दण्डकारण्य के घने वन में एक दिन भगवान शिव अपने वृषभ पर सवार, देवी सती के साथ इस भूतल पर विचरण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे उस वन-भाग में जा पहुँचे जहाँ श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ भटक रहे थे। रावण छल से उनकी प्रिय पत्नी सीता का हरण कर ले गया था, और श्रीराम ‘हा सीते!’ पुकारते, इधर-उधर ताकते, बारंबार आँसू बहाते वन-वन ढूँढ़ रहे थे। सूर्यवंश में जन्मे, दशरथ के उस वीर पुत्र की कान्ति विरह के शोक से फीकी पड़ गयी थी।
उस दीन-से दिखते वनवासी को देखते ही उदारचेता भगवान शंकर का मन आनन्द से भर उठा। उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से श्रीराम को प्रणाम किया, जय-जयकार किया, और फिर दूसरी ओर चल पड़े। भक्तवत्सल शिव ने उस वन में श्रीराम के सामने अपने-आपको प्रकट नहीं किया। पर जो अभी घटा था, उसे देखकर सती के मन में विस्मय की लहर उठ गयी।
सती का संशय
सती बोलीं, “देवदेव! परब्रह्म परमेश्वर! ब्रह्मा और विष्णु आदि सब देवता तो सदा आप ही की सेवा करते हैं; सारे जगत को आप ही का ध्यान करना चाहिए। फिर नाथ, ये दो धनुर्धर पुरुष कौन हैं, जो विरह से व्याकुल और दीन होकर वन में भटक रहे हैं? इनमें जो बड़े हैं, उनका रंग नील कमल-सा श्याम है। उन्हें देखकर आप आनन्द में क्यों डूब गये और किसी भक्त के समान विनम्र क्यों हो उठे? स्वामी, सेव्य स्वामी अपने सेवक को प्रणाम करे, यह तो उचित नहीं जान पड़ता। हमारा यह संशय मिटाइए।”
यह प्रश्न सुनकर लीलाविशारद शंकर हँस पड़े और बोले, “देवी, सुनिए, हम सच कहते हैं, इसमें कोई छल नहीं। वरदान के प्रभाव से ही हमने इन्हें आदर के साथ प्रणाम किया है। ये दो भाई हैं, श्रीराम और लक्ष्मण, सूर्यवंश में प्रकट हुए दशरथ के विद्वान पुत्र। इनमें जो गोरे रंग के छोटे हैं, वे साक्षात शेष के अंश लक्ष्मण हैं; और बड़े भैया श्रीराम हैं। इनके रूप में स्वयं भगवान विष्णु अपने सम्पूर्ण अंश से प्रकट हुए हैं। ये साधुपुरुषों की रक्षा और हम लोगों के कल्याण के लिए इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं।”
ऐसा कहकर शम्भु मौन हो गये। पर शिव की बात सुनकर भी सती के मन में विश्वास न जमा; शिव की माया सचमुच प्रबल है, जो समूची त्रिलोकी को मोह में डाल देती है। सती के मन का संदेह ताड़कर सनातन शम्भु फिर बोले, “देवी, यदि हमारे कहने पर विश्वास नहीं आता, तो आप स्वयं जाकर अपनी बुद्धि से श्रीराम की परीक्षा कर लीजिए। जिस प्रकार आपका यह मोह मिटे, वही कीजिए। तब तक हम इसी वटवृक्ष के नीचे खड़े रहते हैं।”
सीता का रूप
शिव की आज्ञा पाकर सती चल पड़ीं, पर मन-ही-मन सोचती जाती थीं, ‘इस वनचारी राम की परीक्षा हम कैसे लें? अच्छा, हम सीता का रूप धरकर उनके पास जाते हैं। यदि राम सचमुच साक्षात विष्णु होंगे, तो सब जान लेंगे; अन्यथा हमें पहचान न सकेंगे।’ यही विचारकर वे सीता का रूप धारण कर श्रीराम के समीप जा पहुँचीं। सच तो यह कि वे स्वयं मोह में पड़ चुकी थीं।
अपने सामने सीता के रूप में आयी हुई सती को देखते ही शिव-शिव का जप करते हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम सब कुछ जान गये। वे हँसते हुए उन्हें प्रणाम करके बोले, “सतीजी, आपको नमस्कार है। प्रेम से बताइए, भगवान शम्भु कहाँ गये? आप अपने पति के बिना अकेली इस वन में कैसे आ गयीं? और अपना रूप त्यागकर आपने यह नया रूप किसलिए धारण किया है? कृपा करके इसका कारण बताइए।”
श्रीराम की यह बात सुनते ही सती अवाक रह गयीं। शिव के कहे वचन उन्हें स्मरण हो आये, और उनका सत्य समझ में आते ही वे बहुत लज्जित हुईं। श्रीराम को साक्षात विष्णु जानकर उन्होंने अपना असली रूप प्रकट कर दिया, मन-ही-मन शिव के चरणों का ध्यान किया, और प्रसन्न चित्त से बोलीं, “रघुनन्दन! स्वतन्त्र परमेश्वर भगवान शिव अपने पार्षदों के साथ इस वन में आ गये थे। यहाँ आपको सीता की खोज में लगा देखकर उन्होंने आपको प्रणाम किया और आपके वैष्णव रूप की महिमा का गान करते रहे; आपके दर्शन मात्र से वे आनन्द में विभोर हो गये। इसी पर हमारे मन में भ्रम उठ खड़ा हुआ, और हमने उन्हीं की आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की। अब जान गयी कि आप साक्षात विष्णु हैं। पर एक संशय शेष है, राघवेन्द्र, उसे भी मिटा दीजिए: आप भगवान शिव के भी वन्दनीय कैसे हो गये?”
गोलोक की कथा
सती के इस वचन को सुनकर श्रीराम के नेत्र खिले कमल-से प्रफुल्लित हो उठे। उन्होंने मन-ही-मन अपने प्रभु शिव का स्मरण किया, और उनके हृदय में प्रेम का बाढ़ उमड़ आया। आज्ञा न होने के कारण वे सती के साथ शिव के निकट तो नहीं गये, पर मन-ही-मन शिव की महिमा का बखान करते हुए उन्होंने सती से कहना आरम्भ किया।
“देवी, प्राचीन काल की बात है। एक बार भगवान शम्भु ने अपने परात्पर धाम में विश्वकर्मा से अपनी गोशाला में एक रमणीय भवन और श्रेष्ठ सिंहासन बनवाया, इन्द्र आदि देवताओं, मुनियों, वेदों और लोकपालों को बुलवाया, वीणा-मृदंग के साथ महान उत्सव रचा, और राज्याभिषेक की समस्त सामग्री जुटायी। विष्णु की भक्ति से प्रसन्न महेश्वर ने प्रीति भरे हृदय से श्रीहरि को वैकुण्ठ से बुलवाया, शुभ मुहूर्त में उस सिंहासन पर बिठाया, अपने ही हाथों आभूषणों और मुकुट से सजाया, और उनका अभिषेक किया।
“इस प्रकार विष्णु की भक्ति देखकर प्रसन्न शम्भु ने अपनी भक्तपरवशता को सर्वत्र प्रकट करते हुए ब्रह्मा से कहा, ‘आज से हमारी आज्ञा के अनुसार ये विष्णु हरि स्वयं हमारे वन्दनीय हो गये। आप सब देवताओं सहित इन्हें प्रणाम कीजिए, और वेद हमारी ही भाँति इनका वर्णन करें।’ यह कहकर स्वयं रुद्रदेव ने श्रीहरि को प्रणाम किया, फिर ब्रह्मा आदि देवताओं ने भी उनकी वन्दना की। तब महेश्वर ने उन्हें बड़े-बड़े वर दिये, ‘आप हमारी आज्ञा से सम्पूर्ण लोकों के कर्ता, पालक और संहारक हों; समर में कभी पराजित न हों, हमसे भी नहीं। हमसे इच्छा-सिद्धि, लीला-प्रकटन और तीनों लोकों में नित्य स्वतन्त्रता, ये तीन शक्तियाँ ग्रहण कीजिए। आप हमारी बायीं भुजा हैं और विधाता दाहिनी। हमारे चिन्मय धाम में आपका जो परम उज्ज्वल स्थान है, वह गोलोक नाम से विख्यात होगा। भूतल पर आपके जो अवतार होंगे, वे सबके रक्षक और हमारे भक्त होंगे; हम उनका अवश्य दर्शन करेंगे, और वे हमारे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे।’
“इस प्रकार श्रीहरि को अपना अखण्ड ऐश्वर्य सौंपकर शिव कैलास पर अपने पार्षदों के साथ स्वच्छन्द विहार करने लगे। तभी से भगवान लक्ष्मीपति गोप-वेष धारण कर वहाँ आये और गोप-गोपियों तथा गौओं के अधिपति होकर जगत की रक्षा करने लगे। इसी समय शंकर की आज्ञा से श्रीहरि चार भाइयों के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। उनमें सबसे बड़े हम राम हैं, दूसरे भरत, तीसरे लक्ष्मण और चौथे शत्रुघ्न। हम पिता की आज्ञा से सीता और लक्ष्मण के साथ वन आये थे, जहाँ किसी निशाचर ने हमारी पत्नी का हरण कर लिया। मा सती, आपकी कृपा से हमें सीता की प्राप्ति का वर अवश्य मिलेगा; उस पापी राक्षस को मारकर हम उन्हें फिर पा लेंगे। धन्य है वह पुरुष, जिस पर आप दोनों की दया हो।”
इतना कहकर श्रीराम ने सती को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा से वन में विचरने चले गये। शिवभक्त रघुनाथ की यह बात सुनकर सती प्रसन्न तो हुईं, पर अपने किये को याद कर उनका मन शोक से भर गया। उन्होंने भगवान शिव का कहा न माना था और श्रीराम के प्रति कुत्सित बुद्धि कर बैठी थीं। ‘अब शंकर के पास जाकर उन्हें क्या उत्तर देंगे’, यही सोचते-सोचते उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ, और उदास मन लिये वे शिव के पास लौटीं।
शिव का मानसिक त्याग
शिव के समीप पहुँचकर सती ने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया। उनके मुख पर विषाद छाया था, वे शोक से व्याकुल और निस्तेज हो चुकी थीं। सती को दुखी देख भगवान शिव ने उनका कुशल पूछा और प्रेम से कहा, “आपने किस प्रकार परीक्षा ली?” यह सुनकर सती मस्तक झुकाये उनके पास खड़ी रह गयीं; उनका मन शोक और विषाद में डूबा था। तब महेश्वर ने ध्यान लगाकर सती का सारा चरित्र जान लिया, कि उन्होंने अपने वन्दनीय श्रीराम की पत्नी सीता का रूप धरा था। यह जानते ही उन्होंने सती को मन से त्याग दिया। वेदधर्म का पालन करनेवाले शिव ने अपनी पहले की हुई प्रतिज्ञा को टूटने नहीं दिया। सती को मन से त्यागकर वे अपने निवास कैलास की ओर चल पड़े।
मार्ग में दोनों को सुनाती हुई आकाशवाणी हुई, “परमेश्वर! आप धन्य हैं और आपकी यह प्रतिज्ञा भी धन्य है। तीनों लोकों में आप-जैसा महायोगी और महाप्रभु दूसरा कोई नहीं।” यह सुनकर सती की कान्ति फीकी पड़ गयी, और उन्होंने पूछा, “नाथ! हमारे परमेश्वर! आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है? बताइए।” पर हित चाहनेवाले प्रभु ने अपने विवाह के समय विष्णु के सामने की हुई वह प्रतिज्ञा नहीं बतायी। तब सती ने अपने प्राणवल्लभ का ध्यान कर वह सारा कारण स्वयं जान लिया, जिससे उनके प्रियतम ने उन्हें त्याग दिया था। ‘शम्भु ने हमारा त्याग कर दिया’, यह जानकर दक्षकन्या शोक में डूब गयीं और बारंबार सिसकने लगीं।
सती के मनोभाव को ताड़कर भी शिव ने अपनी प्रतिज्ञा गुप्त ही रखी, और दूसरी-दूसरी कथाएँ कहते हुए उन्हें साथ लिये कैलास जा पहुँचे। वहाँ श्रेष्ठ आसन पर बैठकर उन्होंने समाधि लगायी और अपने स्वरूप का ध्यान करने लगे। सती अत्यन्त विषाद लिये उसी धाम में रहती रहीं; इस प्रकार बहुत समय बीत गया। जब महादेव ने समाधि खोली, तो जगदम्बा सती भी आ गयीं और व्यथित हृदय से शिव के चरणों में प्रणाम किया। उदारचेता शम्भु ने उन्हें अपने सामने आसन दिया, बड़े प्रेम से अनेक मनोरम कथाएँ कहीं, और वैसी ही लीला करके सती का शोक तत्काल दूर कर दिया। वे पहले-सी सुखी हो गयीं। फिर भी शिव ने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी।
परमेश्वर शिव के इस चरित्र को कोई आश्चर्य न समझे। मुनिजन शिवा और शिव की कथा ऐसी ही कहते हैं। कुछ लोग इन दोनों में वियोग मानते हैं, पर इनमें वियोग भला कैसे सम्भव है? शिवा और शिव वाणी और अर्थ की भाँति नित्य एक-दूसरे से संयुक्त हैं; इनमें वास्तविक वियोग असम्भव है, ये तो अपनी ही इच्छा से लीला-वियोग रच लेते हैं।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (सती खण्ड)