूर करके परमात्मा के घर में पैदा हो जाता है (परमात्मा की याद में जुड़े रहके नया आत्मिक जीवन बना लेता है। (गुरू के द्वारा) मनुष्य इस ढीठ मन को (वश से बाहर हुए मन को) वश में ले आता है। अच्छे-बुरे कर्म के परख की सूझ हासिल कर लेता है। और। इस तरह गुरू-पुरख के द्वारा मनुष्य अकाल-पुरख को मिल जाता है। 4। हे भाई ! यह जगत नाशवंत खेल (ही) है। (वह मनुष्य) मूर्ख है (जो इस नाशवंत खेल की खातिर अपने आत्मिक जीवन का सारा) सरमाया गवा के (यहाँ से) जाता है। हे भाई ! नफा परमात्मा (का नाम है। यह लाभ) साध-संगति में मिलता है। (पर। परमात्मा की) मेहर से ही (मनुष्य यह फायदा) हासिल करता है। 5। हे भाई ! अपने मन में हृदय में बिचार करके देख लो। किसी भी मनुष्य ने (ये हरी-नाम-लाभ) गुरू (की शरण) के बिना हासिल नहीं किया। (जिन मनुष्यों ने) बड़े भाग्यों से गुरू को पा लिया। वे संसार-समुंद्र से पार लांघ गए। 6। हे भाई ! (मेरे वास्ते तो) हरी परमात्मा का नाम (ही) सहारा है। हरी का नाम ही आसरा है। हे प्रभू जी ! मेहर करो। (मुझे) गुरू से मिलाओ। मैं (गुरू के माध्यम से माया के मोह से खलासी का) रास्ता तलाश सकूँ। 7। हे भाई ! (जिन मनुष्यों के) माथे पर धुर-दरगाह से मालिक-प्रभू ने (गुरू-मिलाप के लेख) लिख दिए। (वह लेख किसी भी तरह से) मिटाए नहीं जा सकते। हे नानक ! (कह- हे भाई ! गुरू-शरण की बरकति से) जिन मनुष्यों को परमात्मा की रज़ा प्यारी लग गई। वे मनुष्य संपूर्ण (पूरन आत्मिक जीवन वाले) बन गए। 8। 1।
मलार महला 3 ॥
बेद बाणी जगु वरतदा त्रै गुण करे बीचारु ॥
बिनु नावै जम डंडु सहै मरि जनमै वारो वार ॥
सतिगुर भेटे मुकति होइ पाए मोख दुआरु ॥1॥
मन रे सतिगुरु सेवि समाइ ॥
वडै भागि गुर पूरा पाइआ हरि हरि नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि आपणै भाणै स्रिसटि उपाई हरि आपे देइ अधारु ॥
हरि आपणै भाणै मनु निरमलु कीआ हरि सिउ लागा पिआरु ॥
हरि कै भाणै सतिगुरु भेटिआ सभु जनमु सवारणहारु ॥2॥
वाहु वाहु बाणी सति है गुरमुखि बूझै कोइ ॥
वाहु वाहु करि प्रभु सालाहीऐ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
आपे बखसे मेलि लए करमि परापति होइ ॥3॥
साचा साहिबु माहरो सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥
अंम्रितु वरसै मनु संतोखीऐ सचि रहै लिव लाइ ॥
हरि कै नाइ सदा हरीआवली फिरि सुकै ना कुमलाइ ॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! जगत (कर्म-काण्ड में रखने वाले शास्त्रों-) वेदों की बाणी में परचा रहता है। माया के तीन गुणों की (ही) विचार करता रहता है (प्रभू का नाम नहीं सिमरता)। परमात्मा के नाम के बिना (जगत) जमदूतों की सज़ा सहता है। बार-बार जनम-मरण के चक्करों में पड़ा रहता है। (जो मनुष्य) गुरू को मिल जाता है। उसको माया के मोह से खलासी मिल जाती है वह मनुष्य माया के मोह से आजाद होने का राह ढूँढ लेता है। 1। हे (मेरे) मन ! गुरू की शरण पड़ कर (परमातमा के नाम में) लीन हुआ रह। (जिस मनुष्य ने) बड़ी किस्मत से पूरा गुरू पा लिया। वह सदा हरी का नाम ध्याता रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ने अपनी रजा में ये जगत पैदा किया है। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) आसरा देता है। (जिस मनुष्य का) मन परमात्मा ने अपनी रज़ा में (गुरू के द्वारा) पवित्र कर दिया है। उस मनुष्य का प्यार प्रभू-चरणों के साथ बन गया। सारे मनुष्य जीवन को अच्छा बना सकने वाला गुरू (उस मनुष्य को) परमात्मा की रज़ा मुताबिक मिल गया। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर (ही) कोई विरला मनुष्य (ये) समझता है (कि) परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी ही सदा कायम रहने वाली है। हे भाई ! (प्रभू) ‘आश्चर्य है आश्चर्य है’- ये कह-कह के परमात्मा की सिफतसालह करते रहना चाहिए। (उसके बराबर का कोई और है ही नहीं। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही जिस मनुष्य पर) बख्शिश करता है (उसको अपने चरणों में) मिला लेता है। (उसकी) मेहर से (ही उसका) मिलाप होता है। 3। हे भाई ! सदा कायम रहने वाला प्रभू ही (सारे जगत का) प्रधान है मालिक है। जिस (मनुष्य को) गुरू ने उसके दर्शन करवा दिए; (उसके अंदर) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की बरखा होने लग जाती है। (उसका) मन संतोखी हो जाता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में सुरति जोड़े रखता है। हे भाई ! (जैसे पानी के साथ खेती हरी हो जाती है और। ना सूखती है ना कुम्हलाती है। वैसे ही जिस मनुष्य को गुरू ने परमात्मा के दर्शन करवा दिया। उसकी जिंद) परमात्मा के नाम (-जल) की बरकति से सदा हरी-भरी (आत्मिक जीवन वाली) रहती हैं। ना कभी सूखती है। (और ना ही कभी आत्मिक मौत सहेड़ती है) ना कभी कुम्हलाती है (ना कभी डोलती है)। 4।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मलार महला 3 असटपदीआ घरु 1 ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जब परमात्मा की मेहर होती है तब गुरू मिलता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।