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अंग १०५० · मारू

अंग
1050
मारू
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  1. गुरमुखि गिआनु एको है जाता अनदिनु नामु रवीजै हे ॥13॥
  2. सचै सचा तखतु रचाइआ ॥

गुरमुखि गिआनु एको है जाता अनदिनु नामु रवीजै हे ॥13॥

अंग १०४९ से चला आ रहा अंश

गुरमुखि गिआनु एको है जाता अनदिनु नामु रवीजै हे ॥13॥
बेद पड़हि हरि नामु न बूझहि ॥
माइआ कारणि पड़ि पड़ि लूझहि ॥
अंतरि मैलु अगिआनी अंधा किउ करि दुतरु तरीजै हे ॥14॥
बेद बाद सभि आखि वखाणहि ॥
न अंतरु भीजै न सबदु पछाणहि ॥
पुंनु पापु सभु बेदि द्रिड़ाइआ गुरमुखि अंम्रितु पीजै हे ॥15॥
आपे साचा एको सोई ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
नानक नामि रते मनु साचा सचो सचु रवीजै हे ॥16॥6॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह सिर्फ यही आत्मिक जीवन की सूझ हासिल करता है कि हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। 13। हे भाई ! (पंण्डित लोग) वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ते हैं। (पर अगर वे) परमात्मा के नाम को (जीवन का मनोरथ) नहीं समझते। तो वे माया (कमाने) के लिए ही (वेदा आदि धर्म-पुस्तकों को) पढ़-पढ़ के (माया के कम चढ़ावे को देख कर अंदर-अंदर से ही) खिझते रहते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर (माया के मोह की) मैल है (वह वेद-पाठी पंडित भी हो। तो भी) वह अंधा बेसमझ है। इस तरह यह दुश्तर संसार-समुंद्र तैरा नहीं जा सकता। 14। हे भाई ! सारे (पण्डित लोक) वेद (आदि धम्र पुस्तकों) की चर्चा उचार के (औरों के सामने) व्याख्या करते हैं। (इस तरह) ना (उनका अपना) हृदय भीगता है। ना ही वे सिफत सालाह की बाणी की कद्र समझते हैं। हे भाई ! वेदों ने बार-बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि कौन सा पुन्य कर्म है और कौन सा 'पाप कर्म' है। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल तो गुरू के शरण पड़ कर ही पीया जा सकता है। 15। हे भाई ! (अपने जैसा) सिर्फ वह परमत्मा स्वयं ही है जो सदा कायम रहने है। उसके बिना (उस जैसा) है उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे गए हैं। उनका मन अडोल हो जाता है। (इस वासते। हे भाई !) सदा कायम रहने वाले परमात्मा को ही सिमरना चाहिए। 16। 6।

सचै सचा तखतु रचाइआ ॥

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मारू महला 3 ॥
सचै सचा तखतु रचाइआ ॥
निज घरि वसिआ तिथै मोहु न माइआ ॥
सद ही साचु वसिआ घट अंतरि गुरमुखि करणी सारी हे ॥1॥
सचा सउदा सचु वापारा ॥
न तिथै भरमु न दूजा पसारा ॥
सचा धनु खटिआ कदे तोटि न आवै बूझै को वीचारी हे ॥2॥
सचै लाए से जन लागे ॥
अंतरि सबदु मसतकि वडभागे ॥
सचै सबदि सदा गुण गावहि सबदि रते वीचारी हे ॥3॥
सचो सचा सचु सालाही ॥
एको वेखा दूजा नाही ॥
गुरमति ऊचो ऊची पउड़ी गिआनि रतनि हउमै मारी हे ॥4॥
माइआ मोहु सबदि जलाइआ ॥
सचु मनि वसिआ जा तुधु भाइआ ॥
सचे की सभ सची करणी हउमै तिखा निवारी हे ॥5॥
माइआ मोहु सभु आपे कीना ॥
गुरमुखि विरलै किन ही चीना ॥
गुरमुखि होवै सु सचु कमावै साची करणी सारी हे ॥6॥
कार कमाई जो मेरे प्रभ भाई ॥
हउमै त्रिसना सबदि बुझाई ॥
गुरमति सद ही अंतरु सीतलु हउमै मारि निवारी हे ॥7॥
सचि लगे तिन सभु किछु भावै ॥
सचै सबदे सचि सुहावै ॥
ऐथै साचे से दरि साचे नदरी नदरि सवारी हे ॥8॥
बिनु साचे जो दूजै लाइआ ॥
माइआ मोह दुख सबाइआ ॥
बिनु गुर दुखु सुखु जापै नाही माइआ मोह दुखु भारी हे ॥9॥
साचा सबदु जिना मनि भाइआ ॥
पूरबि लिखिआ तिनी कमाइआ ॥
सचो सेवहि सचु धिआवहि सचि रते वीचारी हे ॥10॥
गुर की सेवा मीठी लागी ॥
अनदिनु सूख सहज समाधी ॥
हरि हरि करतिआ मनु निरमलु होआ गुर की सेव पिआरी हे ॥11॥
से जन सुखीए सतिगुरि सचे लाए ॥
आपे भाणे आपि मिलाए ॥
सतिगुरि राखे से जन उबरे होर माइआ मोह खुआरी हे ॥12॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने (अपने 'निज घर' में बैठने के लिए) सदा कायम रहने वाला तख्त बना रखा है। उस स्वै-स्वरूप में वह अडोल बैठा है। वहाँ माया का मोह असर नहीं कर सकता। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य (हरी-नाम जपने का) श्रेष्ठ करने-योग्य कर्म करता है। उसके हृदय में वह सदा-स्थिर प्रभू हमेशा के लिए आ बसता है। 1। हे भाई ! नाम-धन कमाना ही सदा-स्थिर सौदा है सदा-स्थिर व्यापार है। उस सौदे-व्यापार में कोई भटकना नहीं। कोई माया का पसारा नहीं। यह सदा-स्थिर नाम-धन कमाने से कभी घाटा नहीं पड़ता। पर इस बात को कोई विरला विचारवान ही समझता है। 2। हे भाई ! (इस नाम-धन के व्यापार में) वही मनुष्य लगते हैं। जिनको सदा-स्थिर परमात्मा ने स्वयं लगाया है। उनके हृदय में गुरू का शबद बसता है। उनके माथे पर अच्छे भाग्य जाग उठते हैं। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह के शबद से सदा हरी-गुण गाते रहते हैं। वह मनुष्य गुरू-शबद (के रंग) में रंगे रहते हैं। वह उच्च विचार के मालिक बन जाते हैं। 3। हे भाई ! मैं तो सदा उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की ही सिफत-सालाह करता हूँ। मैं तो (हर जगह) सिर्फ उस परमात्मा को ही देखता हूँ। (मुझे उसके बिना) कोई और नहीं (दिखाई देता)। हे भाई ! गुरू की मति पर चल कर (परमात्मा की सिफत-सालाह करनी - यह ही परमात्मा के चरणों तक पहुँचने के लिए) सबसे ऊँची सीढ़ी है। इस श्रेष्ठ ज्ञान की बरकति से मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार मार खत्म कर देता है। 4। हे प्रभू ! जिस मनुष्य ने गुरू के शबद की बरकति से (अपने अंदर से) माया का मोह जला डाला। जब वह मनुष्य आपको अच्छा लग पड़ा तब आपका सदा-स्थिर नाम उस के मन में बस गया। हे भाई ! जिस मनुष्य ने (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लिया। माया की तृष्णा दूर कर ली। उसको अभूल परमात्मा की सारी कार अभूल प्रतीत होने लग गई। 5। हे भाई ! माया का सारा मोह परमात्मा ने स्वयं ही पैदा किया है। पर ये बात किसी उस विरले ने ही पहचानी है जो गुरू के सन्मुख रहता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ जाता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के नाम सिमरन की कमाई करता है। उसको नाम-सिमरन वाली कार ही श्रेष्ठ लगती है। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य ने वह कार करनी आरम्भ कर दी जो मेरे प्रभू को पसंद आती है (जिस मनुष्य ने प्रभू की रजा में चलना आरम्भ कर दिया)। जिसने गुरू के शबद द्वारा (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लिया। माया की तृष्णा मिटा ली। गुरू की मति पर चल कर उसका हृदय सदा ही शांत रहता है। 7। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में जुड़ते हैं। उनको परमात्मा का किया हुआ हरेक काम भला प्रतीत होता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी से सदा-स्थिर प्रभू में टिक के मनुष्य अपना जीवन सुंदर बना लेता है। (सिमरन की बरकति से जो मनुष्य) इस लोक में सुर्खरू हो जाते हैं। वे मनुष्य प्रभू की हजूरी में भी सुर्खरू हो जाते हैं। मेहर की निगाह वाले परमात्मा की मेहर की नज़र उनका जीवन सँवार देती है। 8। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू (के नाम) से टूट कर जो मनुष्य माया के प्यार में मस्त रहता है। उसको माया के मोह के सारे दुख (चिपके रहते हैं)। माया के मोह का बहुत सारा दुख उसको बना रहता है। गुरू की शरण के बिना ये समझ नहीं आती कि दुख कैसे दूर हो और सुख कैसे मिले। 9। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी प्यारी लगने लग जाती है। वही मनुष्य पूर्बले जनम में किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार (नाम सिमरन की) कमाई करते हैं। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सेवा-भक्ति करते हैं। सदा-स्थिर प्रभू को सिमरते हैं। सदा-स्थिर प्रभू के नाम-रंग में रंगे जाते हैं। और ऊँची सूझ वाले हो जाते हैं। 10। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की (बताई) सेवा प्यारी लगती है। वह हर वक्त आत्मिक आनंद पाता है। उसकी आत्मिक अडोलता वाली समाधि बनी रहती है। परमात्मा का नाम जपते उसका मन पवित्र हो जाता है। गुरू की शरण पड़े रहना उसको अच्छा लगता है। 11। हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरू ने सदा-स्थिर प्रभू की याद में जोड़ दिया। वे सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। (ये परमात्मा की अपनी ही मेहर है। प्रभू को) स्वयं ही (ऐसे मनुष्य) अच्छे लगे। और। स्वयं ही उसने (अपने चरणों में) जोड़ लिए। हे भाई ! गुरू ने जिन मनुष्यों की रक्षा की। वे मनुष्य (माया के मोह से) बच गए। बाकी की दुनिया माया के मोह का संताप ही (सारी उम्र) सहती रही। 12।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1050 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०५० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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