गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! परमात्मा अपनी स्मर्था से) स्वयं ही माया के प्रभाव से बहुत ऊँचा है। जिस किसी (भाग्यशाली मनुष्य) को (अपनी ये स्मर्था) परमात्मा स्वयं दिखाता है वह खुद देख लेता है (कि प्रभू बहुत शक्तिशाली है)। हे नानक ! (परमात्मा की अपनी ही मेहर से किसी भाग्यशाली मनुष्य के) हृदय में उसका नाम बसता है (उस मनुष्य में प्रगट हो के प्रभू खुद ही अपने स्वरूप का) दर्शन करके (औरों को) दर्शन कराता है। 8। 26। 27।
माझ महला 3 ॥ मेरा प्रभु भरपूरि रहिआ सभ थाई ॥ गुर परसादी घर ही महि पाई ॥ सदा सरेवी इक मनि धिआई गुरमुखि सचि समावणिआ ॥1॥ हउ वारी जीउ वारी जगजीवनु मंनि वसावणिआ ॥ हरि जगजीवनु निरभउ दाता गुरमति सहजि समावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥ घर महि धरती धउलु पाताला ॥ घर ही महि प्रीतमु सदा है बाला ॥ सदा अनंदि रहै सुखदाता गुरमति सहजि समावणिआ ॥2॥ काइआ अंदरि हउमै मेरा ॥ जंमण मरणु न चूकै फेरा ॥ गुरमुखि होवै सु हउमै मारे सचो सचु धिआवणिआ ॥3॥ काइआ अंदरि पापु पुंनु दुइ भाई ॥ दुही मिलि कै स्रिसटि उपाई ॥ दोवै मारि जाइ इकतु घरि आवै गुरमति सहजि समावणिआ ॥4॥ घर ही माहि दूजै भाइ अनेरा ॥ चानणु होवै छोडै हउमै मेरा ॥ परगटु सबदु है सुखदाता अनदिनु नामु धिआवणिआ ॥5॥ अंतरि जोति परगटु पासारा ॥ गुर साखी मिटिआ अंधिआरा ॥ कमलु बिगासि सदा सुखु पाइआ जोती जोति मिलावणिआ ॥6॥ अंदरि महल रतनी भरे भंडारा ॥ गुरमुखि पाए नामु अपारा ॥ गुरमुखि वणजे सदा वापारी लाहा नामु सद पावणिआ ॥7॥ आपे वथु राखै आपे देइ ॥ गुरमुखि वणजहि केई केइ ॥ नानक जिसु नदरि करे सो पाए करि किरपा मंनि वसावणिआ ॥8॥27॥28॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (हे भाई !) मेरा प्रभू सब जगहों पर पूर्ण तौर पे मौजूद है। गुरू की कृपा से मैंने उसे अपने हृदय घर में ही ढूँढ लिया है। मैं अब सदा उसे सिमरता हूँ। सदा एकाग्रचित्त हो के उसका ध्यान धरता हूँ। जो भी मनुष्य गुरू का आसरा परना लेता है, वह सदा स्थिर परमात्मा में लीन रहता है। 1। (हे भाई !) मैं उन लोगों से सदा कुर्बान जाता हूँ जो जगत की जिंदगी के आसरे परमात्मा को अपने मन में बसाते हैं। परमात्मा जगत को जिंदगी देने वाला है। जो मनुष्य गुरू की मति ले कर उसे अपने मन में बसाता है वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 1। रहाउ। जो परमात्मा धरती व पाताल का आसरा है, वह मनुष्य के हृदय में (भी) बसता है। वह प्रीतम प्रभू सदा जवान रहने वाला है वह हरेक हृदय में ही बसता है। जो मनुष्य गुरू की मति ले के उस सुखदाते प्रभू को सिमरता है, वह सदा आत्मिक आनंद में रहता है। वह आत्मिक अडोलता में समाया रहता है। 2। पर, जिस मनुष्य के शरीर में अहम् प्रबल है, ममता प्रबल है, उस मनुष्य का जनम मरण रूपी चक्र खत्म नहीं होता। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह (अपने अंदर से) अहंकार को मार लेता है, और वह सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को ही सिमरता है। 3। (अहंकार के प्रभाव तहत रहने वाले मनुष्य के) शरीर में (अहंम् से उत्पन्न हुए हुए) दोनों भ्राता पाप और पुंन बसते हैं। इन दोनों ने ही जगत रचना की है। जो मनुष्य गुरू की मति ले के इन दोनों (के प्रभाव) को मारता है, वह एक ही घर में (प्रभू चरणों में ही) टिक जाता है। वह आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 4। परमात्मा मनुष्य के हृदय-घर में ही बसता है। पर, माया के प्यार के कारण मनुष्य के अंदर माया का अंधकार बना रहता है। जब मनुष्य गुरू की शरण ले के (अपने अंदर से) अहम् और ममता को दूर करता है, तब (इसके अंदर परमात्मा की ज्योति का आत्मिक) प्रकाश हो जाता है। आत्मिक आनंद देने वाली परमात्मा की सिफत सालाह (इसके अंदर) उघड़ पड़ती है, और ये हर वक्त प्रभू का नाम सिमरता है। 5। जिस प्रभू ज्योति ने सारा जगत पसारा पसारा है, गुरू की शिक्षा से वह जिस मनुष्य के अंदर प्रगट हो जाती है, उसके अंदर से अज्ञानता का अंधकार मिट जाता है। उसका हृदय कमल पुष्प की तरह खिल जाता है। वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में मिली रहती है। 6। मनुष्य के शरीर में (परमात्मा के गुण रूपी) रत्नों के खजाने भरे पड़े हैं (पर, ये उस मनुष्य को ही प्राप्त होते हैं) जो गुरू की शरण पड़ के बेअंत प्रभू का नाम प्राप्त करता है। गुरू के शरण पड़ने वाला मनुष्य (प्रभू नाम का) व्यापारी (बन के आत्मिक गुणों के रत्नों का) व्यापार करता है और सदा प्रभू नाम की कमाई करता है। 7। (पर, जीवों के बस की बात नहीं) परमात्मा स्वयं ही जीवों के अंदर अपना नाम पदार्थ टिकाता है, परमात्मा स्वयं ही (ये दाति) जीवों को देता है। गुरू की शरण पड़ के अनेकों (भाग्यशाली) मनुष्य नाम निधि का सौदा करते हैं। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की नजर करता है, वह प्रभू का नाम प्राप्त करता है। प्रभू अपनी कृपा करके अपना नाम उसके मन में बसाता है। 8। 27। 28।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ परमात्मा स्वयं ही (जीवों को अपने चरणों में) जोड़ता है। (अपनी) सेवा भक्ति करवाता है। (जिस मनुष्य को प्रभू) गुरू के शबद में (जोड़ता है, उसके अंदर से) माया का प्यार दूर हो जाता है। परमात्मा (स्वयं) सदा पवित्र स्वरूप है, (सब जीवों को अपने) गुण देने वाला है। परमात्मा स्वयं (अपने) गुणों में (जीव को) लीन करता है। 1। मैं उन मनुष्यों से सदा सदके जाता हूँ, जो सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को अपने हृदय में बसाते हैं। परमात्मा का सदा कायम रहने वाला नाम सदा पवित्र है। (भाग्यशाली मनुष्य) गुरू के शबद द्वारा (इस नाम को अपने) मन में बसाते हैं। 1। रहाउ। परमात्मा स्वयं ही गुरू (रूप) है। स्वयंही दातें देने वाला है, स्वयं ही (जीव को उस के किए) कर्म अनुसार पैदा करने वाला है। प्रभू के सेवक गुरू की शरण पड़ के उसकी सेवा भक्ति करते हैं, और उससे गहरी सांझ डालते हैं। आत्मिक जीवन देने वाले हरी नाम में जुड़ के सेवक जन अपना जीवन सुहाना बनाते हैं गुरू की मति पर चल के परमात्मा के मिलाप का आनंद लेते हैं। 2। उसके इस शरीर-गुफा में परमात्मा प्रगट हो गया और उस का हृदय सुंदर बन गया। (जिस मनुष्य के हृदय में से) पूरे गुरू ने अहम् को दूर कर दिया, भटकना समाप्त कर दी। (भाग्यशाली मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर) हर वक्त परमात्मा का नाम सालाहते हैं, उसके प्रेम रंग में रंगे रहते हैं, गुरू की कृपा से उसका मिलाप प्राप्त करते हैं। 3।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! परमात्मा अपनी स्मर्था से) स्वयं ही माया के प्रभाव से बहुत ऊँचा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।