Author: Rajiv Lulla

  • जीवन का अर्थ, और चार राही

    Reflections · चिंतन

    जीवन का अर्थ, और चार राही

    हर जीवन जिस एक सवाल से मिलता है, और चार जो उसे चार सड़कों पर ले गए

    ज़रा बैठिए, साहब। एक सवाल है जो देर-सबेर हर दरवाज़े पर दस्तक देता है, इस सब का अर्थ क्या है। पहले हम उस सवाल का ढाँचा देखेंगे, और फिर चार राहियों के साथ चलेंगे जिन्होंने इसे चार अलग सड़कों पर ढोया, और एक ही क्षितिज की ओर बढ़े।

    भाग एक · वही एक सवाल

    हर जीवन एक न एक दिन इस सवाल से मिलता है, इस सब का अर्थ क्या है। भारतीय परंपरा इसका एक ढाँचा देती है। चार पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, जीवन के जायज़ लक्ष्य, जिनमें सांसारिक लक्ष्य धर्म के भीतर रह कर माने जाते हैं और मोक्ष आख़िरी लक्ष्य है। चार आश्रम, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास (पैट्रिक ओलिवेल, The Asrama System)। मोक्ष यहाँ का मुख्य उत्तर है, अद्वैत में आत्मा और ब्रह्म का एक होना, और भक्ति में किसी सगुण ईश्वर से प्रेम-भरा मिलन। और गीता की तीन राहें, ज्ञान, कर्म और भक्ति।

    इसके आगे एक चौड़ा मैदान भी है, जिसे यहाँ एक नक़्शे की तरह रखा है, फ़ैसले की तरह नहीं। किसी के लिए उत्तर है उस परम से मिलना या उसकी सेवा। किसी के लिए दुख का थम जाना। किसी के लिए दूसरों के साथ सही रिश्ता और उनका फलना-फूलना। और किसी के लिए अर्थ ख़ुद चुनने और जवाब देने से बनता है, यह अस्तित्ववादी उत्तर है (विक्टर फ़्रैंकल, Man’s Search for Meaning)।

    भाग दो · चार जिन्होंने इसे ढोया

    अब चार शिक्षक, हर एक की एक छोटी कथा, और फिर उसके उत्तर की बनावट। इतिहास की एहतियातें साथ रखते हुए।

    बुद्ध
    सवाल

    दुख क्यों है, और क्या वह मिट सकता है?

    राह

    चार आर्य सत्य, और अष्टांगिक मार्ग

    ईसा
    सवाल

    परमेश्वर क्या माँगता है, जब उसका राज्य पास है?

    राह

    पश्चात्ताप, और ईश्वर तथा पड़ोसी से प्रेम

    कृष्ण
    सवाल

    कर्तव्य, अपनों और मृत्यु के सामने क्या करूँ?

    राह

    अनासक्त कर्म, और देहातीत आत्मा में ठहराव

    गुरु नानक
    सवाल

    उस एक निराकार को कैसे जानूँ?

    राह

    नाम-सिमरन, ईमानदार गृहस्थी, हउमै का गलना

    चार शिक्षक, एक-सा सवाल, चार राहें

    बुद्ध

    राजकुमार ने महल के बाहर चार दृश्य देखे, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, और एक संन्यासी। सवाल उठा, दुख क्यों है, और क्या वह मिट सकता है। उत्तर चार आर्य सत्यों में आया, कि साधारण जीवन में एक बेचैनी है, उसकी जड़ तृष्णा है, उसका थमना हो सकता है, और उस तक अष्टांगिक मार्ग ले जाता है। साथ में प्रतीत्यसमुत्पाद और अनात्म, कि कुछ भी अपने आप अलग नहीं, और कोई स्थिर मैं नहीं। पहला उपदेश धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त है (संयुक्त निकाय 56.11)।

    ईसा

    एक एहतियात पहले। इतिहास की पुनर्रचना उन्हें दूसरे मंदिर-काल के यहूदी समाज में रखती है, एक यहूदी सर्वनाश-भविष्यवक्ता, जिसका सवाल है कि परमेश्वर क्या माँगता है, जब उसका राज्य पास आ रहा है। उत्तर है पश्चात्ताप, ईश्वर और पड़ोसी से प्रेम (मरकुस 12:28-31), उन उलट-फेरों में जो धन्य-वचनों में हैं (मत्ती 5), और एक आख़िरी न्याय में भरोसा। एहतियात यह कि स्रोत वही सुसमाचार हैं, जो दशकों बाद उन समुदायों ने लिखे जो उनकी आराधना करते थे।

    कृष्ण

    एहतियात पहले, कि यह गीता का दैवी वक्ता है, कोई इतिहास में दर्ज शिक्षक नहीं। संकट अर्जुन का है, अपनों, कर्तव्य और मृत्यु के सामने एक नैतिक जड़ता। उत्तर हैं, वह देहातीत आत्मा जो शरीर नहीं है (अध्याय 2), फल की आसक्ति छोड़ कर किया गया कर्म, कर्म-योग (अध्याय 2 और 3), और प्रेम-भरा समर्पण उस विराट रूप के दर्शन के साथ (अध्याय 11)।

    गुरु नानक

    सवाल यह कि उस एक निराकार सत्य को कैसे जानें, और अड़चन है हउमै, वह आत्म-केंद्रित अहं। जपजी और मूल मंत्र के सिर पर इक ओंकार है, यहाँ देवनागरी में, सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु। राह है नाम-सिमरन, यानी नाम का स्मरण, एक ईमानदार गृहस्थ जीवन में जिया हुआ, किरत करो, वंड छको, नाम जपो। और वह वचन कि न कोई हिन्दू है न कोई मुसलमान। एहतियात यह कि जन्मसाखी की जीवन-कथाएँ भक्ति-भाव से लिखी गई हैं (डब्ल्यू. एच. मैक्लाउड)।

    और अंत में

    हर एक उसी एक हालत के किसी चेहरे से मिलता है, कि हम दुख पाते हैं, कि हम मरते हैं, कि हमें बिना पक्के पते के कर्म करना है, कि हम परम से कटा हुआ महसूस करते हैं। बुद्ध इसे तृष्णा मानते हैं, जिसे छोड़ देना है। ईसा इसे एक रिश्ता मानते हैं, जिसे आते न्याय से पहले फिर जोड़ना है। कृष्ण की गीता इसे एक पुकार मानती है, कि देहातीत आत्मा में ठहर कर ठीक कर्म करो। नानक इसे एक अहं मानते हैं, जिसे उस एक में गला देना है। चारों उत्तर सच्चे हैं, और किसी एक सिद्धांत में मिल कर एक नहीं हो जाते।

    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

    चार पुरुषार्थ क्या हैं?

    धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, जीवन के चार जायज़ लक्ष्य। सांसारिक लक्ष्य धर्म के भीतर रह कर, और मोक्ष आख़िरी लक्ष्य।

    क्या इन चारों शिक्षकों का उत्तर एक ही है?

    नहीं। चारों एक ही हालत के किसी चेहरे से मिलते हैं, पर उनके उत्तर अलग हैं, और किसी एक सिद्धांत में घुल कर एक नहीं होते।

    इसमें इतिहास की एहतियात क्यों रखी है?

    क्योंकि कृष्ण गीता के दैवी वक्ता हैं, ईसा के स्रोत बाद के सुसमाचार हैं, और नानक की जीवन-कथाएँ भक्ति-भाव की हैं। इन फ़र्क़ों को साफ़ रखना ज़रूरी है।

    पढ़ने के लिए

    • रूपर्ट गेथिन, The Foundations of Buddhism
    • वालपोल राहुल, What the Buddha Taught
    • ई. पी. सैंडर्स, The Historical Figure of Jesus
    • बार्ट एरमन, Jesus: Apocalyptic Prophet of the New Millennium
    • अंगेलिका मालिनार, The Bhagavadgita
    • रिचर्ड डेविस, The Bhagavad Gita: A Biography
    • डब्ल्यू. एच. मैक्लाउड, Guru Nanak and the Sikh Religion
    • पैट्रिक ओलिवेल, The Asrama System
    • विक्टर फ़्रैंकल, Man’s Search for Meaning

    जो तंत्र में सोचता है, उसके लिए इस पन्ने का काम यह है। एक ही हालत को चार तरह से नाम दिया जा सकता है, तृष्णा, टूटा रिश्ता, जड़ता, या अहं, और हर नाम अपनी एक राह खोलता है। इन्हें एक में मिलाने की जल्दी मत कीजिए। चारों को अलग-अलग, पूरे आदर के साथ, अपनी-अपनी जगह रहने दीजिए।

  • विष्णु सहस्रनाम

    ॥ श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
    भीष्म-पितामह ने युधिष्ठिर को सुनाई। महर्षि वेद-व्यास के महाभारत में संगृहीत।

    अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

    विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
    भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥

    विश्व-रूप, विष्णु, वषट्कार, भूत-भव्य-भविष्य के प्रभु, भूतों के निर्माता, भूतों के पालक, सबके आत्मा।

    विष्णु सहस्रनाम, पहले आठ नाम

    ↓ सरल संस्कृत पाठ (PDF · 588 KB)

    विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र, यानी “भगवान विष्णु के एक हज़ार नाम।”

    यह महाभारत के अनुशासन-पर्व का, एक सौ उनचासवें अध्याय का अंश है। कुरुक्षेत्र का संग्राम समाप्त हो चुका था। भीष्म पितामह बाण-शय्या पर पड़े थे, महीनों से, उत्तरायण की प्रतीक्षा में, क्योंकि इच्छा-मृत्यु का वर उन्हें प्राप्त था। युधिष्ठिर का मन इतने संहार के बाद शोक और संदेह से भारी था।

    उसी अवसर पर भीष्मजी ने अपने पौत्र को एक हज़ार नामों का यह उपहार दिया, एक ही ईश्वर के। युधिष्ठिर के प्रश्नों का उत्तर एक सूत्र में आता है, कि वसुदेव-नंदन ही सबसे ऊँचे हैं, और उनकी स्तुति ही सबसे बड़ा धर्म है।

    आदि शंकराचार्य ने इस पर भाष्य रचा। आज भी यह स्तोत्र घरों और मंदिरों में, प्रातः-संध्या गूँजता है।

    नीचे न्यास, ध्यान, फिर एक सौ आठ नाम-श्लोक, और अंत में फलश्रुति तथा उत्तर-पीठिका है। हर श्लोक-समूह से पहले उसका भाव सरल हिन्दी में पिरो दिया है, ताकि नाम केवल पढ़े न जाएँ, अनुभव में उतरें।

    पूर्व-पीठिका

    युधिष्ठिर का प्रश्न और भीष्म का उत्तर

    पाठ का आरंभ मंगल-ध्यान से होता है। सफ़ेद वस्त्र, चाँद-सा वर्ण, चार भुजाएँ, प्रसन्न मुख, ऐसे विष्णु को मन में बसाकर साधक पहले विघ्नों की शांति माँगता है, फिर गणेशजी सहित जिन सैकड़ों पार्षदों के स्वामी विष्वक्सेन हैं उनकी शरण लेता है।

    शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ 1 ॥
    यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परश्शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ 2 ॥

    इसके बाद वंदना उन महर्षि व्यास की है जिन्होंने यह स्तोत्र महाभारत में संगृहीत किया। वसिष्ठ के पौत्र, शक्ति के पुत्र, पराशर के पुत्र, शुकदेव के पिता, निष्पाप तपोनिधि व्यास को विष्णु का ही रूप मानकर बार-बार नमन किया जाता है, क्योंकि व्यास-रूप और विष्णु-रूप में कोई भेद नहीं।

    व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ 3 ॥
    व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 4 ॥

    फिर स्वयं विष्णु का स्वरूप-स्मरण है। विकार-रहित, शुद्ध, नित्य, सदा एकरूप वह परमात्मा जिनके स्मरण-मात्र से जन्म-मृत्यु का बंधन कट जाता है, उन्हीं सर्व-व्यापी, सर्व-विजयी प्रभु को प्रणाम करके भूमिका पूरी होती है।

    अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ 5 ॥
    यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 6 ॥

    अब कथा का सूत्र खुलता है। वैशम्पायन बताते हैं कि सारे धर्मों और पवित्र कथाओं को सुन चुकने पर भी युधिष्ठिर का मन शांत नहीं हुआ था, और उन्होंने शांतनु-पुत्र भीष्म से फिर वही मूल प्रश्न पूछे, इस लोक में एक ही देवता कौन है, एक ही परम आश्रय कौन, किसकी स्तुति से मनुष्य श्रेष्ठ फल पाता है, सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म कौन-सा है, और किसका जप जन्म-मरण से छुड़ा देता है।

    श्रीवैशम्पायन उवाच । श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ 7 ॥
    युधिष्ठिर उवाच । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ 8 ॥
    को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ 9 ॥

    भीष्म का उत्तर सीधा है। जगत के प्रभु, देवों के देव, अनंत पुरुषोत्तम के सहस्र-नामों की स्तुति करने वाला मनुष्य सदा जाग्रत रहता है। उसी अविनाशी पुरुष की भक्ति-पूर्वक पूजा, ध्यान और नमन करते हुए, अनादि-अनंत विष्णु की नित्य स्तुति करने वाला सब दुखों से पार उतर जाता है।

    श्री भीष्म उवाच । जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ 10 ॥
    On a bed of arrows, Bhishma teaches the thousand names
    भीष्म-युधिष्ठिर संवाद
    तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ 11 ॥
    अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ 12 ॥

    भीष्म उन्हीं की महिमा गिनाते हैं। वे ब्राह्मण-प्रिय हैं, सर्व-धर्म के ज्ञाता, लोकों की कीर्ति बढ़ाने वाले, सब प्राणियों के जन्म-स्थान। यही भीष्म का निश्चय है कि सब धर्मों का सर्वोत्तम धर्म यही है, कि मनुष्य भक्ति से कमल-नयन श्रीहरि की स्तुति-स्तोत्रों से नित्य अर्चना करे।

    ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ 13 ॥
    एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ 14 ॥

    फिर वे उस परम तत्त्व की ओर संकेत करते हैं। जो परम तेज है, परम तप, परम ब्रह्म, अंतिम आश्रय; जो पवित्रों का भी पवित्र और मंगलों का भी मंगल है, देवों का भी देवता, सब प्राणियों का अव्यय पिता; जिनसे युग के आरंभ में सब प्राणी जन्म लेते हैं और युग के अंत में जिनमें लौट जाते हैं। उन्हीं जगन्नाथ विष्णु के पाप-भय-नाशक सहस्र-नाम सुनने को भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं।

    परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ 15 ॥
    पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ 16 ॥
    यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ 17 ॥
    तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ 18 ॥

    ये नाम कल्पित नहीं हैं। ऋषियों के गाए हुए ये गुण-वाचक नाम हैं, जो विष्णु के किसी-न-किसी गुण या लीला से उपजे हैं। इस सहस्रनाम के ऋषि स्वयं वेदव्यास हैं, छन्द अनुष्टुप् है, और देवता देवकी-पुत्र श्रीकृष्ण। बीज, शक्ति और हृदय-मंत्र निर्दिष्ट करके भीष्म कहते हैं कि यह पाठ मन की शांति के लिए किया जाता है, और अंत में विष्णु, जिष्णु, महाविष्णु, प्रभविष्णु, पुरुषोत्तम को नमन करते हैं।

    यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ 19 ॥
    ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः । छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ 20 ॥
    अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ 21 ॥
    विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् । अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ 22 ॥

    न्यास

    ऋषि, छन्द और देवता का संकल्प

    पाठ से पहले न्यास का संकल्प होता है। साधक ऋषि, छन्द और देवता का स्मरण करता है, और बीज, शक्ति, कीलक, अस्त्र, नेत्र, कवच तथा दिग्बंध के रूप में स्तोत्र के ही कुछ नामों को अपने अंगों पर स्थापित करता है। यह सारा विनियोग श्री महाविष्णु की प्रीति के लिए है।

    अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्र महामन्त्रस्य श्री वेदव्यासो भगवानृषिः अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता, अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्, देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः, उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः, शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्, शार्‍ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्, रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्, त्रिसामा सामगस्सामेति कवचम्, आनन्दं परब्रह्मेति योनिः, ऋतुस्सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः, श्री विश्वरूप इति ध्यानम्, श्रीमहाविष्णु प्रीत्यर्थे सहस्रनाम जपे विनियोगः ॥

    ध्यानम्

    ध्यान-श्लोक

    अब ध्यान का अवसर है, जहाँ शब्द से पहले रूप मन में उतरता है। पहला चित्र क्षीर-सागर का है, रत्न-जड़ी रेती, मोतियों का आसन, ऊपर मेघों से अमृत की वर्षा, और शंख-चक्र-गदा-कमल लिए आनंद-स्वरूप मुकुन्द।

    ध्यानम् । क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां मालाक्लुप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः । शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षै- -रानन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ 1 ॥
    Vishnu reclining on the serpent Shesha
    शेषशायी नारायण

    दूसरा ध्यान विश्वरूप का है। जिनके चरण पृथ्वी, नाभि आकाश, श्वास वायु, नेत्र सूर्य-चंद्र, कान दिशाएँ, सिर स्वर्ग और मुख अग्नि है, जिनके भीतर सारा विश्व अपने देव-मनुष्य-नाग-गन्धर्व सहित बसा है, वही त्रिभुवन-शरीर विष्णु ध्यान के विषय बनते हैं।

    भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावासाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः । अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ 2 ॥
    All the worlds within one body
    विश्वरूप दर्शन

    फिर वह सबसे प्रसिद्ध रूप आता है, जो घर-घर में गाया जाता है। शांत-स्वरूप, शेष-शय्या पर लेटे, कमल-नाभि, मेघ-वर्ण, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के हृदय में ही अनुभव में आने वाले, भव-भय हरने वाले सर्व-लोक-नाथ विष्णु। आगे के ध्यान-श्लोक उसी रूप को और सजाते हैं, मेघश्याम पीताम्बरधारी, श्रीवत्स और कौस्तुभ से दीप्त, शंख-चक्र-मुकुट-कुंडल से मंडित, और अंत में पारिजात की छाया में रुक्मिणी-सत्यभामा सहित विराजमान कृष्ण-रूप।

    शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाकारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ 3 ॥
    मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् । पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ 4 ॥
    नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 5 ॥
    सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षःस्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ 6 ॥
    छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलङ्कृतम् । चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ 7 ॥

    सहस्रनाम

    एक सौ आठ श्लोक · विष्णु के एक हज़ार नाम

    अब वह सहस्र-धारा बहती है। पहला ही नाम सब कुछ कह देता है, यह सारा विश्व विष्णु से अभिन्न है, वही भूत-वर्तमान-भविष्य के प्रभु, वही सृष्टि, वही पालन, वही सबकी अंतरात्मा। आगे के नाम इसी एक सत्य को अनेक कोणों से खोलते हैं, पूतात्मा, परमात्मा, मुक्तों की परम गति, अविनाशी, सबके साक्षी, क्षेत्र को जानने वाले अक्षर।

    विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1॥
    Devas and asuras churn the cosmic ocean using Mount Mandara and the serpent Vasuki
    समुद्र मन्थन

    विश्वम्शंकराचार्य के अनुसार “विश्” धातु से बना यह नाम कहता है कि सारा विश्व जिनसे प्रकट होकर जिनमें ही स्थित है, और प्रलय में जिनमें लौट जाता है, वही विष्णु इस विश्व-रूप से अभिन्न हैं। पहला ही नाम कारण और कार्य की एकता की ओर संकेत करता है, जैसे मिट्टी से बने घड़े का आकार मिट्टी से भिन्न नहीं।

    पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ 2॥
    योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3॥
    Neither man nor beast, neither day nor night
    नरसिंह

    नारायण“नार” का अर्थ है जल अथवा समस्त जीव-समूह, और “अयन” का अर्थ है निवास तथा आश्रय। नारायण वे हैं जो समस्त प्राणियों के अयन हैं, और जिनका अयन भी वे ही जल हैं। प्रलय की एकार्णव-दशा में शेष-शय्या पर शयन करते हुए नारायण का यही रूप दिखाया जाता है।

    यहाँ नाम सृष्टि, स्थिति और संहार, तीनों को एक ही हाथ में रख देते हैं। सर्व, शिव, स्थाणु, सम्भव, भर्ता, स्वयम्भू, धाता, विधाता; जो स्वयं प्रकट होते हैं और जिनसे सब रचा जाता है। हृषीकेश इन्द्रियों के स्वामी हैं, पद्मनाभ की नाभि-कमल से सृष्टि उपजती है, और माधव-मधुसूदन लक्ष्मी-पति होकर भी असुर-संहारक हैं।

    सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4॥
    स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5॥
    अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6॥
    अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7॥
    ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8॥

    अगली लहर पराक्रम और ज्ञान की है। ईश्वर, विक्रमी, धन्वी, मेधावी, अनुत्तम, दुराधर्ष; जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं और जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता। साथ ही कृतज्ञ, जो जीवों के सब कर्मों को जानते हैं, और आत्मवान्, जो अपनी ही महिमा में स्थित हैं। इन्हीं के बीच शरण, शर्म, अच्युत जैसे कोमल नाम भी आते हैं, जो शक्ति के साथ करुणा को जोड़ते हैं।

    ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ 9॥

    यज्ञ-वाचक नामयज्ञ-कर्ता, यज्ञ-भोक्ता, यज्ञ-अंग, यज्ञ-साधन, यज्ञ-पालक, सहस्रनाम में यज्ञ से जुड़े अनेक नाम बार-बार आते हैं। शंकराचार्य इनका अर्थ यही करते हैं कि यज्ञ का अधिष्ठाता, उसका विधान, उसका फल और स्वयं यज्ञ-स्वरूप, सब विष्णु ही हैं। गीता में भी कहा गया है कि यज्ञ ब्रह्म से उपजा और ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित है।

    सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10॥
    अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः । वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ 11॥
    वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12॥

    यहाँ काल स्वयं प्रभु के हाथ में घूमता है। ऋतु, सुदर्शन, काल; जो सबकी गणना और संहार करते हैं, पर स्वयं काल से परे हैं। विस्तार, बीजमव्ययम्, महाकोश, महाधन; अविनाशी बीज जिससे सृष्टि उपजती है और अनंत ऐश्वर्य जिसके वे स्वामी हैं।

    रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13॥

    सुदर्शन-चक्रविष्णु के कर में घूमता सुदर्शन-चक्र उनकी संहार-शक्ति का प्रतीक है, और परंपरा इसे काल का स्वरूप मानती है। सहस्रनाम में आगे “ऋतुः सुदर्शनः कालः” आता है, अर्थात् ऋतु, सुदर्शन और काल, ये भी विष्णु के ही नाम हैं। जो काल-चक्र से परे है, वही विष्णु है।

    Time itself spinning in the Lord's hand
    सुदर्शन चक्र
    सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ 14॥
    लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15॥
    भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16॥
    उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17॥
    वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः । अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18॥

    फिर “महा” शब्द बार-बार गूँजता है, मानो हर गुण अपनी अंतिम सीमा तक खिंच गया हो। महाबुद्धि, महावीर्य, महाशक्ति, महाद्युति; जिनका रूप “ऐसा है” कहकर बताया नहीं जा सकता, और जो मन्दराचल और गोवर्धन तक उठा लेते हैं। श्रीनिवास, सतां गति, सुरानन्द, गोविन्द; ऐश्वर्य और आश्रय एक ही नाम-माला में पिरोए हुए हैं।

    महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19॥
    महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20॥
    The cowherd who plays the flute of awakening
    गोविन्द

    अनादि-निधनजिनका न आदि है न अंत, ऐसे विष्णु को सहस्रनाम बार-बार स्मरण कराता है। न जन्म, न मृत्यु, न क्षय। जो सृष्टि के आरंभ से पूर्व था और प्रलय के पश्चात् भी रहेगा, वही नित्य सत्य है। शंकराचार्य इसे ही ब्रह्म का अव्यय स्वरूप कहते हैं।

    यहाँ अवतारों और रूपों की झलकें आती हैं। हंस, सुपर्ण, शेष-रूप भुजगोत्तम, हिरण्यनाभ; अमृत्यु जिनकी मृत्यु नहीं, सिंह जो पापों का संहार करते हैं, गुरु जो ब्रह्मा को भी ज्ञान देते हैं। निमिष और अनिमिष साथ-साथ हैं, योग-निद्रा में मुँदे नेत्र और सदा जागती दृष्टि, एक ही प्रभु के दो भाव।

    मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21॥
    अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22॥
    गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23॥
    अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24॥
    आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25॥

    इस लहर में प्रभु का प्रसन्न और कृपालु मुख दिखता है। सुप्रसाद, प्रसन्नात्मा, साधु, सत्कर्ता; जो अपराधियों पर भी सहज प्रसन्न हो जाते हैं। नारायण और नर यहीं आते हैं, जल और समस्त जीवों के अयन, और सबको परम पद तक ले जाने वाले पुरुष। सिद्धार्थ, सिद्धसंकल्प, सिद्धिद, हर संकल्प जिनका पूर्ण होता है।

    सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26॥
    असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ 27॥
    वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28॥

    अब तेज और प्रकाश के नाम जगमगाते हैं। महेन्द्र, वसुद, बृहद्रूप, प्रकाशात्मा, प्रतापन; ओज, तेज और द्युति को धारण करने वाले। अमृतांशूद्भव में समुद्र-मंथन की स्मृति है, जिससे अमृत-किरण वाला चंद्र निकला; और जगतः सेतु वह पुल है जो संसार-सागर पार करा देता है।

    सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29॥
    ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30॥
    अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31॥

    इस धारा में कामना और काल दोनों प्रभु के अधीन हैं। पवन, पावन, कामहा और कामप्रद एक साथ हैं, जो वासना को मिटाते भी हैं और धर्म-संगत कामना पूरी भी करते हैं। युगादिकृत् और युगावर्त युग-चक्र को घुमाते हैं, और अनन्तजित् सर्वत्र, सदा, सबको जीतते हैं।

    भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32॥
    युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33॥
    इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34॥

    नहुषनहुष एक राजा थे जो इन्द्र-पद पर आसीन हुए, किन्तु गर्व से सप्तर्षियों का अपमान कर बैठे, और शाप पाकर सर्प हो गए। पाण्डवों के वनवास-काल में युधिष्ठिर ने धर्म के प्रश्नों का उत्तर देकर उन्हें इस योनि से मुक्त किया। सहस्रनाम में यह नाम विष्णु की उस व्यापकता को कहता है जिससे जीवों को अपनी ओर खींचा जाता है।

    यहाँ अवतार-कथाएँ नामों में छिप जाती हैं। वासवानुज वामन-रूप में इन्द्र के अनुज हैं; स्कन्दधर, वरद, वासुदेव, आदिदेव, पुरन्दर; अशोक जो शोक हरते हैं, तारण जो पार उतारते हैं। पद्मनाभ और गरुडध्वज के बीच वही एक प्रभु अपने अनेक रूपों में झलकते रहते हैं।

    अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35॥

    अच्युतअच्युत का अर्थ है, जो अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होता, कभी गिरता नहीं। शंकराचार्य कहते हैं कि विष्णु अपनी सत्ता, सामर्थ्य और स्वभाव से कभी अपकर्ष को प्राप्त नहीं होते। यही नाम भगवद्गीता में भी अर्जुन के मुख से आता है।

    स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ 36॥
    The Lord who dwells in all hearts with infinite compassion
    वासुदेव
    अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः । अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37॥
    पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् । महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38॥

    अब नाम संग्राम और यज्ञ की ओर मुड़ते हैं। अतुल, भीम, समितिञ्जय; संग्राम में सदा विजयी। दामोदर का नाम यशोदा की रस्सी की याद दिलाता है, और हेतु वह कारण है जिससे सारा जगत बना। उद्भव, क्षोभण, कारण, कर्ता, विकर्ता; जो प्रकृति को क्षुब्ध कर इस विचित्र सृष्टि को रचते हैं।

    अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39॥
    विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40॥
    Love alone could bind the Lord
    दामोदर
    उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41॥

    दामोदर“दाम” अर्थात् रस्सी, “उदर” अर्थात् पेट। माता यशोदा ने बाल-कृष्ण को ऊखल से बाँधना चाहा, पर हर रस्सी छोटी पड़ती गई। अंत में कृष्ण ने स्वयं को बँधने दिया। शंकराचार्य इस नाम का यह भी अर्थ करते हैं कि “दाम” से अर्थात् इन्द्रिय-संयम और दान से जो जाने जाते हैं, वे दामोदर हैं।

    इस लहर में स्थिरता और राम-तत्त्व प्रकट होते हैं। व्यवस्थान, संस्थान, ध्रुव; जिन पर सारी सृष्टि-व्यवस्था टिकी है। राम वही हैं जिनमें योगी निरंतर रमते हैं, और विराम समस्त गति का अंतिम विश्राम। वैकुण्ठ, प्रणव, अधोक्षज; इन्द्रियों की पकड़ से परे रहकर भी ॐकार-रूप में नमन के योग्य।

    व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42॥
    रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ 43॥
    वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44॥
    ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45॥
    विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46॥

    अब यज्ञ-वाचक नामों की एक पूरी लड़ी आती है। धर्मयूप, महामख, यज्ञ, इज्य, महेज्य, क्रतु, सत्र; यज्ञ का अधिष्ठाता, उसका विधान, उसका फल और स्वयं यज्ञ-स्वरूप, सब एक ही प्रभु हैं। साथ में सर्वदर्शी, विमुक्तात्मा, सर्वज्ञ और उत्तम ज्ञान-स्वरूप, जो बताते हैं कि कर्म और ज्ञान दोनों यहीं मिलते हैं।

    अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ 47॥
    यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48॥

    इस धारा में प्रभु का सौम्य और मित्र-रूप मुखर है। सुमुख, सुखद, सुहृत्, मनोहर; वह सच्चा मित्र जो बिना प्रत्युपकार की आशा के उपकार करता है। फिर स्वापन, स्ववश, व्यापी, नैकात्मा; जो माया से जीवों को सुला भी देते हैं और स्वयं सर्वथा स्वतंत्र रहते हैं। वत्सल, वत्सी, रत्नगर्भ; संतान की तरह सबका पालन करने वाले पिता।

    सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् । मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ 49॥
    स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् । वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50॥

    यहाँ धर्म और सत्-असत् का रहस्य खुलता है। धर्मगुप्, धर्मकृत्, धर्मी; जो धर्म की रक्षा भी करते हैं और स्वयं उसका आचरण भी। सत् और असत्, क्षर और अक्षर, दोनों जोड़े एक ही तत्त्व में समाते हैं। आदिदेव, महादेव, देवेश; देवों के भी देव और इन्द्र तक के गुरु।

    धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् । अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51॥
    गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः । आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52॥
    उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53॥

    इस लहर में कृष्ण और मुकुन्द का रूप उभरता है। सोमप, अमृतप, मुकुन्द, अमितविक्रम; जो अपने ही आनंद-अमृत का पान करते हैं और मुक्ति देते हैं। सत्यसन्ध, दाशार्ह, सात्वतां पति; यादव-वंश के स्वामी, सत्य-प्रतिज्ञ। अनन्तात्मा और महोदधिशय, क्षीर-सागर पर शयन करने वाली वह अनंत आत्मा।

    सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः । विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥ 54॥
    जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः । अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ 55॥

    फिर आनंद और अवतार साथ-साथ आते हैं। आनन्द, नन्दन, नन्द; जो स्वयं आनंद हैं और सबको आनंदित करते हैं। त्रिविक्रम तीन पगों से तीनों लोक नाप लेते हैं; कपिलाचार्य सांख्य के प्रवर्तक हैं; महाशृङ्ग मत्स्य-रूप में वेदों के रक्षक। कृतान्तकृत् काल और मृत्यु का भी अंत कर देते हैं।

    अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः । आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56॥
    महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः । त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश‍ृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57॥

    यहाँ वराह और गुह्य-तत्त्व मिलते हैं। महावराह पृथ्वी का उद्धार करते हैं, गोविन्द गौओं और वेद-वाणी के स्वामी हैं, और चक्रगदाधर सुदर्शन तथा कौमोदकी धारण करते हैं। गुह्य, गभीर, गहन, गुप्त; उपनिषदों में छिपा वह रहस्य जिसमें प्रवेश दुष्कर है। वेधा, अजित, कृष्ण, सङ्कर्षण; प्रलय में सबको अपने में खींच लेने वाले अच्युत।

    महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी । गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ 58॥
    The boar rescues Bhudevi from the cosmic waters
    वराह अवतार

    त्रिविक्रमदानवीर बलि से वामन-रूपी विष्णु ने तीन पग भूमि माँगी। बलि के स्वीकार करते ही वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में पृथ्वी नापी, दूसरे में द्युलोक, और तीसरे पग के लिए बलि ने अपना मस्तक प्रस्तुत कर दिया। तीन पगों से तीनों लोक नापने के कारण वे त्रिविक्रम कहलाते हैं।

    The dwarf asks for three paces and spans the worlds
    त्रिविक्रम · वामन
    वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः । वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59॥

    महा-वराहहिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में डुबो दिया था। विष्णु ने वराह का रूप धारण किया, अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठाकर जल के ऊपर पुनः प्रतिष्ठित किया, और हिरण्याक्ष का संहार किया। यज्ञ-वराह के रूप में यह अवतार पृथ्वी के उद्धार का प्रतीक है।

    Matsya, Vishnu's fish avatar, guides a boat carrying sages and the Vedas through the deluge
    मत्स्य अवतार

    इस धारा में “भगवान्” शब्द अपने पूरे अर्थ में आता है, ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, इन छह भगों से युक्त। वनमाली, हलायुध, आदित्य; बलराम का हल और सूर्य की ज्योति एक ही माला में। सुधन्वा शार्ङ्ग धारण करते हैं, खण्डपरशु परशुराम-रूप हैं, और अयोनिज बिना किसी योनि के स्वयं प्रकट होते हैं।

    भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः । आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60॥

    कृष्णशंकराचार्य “कृष्ण” नाम का अर्थ सत्-चित्-आनंद-स्वरूप करते हैं, क्योंकि “कृष्” सत्ता को और “ण” आनंद को कहता है। एक अन्य व्युत्पत्ति में कृष्ण वे हैं जो भूमि को कर्षण कर समस्त भोग प्रदान करते हैं। श्याम-वर्ण कृष्ण का वही रूप ध्यान में प्रसिद्ध है।

    सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61॥

    अब शांति और औषधि के नाम आते हैं। साम-वेद का गान, निर्वाण, भेषज, भिषक्; गीता का उपदेश देकर संसार-रोग हरने वाला वैद्य। संन्यासकृत्, शम, शान्त, निष्ठा, शान्ति, परायणम्; मन की शांति से लेकर परम विश्राम तक की पूरी सीढ़ी एक ही श्लोक में रखी है। शुभाङ्ग, शान्तिद, गोपति, गोप्ता; जो भक्तों को शांति देते और जगत की रक्षा करते हैं।

    त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ 62॥
    शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63॥

    यहाँ श्री और लक्ष्मी का तेज छा जाता है। श्रीवत्सवक्षा, श्रीवास, श्रीपति, श्रीद, श्रीश, श्रीनिवास, श्रीधर; नाम पर नाम लक्ष्मी के नित्य वास की घोषणा करते हैं। साथ में क्षेमकृत् और शिव, जो भक्तों का योग-क्षेम वहन करते हैं और नित्य कल्याण-स्वरूप हैं।

    अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64॥
    श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65॥

    इस लहर में सौंदर्य और निर्भयता मिलती है। सुंदर नेत्र, सुगठित अंग, छिन्नसंशय जो भक्तों के संशय काट देते हैं। उदीर्ण, शाश्वतस्थिर, विशोक, शोकनाशन; शोक-रहित होकर दूसरों का शोक हरने वाले। अर्चिष्मान्, विशुद्धात्मा, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न; चतुर्व्यूह के वे रूप जिन्हें कोई शत्रु रोक नहीं सकता।

    स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ 66॥
    उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67॥
    अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः । अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ 68॥

    फिर असुर-संहार और नाम-महिमा साथ आते हैं। कालनेमि और केशी का वध, त्रिलोकात्मा और त्रिलोकेश का विस्तार, हरि जो पाप और संसार-दुख हर लेते हैं। कामदेव, कामपाल, धनञ्जय; धर्म-संगत कामनाओं के पालक और अर्जुन-रूप में विजयी। यहाँ ब्रह्म-वाचक नामों की एक सघन लड़ी आती है, ब्रह्मण्य, ब्रह्मकृत्, ब्रह्म, ब्रह्मविद्, ब्रह्मज्ञ; जो बताती है कि तप, वेद और ब्रह्म, सब इन्हीं में हैं।

    कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः । त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69॥
    कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः । अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ 70॥

    केशव और केशि-हासहस्रनाम में “केशव” और “केशिहा”, दोनों नाम अलग-अलग आते हैं। शंकराचार्य के अनुसार केशव वे हैं जिनके केश सुंदर हैं, अथवा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव, इन तीन “क-अ-ईश” रूपों के स्वामी हैं। केशिहा वे हैं जिन्होंने केशी नामक अश्व-रूपी असुर का वध किया, जो कृष्ण-रूप में मथुरा आया था।

    The demon horse meets its match
    केशव · केशि-हा
    ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः । ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71॥

    इस धारा में फिर “महा” गरजता है। महाक्रम, महातेजा, महोरग, महाक्रतु, महायज्ञ, महाहवि; पराक्रम और यज्ञ दोनों अपनी चरम सीमा पर। फिर स्तुति स्वयं नाम बन जाती है, स्तव्य, स्तवप्रिय, स्तोत्र, स्तुति, स्तोता; स्तुति करने वाला, स्तुति का विषय और स्तुति की क्रिया, सब वही। पूर्ण, पुण्य, पुण्यकीर्ति, अनामय; जो स्वयं पूर्ण रहकर सबको पूर्ण करते हैं।

    महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः । महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72॥
    स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः । पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73॥

    अब वासुदेव-तत्त्व पर बल आता है। वासुदेव, वसु, भूतावास, सर्वासुनिलय; सब प्राणियों और प्राणों के निवास-स्थान। सद्गति, सत्ता, यदुश्रेष्ठ, सुयामुन; यमुना-तट पर लीला करने वाले यदु-श्रेष्ठ कृष्ण। दर्पहा और दर्पद साथ हैं, जो अहंकार को तोड़ते हैं और धर्म-निष्ठों को उचित गौरव देते हैं।

    मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः । वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74॥
    सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः । शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75॥
    भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः । दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ 76॥

    इस लहर में एक और अनेक का रहस्य खुलता है। विश्वमूर्ति, अनेकमूर्ति, शतमूर्ति, फिर भी अमूर्तिमान्; अनगिनत रूप धारण करके भी जिनका कोई कर्म-जन्य शरीर नहीं। एक, नैक, तत्, यत्, परम पद; जो अद्वितीय एक है पर माया से अनेक दिखता है। लोकबन्धु, लोकनाथ, भक्तवत्सल; सब लोकों का हितैषी बंधु और भक्तों पर वत्सल।

    विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् । अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77॥
    एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम् । लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78॥

    यहाँ रूप और निर्गुण-भाव साथ-साथ आते हैं। सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वराङ्ग, चन्दनाङ्गदी; स्वर्ण-कान्ति और चंदन की सुगंध से सजे। फिर विषम, शून्य, अचल और चल; अद्वितीय, निर्गुण, अविचल, और फिर भी वायु-रूप में गतिशील। अमानी, मानद, मान्य; अभिमान-रहित होकर भी सबके पूज्य।

    सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी । वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79॥
    अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् । सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80॥

    इस धारा में शस्त्र और चार-रूप उभरते हैं। सर्व-शस्त्र-धारियों में श्रेष्ठ, प्रग्रह और निग्रह; जो लगाम भी हैं और संहार भी। चतुर्मूर्ति, चतुर्बाहु, चतुर्व्यूह, चतुर्गति; जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति-तुरीय की चार अवस्थाएँ और चार व्यूह एक ही पुरुष में। समावर्त, दुर्जय, दुर्लभ, दुर्गम, दुर्ग; जो भक्ति-मात्र से सुलभ हैं पर अहंकार के लिए दुर्गम।

    तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः । प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश‍ृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81॥
    चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः । चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82॥
    समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83॥

    चतुर्-व्यूहपाञ्चरात्र-परंपरा में विष्णु के चार व्यूह माने गए हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। सृष्टि, स्थिति और संहार के विविध कार्यों के लिए एक ही परमात्मा इन चार रूपों में प्रकट होते हैं। इसी से वे चतुरात्मा और चतुर्व्यूह कहलाते हैं।

    अब सृष्टि-तंतु और सौंदर्य की लहर है। सुतन्तु और तन्तुवर्धन इस फैलते संसार-तंतु को बुनते और समेटते हैं। इन्द्रकर्मा, महाकर्मा, कृतकर्मा; जिनका कोई कर्तव्य शेष नहीं। उद्भव, सुन्दर, रत्ननाभ, सुलोचन; परम सौंदर्य और करुणा से युक्त। महाह्रद, महानिधि; परम आनंद का अगाध कुंड जिसमें समस्त भूत निधि-रूप में स्थित हैं।

    शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84॥
    उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः श‍ृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85॥
    सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86॥

    इस धारा में प्रकृति के रूप प्रभु बन जाते हैं। पर्जन्य मेघ-सा ताप शांत करता है, पावन सबको पवित्र करता है, अमृतवपु अमृत-रूप शरीर वाला है। सुलभ और सिद्ध साथ हैं, भक्ति से सहज मिलने वाले नित्य-सिद्ध। न्यग्रोध, उदुम्बर, अश्वत्थ; वट, गूलर और पीपल भी इन्हीं के नाम हैं, और चाणूर का वध करने वाले कृष्ण भी।

    कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः । अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87॥
    सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ 88॥

    अब अग्नि और सूर्य के सात-सात रूप गूँजते हैं। सहस्रार्चि, सप्तजिह्व, सप्तैधा, सप्तवाहन; सहस्र किरणों और सात अश्वों वाला तेज। भयकृत् और भयनाशन एक साथ हैं, अधर्मियों में भय और सज्जनों का अभय। फिर अणु और बृहत्, कृश और स्थूल, गुणभृत् और निर्गुण; एक ही तत्त्व अपने विरोधी जोड़ों में पूरा दिखता है।

    सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89॥

    न्यग्रोध, उदुम्बर, अश्वत्थवट, गूलर और पीपल, तीनों विष्णु के नाम हैं। शंकराचार्य कहते हैं, न्यग्रोध वे हैं जो ऊपर रहकर सबको माया से आच्छादित करते हैं, उदुम्बर वे हैं जो अंतरिक्ष से भी ऊँचे हैं, और अश्वत्थ वे हैं जो अनित्य संसार-वृक्ष-रूप हैं। गीता का “ऊर्ध्व-मूल, अधः-शाख” अश्वत्थ इसी संसार-वृक्ष को कहता है।

    अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् । अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90॥

    इस लहर में योग और विश्राम मिलते हैं। योगी, योगीश, सर्वकामद; समस्त योगियों के स्वामी और सब कामनाओं के दाता। आश्रम वह विश्राम-स्थल है जहाँ संसार-पथ के थके जीव ठहरते हैं। धनुर्धर, दमयिता, दम, अपराजित; राम-रूप में धनुष धारण कर दुष्टों का दमन करने वाले अजेय।

    भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः । आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91॥
    धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः । अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ 92॥

    यहाँ सत्य और प्रेम की धारा बहती है। सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्य, सत्यधर्मपरायण; बल और सत्य दोनों जिनमें पूर्ण हैं। प्रियकृत् और प्रीतिवर्धन भक्तों का प्रिय करते और उनमें प्रेम बढ़ाते हैं। फिर सूर्य के अनेक नाम, रवि, विरोचन, सूर्य, सविता, रविलोचन; जिनका एक नेत्र ही सूर्य है।

    सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः । अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93॥
    विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः । रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94॥

    इस धारा में अनंतता और आश्चर्य प्रकट होते हैं। अनन्त, लोकाधिष्ठान, अद्भुत; सब लोकों का आधार वह आश्चर्यमय स्वरूप। सनातनतम और अव्यय, ब्रह्मा से भी पुरातन और अविनाशी। फिर स्वस्ति-वाचक नामों की लड़ी, स्वस्तिद, स्वस्तिकृत्, स्वस्ति, स्वस्तिभुक्; जो स्वयं कल्याण हैं और सबका कल्याण करते हैं।

    अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95॥
    सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः । स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96॥

    अब शीतलता और निर्भयता की लहर है। अरौद्र राग-द्वेष से रहित हैं, शिशिर तीनों तापों से जलते जीवों को शीतल करते हैं, शब्दातिग वाणी की पहुँच से परे हैं। अक्रूर, पेशल, दक्ष; क्रूरता-रहित, कोमल और कुशल। वीतभय और पुण्यश्रवणकीर्तन; सर्वथा निर्भय, जिनका श्रवण और कीर्तन ही पवित्र कर देता है।

    अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97॥

    कपिलकपिल मुनि सांख्य-दर्शन के प्रवर्तक माने जाते हैं, और विष्णु के अवतार कहे गए हैं। पाताल में तप करते कपिल के पास सगर-पुत्र अपने यज्ञ-अश्व की खोज में आक्षेप करते पहुँचे, और मुनि की दृष्टि-मात्र से भस्म हो गए। उन्हीं की मुक्ति के लिए भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए।

    अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98॥

    इस धारा में उद्धार और रक्षा का भाव है। उत्तारण, दुष्कृतिहा, दुःस्वप्ननाशन; जो संसार-सागर से पार उतारते हैं और बुरे स्वप्न तक मिटा देते हैं। रक्षण, सन्त, जीवन, पर्यवस्थित; सर्वत्र व्याप्त होकर जगत की रक्षा करने वाले। अनन्तरूप, अनन्तश्री, जितमन्यु, भयापह; अनंत रूप और ऐश्वर्य वाले, क्रोध-विजयी, भय-नाशक।

    उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99॥
    अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः । चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100॥

    यहाँ आधार और प्राण के नाम घने होते हैं। अनादि, आधारनिलय, अधाता; सब आधारों के भी आधार, जिनका कोई नियामक नहीं। प्राणद, प्रणव, प्रमाण, प्राणनिलय, प्राणभृत्, प्राणजीवन; प्राण-वायुओं से सबको जिलाने वाले। तत्त्व, तत्त्वविद्, एकात्मा, जन्ममृत्युजरातिग; वह एकमात्र आत्मा जो जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे से परे है।

    अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101॥
    आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102॥
    प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103॥

    अब समापन के निकट यज्ञ-नामों की सबसे घनी लड़ी आती है। यज्ञ, यज्ञपति, यज्वा, यज्ञाङ्ग, यज्ञवाहन, यज्ञभृत्, यज्ञकृत्, यज्ञभुक्, यज्ञसाधन, यज्ञान्तकृत्, यज्ञगुह्यम्; यज्ञ का स्वामी, साधन, फल और रहस्य, सब वही। अन्न और अन्नाद साथ हैं, जो स्वयं भोग्य भी हैं और भोक्ता भी।

    भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104॥
    यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः । यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105॥

    फिर कृष्ण-रूप पर पाठ ठहरता है। आत्मयोनि और स्वयञ्जात, जो अपने ही कारण से प्रकट होते हैं; देवकीनन्दन, स्रष्टा, पापनाशन; देवकी के पुत्र जिनके स्मरण से पाप नष्ट होते हैं। फिर आयुधों की गणना है, शङ्खभृत्, नन्दकी, चक्री, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर, रथाङ्गपाणि; शंख, खड्ग, चक्र, धनुष और गदा सब इन्हीं के हाथ में हैं।

    आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः । देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106॥
    शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107॥

    और अंत में वह संकल्प-श्लोक आता है जिससे सहस्रनाम पूरा होता है। वनमाली, गदी, शार्ङ्गी, शङ्खी, चक्री, नन्दकी; पाँचों आयुध और वैजयन्ती-माला धारण किए श्रीमान् नारायण विष्णु वासुदेव हमारी सब ओर से रक्षा करें। यहीं एक हज़ार नाम अपने मूल आश्रय, वासुदेव, पर लौट आते हैं।

    वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी । श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ 108॥

    फलश्रुति एवं उत्तर-पीठिका

    पाठ का फल, समापन-संवाद और राम-नाम की महिमा

    Sanatkumara reveals the glory of the thousand names
    सहस्रनाम महिमा
    ॥ उत्तरपीठिका ॥

    अब भीष्म स्वयं फल बताते हैं। उन्होंने महात्मा केशव के एक हज़ार दिव्य नाम बिना कुछ छोड़े सुना दिए। जो इसे नित्य सुनता या कीर्तन करता है उसे इस लोक और परलोक में कोई अशुभ नहीं छूता; ब्राह्मण को वेदान्त-ज्ञान, क्षत्रिय को विजय, वैश्य को समृद्धि, शूद्र को सुख मिलता है, और जो जिस पुरुषार्थ का इच्छुक है उसे वही प्राप्त होता है।

    श्री भीष्म उवाच । इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः । नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ 1 ॥
    य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । नाऽशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ 2 ॥
    वेदान्तगो ब्राह्मणस्स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् । वैश्यो धनसमृद्धस्स्याच्छूद्रस्सुखमवाप्नुयात् ॥ 3 ॥
    धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् । कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाः ॥ 4 ॥

    फिर नित्य-पाठी की दिनचर्या और उसका फल आता है। जो भक्त सवेरे उठकर, शुद्ध होकर, मन एकाग्र कर वासुदेव के इस सहस्रनाम का पाठ करता है, उसे विशाल यश, श्रेष्ठता, अचल लक्ष्मी और अनुत्तम श्रेय मिलता है। उसे भय नहीं छूता, वह निरोग, तेजस्वी और गुणवान होता है; रोगी रोग से, बंधा बंधन से, भयभीत भय से और आपद-ग्रस्त आपदा से छूट जाता है।

    भक्तिमान् यस्सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः । सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ 5 ॥
    A devotee seated before a home shrine at dawn, holding mala beads, beginning the daily recitation
    प्रातः पाठ
    यशः प्राप्नोति विपुलं याति प्राधान्यमेव च । अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ 6 ॥
    न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति । भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ 7 ॥
    रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ 8 ॥
    Vishnu on Garuda rescuing Gajendra, the elephant king, from the crocodile
    गजेन्द्र मोक्ष

    यहाँ शरणागति का फल चरम पर पहुँचता है। नित्य भक्ति से पुरुषोत्तम की स्तुति करने वाला सब संकट शीघ्र पार कर जाता है; वासुदेव की शरण में रहने वाला सब पापों से शुद्ध होकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होता है। वासुदेव के भक्तों को न जन्म-मृत्यु का भय सताता है, न उनमें क्रोध, ईर्ष्या या लोभ टिकता है; पाठ करने वाले की आत्मा सुख, क्षमा, श्री, धृति, स्मृति और कीर्ति से भर जाती है।

    दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ 9 ॥
    वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ 10 ॥
    न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ 11 ॥
    इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येतात्मा सुखक्षान्ति श्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ 12 ॥
    न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः । भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ 13 ॥

    अब स्तोत्र विराट दर्शन की ओर मुड़ता है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, अंतरिक्ष, दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर, सब वासुदेव के वीर्य से ही धारण किए हुए हैं; देव-दानव-गंधर्व-यक्ष-राक्षस सहित सारा चराचर उन्हीं के तेज से चलता है। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, बल, धैर्य, यहाँ तक कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ भी वासुदेव-आत्मक हैं। शास्त्रों का आचार, उससे उपजा धर्म, और उस धर्म के प्रभु, सब उन्हीं अच्युत में हैं।

    द्यौस्सचन्द्रार्कनक्षत्रं खं दिशो भूर्महोदधिः । वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ 14 ॥
    स सुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ 15 ॥
    इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्सत्त्वं तेजो बलं धृतिः । वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ 16 ॥
    सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पितः । आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ 17 ॥

    यहाँ सृष्टि का हर अंश नारायण से निकलता है। ऋषि, पितर, देव, महा-भूत, धातु, जंगम-स्थावर, सारा जगत जनार्दन से ही उपजा। योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प, वेद, शास्त्र और विज्ञान भी उन्हीं से प्रकट हुए। वह एक ही विष्णु बहुरूप होकर तीनों लोकों में व्याप्त है, और यह सारा विश्व उसी अव्यय का भोग है; इसी विश्वेश्वर अजन्मा को जो भजते हैं उनका कभी पराभव नहीं होता।

    ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः । जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ 18 ॥
    योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याश्शिल्पादि कर्म च । वेदाश्शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ 19 ॥
    एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः । त्रीन्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ 20 ॥
    इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् । पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ 21 ॥
    विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् । भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ 22 ॥

    अब समापन-संवाद में अनेक स्वर एक साथ बोलते हैं। अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि कमल-नयन पद्मनाभ अपने भक्तों के त्राता बनें, और भगवान आश्वासन देते हैं कि जो सहस्र-नामों से स्तुति करना चाहता है, वह एक ही श्लोक से भी स्तुति करे तो मैं स्तुत हो जाता हूँ। व्यास “वासुदेव” शब्द की व्युत्पत्ति से कहते हैं कि आप ही तीनों लोकों के निवास हैं, और उन्हें नमन करते हैं।

    अर्जुन उवाच । पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम । भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ 23 ॥
    श्री भगवानुवाच । यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव । सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ 24 ॥
    व्यास उवाच । वासनाद्वासुदेवस्य वासितं ते जगत्त्रयम् । सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ 25 ॥

    फिर वह प्रसिद्ध संवाद आता है जो पूरे स्तोत्र का सार एक नाम में बाँध देता है। पार्वती पूछती हैं कि विद्वान किस सरल उपाय से नित्य सहस्रनाम का पाठ करते हैं, और शिवजी उत्तर देते हैं कि वे “राम राम राम” इस मनोरम नाम में ही रमते रहते हैं, क्योंकि एक राम-नाम पूरे सहस्रनाम के तुल्य है। फिर ब्रह्मा अनन्त को नमन करते हैं, और संजय कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय और स्थिर नीति है।

    पार्वत्युवाच । केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् । पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ 26 ॥
    ईश्वर उवाच । श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ 27 ॥
    ब्रह्मोवाच । नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥ 28 ॥
    सञ्जय उवाच । यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ 29 ॥

    अंत में स्वयं भगवान की वाणी से आश्वासन और शरणागति का भाव आता है। जो अनन्य भाव से चिंतन और उपासना करते हैं उनके योग-क्षेम का भार वे स्वयं उठाते हैं; साधुओं की रक्षा, दुष्टों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए वे हर युग में प्रकट होते हैं। दुखी, भयभीत और रोग-ग्रस्त जन केवल “नारायण” शब्द का कीर्तन कर सब दुखों से मुक्त हो जाते हैं। पाठ में छूटे अक्षर और मात्रा के लिए क्षमा माँगते हुए, साधक शरीर-वाणी-मन से किए सब कर्म नारायण को समर्पित कर देता है, और स्तोत्र पूर्ण होता है।

    श्री भगवानुवाच । अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ 30 ॥
    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 31 ॥
    Young Krishna lifting Mount Govardhana on one finger, sheltering villagers from the storm
    कृष्ण-गोवर्धन
    आर्ता विषण्णाश्शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः । सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखास्सुखिनो भवन्ति ॥ 32 ॥
    [अधिक] यदक्षर पदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत् । तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥
    कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेस्स्वभावात् । करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥
    इति श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥

    परिशिष्ट

    रचयिता और भाष्यकार

    यह स्तोत्र महाभारत का अंश है, अतः इसके रचयिता महर्षि वेद-व्यास माने जाते हैं। कथा के भीतर इसे भीष्म-पितामह ने बाण-शय्या पर पड़े हुए युधिष्ठिर को सुनाया, और श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ उपस्थित थे। आगे चलकर आदि शंकराचार्य ने इस पर भाष्य रचा, जो आज “विष्णुसहस्रनाम-भाष्य” के नाम से प्रसिद्ध है, और जिसके आधार पर यहाँ नामों के अर्थ दिए गए हैं।

    शास्त्र में स्थान

    इसका मूल स्थान है महाभारत का अनुशासन-पर्व, अध्याय एक सौ उनचास। महाभारत अठारह पर्वों में विभक्त है; अनुशासन-पर्व तेरहवाँ है, जिसमें युद्ध के पश्चात् भीष्म ने युधिष्ठिर को राज-धर्म, आपद-धर्म और मोक्ष-धर्म का उपदेश दिया। उन्हीं उपदेशों में यह सहस्रनाम आता है। इसके कुछ श्लोक पद्म-पुराण, गरुड़-पुराण और स्कन्द-पुराण में भी मिलते हैं, किन्तु मूल संस्करण महाभारत का ही है।

    प्रसंग और परिवेश

    कुरुक्षेत्र का संग्राम समाप्त हो चुका था। भीष्म-पितामह अर्जुन के बाणों से आच्छादित बाण-शय्या पर पड़े थे। उत्तरायण आने में कई मास शेष थे, और इच्छा-मृत्यु का वर पाए भीष्म स्वयं अपने देह-त्याग का समय चुन सकते थे। युधिष्ठिर श्रीकृष्ण, व्यास और अन्य ऋषियों के साथ उनके पास बैठे थे। इतने संहार के पश्चात् धर्म क्या है, इसी संदेह से भारी मन लेकर युधिष्ठिर ने प्रश्न किए, और भीष्म के उत्तर में यह सहस्रनाम प्रकट हुआ।

    पाठ का फल

    फलश्रुति में भीष्मजी स्वयं इसका फल गिनाते हैं, आरोग्य, कीर्ति, बुद्धि, धैर्य, ऐश्वर्य, और अंततः मोक्ष। एक ही ईश्वर को हज़ार नामों से पुकारते हुए साधक का मन उन्हीं गुणों में रमता जाता है। गीता का वचन है कि मनुष्य जिस भाव में रमता है, वही उसे प्राप्त होता है।

    पाठ का काल

    परंपरा में ब्रह्म-मुहूर्त और संध्या-काल को पाठ के लिए श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उन क्षणों में मन सहज ही एकाग्र होता है। एकादशी, द्वादशी और वैकुण्ठ-एकादशी, तथा जन्माष्टमी और रामनवमी विशेष रूप से शुभ मानी जाती हैं। फिर भी भीष्मजी ने नित्य, प्रतिदिन के पाठ को ही पूर्ण फलदायी कहा है। अनियमित उत्साह से नियमित श्रद्धा श्रेष्ठ है।

    राम-नाम की महिमा

    उत्तर-पीठिका में पार्वती के प्रश्न पर शिवजी कहते हैं, “श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने॥”अर्थात् एक राम-नाम का उच्चारण पूरे सहस्रनाम के तुल्य है। सहस्रनाम और एक नाम, दोनों एक ही प्रेम की दो सीढ़ियाँ हैं। किसी का मन सहस्र गुणों के सहारे विष्णु के समीप पहुँचता है, किसी के लिए एक नाम ही समस्त ब्रह्म है।

    हनुमानजी के लिए राम-नाम ही ब्रह्म था, और उसी नाम के बल पर उन्होंने पर्वत तक उठा लिए। नाम की महिमा उसके उच्चारण-मात्र में नहीं, उस भाव में है जिससे वह हृदय में बसता है।

    Hanuman parting his chest to reveal Rama and Sita seated within his heart
    हनुमान हृदय

    विष्णु के हज़ार नाम एक ही प्रेम के हज़ार रूप हैं। जो भी नाम मन को स्थिर करे, प्रेम जगाए और अहंकार को गला दे, वही साधक के लिए पर्याप्त है।

     

    साथ में पढ़ें

  • सुखमनी साहिब

    The Psalm of Peace (or Jewel of Bliss)
    श्री गुरु अर्जन देव जी, पाँचवें गुरु
    श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 262-296.
    (Sikh tradition refers to pages as “अंग” rather than “pages” (पृष्ठ) because the Granth Sahib is treated as a living body, not a text. Each page is a limb of the Guru.

    ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
    एक ही अकाल पुरख है, जो सतगुरु की कृपा से मिलता है।
    ↓ Sukhmani Sahib (Devanagari PDF, print-friendly)

    अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

    सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥

    स्मरण कर के, बार-बार स्मरण कर के, सुख पाया।

    सुखमनी, अष्टपदी 1, opening

    Background

    गुरु अर्जुन देव जी सिख परंपरा के पहले शहीद हैं। उनकी शहादत 30 मई, 1606 को लाहौर में हुई। यह कहानी श्रद्धाराजनीति और अटूट विश्वास की कहानी है।

    गुरु अर्जुन देव जी ने दो ऐसे कार्य किए जिन्होंने सिख पंथ को एक संगठित शक्ति के रूप में स्थापित किया। पहला, उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन किया और 1604 में उसे श्री हरमंदिर साहिब में प्रतिष्ठित किया। यह पहली बार था कि किसी धर्म का पवित्र ग्रंथ उसके संस्थापकों के जीवनकाल में ही लिपिबद्ध हुआ, और उसमें हिंदू भक्तों और मुस्लिम सूफियों दोनों की वाणी सम्मिलित की गई। दूसरा, उन्होंने अमृतसर को सिखों के आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया, हरमंदिर साहिब का निर्माण पूर्ण किया, और मसंद प्रथा (दशांश संग्रह) को व्यवस्थित किया। इससे सिख समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त हुआ।

    1605 में मुगल सम्राट अकबर की मृत्यु हुई। अकबर relatively calm and measured शासक थे। उनके पुत्र जहाँगीर ने गद्दी संभाली। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा “तुज़ुक-ए-जहाँगीरी” में स्वयं लिखा कि वह बहुत समय से गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करना चाहता था। उसने लिखा कि “इस दुकान को बंद करना चाहिए, या इसे इस्लाम में लाना चाहिए।”

    तत्काल कारण यह बना कि जहाँगीर का पुत्र खुसरो, जिसने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था, लाहौर से भागते हुए गुरु अर्जुन देव जी से मिला। गुरु साहिब ने उसे आशीर्वाद दिया (कुछ इतिहासकारों के अनुसार आर्थिक सहायता भी दी)। जहाँगीर ने इसे राजद्रोह माना।

    लाहौर के दीवान (राजस्व अधिकारी) चंदू शाह की गुरु साहिब से व्यक्तिगत शत्रुता थी। एक विवाह प्रस्ताव के अपमान को लेकर चंदू शाह ने गुरु साहिब के विरुद्ध जहाँगीर को भड़काया और उनकी गिरफ्तारी तथा दंड की व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाई। Btw, चंदू शाह पंजाबी खत्री वंश से थे। खत्री पंजाब का एक प्रमुख व्यापारिक और प्रशासनिक समुदाय है। उनके नाम में “शाह” खत्री समुदाय की एक उपजाति (गोत्र) का सूचक है। इसे फ़ारसी या सिंधी उपाधि समझ लेना ग़लती है। वे मूल रूप से पंजाब के निवासी थे, लेकिन मुगल दरबार में अपने पद के कारण लाहौर और दिल्ली दोनों में रहते थे। वे लाहौर के सूबेदार (गवर्नर) के अधीन दीवान (राजस्व अधिकारी) थे। साथ ही वे एक धनी साहूकार भी थे।

    एक उल्लेखनीय बात यह है कि स्वयं सिख गुरु भी खत्री थे: गुरु नानक देव जी बेदी खत्री थे, गुरु अंगद देव जी त्रेहन खत्री, गुरु अमरदास जी भल्ला खत्री, और गुरु रामदास जी से गुरु गोबिंद सिंह जी तक सभी सोढी खत्री थे। इसलिए चंदू शाह और गुरु अर्जुन देव जी एक ही पंजाबी खत्री समुदाय से आते थे। यही कारण है कि सिख इतिहास में चंदू शाह के विश्वासघात को और भी अधिक पीड़ादायक माना जाता है: यह अपने ही समुदाय के एक व्यक्ति का कुकर्म था, किसी बाहरी शत्रु के अत्याचार से कहीं ज़्यादा खटकने वाला।

    यातना और शहादत:

    गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में कई दिनों तक यातनाएँ दी गईं। उन्हें तपती लोहे की तवी (गर्म लोहे की चादर) पर बैठाया गया। उनके शरीर पर जलती हुई रेत डाली गई। उन्हें उबलते पानी में डुबोया गया। May की भीषण गर्मी में यह सब किया गया। अंत में उन्हें रावी नदी में स्नान करने दिया गया, जहाँ उनके प्राण निकल गए। तिथि थी 30 मई, 1606।

    शहादत का प्रभाव:

    गुरु अर्जुन देव जी की शहादत ने सिख इतिहास की दिशा बदल दी। उनके पुत्र गुरु हरगोबिंद साहिब ने गद्दी संभालते ही दो तलवारें धारण कीं, मीरी (सांसारिक सत्ता) और पीरी (आध्यात्मिक सत्ता), और अकाल तख्त की स्थापना की। यह क्षण सिख पंथ के शांत भक्ति आंदोलन से सशस्त्र योद्धा परंपरा में परिवर्तन का आरंभ था।

    Introduction

    सुखमनी साहिब सिख धर्म की गहरी और सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली बाणी है। इसे पाँचवें गुरु श्री गुरु अर्जन देव जी ने लगभग 1602-03 में अमृतसर के रामसर सरोवर के किनारे लिखा था, वही जगह जो आज भी हरिमंदिर साहिब (Golden Temple) के पास मौजूद है। उस वक़्त वो जगह घने जंगल से घिरी हुई थी।

    “सुखमनी” शब्द दो हिस्सों से बना है: “सुख” यानी शान्ति, आराम, चैन; और “मनी” यानी मन, या मणि (रत्न)। तो सुखमनी का मतलब है “मन को शान्ति देने वाला रत्न” या “मन की सांत्वना”। अंग्रेज़ी में इसे “Psalm of Peace” या “Jewel of Peace” कहा गया है।

    इसकी संरचना बड़ी व्यवस्थित है। कुल 24 अष्टपदी हैं। हर अष्टपदी की शुरुआत एक श्लोक (दोहे) से होती है, जो उस पूरी अष्टपदी का सार बताता है। फिर उसके बाद 8 पउड़ियाँ (छंद) आती हैं। हर पउड़ी में 10 पंक्तियाँ हैं, यानी 5 दोहे। पूरी रचना में 24 श्लोक और 192 पउड़ियाँ हैं।

    रचना का ऐतिहासिक संदर्भ

    सुखमनी साहिब की रचना अमृतसर के रामसर सरोवर के किनारे, क़रीब 1602-03 ईस्वी में हुई। उस-समय गुरु अर्जुन देव जी की आयु लगभग चालीस वर्ष थी। चार वर्ष पहले, 1598 में, अकबर बादशाह ने स्वयं हरमंदिर साहिब आ कर लंगर में बैठ कर भोजन किया था, और गुरु-घर का आदर-व्यवहार किया था। अकबर की 1605 में मृत्यु हुई, जहाँगीर गद्दी पर बैठा, और 1606 में गुरु अर्जुन देव जी की शहादत। सुखमनी इस तीन-वर्षीय खिड़की में रची गयी, जब मुग़ल-सिख-सम्बन्ध अभी संतुलित थे, मगर बदलने को थे।

    परम्परा कहती है कि बाबा बुद्ध जी, जिन्हें छहों गुरुओं (नानक से हरगोबिंद तक) से दीक्षा का सौभाग्य मिला, सुखमनी-पाठ के प्रथम-श्रोता थे। आज भी सिख घरों में बच्चे के जन्म के बाद के चालीस-दिन, बीमारी के समय, और परिवार में किसी की मृत्यु के बाद, सुखमनी का अखंड-पाठ करवाया जाता है।

    संरचना के बारे में एक उल्लेखनीय बात है। चौबीस-अष्टपदियाँ चौबीस-वर्ष की एक संख्यात्मक समानता बनाती हैं, गुरु अर्जुन देव जी ने अठारह वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली थी और चौवालीस की आयु में शहीद हुए, यानी पूरे चौबीस-वर्ष का गुरुत्व-काल। यह संख्यात्मक संगति आज भी विद्वान चर्चा का विषय है।

    आदि शंकराचार्य की पाँच-शताब्दी पुरानी विवेक-चूड़ामणि और गुरु अर्जुन देव की सुखमनी, दोनों का केन्द्रीय-विषय एक ही है, मन की शान्ति का सूत्र। दोनों के बीच पाँच-सौ साल का अन्तर है, और भाषाएँ अलग, मगर पाठ-शैली में एक-तरह की संगति है, प्रत्येक खंड एक सूत्र-वाक्य के चारों ओर बँधा। यह तुलना आज भी तुलनात्मक-दर्शन के विद्वानों के बीच रोचक मानी जाती है।

    एक famous story है कि जब गुरु अर्जन देव जी ने 16 अष्टपदी पूरी कर ली थीं, तब गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र बाबा श्रीचंद जी अमृतसर आए। गुरु जी ने उनसे आगे की रचना जारी रखने का अनुरोध किया। बाबा श्रीचंद जी ने विनम्रता से केवल गुरु नानक जी का वह श्लोक सुनाया जो जपुजी साहिब में आता है: “आदि सचु, जुगादि सचु; है भी सचु, नानक होसी भी सचु।” गुरु अर्जन देव जी ने फिर इसी श्लोक को 17वीं अष्टपदी के शीर्ष पर रखा।

    पूरी रचना में कुछ बुनियादी विषय बार-बार लौटते हैं:

    1. ईश्वर की सर्वव्यापकता,
    2. नाम सिमरन की शक्ति,
    3. साध-संगत का महत्व,
    4. अहंकार का त्याग, और
    5. ब्रह्मज्ञानी की पहचान।

    अष्टपदी 1

    सिमरन की महिमा
    नाम-सिमरन (ईश्वर के नाम का स्मरण) पूरी सुखमनी साहिब की नींव है। पहली अष्टपदी इसी नींव को रखती है।
    Peace Is Remembered, Not Found

    श्लोक

    आदि गुरए नमः ॥ जुगादि गुरए नमः ॥
    सतिगुरए नमः ॥ श्री गुरदेवए नमः ॥1॥
    गुरु अर्जन देव जी पूरी रचना की शुरुआत चार नमस्कार से करते हैं। ये चार नमस्कार उस एक अकाल पुरख (पुरख यानी पुरुष = ईश्वर) के चार रूपों को प्रणाम हैं: जो आदि-काल से गुरु है, जो युगों-युगों से गुरु है, जो सत्य-स्वरूप गुरु है, और जो दिव्य प्रकाश वाला गुरु है। कुछ विद्वान इसे पहले चार गुरु साहिबान के प्रति प्रणाम मानते हैं। लेकिन गुरु अर्जन देव जी की दृष्टि में गुरु और ईश्वर में भेद नहीं। जो ज्योति सब गुरुओं में प्रकाशित है, वो एक ही अकाल पुरख की ज्योति है।
    रहाउ: यानी केंद्रीय भाव
    सुखमनी सुख अम्रित प्रभ नामु ॥
    भगत जना कै मनि बिसरामु ॥ रहाउ ॥
    ये “रहाउ” पंक्ति पूरी सुखमनी साहिब की चाबी है। जैसे किसी गीत में कोई पंक्ति बार-बार लौटती है, वैसे ही ये भाव पूरी रचना में गूँजता रहेगा। गुरु जी कहते हैं: सुखमनी यानी मन की शान्ति, सुख-अमृत, ये सब प्रभु के नाम में है। और ये नाम भक्तजनों के मन में बसता है, ठहरता है। शान्ति बाहर नहीं मिलती, वो अंदर पहले से मौजूद है। बस परतें हटानी हैं।

    पउड़ी 1

    सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ ॥ कलि कलेस तन माहि मिटावउ ॥
    सिमरउ जासु बिसुंभर एकै ॥ नामु जपत अगनत अनेकै ॥
    बेद पुरान सिम्रिति सुधाखर ॥ कीने राम नाम इक आखर ॥
    किनका एक जिसु जीअ बसावै ॥ ता की महिमा गनी न आवै ॥
    कांखी एकै दरस तुहारो ॥ नानक उन संगि मोहि उधारो ॥1॥

    पहली पंक्ति में गुरु जी “सिमरउ” तीन बार दोहराते हैं। ये दोहराव बिना वजह नहीं। जैसे कोई माँ बच्चे को कहती है “पढ़, पढ़, पढ़”, उसमें ज़ोर है, तड़प है। सिमरन एक बार का काम होता तो दोहराने की क्या ज़रूरत, ये असल में जीने का तरीक़ा है। “सिमरन” का मतलब सिर्फ़ माला फेरना समझ लेना अधूरा है, असली अर्थ है याद रखना, उस चेतना में डूब जाना।

    “बिसुंभर” संस्कृत के “विश्वम्भर” से आया है, जो पूरे विश्व को धारण करता है। उसका नाम अनगिनत लोग जपते हैं, चाहे कोई “राम” कहे, कोई “अल्लाह”, कोई “वाहेगुरु”, सब उसी एक को पुकार रहे हैं।

    “बेद पुरान सिम्रिति सुधाखर, कीने राम नाम इक आखर”: हज़ारों पन्ने, सैकड़ों ग्रंथ, युगों का ज्ञान, इन सबने मिलकर बस एक बात कही है: राम का नाम लो। जैसे एक बड़ा पेड़ एक छोटे-से बीज से निकलता है, वैसे ही सारा ज्ञान एक नाम से निकलता है।

    “किनका एक”: एक ज़र्रा-भर भी अगर कोई इस नाम को दिल में बसा ले, तो उसकी महिमा अनगिनत हो जाती है। गुरु जी ये नहीं कहते कि तपस्वी बनो, जंगलों में जाएँ। कहते हैं, एक कण भी सच्चे दिल से रख लो, काफ़ी है।

    पउड़ी का अंत निजी प्रार्थना से होता है: जो आपके दर्शन के लिए तड़पते हैं, उनकी संगत में मुझे भी तार दो। गुरु जी, जो पाँचवें गुरु हैं, ख़ुद कहते हैं “मुझे भी उनकी संगत में रख दो।” जब गुरु ख़ुद याचक ((यानी – applicant या request करने वाला) बने, तो हमारा अहंकार कहाँ ठहरेगा?

     

    पउड़ी 2

    प्रभ कै सिमरनि गरभि न बसै ॥ प्रभ कै सिमरनि दूखु जमु नसै ॥
    प्रभ कै सिमरनि कालु परहरै ॥ प्रभ कै सिमरनि दुसमनु टरै ॥
    प्रभ सिमरत कछु बिघनु न लागै ॥ प्रभ कै सिमरनि अनदिनु जागै ॥
    प्रभ कै सिमरनि भउ न बिआपै ॥ प्रभ कै सिमरनि दुखु न संतापै ॥
    प्रभ का सिमरनु साध कै संगि ॥ सभ निधान नानक हरि रंगि ॥2॥

    हर पंक्ति “प्रभ कै सिमरनि” से शुरू होती है, जैसे ढोल पर एक ही ताल बार-बार बजे, और हर बार थोड़ा गहरा उतरे। सिमरन से जन्म-मरण का चक्र टूटता है। दुख और यम का डर भाग जाता है। काल हट जाता है। दुश्मन, बाहर के भी और अंदर के भी (काम, क्रोध, लोभ), दूर हो जाते हैं। कोई विघ्न नहीं लगता। अज्ञान की नींद टूट जाती है। भय नहीं सताता। दुख नहीं तपाता।

    और आख़िर में: ये सिमरन साधू की संगत में गहरा होता है। जैसे एक कोयले को अकेला रख दो तो बुझ जाता है, लेकिन दूसरे जलते कोयलों के बीच रखो तो दहकता रहता है। “सभ निधान नानक हरि रंगि”: सारे ख़ज़ाने हरि के प्रेम में हैं।

    पउड़ी 3

    प्रभ कै सिमरनि रिधि सिधि नउ निधि ॥ प्रभ कै सिमरनि गिआनु धिआनु ततु बुधि ॥
    प्रभ कै सिमरनि जपु तपु पूजा ॥ प्रभ कै सिमरनि बिनसै दूजा ॥
    प्रभ कै सिमरनि तीरथि इसनानी ॥ प्रभ कै सिमरनि दरगह मानी ॥
    प्रभ कै सिमरनि होइ सु भला ॥ प्रभ कै सिमरनि सुफल फला ॥
    से सिमरहि जिन आपि सिमराए ॥ नानक ता कै लागउ पाए ॥3॥

    सिमरन में सब कुछ है: ऋद्धि-सिद्धि, नौ निधियाँ, ज्ञान, ध्यान, तत्व-बुद्धि। सिमरन ही जप है, तप है, पूजा है। और सबसे बड़ी बात: “बिनसै दूजा”, द्वैत ख़त्म हो जाता है। ये “दूजा” यहाँ “दूसरा देवता” से कहीं गहरा है, ये वो मन की फाँक है जो कहती है “मैं अलग हूँ, ईश्वर अलग है।”

    “से सिमरहि जिन आपि सिमराए”: सिमरन वही करते हैं जिन्हें ख़ुद ईश्वर ने सिमरन करवाया। सिमरन को हम अपनी उपलब्धि समझ बैठते हैं, असल में ये ईश्वर की कृपा है। और नानक ऐसे लोगों के चरणों में झुकते हैं।

     

    पउड़ी 4

    प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥ प्रभ कै सिमरनि उधरे मूचा ॥
    प्रभ कै सिमरनि त्रिसना बुझै ॥ प्रभ कै सिमरनि सभु किछु सुझै ॥
    प्रभ कै सिमरनि नाही जम त्रासा ॥ प्रभ कै सिमरनि पूरन आसा ॥
    प्रभ कै सिमरनि मन की मलु जाइ ॥ अम्रित नामु रिद माहि समाइ ॥
    प्रभ जी बसहि साध की रसना ॥ नानक जन का दासनि दसना ॥4॥

    सिमरन सबसे ऊँचा है। “त्रिसना बुझै”: तृष्णा बुझ जाती है। ये वो अंदरूनी खालीपन है जो इंसान हर चीज़ से भरने की कोशिश करता है। “मन की मलु जाइ, अम्रित नामु रिद माहि समाइ”: पहले मैल जाता है, फिर नाम भरता है। जैसे बर्तन पहले साफ़ करो, तब दूध डालो।

    “नानक जन का दासनि दसना”: नानक भक्तों के दासों का भी दास है। ये विनम्रता का शिखर है। एक बादशाह के दरबार में सबसे ज़्यादा इज़्ज़त किसकी होती है? जो बादशाह के सबसे क़रीब हो। और बादशाह के सबसे क़रीब वो होता है जो सबसे ज़्यादा झुका हुआ हो: दरबान, सेवक, पानी देने वाला। गुरु जी कहते हैं, मैं भक्तों के सेवकों का भी सेवक बनूँ। ये ऊँचा पद है, नीचे होकर।

    पउड़ी 5

    प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥ प्रभ कउ सिमरहि से पतिवंते ॥
    प्रभ कउ सिमरहि से जन परवान ॥ प्रभ कउ सिमरहि से पुरख प्रधान ॥
    प्रभ कउ सिमरहि सि बेमुहताजे ॥ प्रभ कउ सिमरहि सि सरब के राजे ॥
    प्रभ कउ सिमरहि से सुखवासी ॥ प्रभ कउ सिमरहि सदा अबिनासी ॥
    सिमरन ते लागे जिन आपि दइआला ॥ नानक जन की मंगै रवाला ॥5॥

    जो प्रभु को सिमरते हैं, वो धनवंत हैं (आत्मिक समृद्धि वाले, बैंक बैलेंस की भाषा में नहीं)। वो इज़्ज़तदार हैं। वो ईश्वर के दरबार में स्वीकार किए हुए हैं। वो किसी के मोहताज नहीं रहते, और इसीलिए “सरब के राजे” कहलाते हैं, क्योंकि जिसे किसी चीज़ की ज़रूरत न रहे, वही असली राजा है। वो सुखी हैं और कभी नष्ट नहीं होने वाले।

    और फिर वही बात: सिमरन उन्हीं को मिलता है जिन पर ख़ुद ईश्वर ने दया की। नानक ऐसे जनों के चरणों की धूल माँगते हैं।

     

    पउड़ी 6

    प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन सद बलिहारी ॥
    प्रभ कउ सिमरहि से मुख सुहावे ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन सूखि बिहावै ॥
    प्रभ कउ सिमरहि तिन आतमु जीता ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन निरमल रीता ॥
    प्रभ कउ सिमरहि तिन आनद घनेरे ॥ प्रभ कउ सिमरहि बसहि हरि नेरे ॥
    संत कृपा ते अनदिनु जागि ॥ नानक सिमरनु पूरै भागि ॥6॥

    सिमरन करने वाले परोपकारी होते हैं। उनके चेहरे पर नूर आता है (“मुख सुहावे”), वो नूर अंदर की शान्ति से आता है। “आतमु जीता”: उन्होंने अपने आप को जीत लिया है, जो कठिन जीत है। उनकी रीति निर्मल है। उनके पास आनंद के भंडार हैं और वो ईश्वर के पास बसते हैं।

    “नानक सिमरनु पूरै भागि”: सिमरन पूरे भाग्य से मिलता है, भाग्य यानी कर्म और कृपा का संगम।

     

    पउड़ी 7

    प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥ प्रभ कै सिमरनि कबहु न झूरे ॥
    प्रभ कै सिमरनि हरि गुन बानी ॥ प्रभ कै सिमरनि सहजि समानी ॥
    प्रभ कै सिमरनि निहचल आसनु ॥ प्रभ कै सिमरनि कमल बिगासनु ॥
    प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥ सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥
    सिमरहि से जन जिन कउ प्रभ मेआ ॥ नानक तिन जन सरनी पेआ ॥7॥

    सिमरन से सारे काम पूरे होते हैं। कभी अफ़सोस नहीं होता। “निहचल आसनु”: मन स्थिर हो जाता है। “कमल बिगासनु”: हृदय-कमल खिल जाता है, चेतना का विकास होता है।

    “अनहद झुनकार”: अनहद नाद सुनाई देता है, वो आंतरिक ध्वनि जो गहरे ध्यान में सुनाई देती है, बिना किसी चीज़ को ठोके बजने वाली ध्वनि। कमल कीचड़ में उगता है, लेकिन कीचड़ उसे छूता नहीं। ठीक वैसे ही, सिमरन करने वाला इंसान दुनिया में रहता है, कमाता है, परिवार चलाता है, लेकिन दुनिया का मैल उसके मन को नहीं छूता। फूल खिला हुआ है, पानी के ऊपर, धूप की तरफ़। जड़ें कीचड़ में हैं लेकिन सुगंध आकाश में फैलती है।

    पउड़ी 8

    हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥ हरि सिमरनि लगि बेद उपाए ॥
    हरि सिमरनि भए सिध जती दाते ॥ हरि सिमरनि नीच चहु कुंट जाते ॥
    हरि सिमरनि धारी सभ धरना ॥ सिमरि सिमरि हरि कारन करना ॥
    हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा ॥ हरि सिमरन मह आपि निरंकारा ॥
    करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ ॥ नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ ॥8॥1॥

    आठवीं पउड़ी पहली अष्टपदी का समापन है। यहाँ गुरु जी एक बड़ा दावा करते हैं: सिमरन personal साधना से कहीं आगे जाकर सृष्टि का मूल सिद्धांत बन जाता है। सिमरन से भगत प्रकट हुए। सिमरन से वेदों की रचना हुई। सिमरन से सिद्ध, जती, और दानी पैदा हुए। सिमरन से नीच लोग चारों दिशाओं में प्रसिद्ध हुए, यानी सिमरन जात-पात नहीं देखता।

    “हरि सिमरनि धारी सभ धरना”: सिमरन से सारी धरती धारण की गई। “हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा”: सारा संसार सिमरन से ही रचा गया। “हरि सिमरन मह आपि निरंकारा”: सिमरन के अंदर ही निराकार ईश्वर ख़ुद बसता है।

    निष्कर्ष: “करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ, नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ”: जिसे ईश्वर ने ख़ुद कृपा करके समझाया, उस गुरमुख ने ही सिमरन पाया।

    पहली अष्टपदी का सार: सिमरन सबसे ऊँचा है, सबसे गहरा है, और ये मिलता है गुरु की कृपा से।

    अष्टपदी 2

    नाम का आसरा
    पहली अष्टपदी में सिमरन की महिमा बताई। अब दूसरी अष्टपदी में गुरु जी बताते हैं कि ज़िंदगी की हर मुश्किल घड़ी में, जब कोई साथ नहीं होता, तब नाम ही सहारा है।
    When No One Else Is There

    श्लोक

    दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥
    सरणि आपकी आइओ नानक के प्रभ साथ ॥1॥
    हे दीनों के दर्द और दुखों को तोड़ने वाले, हर हृदय में बसने वाले, अनाथों के नाथ, आपकी शरण में आया हूँ, मेरे साथ रहो। ये श्लोक एक बच्चे की पुकार जैसा है। जब बच्चा डर जाता है, तो वो सीधा माँ की गोद में दौड़ता है, कोई तर्क नहीं, कोई शर्त नहीं। और “घटि घटि” (हर हृदय में) कहकर स्पष्ट कर दिया कि ईश्वर कहीं दूर नहीं बैठा, वो आपके अंदर ही है।

    पउड़ी 1

    जह माता पिता सुत मीत न भाई ॥ मन ऊहा नामु तेरै संगि सहाई ॥
    जह महा भइआन दूत जम दलै ॥ तह केवल नामु संगि तेरै चलै ॥
    जह मुसकल होवै अति भारी ॥ हरि को नामु खिन माहि उधारी ॥
    अनिक पुनहचरन करत नही तरै ॥ हरि को नामु कोटि पाप परहरै ॥
    गुरमुखि नामु जपहु मन मेरे ॥ नानक पावहु सूख घनेरे ॥1॥

    गुरु जी एक-एक करके उन जगहों को गिनाते हैं जहाँ इंसान बिल्कुल अकेला होता है। जहाँ माता, पिता, बेटा, दोस्त, भाई कोई नहीं होता, वहाँ नाम ही साथी है। जहाँ यमराज के भयानक दूत घेर लेते हैं, वहाँ भी सिर्फ़ नाम साथ चलता है। जहाँ मुश्किल बहुत भारी हो, वहाँ नाम पल-भर में बचाव कर देता है।

    “अनिक पुनहचरन करत नही तरै”: अनगिनत प्रायश्चित करने से भी पार नहीं होता, लेकिन “हरि को नामु कोटि पाप परहरै”: नाम करोड़ों पापों को दूर कर देता है। बाहरी प्रायश्चित की सीमा है, नाम की शक्ति असीम है।

     

    पउड़ी 2

    सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥ हरि का नामु जपत होइ सुखीआ ॥
    लाख करोड़ी बंधु न परै ॥ हरि का नामु जपत निसतरै ॥
    अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै ॥ हरि का नामु जपत आघावै ॥
    जिह मारगि एहु जात एकेला ॥ तह हरि नामु संगि होत सुहेला ॥
    ऐसा नामु मन सदा धिआईऐ ॥ नानक गुरमुखि परम गति पाईऐ ॥2॥

    “सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ”: सारी सृष्टि का राजा भी दुखी है। अगर राजा भी दुखी है, तो दुख का इलाज पैसे, ताक़त, या रुतबे में नहीं। “अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै”: माया के अनगिनत रंग-तमाशे प्यास नहीं बुझाते। ये नमकीन पानी पीने जैसा है: जितना पीओ, उतनी और लगती है।

    “जिह मारगि एहु जात एकेला”: जिस रास्ते पर इंसान अकेला जाता है (मृत्यु का रास्ता), वहाँ भी नाम साथ चलता है। एक व्यापारी के पास बहुत सारा सोना था। नदी में बाढ़ आ गई और नाव डूबने लगी। नाव वाले ने कहा, “सोना फेंको, वरना डूब जाएँगे।” व्यापारी ने सोना पकड़े रखा और डूब गया। दूसरा आदमी, जिसके पास कुछ नहीं था सिवाय ईश्वर के नाम के, वो तैरकर पार हो गया। जिस रास्ते पर सब कुछ छूट जाता है, वहाँ सिर्फ़ नाम काम आता है।

     

    पउड़ी 3

    छूटत नही कोटि लख बाही ॥ नामु जपत तह पारि पराही ॥
    अनिक बिघन जह आए संघारै ॥ हरि का नामु तत्काल उधारै ॥
    अनिक जोनि जनमै मरि जाम ॥ नामु जपत पावै बिसरामु ॥
    हउ मैला मलु कबहु न धोवै ॥ हरि का नामु कोटि पाप खोवै ॥
    ऐसा नामु जपहु मन रंगि ॥ नानक पाईऐ साध कै संगि ॥3॥

    लाखों-करोड़ों प्रयत्नों से छुटकारा नहीं मिलता, लेकिन नाम जपने से पार हो जाते हैं। “तत्काल उधारै”: “तत्काल” (फ़ौरन), देर नहीं लगती।

    “हउ मैला मलु कबहु न धोवै”: अहंकार (“हउ”) का मैल कभी नहीं धुलता, किसी भी बाहरी तरीक़े से। तीर्थ में नहाने से नहीं, उपवास करने से नहीं, दान देने से नहीं। सिर्फ़ नाम करोड़ों पापों को धो देता है। और ये नाम मिलता है “साध कै संगि”, संत की संगत में।

     

    पउड़ी 4

    जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥ हरि का नामु ऊहा संगि तोसा ॥
    जिह पैडै महा अंध गुबारा ॥ हरि का नामु संगि उजिआरा ॥
    जहा पंथि आपका को न सिञानू ॥ हरि का नामु तह नालि पछानू ॥
    जह महा भइआन तपति बहु घाम ॥ तह हरि के नाम की आप ऊपरि छाम ॥
    जहा त्रिखा मन आपु आकरखै ॥ तह नानक हरि हरि अम्रितु बरखै ॥4॥

    ये पउड़ी एक यात्रा का चित्र खींचती है। जिस रास्ते की दूरी गिनी न जा सके, वहाँ नाम आपका “तोसा” (रसद) है। जहाँ गहरा अँधेरा है, वहाँ नाम उजाला है। जहाँ कोई आपको नहीं पहचानता, वहाँ नाम आपका पहचान-पत्र है। जहाँ भयानक तपती धूप है, वहाँ नाम आपके ऊपर छाँव है। जहाँ प्यास मन को खींचे, वहाँ हरि का अमृत बरसता है।

    गुरु जी ने कितनी सजीव कल्पना इस्तेमाल की है: लंबा रास्ता, अँधेरा, अजनबीपन, तपती धूप, प्यास। ये सब ज़िंदगी के रूपक हैं। और हर एक का जवाब एक ही है: नाम।

     

    पउड़ी 5

    भगत जना की बरतनि नामु ॥ संत जना कै मनि बिसरामु ॥
    हरि का नामु दास की ओट ॥ हरि कै नामि उधरे जन कोटि ॥
    हरि जसु करत संत दिनु राति ॥ हरि हरि अउखधु साध कमाति ॥
    हरि जन कै हरि नामु निधानु ॥ पारब्रहमि जन कीनो दान ॥
    मन तन रंग रते रंग एकै ॥ नानक जन कै बिरति बिबेकै ॥5॥

    “भगत जना की बरतनि नामु”: भक्तों की बरतन (दैनिक उपयोग की चीज़) नाम है। जैसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बरतन ज़रूरी हैं, वैसे ही भक्तों के लिए नाम रोज़ की ज़रूरत है। “हरि हरि अउखधु साध कमाति”: नाम वो औषधि (दवाई) है जो संतों की कमाई है। “पारब्रहमि जन कीनो दान”: ये दान ईश्वर ने ख़ुद दिया है, कोई ख़ुद कमाकर नहीं लाता।

     

    पउड़ी 6

    हरि का नामु जन का मुकति जुगति ॥ हरि कै नामि जन का त्रिपति भुगति ॥
    हरि का नामु जन का रूप रंगु ॥ हरि नामु जपत कब परै न भंगु ॥
    हरि का नामु जन की वडिआई ॥ हरि कै नामि जन सोभा पाई ॥
    हरि का नामु जन का भोग जोग ॥ हरि नामु जपत कछु नाहि बिओगु ॥
    जनु राता हरि नाम की सेवा ॥ नानक पूजै हरि हरि देवा ॥6॥

    नाम ही मुक्ति है, नाम ही तृप्ति है, नाम ही रूप-रंग है, नाम ही शोभा है, नाम ही भोग और योग दोनों है। इंसान जो कुछ भी ढूँढता है, चाहे भौतिक सुख हो या आत्मिक मुक्ति, वो सब एक ही जगह मिलता है: नाम में। ये दो अलग दुनियाएँ नहीं हैं, ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

     

    पउड़ी 7

    हरि हरि जन कै मालु खजीना ॥ हरि धनु जन कउ आपि प्रभि दीना ॥
    हरि हरि जन कै ओट सताणी ॥ हरि प्रतापि जन अवर न जाणी ॥
    ओटि पोटि जन हरि रसि राते ॥ सुंन समाधि नाम रस माते ॥
    आठ पहर जनु हरि हरि जपै ॥ हरि का भगतु प्रगट नही छपै ॥
    हरि की भगति मुकति बहु करे ॥ नानक जन संगि केते तरे ॥7॥

    “ओटि पोटि जन हरि रसि राते”: ताने-बाने की तरह भक्त हरि के रस में रँगे हैं। जैसे कपड़े में ताना और बाना अलग नहीं किए जा सकते, वैसे ही भक्त और नाम को अलग नहीं किया जा सकता। “हरि का भगतु प्रगट नही छपै”: ये अंदरूनी बदलाव इतना गहरा होता है कि बाहर दिखने लगता है। जैसे सुबह का सूरज चाहे भी छिपना चाहे तो नहीं छिप सकता।

    “नानक जन संगि केते तरे”: ऐसे भक्तों की संगत में और भी कितने ही तर जाते हैं। सिमरन व्यक्तिगत होने के साथ-साथ दूसरों को भी पार लगाता है।

     

    पउड़ी 8

    पारजातु एहु हरि को नाम ॥ कामधेनु हरि हरि गुण गाम ॥
    सभ ते ऊतम हरि की कथा ॥ नामु सुनत दरद दुख लथा ॥
    नाम कि महिमा संत रिद वसै ॥ संत प्रतापि दुरतु सभु नसै ॥
    संत का संगु वडभागी पाईऐ ॥ संत कि सेवा नामु धिआईऐ ॥
    नाम तुलि कछु अवरु न होइ ॥ नानक गुरमुखि नामु पावै जनु कोइ ॥8॥2॥

    “पारजातु एहु हरि को नाम”: हरि का नाम पारिजात वृक्ष है, वो पौराणिक कल्प-वृक्ष जो हर इच्छा पूरी करता है। “कामधेनु हरि हरि गुण गाम”: हरि के गुण गाना कामधेनु (इच्छा-पूरक गाय) है।

    “नामु सुनत दरद दुख लथा”: नाम सुनते ही दर्द और दुख उतर जाते हैं। “सुनत” (सुनते ही) पर ध्यान दें: सिर्फ़ सुनने मात्र से ही असर शुरू हो जाता है। “नाम तुलि कछु अवरु न होइ”: नाम की तुलना में और कुछ भी नहीं।

    ये दूसरी अष्टपदी का निष्कर्ष है। ज़िंदगी के हर अँधेरे कोने में, हर कठिन मोड़ पर, जब सब छूट जाता है, तब भी नाम साथ रहता है। पारिजात वृक्ष और कामधेनु की उपमा से स्पष्ट किया कि नाम में सब कुछ है।

    अष्टपदी 3

    बाहरी कर्मकांड की सीमा
    पहली दो अष्टपदियों ने नाम की महिमा बताई। अब तीसरी अष्टपदी में गुरु जी एक कठोर सत्य सामने रखते हैं: बाहरी धार्मिक क्रियाओं से, बिना अंदरूनी बदलाव के, कुछ नहीं होता।
    अगर आप रोज़ meditation करें, प्राणायाम करें, पूजा पाठ करें, तीर्थ यात्रा करें – अगर अंदर से बदलाव नहीं ं, तो कोई फायदा नहीं होंगे इन सब activities का।

    श्लोक

    बहु सासत्र बहु सिम्रिती पेखे सरब ढढोलि ॥
    पूजसि नाही हरि हरे नानक नाम अमोल ॥1॥
    बहुत शास्त्र देखे, बहुत स्मृतियाँ छान मारीं, सब खँगाल डाला, लेकिन हरि के अमूल्य नाम की बराबरी कुछ नहीं कर सकता। ये श्लोक पूरी तीसरी अष्टपदी का सार है: बाहरी ज्ञान और कर्मकांड की एक सीमा है। असली चीज़ नाम है।

    पउड़ी 1

    जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥ खट सासत्र सिम्रिति वखिआन ॥
    जोग अभिआस करम धर्म किरिआ ॥ सगल तिआगि बन मधे फिरिआ ॥
    अनिक प्रकार कीए बहु जतना ॥ पुंन दान होमे बहु रतना ॥
    सरीरु कटाए होमै करि राती ॥ वरत नेम करै बहु भाती ॥
    नही तुलि राम नाम बीचार ॥ नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार ॥1॥

    गुरु जी एक लंबी सूची गिनाते हैं: जाप, तप, ज्ञान, ध्यान, छह शास्त्रों का अध्ययन, स्मृतियों की व्याख्या, योगाभ्यास, कर्मकांड, सब कुछ त्यागकर जंगल में भटकना, दान-पुण्य, हवन, शरीर को कष्ट देना, व्रत-नियम। ये सब कर लो, सब।

    और फिर एक पंक्ति में सब उलट देते हैं: “नही तुलि राम नाम बीचार”, इन सबकी तुलना राम नाम के विचार (चिंतन) से नहीं। “नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार”: गुरमुख बनकर एक बार भी नाम जप लो, तो वो सब कुछ से ज़्यादा है।

    ये बात सुनने में सरल लगती है, लेकिन इसकी गहराई बहुत है। गुरु जी कर्मकांड के ख़िलाफ़ नहीं हैं, वो कह रहे हैं कि बिना अंदरूनी प्रेम और चेतना के ये सब खोखले हैं। जैसे बिना पानी के बादल गरजता तो है, लेकिन फ़सल नहीं उगती।

    पउड़ी 2

    नउ खंड पृथमी फिरै चिरु जीवै ॥ महा उदासु तपीसर थीवै ॥
    अगनि माहि होमत परान ॥ कनिक अस्व हैवर भूमि दान ॥
    निलि करम करै बहु आसन ॥ जैन मारग संजम अति साधन ॥
    निमख निमख करि सरीरु कटावै ॥ तउ भी हउमै मैलु न जावै ॥
    हरि के नाम समसरि कछु नाहि ॥ नानक गुरमुखि नामु जपत गति पाहि ॥2॥

    गुरु जी और आगे जाते हैं: चाहे नौ खंड पृथ्वी घूम लो, चिरंजीवी बन जाएँ, महान उदासी (संन्यासी) बन जाएँ, अग्नि में प्राण होम कर दो, सोना, घोड़े, ज़मीन दान कर दो, जैन मार्ग के संयम और कठिन साधन कर लो, पल-पल शरीर कटवाते रहो।

    “तउ भी हउमै मैलु न जावै”: फिर भी अहंकार का मैल नहीं जाता। ये तीखी बात है। गुरु जी कह रहे हैं कि ये सारी कठिन तपस्या भी अहंकार के मैल को नहीं धो सकती। क्यों? क्योंकि बहुत बार ये तपस्या ख़ुद अहंकार का कारण बन जाती है: “मैंने इतना कठिन व्रत रखा, मैंने इतना दान दिया, मैंने इतनी तपस्या की।” ये “मैंने” ही तो अहंकार है।

    पउड़ी 3

    मन कामना तीरथ देह छुटै ॥ गरबु गुमानु न मन ते हुटै ॥
    सोच करै दिनसु अरु राति ॥ मन की मैलु न तन ते जाति ॥
    इसु देही कउ बहु साधना करै ॥ मन ते कबहू न बिखिआ तरै ॥
    जलि धोवै बहु देह अनीति ॥ सुध कहा होइ काची भीति ॥
    मन हरि के नाम की महिमा ऊच ॥ नानक नामि उधरे पतित बहु मूच ॥3॥

    “मन कामना तीरथ देह छुटै”: मन में कामना (इच्छा) रखकर तीर्थ जाएँ तो शरीर भले ही छूटे (थक जाए), लेकिन गर्व और अभिमान मन से नहीं हटता। “सोच करै दिनसु अरु राति”: दिन-रात शुद्धि करो (स्नान, शौच, सफ़ाई), मन का मैल तन से नहीं जाता।

    “जलि धोवै बहु देह अनीति, सुध कहा होइ काची भीति”: पानी से शरीर को बार-बार धोओ, कच्ची दीवार कहाँ शुद्ध होगी? ये सटीक उपमा है। कच्ची मिट्टी की दीवार को जितना पानी डालो, वो और गलती है, मज़बूत नहीं होती। ठीक वैसे ही, बाहरी शुद्धि से मन का मैल और फैलता है, क्योंकि इंसान सोचता है “मैं तो शुद्ध हो गया” और ये सोच ख़ुद मैल है।

    “नानक नामि उधरे पतित बहु मूच”: नाम से बहुत-से पतित (गिरे हुए, पापी) उधर गए हैं। ये आशा की बात है: गुरु जी कह रहे हैं कि चाहे आप कितने ही गिरे हैं, नाम आपको उठा सकता है।

     

    पउड़ी 4

    बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै ॥ अनिक जतन कर त्रिसन ना धरापै ॥
    भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥ कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥
    छूटसि नाही ऊभ पइआलि ॥ मोहि बिआपहि माइआ जालि ॥
    अवर करतूति सगली जमु डानै ॥ गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै ॥
    हरि का नामु जपत दुखु जाए ॥ नानक बोलै सहजि सुभाए ॥4॥

    “बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै”: बहुत चतुराई करने पर भी यम का भय लगा रहता है। “भेख अनेक अगनि नही बुझै”: अनेक वेष (भेष) बदलने से अंदर की अग्नि (तृष्णा, विकार) नहीं बुझती। कोई साधु का वेष ले ले, कोई संन्यासी बन जाए, लेकिन अंदर अगर वही आग जल रही है तो कपड़े बदलने से क्या होंगे?

    “अवर करतूति सगली जमु डानै, गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै”: बाक़ी सारे काम यम डाँटता है (स्वीकार नहीं करता)। गोविंद के भजन के बिना तिल-भर भी नहीं मानता। ये ऐसा है जैसे कोई परीक्षा में ग़लत विषय की कॉपी भर ले, बहुत मेहनत की, लेकिन सवाल का जवाब तो दिया ही नहीं।

    “नानक बोलै सहजि सुभाए”: नानक सहज स्वभाव से (बिना किसी दिखावे के, सरलता से) कहते हैं: नाम जपो, दुख जाएगा।

    पउड़ी 5

    चार पदारथ जे को मागै ॥ साध जना की सेवा लागै ॥
    जे को आपुना दूखु मिटावै ॥ हरि हरि नामु रिदै सद गावै ॥
    जे को अपुनी सोभा लोरै ॥ साधसंगि इह हउमै छोरै ॥
    जे को जनम मरण ते डरै ॥ साध जना की सरनी परै ॥
    जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा ॥ नानक ता कै बलि बलि जासा ॥5॥

    अब गुरु जी सीधे-सीधे बताते हैं कि अगर आपको ये चाहिए, तो ये करो:

    अगर चार पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चाहिए, तो साध जनों की सेवा करो। अगर अपना दुख मिटाना है, तो हरि का नाम गाओ। अगर अपनी शोभा (इज़्ज़त) चाहते हैं, तो साधसंगत में अहंकार छोड़ो। अगर जन्म-मरण से डरते हैं, तो संतों की शरण में जाएँ।

    हर जवाब में या तो “नाम” है या “साध जना की सेवा/संगत” है। गुरु जी बार-बार इन्हीं दो बातों पर लौटते हैं। और अंत में: “जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा, नानक ता कै बलि बलि जासा”: जो प्रभु के दर्शन का प्यासा है, नानक उस पर बलिहारी जाते हैं।

     

    पउड़ी 6

    सगल पुरख मह पुरखु प्रधानु ॥ साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
    आपस कउ जो जाणै नीचा ॥ सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
    जा का मनु होइ सगल की रीना ॥ हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
    मन अपुने ते बुरा मिटाना ॥ पेखै सगल स्रिसटि साजना ॥
    सूख दूख जन सम द्रिसटेता ॥ नानक पाप पुंन नही लेपा ॥6॥

    “आपस कउ जो जाणै नीचा, सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा”: जो अपने आप को नीचा (छोटा) जाने, वही सबसे ऊँचा गिना जाता है। ये सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध पंक्तियों में से है। ये विरोधाभास (paradox) है जो सारे धर्मों में मिलता है: ऊँचाई नीचे होने में है।

    “जा का मनु होइ सगल की रीना”: जिसका मन सबके चरणों की धूल (रीना) बन जाए। “मन अपुने ते बुरा मिटाना, पेखै सगल स्रिसटि साजना”: अपने मन से बुराई मिटा ली, अब सारी सृष्टि में उसे सज्जन (अपने) दिखते हैं।

    “सूख दूख जन सम द्रिसटेता”: सुख-दुख को समान दृष्टि से देखता है। “पाप पुंन नही लेपा”: पाप-पुण्य का लेप उस पर नहीं लगता। ये कर्म से ऊपर उठने की बात है, जहाँ इंसान करता सब कुछ है लेकिन “मैंने किया” का बोध नहीं रहता। 

    गाँव में दो कुएँ थे। एक कुआँ कहता था, “मैं बहुत गहरा हूँ, मेरा पानी बहुत मीठा है।” लोग आते, पानी पीते, लेकिन कुएँ का गर्व बढ़ता जाता। दूसरा कुआँ चुपचाप पानी देता रहता, न कोई दावा, न कोई शोर। धीरे-धीरे पहले कुएँ का पानी कड़वा हो गया और दूसरे का और मीठा। गुरु जी कहते हैं: जो अपने आप को नीचा जाने, वही सबसे ऊँचा है।

    पउड़ी 7

    निधन कउ धनु आपके नाउ ॥ निथावे कउ नाउ आपका थाउ ॥
    निमाने कउ प्रभ आपके मानु ॥ सगल घटा कउ देवहु दानु ॥
    करन करावनहार सुआमी ॥ सगल घटा के अंतरजामी ॥
    अपनी गति मिति जानहु आपे ॥ आपन संगि आपि प्रभ राते ॥
    तुम्हरी उसतति आप ते होइ ॥ नानक अवरु न जानसि कोइ ॥7॥

    ये पउड़ी एक सुंदर प्रार्थना है। “निधन कउ धनु आपके नाउ”: निर्धन (ग़रीब) के लिए आपका नाम ही धन है। “निथावे कउ नाउ आपका थाउ”: बेघर के लिए आपका नाम ही ठिकाना है। “निमाने कउ प्रभ आपके मानु”: अपमानित के लिए आपका नाम ही सम्मान है।

    गुरु जी ने तीन तरह की ग़रीबी बताई: धन की ग़रीबी, ठिकाने की ग़रीबी, और इज़्ज़त की ग़रीबी। और तीनों का इलाज एक ही है: नाम। “तुम्हरी उसतति आप ते होइ”: आपकी स्तुति आपसे ही हैं सकती है। कोई और आपकी पूरी महिमा बयान नहीं कर सकता।

    पउड़ी 8

    सभल धरम मह सरेसट धरमु ॥ हरि को नामु जपि निरमल करमु ॥
    सगल क्रिआ मह ऊतम किरिआ ॥ साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ ॥
    सगल उदम मह उदमु भला ॥ हरि का नामु जपहु जीअ सदा ॥
    सगल बानी मह अम्रित बानी ॥ हरि को जसु सुनि रसन बखानी ॥
    सगल थान ते ओहु ऊतम थानु ॥ नानक जिह घटि वसै हरि नामु ॥8॥3॥

    तीसरी अष्टपदी का समापन। गुरु जी चार “सबसे श्रेष्ठ” बताते हैं: सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म: हरि का नाम जपना। सब क्रियाओं में श्रेष्ठ क्रिया: साधसंगत में मन का मैल धोना। सब उद्यमों में श्रेष्ठ उद्यम: हरि का नाम सदा जपना। सब बाणियों (वाचाओं) में अमृत बाणी: हरि का यश सुनना और बखानना।

    और सबसे ऊँचा स्थान? कोई तीर्थ नहीं, कोई पहाड़ नहीं, कोई मंदिर नहीं। “नानक जिह घटि वसै हरि नामु”: वो हृदय सबसे ऊँचा स्थान है जिसमें हरि का नाम बसता है। ये पूरी तीसरी अष्टपदी का निचोड़ है: बाहर कहीं मत भटको, सबसे पवित्र तीर्थ आपका अपना हृदय है, अगर उसमें नाम बसा हो।

    अष्टपदी 4

    ईश्वर के उपकारों की याद
    तीसरी अष्टपदी ने बताया कि बाहरी कर्मकांड काफ़ी नहीं। अब चौथी अष्टपदी पूछती है: आप ईश्वर के उपकार भूल क्यों जाते हैं? उसने आपको क्या-क्या दिया, और आप कहाँ भटक रहे हैं?

    श्लोक

    निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥
    जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही नालि ॥1॥
    हे गुण-रहित (निरगुणीआर) और अज्ञानी (इआनिआ) इंसान, उस प्रभु को सदा याद रख। जिसने आपको बनाया, उसे चित्त (मन) में रख, नानक कहते हैं, वही आख़िर तक साथ निभाएगा। “निरगुणीआर” शब्द कठोर है, गुरु जी अपने आप को भी इसी श्रेणी में रखते हैं। इसे डाँट समझ लेना ग़लत होंगे, ये एक पिता की पुकार है।

    पउड़ी 1

    रमईआ के गुण चेति परानी ॥ कवन मूल ते कवन द्रिसटानी ॥
    जिनि तूं साजि सवारि सीगारिआ ॥ गरभ अगनि मह जिनहि उबारिआ ॥
    बार बिवसथा आपहि पिआरै दूध ॥ भरि जोबन भोजन सुख सूध ॥
    बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन ॥ मुखि अपिआउ बैठ कउ दैन ॥
    इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥ बखसि लेहु तउ नानक सीझै ॥1॥

    गुरु जी एक-एक करके ईश्वर के उपकार गिनाते हैं, और ये गिनती किसी भी इंसान की ज़िंदगी पर लागू होती है:

    “कवन मूल ते”: किस मूल (जड़, शुरुआत) से आप बना? कुछ भी नहीं था, और उसने आपको रचा, सजाया, सँवारा। “गरभ अगनि मह जिनहि उबारिआ”: गर्भ की अग्नि (गर्भ में जो तपिश और अँधेरा है) में उसने आपको बचाया। “बार बिवसथा आपहि पिआरै दूध”: बचपन में (जब आप बेबस था) आपको दूध पिलाया। “भरि जोबन भोजन सुख सूध”: जवानी में भोजन, सुख, और समझ दी। “बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन”: बुढ़ापे में आपके ऊपर रिश्तेदार और साथी रखे जो आपकी देखभाल करें।

    और फिर: “इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै”: ये निर्गुण (कृतघ्न) इंसान कुछ नहीं समझता। “बखसि लेहु तउ नानक सीझै”: बख़्श (माफ़ कर) दो, तभी नानक सफल होंगे।

     

    पउड़ी 2

    जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥ सुत भ्रात मीत बिनता संगि हसहि ॥
    जिह प्रसादि पीवहि सीतल जला ॥ सुखदाई पवनु पावकं अमुला ॥
    जिह प्रसादि भोगहि सभि रसा ॥ सगल समग्री संगि साथि बसा ॥
    दीने हसत पाव करन नेत्र रसना ॥ तिसहि तिआगि अवर संगि रचना ॥
    ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे ॥ नानक काढि लेहु प्रभ आपे ॥2॥

    अब “जिह प्रसादि” (जिसकी कृपा से) की लय शुरू होती है, जो छठी अष्टपदी में पूरी तरह खिलेगी। जिसकी कृपा से आप धरती पर सुख से बसता है, बेटों, भाइयों, दोस्तों, पत्नी के साथ हँसता है। जिसकी कृपा से ठंडा पानी पीता है, सुखदायी हवा और अमूल्य अग्नि मिलती है। जिसकी कृपा से सब रस भोगता है। जिसने हाथ, पैर, कान, आँखें, जीभ दी।

    “तिसहि तिआगि अवर संगि रचना”: उसी को छोड़कर और (दूसरों) के साथ रचा-बसा (लिपटा) है। ये बड़ी सीधी बात है: जिसने सब दिया, उसे भूल गए, और जो कुछ नहीं दे सकते (माया, दुनियादारी), उनके पीछे भाग रहे हैं।

    “ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे”: ऐसे दोष मूर्ख अंधे को सता रहे हैं। “नानक काढि लेहु प्रभ आपे”: नानक कहते हैं, प्रभु ख़ुद (इन दोषों से) निकाल लो।

     

    पउड़ी 3

    आदि अंति जो राखनहारु ॥ तिस सिउ प्रीति न करै गवारु ॥
    जा की सेवा नव निधि पावै ॥ ता सिउ मूड़ा मनु नही लावै ॥
    जो ठाकुरु सद सदा हजूरे ॥ ता कउ अंधा जानत दूरे ॥
    जा की टहल पावै दरगह मानु ॥ तिसहि बिसारै मुगधु अजानु ॥
    सदा सदा इहु भूलनहारु ॥ नानक राखनहारु अपारु ॥3॥

    गुरु जी इंसान की मूर्खता को कई कोणों से दिखाते हैं। जो आदि से अंत तक रक्षा करने वाला है, उससे प्रीत नहीं करता। जिसकी सेवा से नौ निधियाँ मिलें, उस पर मन नहीं लगाता। जो ठाकुर (मालिक) सदा हज़ूर (पास) है, उसे अंधा दूर जानता है। जिसकी टहल (सेवा) से दरगाह (ईश्वर के दरबार) में मान मिले, उसे मूर्ख अज्ञानी भूल जाता है।

    “सदा सदा इहु भूलनहारु, नानक राखनहारु अपारु”: ये इंसान सदा-सदा भूलने वाला है, लेकिन नानक कहते हैं, रक्षा करने वाला अपार (असीम) है। ये आख़िरी पंक्ति बड़ी तसल्ली देने वाली है: हम भूलते रहते हैं, लेकिन वो बचाता रहता है। हमारी भूल से उसकी रक्षा कम नहीं होती।

     

    पउड़ी 4

    रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥ साचु छोडि झूठ संगि मचै ॥
    जो छडना सु असथिरु करि मानै ॥ जो होवनु सो दूरि परानै ॥
    छोडि जाइ तिस का सरमु करै ॥ संगि सहाई तिसु परहरै ॥
    चंदन लेपु उतारै धोइ ॥ गरधब प्रीति भसम संगि होइ ॥
    अंध कूप मह पतित बिकराल ॥ नानक काढि लेहु प्रभ दइआल ॥4॥

    ये पउड़ी इंसान की उलटी बुद्धि का वर्णन है, और इसकी उपमाएँ तीखी हैं:

    “रतनु तिआगि कउडी संगि रचै”: रत्न (नाम) छोड़कर कौड़ी (माया) से लिपटा है। “साचु छोडि झूठ संगि मचै”: सच छोड़कर झूठ के साथ मस्त है। “जो छडना सु असथिरु करि मानै”: जो छोड़ना है (दुनिया), उसे स्थिर (शाश्वत) मान लिया। “जो होवनु सो दूरि परानै”: जो होना है (ईश्वर की कृपा), उसे दूर जानता है।

    “चंदन लेपु उतारै धोइ, गरधब प्रीति भसम संगि होइ”: चंदन का लेप धो डालता है (जो सुगंध और शीतलता देता है), और गधे (गरधब) की तरह भस्म (राख, मिट्टी) में लोटता है। ये उपमा बहुत सटीक है। गधे को चंदन लगा दो तो वो धूल में लोट लगाएगा। ठीक वैसे ही, इंसान को ईश्वर ने इतनी सुंदर ज़िंदगी दी, लेकिन वो माया की धूल में लोट लगा रहा है।

     

    पउड़ी 5

    करतूति पसू की मानस जाति ॥ लोक पचारा करै दिनु राति ॥
    बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ ॥ छपसि नाहि कछु करै छपाइआ ॥
    बाहरि गिआन धिआन इसनान ॥ अंतरि बिआपै लोभु सुआनु ॥
    अंतरि अगनि बाहरि तनु सुआह ॥ गलि पाथर कैसे तरै अथाह ॥
    जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि ॥ नानक ते जन सहजि समाति ॥5॥

    “करतूति पसू की मानस जाति”: करतूत (काम) पशु जैसे, जाति (पैदाइश) मनुष्य की। ये कड़ी बात है। गुरु जी कहते हैं, जन्म तो इंसान का लिया, लेकिन काम पशुओं जैसे करता है।

    “बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ”: बाहर से धार्मिक वेश, अंदर माया का मैल। “बाहरि गिआन धिआन इसनान, अंतरि बिआपै लोभु सुआनु”: बाहर ज्ञान, ध्यान, स्नान, लेकिन अंदर लोभ का कुत्ता (“सुआनु”) सता रहा है। ये “सुआनु” (कुत्ता) उपमा बहुत तीखी है। लोभ कुत्ते जैसा है: कभी संतुष्ट नहीं होता, हर हड्डी के पीछे भागता है।

    “गलि पाथर कैसे तरै अथाह”: गले में पत्थर बाँधकर गहरे पानी में कैसे तैरोगे? ये दोहरी ज़िंदगी (बाहर संत, अंदर विकारी) गले का पत्थर है।

    लेकिन अंत सकारात्मक है: “जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि, नानक ते जन सहजि समाति”: जिसके अंदर प्रभु ख़ुद बसता है, वो सहज ही समा जाता है। बाहरी दिखावा नहीं, अंदरूनी उपस्थिति चाहिए।

     

    पउड़ी 6

    सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥ करु गहि लेहु ओड़ि निबहावै ॥
    कहा बुझारति बूझै डोरा ॥ निसि कहीऐ तउ समझै भोरा ॥
    कहा बिसनपद गावै गुंग ॥ जतन करै तउ भी सुर भंग ॥
    कह पिंगुल पर्बत पर भवन ॥ नही होत ऊहा उसु गवन ॥
    करतार करुणा मै दीन बेनती करै ॥ नानक तुमरी किरपा तरै ॥6॥

    ये पउड़ी चार उपमाओं पर बनी है:

    अंधा (नेत्रहीन) रास्ता कैसे पाए? किसी को हाथ पकड़कर ले जाना होंगे। मूर्ख (डोरा) पहेली कैसे बूझे? उसे रात कहो तो सुबह समझता है। गूँगा विष्णुपद (भजन) कैसे गाए? कोशिश करे तो भी सुर टूटता है। लँगड़ा (पिंगुल) पर्वत पर कैसे चढ़े? संभव ही नहीं।

    गुरु जी कह रहे हैं: हम सब इन्हीं की तरह हैं। हम आध्यात्मिक रूप से अंधे, मूर्ख, गूँगे, और लँगड़े हैं। अपने बल पर ईश्वर तक पहुँचना असंभव है। “करतार करुणा मै दीन बेनती करै”: हे करुणामय करतार, ये दीन (निर्बल) विनती करता है। “नानक तुमरी किरपा तरै”: सिर्फ़ आपकी कृपा से ही पार होंगे।

    ये समर्पण का क्षण है। जब इंसान अपनी सीमा पहचान लेता है, तभी कृपा का दरवाज़ा खुलता है।

     

    पउड़ी 7

    संगि सहाई सु आवै न चीति ॥ जो बैराई ता सिउ प्रीति ॥
    बलूआ के गृह भीतरि बसै ॥ अंद कैल माइआ रंगि रसै ॥
    द्रिड़ करि मानै मनहि प्रतीति ॥ कालु न आवै मूड़े चीति ॥
    बैर बिरोध काम क्रोध मोह ॥ झूट बिकार महा लोभ धरोह ॥
    इआहू जुगति बिहाने कई जनम ॥ नानक राखि लेहु आपन करि करम ॥7॥

    “संगि सहाई सु आवै न चीति”: जो साथी (ईश्वर) सदा साथ है, वो याद नहीं आता। “जो बैराई ता सिउ प्रीति”: जो दुश्मन हैं (विकार), उनसे प्रीति है। “बलूआ के गृह भीतरि बसै”: रेत के घर में बसता है (यानी ऐसी चीज़ों पर भरोसा करता है जो पल में ढह जाएँगी)।

    “द्रिड़ करि मानै मनहि प्रतीति, कालु न आवै मूड़े चीति”: मन में पक्का विश्वास कर रखा है (कि ये सब टिकेगा), मूर्ख को काल (मृत्यु) का ध्यान ही नहीं आता।

    “बैर बिरोध काम क्रोध मोह, झूट बिकार महा लोभ धरोह”: ये पाँच विकारों (और उनके साथियों) की सूची है जो इंसान को जकड़े रखती है। “इआहू जुगति बिहाने कई जनम”: इसी तरीक़े से कई जन्म गँवा दिए। “नानक राखि लेहु आपन करि करम”: नानक कहते हैं, हे प्रभु, अपनी करम (कृपा) करके बचा लो।

     

    पउड़ी 8

    आप ठाकुरु आप पहि अरदासि ॥ जीउ पिंडु सभु आपकी रासि ॥
    आप मात पिता हम बारिक आपके ॥ तुमरी कृपा मह सूख घनेरे ॥
    कोइ न जानै तुमरा अंतु ॥ ऊचे ते ऊचा भगवंत ॥
    सगल समगरी तुमरै सूत्र धारी ॥ आप ते होइ सु आगिआकारी ॥
    तुमरी गति मिति आप ही जानी ॥ नानक दास सदा कुरबानी ॥8॥4॥

    चौथी अष्टपदी का समापन एक सुंदर प्रार्थना से होता है:

    “आप ठाकुरु आप पहि अरदासि”: आप मालिक है, आपसे ही अरदास (प्रार्थना) है। “जीउ पिंडु सभु आपकी रासि”: जीव और शरीर, सब आपकी पूँजी (रासि) है। “आप मात पिता हम बारिक आपके”: आप माता-पिता हैं, हम आपके बच्चे हैं। “तुमरी कृपा मह सूख घनेरे”: आपकी कृपा में बहुत सुख हैं।

    “सगल समगरी तुमरै सूत्र धारी”: सारी सामग्री (सृष्टि) आपके सूत्र (धागे) में पिरोई हुई है। ये वैसा ही है जैसे माला के मोती अलग-अलग दिखते हैं लेकिन एक ही धागा सबको जोड़े रखता है। सारी सृष्टि, सारे जीव, सारे ग्रह, एक ही सूत्र में पिरोए हैं।

    “नानक दास सदा कुरबानी”: नानक का दास सदा कुर्बान (बलिदान, समर्पित) है।

    अष्टपदी 5

    कृतघ्नता और भूलना
    चौथी अष्टपदी ने ईश्वर के उपकार गिनाए। पाँचवीं अष्टपदी और गहरी जाती है: इंसान उस देने वाले को छोड़कर दूसरों के पीछे क्यों भागता है? ये कृतघ्नता का विश्लेषण है।

    श्लोक

    देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि अन सुआइ ॥
    नानक कहू न सीझई बिनु नावै पति जाइ ॥1॥
    देने वाले प्रभु को छोड़कर और (दूसरे) स्वादों (सुखों) के पीछे लग गए। नानक कहते हैं, बिना नाम के कहीं सफलता नहीं मिलती, और इज़्ज़त चली जाती है।

    पउड़ी 1

    दस बसआप ले पाछै पावै ॥ एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै ॥
    एक भी न दए दस भी हिरि लए ॥ तउ मूड़ा कहु कहा करए ॥
    जिसु ठाकुर सिउ नाही चारा ॥ ता कउ कीजै सद नमसकारा ॥
    जा कै मनि लागा प्रभु मीठा ॥ सभल सूख ताहू मनि वूठा ॥
    जिसु जन अपना हुकमु मनाइआ ॥ सभल थोक नानक तिनि पाइआ ॥1॥

    ये पउड़ी एक व्यापारिक उदाहरण से शुरू होती है: “दस बसआप ले पाछै पावै, एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै”: ईश्वर दस वस्तुएँ देता है, इंसान उन्हें पीछे (बेक़दर) रख देता है, और एक वस्तु (जो ईश्वर ने नहीं दी) के लिए सब कुछ गँवा देता है। “एक भी न दए दस भी हिरि लए”: वो एक भी नहीं देता (ईश्वर को), और ईश्वर दसों भी वापस ले ले, तो मूर्ख क्या करेगा?

    ये बात हर इंसान पर लागू है। हमारे पास जो कुछ भी है, सेहत, परिवार, बुद्धि, ये सब उसका दिया हुआ है। लेकिन हम उन चीज़ों के पीछे भागते हैं जो हमारे पास नहीं हैं, और जो हैं उनकी क़दर नहीं करते।

    “जा कै मनि लागा प्रभु मीठा, सभल सूख ताहू मनि वूठा”: जिसके मन को प्रभु मीठा लगने लगा, उसके मन में सारे सुख बरस पड़ते हैं।

     

    पउड़ी 2

    अगनत साहु अपनी दे रासि ॥ खात पीत बरतै अंद उलासि ॥
    अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लए ॥ अगिआनी मनि रोसु करए ॥
    अपनी परतीति आप ही खोवै ॥ बहुरि उस का बिस्वासु न होवै ॥
    जिस की बसतु तिसु आगै राखै ॥ प्रभ की आगिआ मानै माथै ॥
    उस ते चउगुन करै निहालु ॥ नानक साहिबु सदा दइआलु ॥2॥

    गुरु जी एक साहूकार (बैंकर) की उपमा देते हैं: “अगनत साहु अपनी दे रासि”: अनंत साहूकार (ईश्वर) अपनी पूँजी देता है। “खात पीत बरतै अंद उलासि”: इंसान खाता है, पीता है, इस्तेमाल करता है, आनंद मनाता है। “अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लए”: अपनी अमानत (जो उसने दी थी) कुछ वापस ले ले, तो “अगिआनी मनि रोसु करए”: अज्ञानी मन में ग़ुस्सा करता है।

    ये गहरी बात है। जब कोई हमसे छिन जाता है, कोई चीज़ खो जाती है, सेहत बिगड़ती है, तो हम ग़ुस्सा करते हैं ईश्वर पर। लेकिन गुरु जी कहते हैं: ये सब उसकी अमानत थी, उसने दी थी, उसे वापस लेने का हक़ है।

    “जिस की बसतु तिसु आगै राखै”: जिसकी वस्तु है, उसके सामने रख दे (समर्पण कर दे)। “उस ते चउगुन करै निहालु”: वो चौगुना कर देता है, और निहाल (प्रसन्न) करता है। ये शर्त है: पहले समर्पण करो, फिर चौगुना मिलेगा।

     

    पउड़ी 3

    अनिक भाति माइआ के हेत ॥ सरपर होवत जानु अनेत ॥
    बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै ॥ ओह बिनसै ओहु मनि पछुतावै ॥
    जो दीसै सो चालनहारु ॥ लपटि रहिओ तह अंध अंधारु ॥
    बटाऊ सिउ जो लावै नेह ॥ ता का हाथि न आवै केह ॥
    मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ॥ करि किरपा नानक आपि लए लाई ॥3॥

    गुरु जी दो सुंदर उपमाएँ देते हैं:

    “बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै”: पेड़ की छाँव से प्यार कर ले, लेकिन शाम को छाँव चली जाएगी, और मन पछताएगा। छाँव अस्थायी है। ज़िंदगी के सारे सुख ऐसे ही हैं: सुबह की छाँव शाम को नहीं रहती।

    “बटाऊ सिउ जो लावै नेह”: राहगीर (बटाऊ, मुसाफ़िर) से जो प्यार कर ले, उसके हाथ कुछ नहीं आता। राहगीर आता है, थोड़ी देर रुकता है, और चला जाता है। ये दुनिया के सारे रिश्तों का रूपक है: सब राहगीर हैं, कोई हमेशा नहीं रहता। सिर्फ़ नाम शाश्वत है।

     

    पउड़ी 4

    मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥ मिथिआ हउमै ममता माइआ ॥
    मिथिआ राज जोबन धन माल ॥ मिथिआ काम क्रोध बिकराल ॥
    मिथिआ रथ हसती असव बसत्रा ॥ मिथिआ रंग संगि माइआ पेखि हसता ॥
    मिथिआ ध्रोहु मोहु अभिमानु ॥ मिथिआ आपस ऊपरि करत गुमानु ॥
    असथिरु भगति साध की सरन ॥ नानक जपि जपि जीवै हरि के चरन ॥4॥

    ये “मिथिआ” (मिथ्या, झूठा, नश्वर) पउड़ी सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध पउड़ियों में से है। गुरु जी एक-एक करके सब कुछ “मिथिआ” बताते हैं:

    शरीर मिथ्या। धन मिथ्या। परिवार मिथ्या। अहंकार मिथ्या। ममता मिथ्या। राज, जवानी, संपत्ति मिथ्या। काम-क्रोध मिथ्या। रथ, हाथी, घोड़े, कपड़े मिथ्या। द्रोह, मोह, अभिमान मिथ्या।

    और फिर एक पंक्ति में सब उलट देते हैं: “असथिरु भगति साध की सरन”: स्थिर (शाश्वत) सिर्फ़ भक्ति है और साधू की शरण है। बाक़ी सब बहता पानी है, सिर्फ़ भक्ति चट्टान है।

    ध्यान दें: गुरु जी ये नहीं कह रहे कि शरीर, धन, परिवार “बुरे” हैं। वो कह रहे हैं कि ये “मिथिआ” (अस्थायी, नश्वर) हैं। इनसे लगाव रखना वैसा ही है जैसे बर्फ़ के टुकड़े को हमेशा के लिए पकड़ रखना चाहो। वो पिघलेगा। इस सत्य को स्वीकार करना ही ज्ञान है।

    पउड़ी 5

    मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥ मिथिआ हसत पर दरब कउ हिरहि ॥
    मिथिआ नेत्र पेखत पर त्रिअ रूपाद ॥ मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद ॥
    मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि ॥ मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि ॥
    मिथिआ तन नही परउपकारा ॥ मिथिआ बासु लेत बिकारा ॥
    बिनु बूझे मिथिआ सभ भए ॥ सफल देह नानक हरि हरि नाम लए ॥5॥

    अब गुरु जी शरीर के हर अंग को “मिथिआ” बताते हैं, लेकिन शर्त के साथ: जब वो ग़लत काम में लगें, तब मिथ्या हैं।

    कान मिथ्या जब दूसरों की निंदा सुनें। हाथ मिथ्या जब दूसरे का धन चुराएँ। आँखें मिथ्या जब पराई स्त्री/पुरुष के रूप देखें। जीभ मिथ्या जब ग़ैर-ज़रूरी स्वादों में लिपटी रहे। पैर मिथ्या जब विकार की तरफ़ दौड़ें। मन मिथ्या जब दूसरों के लोभ में फँसे। शरीर मिथ्या जब परोपकार न करे। नाक मिथ्या जब विकारों की गंध ले।

    “सफल देह नानक हरि हरि नाम लए”: शरीर तब सफल होता है जब हरि हरि नाम लिया जाए। यानी ये सारे अंग मिथ्या नहीं हैं, ये तब मिथ्या बनते हैं जब इनका इस्तेमाल ग़लत हो। सही इस्तेमाल करो तो ये सफल हैं।

    पउड़ी 6

    बिरथी साकत की आरजा ॥ साच बिना कह होवत सूचा ॥
    बिरथा नाम बिना तनु अंध ॥ मुखि आवत ता कै दुरगंध ॥
    बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ ॥ मेघ बिना जिउ खेती जाइ ॥
    गोबिंद भजन बिनु ब्रिथे सभ काम ॥ जिउ किरपन के निरारथ दाम ॥
    धंनि धंनि ते जन जिह घटि बसिओ हरि नाउ ॥ नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥6॥

    “बिरथी साकत की आरजा”: ईश्वर से विमुख (साकत) इंसान की ज़िंदगी व्यर्थ है। “बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ, मेघ बिना जिउ खेती जाइ”: बिना सिमरन के दिन-रात ऐसे गुज़रते हैं जैसे बिना बारिश के खेती बर्बाद हो जाती है। ये उपमा सीधी और ताक़तवर है। किसान मेहनत करता है, बीज बोता है, खेत जोतता है, लेकिन अगर बारिश नहीं हुई तो सब बेकार। ठीक वैसे ही, बिना सिमरन के ज़िंदगी की सारी मेहनत सूख जाती है।

    “जिउ किरपन के निरारथ दाम”: जैसे कंजूस के पैसे बेकार हैं (न ख़ुद खाए, न किसी को दे), वैसे ही बिना भजन के सारे काम बेकार हैं।

    पउड़ी 7

    रहत अवर कछु अवर कमावत ॥ मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥
    जाननहार प्रभू परबीन ॥ बाहरि भेख न काहू भीन ॥
    अवर उपदेसै आपि न करै ॥ आवत जावत जनमै मरै ॥
    जिस कै अंतरि बसै निरंकारु ॥ तिस की सीख तरै संसारु ॥
    जो आप भाने तिन प्रभु जाता ॥ नानक उन जन चरन पराता ॥7॥

    “रहत अवर कछु अवर कमावत”: कहता कुछ है, करता कुछ और है। “मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत”: मन में प्रीत नहीं, मुँह से (झूठी) गाँठ लगाता है (बातें बनाता है)।

    ये दोहरेपन (hypocrisy) की सीधी पहचान है। “जाननहार प्रभू परबीन”: लेकिन जानने वाला प्रभु बहुत चतुर है, उसे सब पता है। “बाहरि भेख न काहू भीन”: बाहरी वेश से कोई भी उसे बेवक़ूफ़ नहीं बना सकता।

    “अवर उपदेसै आपि न करै”: दूसरों को उपदेश देता है, ख़ुद नहीं करता। ये लाइन हम सबके लिए आईना है। “जिस कै अंतरि बसै निरंकारु, तिस की सीख तरै संसारु”: जिसके अंदर निरंकार बसता है, उसकी सीख से संसार तरता है। सिखाने का हक़ उसे है जो ख़ुद जीता है।

    पउड़ी 8

    करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥ अपना कीआ आपहि मानै ॥
    आपहि आप आपि करत निबेरा ॥ किसै दूरि जनावत किसै बुझावत नेरा ॥
    उपाव सिआणप सगल ते रहत ॥ सभु कछु जानै आतम की रहत ॥
    जिसु भावै तिसु ले लड़ि लाइ ॥ थान थनंतरि रहिआ समाइ ॥
    सो सेवकु जिसु किरपा करी ॥ निमख निमख जपि नानक हरी ॥8॥5॥

    पाँचवीं अष्टपदी का समापन। “करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै”: मैं विनती करता हूँ, पारब्रह्म सब जानता है। “आपहि आप आपि करत निबेरा”: वो ख़ुद ही सब फ़ैसले करता है। किसी को दूर दिखाता है, किसी को पास बुलाता है। वो सारे उपायों और चतुराइयों से परे है। वो हर आत्मा की हालत जानता है।

    “जिसु भावै तिसु ले लड़ि लाइ”: जो उसे भाए (अच्छा लगे), उसे अपने दामन से लगा ले। “थान थनंतरि रहिआ समाइ”: हर जगह, हर कण में समाया हुआ है।

    “निमख निमख जपि नानक हरी”: पल-पल हरि को जपो। ये पाँचवीं अष्टपदी का सार है: कृतघ्न मत बनो, जो मिला है उसकी क़दर करो, और पल-पल उसे याद रखो।

    अष्टपदी 6

    “जिह प्रसादि”: कृपा का लेखा
    ये सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध अष्टपदियों में से है। हर पंक्ति “जिह प्रसादि” (जिसकी कृपा से) से शुरू होती है, और फिर पूछती है: तूने उसका शुक्र किया?

    श्लोक

    काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥
    नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥1॥
    काम, क्रोध, लोभ, मोह, और अहंकार, ये सब नष्ट हो जाएँ। नानक प्रभु की शरणागति में हैं, हे गुरुदेव, कृपा करो। ये श्लोक पाँच विकारों को नाम लेकर गिनाता है और उनसे छुटकारे की अरदास करता है।

    पउड़ी 1

    जिह प्रसादि छतीह अम्रित खाहि ॥ तिसु ठाकुर कउ रखु मन माहि ॥
    जिह प्रसादि सुगंधत तनि लावहि ॥ तिस कउ सिमरत परम गति पावहि ॥
    जिह प्रसादि बसहि सुख मंदिर ॥ तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि ॥
    जिह प्रसादि गृह संगि सुख बसना ॥ आठ पहर सिमरहु तिसु रसना ॥
    जिह प्रसादि रंग रस भोग ॥ नानक सदा धिआईऐ धिआवन जोग ॥1॥

    “जिह प्रसादि” की लय यहाँ से शुरू होती है और पूरी अष्टपदी में चलती है। ये एक कृतज्ञता का अभ्यास है, gratitude meditation है।

    जिसकी कृपा से आप छत्तीस प्रकार के अमृत (स्वादिष्ट भोजन) खाता है, उस ठाकुर को मन में रख। जिसकी कृपा से शरीर पर सुगंध लगाता है, उसे सिमरकर परम गति पा। जिसकी कृपा से सुख के महल में बसता है, उसे सदा मन में ध्या। जिसकी कृपा से घर-परिवार के संग सुख से रहता है, आठ पहर (24 घंटे) उसे जीभ से सिमर। जिसकी कृपा से रंग, रस, भोग मिलते हैं, उसे सदा ध्याओ।

    गुरु जी भोजन, सुगंध, घर, परिवार, भोग, इन सब सांसारिक सुखों को बुरा नहीं कह रहे। ये सब ईश्वर की कृपा हैं। बुराई तब है जब इन्हें भोगते हुए देने वाले को भूल जाएँ।

     

    पउड़ी 2

    जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥ तिसहि तिआगि कत अवर लुभावहि ॥
    जिह प्रसादि सुखि सेज सोईजै ॥ मन आठ पहर ता कउ जसु गावीजै ॥
    जिह प्रसादि आपु सभु को मानै ॥ मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥
    जिह प्रसादि आपके रहता धरमु ॥ मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
    प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ॥ नानक पति सेती घरि जावहि ॥2॥

    जिसकी कृपा से रेशमी (पाट-पटंबर) कपड़े पहनता है, उसे छोड़कर और किसमें लुभाता है? जिसकी कृपा से सुख की सेज पर सोता है, आठ पहर उसका यश गा। जिसकी कृपा से सब आपको मान देते हैं, उसका यश मुँह से बखान। जिसकी कृपा से आपका धर्म (जीवन-व्यवस्था) क़ायम है, सदा केवल पारब्रह्म को ध्या।

    “नानक पति सेती घरि जावहि”: नानक कहते हैं, इज़्ज़त के साथ घर (ईश्वर के दरबार) जाएँगे। “पति सेती” (इज़्ज़त के साथ) बड़ा ख़ूबसूरत शब्द है। ये “घर” ईश्वर का दरबार है, और वहाँ इज़्ज़त से पहुँचने का रास्ता कृतज्ञता है।

    पउड़ी 3

    जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥ लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
    जिह प्रसादि आपका ओला रहत ॥ मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
    जिह प्रसादि आपके सगल छिद्र ढाके ॥ मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
    जिह प्रसादि आपु को न पहूचै ॥ मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
    जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह ॥ नानक ता की भगति करेह ॥3॥

    जिसकी कृपा से निरोग सोने जैसा शरीर मिला, उस राम स्नेही में लिव लगा। जिसकी कृपा से आपकी इज़्ज़त (ओला, ढक्कन, छिपाव) क़ायम है, हरि का यश कहकर मन में सुख पा। जिसकी कृपा से आपके सगल छिद्र (कमियाँ, दोष) ढक दिए गए, उस ठाकुर की शरण में पड़। जिसकी कृपा से आपको कोई नहीं पहुँच सकता (कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता), साँस-साँस उस ऊँचे प्रभु को सिमर।

    “जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह”: जिसकी कृपा से ये दुर्लभ (बहुत मुश्किल से मिलने वाला) मनुष्य शरीर पाया, उसकी भक्ति कर। “द्रुलभ देह” पर ज़ोर है: गुरु जी कहते हैं ये शरीर आसानी से नहीं मिलता, ये बड़ा वरदान है, इसे बर्बाद मत करो।

     

    पउड़ी 4

    जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥ मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
    जिह प्रसादि असव हसति असवारी ॥ मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
    जिह प्रसादि बाग मिलख धना ॥ राखु प्रोइ प्रभु अपुने मना ॥
    जिनि आपकी मन बनत बनाई ॥ ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
    तिसहि धिआइ जो एक अलखै ॥ ईहा ऊहा नानक आपकी रखै ॥4॥

    जिसकी कृपा से आभूषण (गहने) पहनते हैं, उसे सिमरने में आलस क्यों? जिसकी कृपा से घोड़ों, हाथियों की सवारी है, उस प्रभु को कभी मत बिसारो। जिसकी कृपा से बाग़, ज़मीन, धन है, उसे अपने मन में प्रोई (पिरोकर) रखो। जिसने आपकी मन की बनत (रचना, सजावट) बनाई, उठते-बैठते उसे ध्या।

    “ईहा ऊहा नानक आपकी रखै”: इधर भी (इस लोक में) और उधर भी (परलोक में) वो आपकी रक्षा करेगा। ये वायदा है: अगर आप उसे याद रखे, तो वो दोनों जहानों में आपकी रक्षा करेगा।

     

    पउड़ी 5

    जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ॥ मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
    जिह प्रसादि आप आचार बिउहारी ॥ तिसु प्रभ कउ सासि सासि चिक्तारी ॥
    जिह प्रसादि आपका सुंदर रूपु ॥ सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
    जिह प्रसादि आपकी नीकी जाति ॥ सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
    जिह प्रसादि आपकी पति रहै ॥ गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥5॥

    जिसकी कृपा से पुण्य-दान करता है, उसे आठ पहर ध्या। जिसकी कृपा से आपका आचार-व्यवहार अच्छा है, उसे साँस-साँस याद कर। जिसकी कृपा से सुंदर रूप मिला, उस अनूप (अनुपम, बेमिसाल) प्रभु को सिमर। जिसकी कृपा से अच्छी जाति (कुल, हैसियत) मिली, उसे दिन-रात सिमर। जिसकी कृपा से आपकी पत (इज़्ज़त) क़ायम है, गुरु की कृपा से उसका यश कह।

    गुरु जी ने “जाति” (कुल) को भी ईश्वर की कृपा बताया। अक्सर लोग अपनी जाति पर गर्व करते हैं जैसे ये उनकी अपनी कमाई हो। गुरु जी कहते हैं: ये भी उसकी देन है, गर्व की कोई जगह नहीं।

     

    पउड़ी 6

    जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥ जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
    जिह प्रसादि बोलहि अम्रित रसना ॥ जिह प्रसादि सुखि सहजे बसना ॥
    जिह प्रसादि हसत कर चलहि ॥ जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
    जिह प्रसादि परम गति पावहि ॥ जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
    ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ॥ गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥6॥

    अब गुरु जी शरीर की इंद्रियों की तरफ़ मुड़ते हैं: जिसकी कृपा से कान संगीत सुनते हैं, आँखें विस्मय (आश्चर्य) देखती हैं, जीभ अमृत-वाणी बोलती है, सुख-सहज से बसते हैं, हाथ-पैर काम करते हैं, सब फल मिलते हैं, परम गति मिलती है, सुख-सहज में समा जाते हैं।

    “ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु”: ऐसे प्रभु को छोड़कर और किसमें लग रहे हैं? “गुर प्रसादि नानक मनि जागहु”: गुरु की कृपा से मन में जागो। ये “जागहु” (जागो) बहुत ज़ोरदार आदेश है। गुरु जी कह रहे हैं: आप सो रहे हैं, एक तरह की नींद में हो जहाँ आपको वो दिखता नहीं जो सब दे रहा है। जागो।

     

    पउड़ी 7

    जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥ तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसारि ॥
    जिह प्रसादि आपका परतापु ॥ रे मन मूड़ आप ता कउ जापु ॥
    जिह प्रसादि आपके कारज पूरे ॥ तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
    जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ॥ रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
    जिह प्रसादि सभ की गति होइ ॥ नानक जापु जपै जपु सोइ ॥7॥

    जिसकी कृपा से आप संसार में प्रकट (प्रसिद्ध, मौजूद) है, उसे मूल से (बिल्कुल) मत बिसार। जिसकी कृपा से आपका प्रताप (रौब, असर) है, हे मूर्ख मन, उसे जप। जिसकी कृपा से आपके सारे काम पूरे होते हैं, उसे सदा पास (हजूरे) जान। जिसकी कृपा से आप सत्य पाता है, हे मेरे मन, उसमें रच (डूब जा)।

    “रे मन मूड़ आप ता कउ जापु”: “रे मूर्ख मन” कहकर गुरु जी मन को सीधे संबोधित करते हैं। ये तकनीक पूरी सुखमनी साहिब में बार-बार आती है: गुरु जी किसी और को उपदेश नहीं दे रहे, वो अपने मन से बात कर रहे हैं। और यही सबसे प्रभावी उपदेश है।

     

    पउड़ी 8

    आपि जपाइ जपै सो नाउ ॥ आपि गावाइ सु हरि गुन गाउ ॥
    प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥ प्रभू दइआ ते कमल बिगासु ॥
    प्रभ सुप्रसंन बसै मनि सोइ ॥ प्रभ दइआ ते मति ऊतम होइ ॥
    सभल निधान प्रभ आपकी मइआ ॥ आपहु कछू न किनहू लइआ ॥
    जितु जितु लावहु तितु लगहि हरि नाथ ॥ नानक इन कै कछू न हाथ ॥8॥6॥

    छठी अष्टपदी का समापन एक गहरे सत्य से होता है: “आपि जपाइ जपै सो नाउ”: वो ख़ुद जपवाता है, तभी कोई नाम जपता है। “आपि गावाइ”: वो ख़ुद गवाता है, तभी कोई गुण गाता है।जपना और गाना भी उसकी कृपा है।

    “सभल निधान प्रभ आपकी मइआ, आपहु कछू न किनहू लइआ”: सारे ख़ज़ाने आपकी मेहर हैं, अपने से किसी ने कुछ नहीं लिया (कमाया)। “जितु जितु लावहु तितु लगहि”: जिधर-जिधर आप लगाए, उधर ही लगते हैं। “नानक इन कै कछू न हाथ”: इनके (जीवों के) हाथ में कुछ नहीं।

    ये अंतिम पंक्ति पूर्ण समर्पण है। कुछ भी मेरा नहीं, कुछ भी मेरे वश में नहीं। जो है, जो मिला, जो होंगे, सब उसकी मर्ज़ी से। ये भाव जब मन में बैठ जाए, तो अहंकार का कोई आधार नहीं बचता।

    अष्टपदी 7

    साध-संगत की महिमा
    सुखमनी साहिब में “साध” (संत) और “संगत” (सत्संग) बार-बार आते हैं। सातवीं अष्टपदी पूरी तरह इसी विषय को समर्पित है: संत की संगत क्या बदल सकती है?
    You Become Who You Sit With

    श्लोक

    अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥ जो जो कहै सु मुकता होइ ॥
    सुनि मीता नानकै बिनवंता ॥ साध जना की अचरज कथा ॥1॥
    वो पारब्रह्म अगम (पहुँच से परे) और अगाध (गहराई से परे) है। जो-जो उसे कहे (जपे), वो मुक्त हो जाता है। सुनो मित्रो, नानक विनती करता है: संत जनों की अचरज (आश्चर्यजनक) कथा सुनो। “अचरज कथा” कहकर गुरु जी जिज्ञासा जगाते हैं: आगे जो बताएँगे, वो चमत्कारी है।

    पउड़ी 1

    साध कै संगि मुखु ऊजल होत ॥ साधसंगि मलु सगली खोत ॥
    साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥ साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
    साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥ साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
    साध कै संगि पाइ नाम रतनु ॥ साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
    साध की महिमा बरनै कउन प्रानी ॥ नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥1॥

    “साध कै संगि” से हर पंक्ति शुरू होती है, और हर पंक्ति एक अलग फ़ायदा बताती है: संत की संगत से चेहरा उजला (रोशन) होता है। सारा मैल धुलता है। अभिमान मिटता है। सुज्ञान (सच्चा ज्ञान) प्रकट होता है। प्रभु पास लगने लगता है। सारे मामले सुलझ जाते हैं। नाम-रत्न मिलता है। और बस एक (ईश्वर) पर ध्यान लगता है।

    “साध की सोभा प्रभ माहि समानी”: संत की शोभा प्रभु में ही समाई हुई है, यानी संत और प्रभु में कोई फ़र्क़ नहीं। संत प्रभु का दर्पण है।

     

    पउड़ी 2

    साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥ साध कै संगि सदा परफुलै ॥
    साध कै संगि आवहि बसि पंचा ॥ साधसंगि अम्रित रसु भुंचा ॥
    साधसंगि होइ सभ की रेन ॥ साध कै संगि मनोहर बैन ॥
    साध कै संगि न कतहूं धावै ॥ साधसंगि असथिति मनु पावै ॥
    साध कै संगि माइआ ते भिंन ॥ साधसंगि नानक प्रभ सुप्रसंन ॥2॥

    संत की संगत से अगोचर (इंद्रियों से परे) ईश्वर मिलता है। सदा खिले रहते हैं। पाँच (विकार: काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) वश में आ जाते हैं। अमृत रस चखने को मिलता है। सबके चरणों की धूल बन जाते हैं। मनोहर (सुंदर) बोल बोलने लगते हैं। मन कहीं नहीं भटकता। मन को स्थिरता (असथिति) मिलती है। माया से अलग हो जाते हैं। और प्रभु प्रसन्न हो जाता है।

    “आवहि बसि पंचा” पर ध्यान दें: पाँच विकार वश में आ जाते हैं। गुरु जी ये नहीं कह रहे कि विकार मर जाते हैं, कह रहे हैं कि वो “बसि” (क़ाबू में) आ जाते हैं। वो रहते हैं, लेकिन अब आपके ग़ुलाम हैं, आप उनके नहीं।

     

    पउड़ी 3

    साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥ साधू कै संगि महा पुनीत ॥
    साधसंगि किस सिउ नही बैरु ॥ साध कै संगि न बीगा पैरु ॥
    साध कै संगि नाही को मंदा ॥ साधसंगि जाने परमानंदा ॥
    साध कै संगि नाही कउ तापु ॥ साध कै संगि तजै सभु आपु ॥
    आपे जानै साध बड़ाई ॥ नानक साध प्रभू बिनु नाई ॥3॥

    संत की संगत से दुश्मन भी मित्र हो जाते हैं। महा पवित्र हो जाते हैं। किसी से बैर नहीं रहता। पैर भटकता (बीगा) नहीं। कोई बुरा नहीं दिखता। परमानंद का अनुभव होता है। किसी तरह का ताप (कष्ट) नहीं रहता। और सारा “आपु” (अहंकार, मैं-पन) छूट जाता है।

    “नानक साध प्रभू बिनु नाई”: संत और प्रभु में कोई अंतर नहीं। ये गहरा वक्तव्य है। गुरु जी सीधे कह रहे हैं: संत प्रभु ही है। जो संत से मिला, वो प्रभु से मिला।

    लोहे को पारस पत्थर छू ले, तो लोहा सोना बन जाता है। लेकिन लोहे ने कोई मेहनत नहीं की, बस पारस के “संग” (संपर्क) में आया। ठीक वैसे ही, संत की संगत में बैठने मात्र से बदलाव शुरू हो जाता है। आपको कोई विशेष योग्यता नहीं चाहिए, बस संगत में बैठो।

    पउड़ी 4

    साध कै संगि न कबहूं धावै ॥ साध कै संगि सदा सुखु पावै ॥
    साधसंगि बसतु अगोचर लहै ॥ साधू कै संगि अजरु सहै ॥
    साध कै संगि बसै थानि ऊचै ॥ साधू कै संगि महलि पहूचै ॥
    साध कै संगि द्रिड़ै सभि धरम ॥ साध कै संगि केवल पारब्रहम ॥
    साध कै संगि पाइ नाम निधान ॥ नानक साधू कै कुरबान ॥4॥

    मन भटकना बंद करता है। सदा सुख पाता है। अगोचर (अदृश्य) वस्तु (ईश्वर) प्राप्त होती है। जो सहन नहीं हो सकता (“अजरु”), वो सहन होने लगता है। ऊँचे स्थान पर बसता है। महल (ईश्वर के दरबार) तक पहुँचता है। सारे धर्म दृढ़ होते हैं। केवल पारब्रह्म दिखता है। नाम-निधान (नाम का ख़ज़ाना) मिलता है।

    “नानक साधू कै कुरबान”: नानक संत पर कुर्बान है। हर पउड़ी के अंत में गुरु जी संतों पर बलिहारी जाते हैं,असली भाव है।

    पउड़ी 5

    साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥ साधसंगि साजन मीत कुटंब निसतारै ॥
    साधू कै संगि सो धनु पावै ॥ जिसु धन ते सभु को वरसावै ॥
    साधसंगि धरम राइ करे सेवा ॥ साध कै संगि सोभा सुरदेवा ॥
    साधू कै संगि पाप पलाइन ॥ साधसंगि अम्रित गुन गाइन ॥
    साध कै संगि स्रब थान गंमि ॥ नानक साध कै संगि सफल जनंम ॥5॥

    आपका पूरा कुल (वंश) उधर जाता है। साजन, मित्र, परिवार सब तरते हैं। ऐसा धन मिलता है जिससे सबको बरसा सको (बाँट सको)। धर्मराज तक सेवा करता है। देवताओं जैसी शोभा मिलती है। पाप भाग जाते हैं। अमृत गुण गाने को मिलते हैं। सारे स्थान (लोक) सुलभ हो जाते हैं।

    “नानक साध कै संगि सफल जनंम”: संत की संगत से जन्म सफल हो जाता है। “सफल जनंम” (सफल जन्म), ये दो शब्द पूरी ज़िंदगी का लेखा-जोखा समेट लेते हैं।

    पउड़ी 6

    साध कै संगि नही कछु घाल ॥ दरसनु भेटत होत निहाल ॥
    साध कै संगि कलूखत हरै ॥ साध कै संगि नरक परहरै ॥
    साध कै संगि ईहा ऊहा सुहेला ॥ साधसंगि बिछुरत हरि मेला ॥
    जो इछै सोई फलु पावै ॥ साध कै संगि न बिरथा जावै ॥
    पारब्रहमु साध रिद बसै ॥ नानक उधरै साध सुनि रसै ॥6॥

    “नही कछु घाल”: कोई मेहनत नहीं लगती, बस दर्शन (भेटत) करते ही निहाल (आनंदित) हो जाता है। कलंक (कलूखत) हटते हैं। नरक छूटता है। इधर और उधर (इस जन्म और अगले) दोनों जगह सुखी। बिछड़ा हुआ हरि से मिलन हो जाता है। जो इच्छा हो, वो फल मिलता है। संत की संगत में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।

    “पारब्रहमु साध रिद बसै”: पारब्रह्म संत के हृदय में बसता है। “नानक उधरै साध सुनि रसै”: नानक कहते हैं, संत की बात सुनकर, उसके रस में डूबकर, उद्धार होता है।

    पउड़ी 7

    साध कै संगि सुनउ हरि नाउ ॥ साधसंगि हरि के गुन गाउ ॥
    साध कै संगि न मन ते बिसरै ॥ साधसंगि सरपर निसतरै ॥
    साध कै संगि लगै प्रभु मीठा ॥ साधू कै संगि घटि घटि डीठा ॥
    साधसंगि भइ आगिआकारी ॥ साधसंगि गति भई हमारी ॥
    साध कै संगि मिटे सभि रोग ॥ नानक साध भेटे संजोग ॥7॥

    संत की संगत में हरि का नाम सुनो, हरि के गुण गाओ, मन से नहीं बिसरता (भूलता), ज़रूर (सरपर) पार होते हैं, प्रभु मीठा लगने लगता है, हर हृदय में दिखने लगता है, आज्ञाकारी बन जाते हैं, गति (मुक्ति) मिलती है, और सारे रोग मिटते हैं।

    “नानक साध भेटे संजोग”: संत से मिलना संयोग (किस्मत, भाग्य) से होता है। संत की संगत ढूँढने से नहीं मिलती, ये ईश्वर की मेहर है कि आपका रास्ता किसी संत से मिलवा दे।

    पउड़ी 8

    साध की महिमा बेद न जानहि ॥ जेता सुनहि तेता बखिआनहि ॥
    साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि ॥ साध की उपमा रही भरपूरि ॥
    साध की सोभा का नाही अंत ॥ साध की सोभा सदा बेअंत ॥
    साध की सोभा ऊच ते ऊची ॥ साध की सोभा मूच ते मूची ॥
    साध की सोभा साध बनि आई ॥ नानक साध प्रभू बेदु न भाई ॥8॥7॥

    सातवीं अष्टपदी का समापन। “साध की महिमा बेद न जानहि”: संत की महिमा वेद भी नहीं जानते। “साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि”: संत की उपमा तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से परे है। “साध की सोभा ऊच ते ऊची, मूच ते मूची”: ऊँचे से ऊँची, बड़ी से बड़ी।

    “नानक साध प्रभू बेदु न भाई”: संत और प्रभु में कोई भेद (फ़र्क़) नहीं। ये सातवीं अष्टपदी का मुख्य बिंदु है, वही बात जो तीसरी पउड़ी में कही थी, अब पूरे ज़ोर से दोहराई: संत प्रभु का ही रूप है।

    अष्टपदी 8

    ब्रह्मज्ञानी की पहचान
    ये सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध अष्टपदी है। “ब्रह्मज्ञानी” (ब्रह्म को जानने वाला) कैसा होता है, गुरु जी उसका पूरा चित्र खींचते हैं। हर पउड़ी एक प्रकृति-उपमा से शुरू होती है।
    Unshaken in the Noise

    श्लोक

    मनि साचा मुखि साचा सोइ ॥ अवरु न पेखै एकसु बिनु कोइ ॥
    नानक एह लछण ब्रह्म गिआनी होइ ॥1॥
    मन में सच है, मुँह पर सच है। एक के बिना दूसरा किसी को नहीं देखता। नानक कहते हैं, ये ब्रह्मज्ञानी के लक्षण हैं। ब्रह्मज्ञानी वो है जिसका अंदर और बाहर एक है, और जो हर जगह सिर्फ़ एक ही (ईश्वर) देखता है।

    पउड़ी 1

    ब्रहम गिआनी सदा निरलेप ॥ जैसे जल मह कमल अलेप ॥
    ब्रहम गिआनी सदा निरदोख ॥ जैसे सूरु सबल का सोख ॥
    ब्रहम गिआनी कै द्रिसटि समानि ॥ जैसे राज रंक कउ लागै तुलि पवान ॥
    ब्रहम गिआनी कै धीरजु एक ॥ जिउ बसुधा कोऊ खोदै कोऊ चंदन लेप ॥
    ब्रहम गिआनी का इहै गुनाउ ॥ नानक जिउ पावक का सहज सुभाउ ॥1॥

    ये पउड़ी पाँच प्रकृति-उपमाओं से बनी है:

    ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेप (लिप्त नहीं) है, जैसे कमल पानी में रहकर भी भीगता नहीं। ब्रह्मज्ञानी सदा निर्दोष है, जैसे सूरज सबका (अच्छे-बुरे, ऊँचे-नीचे का) सोखता (सुखाता) है, भेद नहीं करता। ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि समान है, जैसे हवा (पवन) राजा और रंक (ग़रीब) दोनों को एक समान छूती है। ब्रह्मज्ञानी का धीरज (धैर्य) एक-सा है, जैसे धरती (बसुधा) को कोई खोदे, कोई चंदन का लेप करे, धरती को फ़र्क़ नहीं पड़ता।

    “ब्रहम गिआनी का इहै गुनाउ, नानक जिउ पावक का सहज सुभाउ”: ब्रह्मज्ञानी का यही गुण है, जैसे अग्नि (पावक) का सहज स्वभाव है, जलाना। अग्नि को सिखाना नहीं पड़ता कि कैसे जलना है। वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को अच्छा होने की कोशिश नहीं करनी पड़ती, वो सहज ही ऐसा है।

    पउड़ी 2

    ब्रहम गिआनी निरमल ते निरमला ॥ जैसे मैलु न लागै जला ॥
    ब्रहम गिआनी कै मनि होइ प्रगासु ॥ जैसे धर ऊपरि आकासु ॥
    ब्रहम गिआनी कै मित्र सत्रु समानि ॥ ब्रहम गिआनी कै नाही अभिमान ॥
    ब्रहम गिआनी ऊच ते ऊचा ॥ मनि अपने है सभ ते नीचा ॥
    ब्रहम गिआनी से जन भए ॥ नानक जिन प्रभु आपि करए ॥2॥

    ब्रह्मज्ञानी निर्मल से निर्मल (शुद्ध से शुद्ध) है, जैसे पानी पर मैल नहीं टिकती (पानी ख़ुद को साफ़ कर लेता है)। उसके मन में प्रकाश है, जैसे धरती के ऊपर आकाश (खुला, असीम, हर जगह)। उसके लिए मित्र और शत्रु समान हैं। उसमें अभिमान नहीं।

    और फिर वो ख़ूबसूरत विरोधाभास: “ब्रहम गिआनी ऊच ते ऊचा, मनि अपने है सभ ते नीचा”: ब्रह्मज्ञानी ऊँचे से ऊँचा है, लेकिन अपने मन में सबसे नीचा है। ये वही बात है जो तीसरी अष्टपदी की छठी पउड़ी में कही थी: “आपस कउ जो जाणै नीचा, सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा।”

    “ब्रहम गिआनी से जन भए, नानक जिन प्रभु आपि करए”: ब्रह्मज्ञानी वो बनते हैं जिन्हें प्रभु ख़ुद बनाए। ये कोई डिग्री नहीं जो कमाई जाए, ये ईश्वर की कृपा है।

    पउड़ी 3

    ब्रहम गिआनी सगल की रीना ॥ आतम रसु ब्रहम गिआनी चीना ॥
    ब्रहम गिआनी की सभ ऊपरि मइआ ॥ ब्रहम गिआनी ते कछु बुरा न भइआ ॥
    ब्रहम गिआनी सदा समदरसी ॥ ब्रहम गिआनी की द्रिसटि अम्रितु बरसी ॥
    ब्रहम गिआनी बंधन ते मुकता ॥ ब्रहम गिआनी की निरमल जुगता ॥
    ब्रहम गिआनी का भोजनु गिआन ॥ नानक ब्रहम गिआनी का ब्रहम धिआन ॥3॥

    ब्रह्मज्ञानी सबके चरणों की धूल (रीना) है। उसने आत्म-रस (अपने भीतर का रस) पहचान लिया है। सब पर उसकी मया (करुणा) है। उससे कभी कुछ बुरा नहीं होता। वो सदा समदर्शी (सबको बराबर देखने वाला) है। उसकी दृष्टि से अमृत बरसता है। वो बंधनों से मुक्त है। उसकी जुगति (जीवन-विधि) निर्मल है।

    “ब्रहम गिआनी का भोजनु गिआन”: उसका भोजन ज्ञान है। “ब्रहम गिआनी का ब्रहम धिआन”: उसका ध्यान ब्रह्म है। खाता ज्ञान, पीता ध्यान। शरीर को भोजन चाहिए, मन को ज्ञान चाहिए, आत्मा को ब्रह्म चाहिए।

    पउड़ी 4

    ब्रहम गिआनी एक ऊपरि आस ॥ ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥
    ब्रहम गिआनी कै गरीबी समाहा ॥ ब्रहम गिआनी परउपकार उमाहा ॥
    ब्रहम गिआनी कै नाही धंधा ॥ ब्रहम गिआनी ले धावतु बंधा ॥
    ब्रहम गिआनी कै होइ सु भला ॥ ब्रहम गिआनी सुफल फला ॥
    ब्रहम गिआनी संगि सगल उधारु ॥ नानक ब्रहम गिआनी जपै सगल संसारु ॥4॥

    ब्रह्मज्ञानी की एक ही आस (आशा) है: ईश्वर। उसका कभी विनाश नहीं होता। उसमें गरीबी (विनम्रता) का समुद्र है। परोपकार का उत्साह (उमाहा) है। उसे कोई धंधा (सांसारिक उलझन) नहीं। उसने भटकते मन को बाँध लिया है। उसके साथ जो भी होता है, अच्छा ही होता है। उसका फल सदा सफल है।

    “ब्रहम गिआनी संगि सगल उधारु”: ब्रह्मज्ञानी की संगत में सबका उद्धार होता है। “ब्रहम गिआनी जपै सगल संसारु”: सारा संसार ब्रह्मज्ञानी को जपता है (उसकी महिमा गाता है)।

    पउड़ी 5

    ब्रहम गिआनी कै एकै रंग ॥ ब्रहम गिआनी कै बसै प्रभु संग ॥
    ब्रहम गिआनी कै नामु आधारु ॥ ब्रहम गिआनी कै नामु परवारु ॥
    ब्रहम गिआनी सदा सद जागत ॥ ब्रहम गिआनी अहंबुधि तिआगत ॥
    ब्रहम गिआनी कै मनि परमानंद ॥ ब्रहम गिआनी कै घरि सदा अनंद ॥
    ब्रहम गिआनी सुख सहजि निवास ॥ नानक ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥5॥

    ब्रह्मज्ञानी का एक ही रंग है (एकाग्र, एकरस)। प्रभु उसके संग बसता है। नाम ही उसका आधार है। नाम ही उसका परिवार है। वो सदा जागृत है। अहंकार-बुद्धि का त्याग कर चुका है। उसके मन में परमानंद है। उसके घर में सदा आनंद है। वो सुख-सहज में बसता है। उसका कभी विनाश नहीं होता।

    “ब्रहम गिआनी कै नामु परवारु”: नाम ही उसका परिवार है। ये बड़ी गहरी बात है। इसका मतलब ये नहीं कि उसने सांसारिक परिवार छोड़ दिया। मतलब यह है कि उसकी गहरी पहचान और गहरा रिश्ता नाम से है। बाक़ी रिश्ते भी हैं, लेकिन जड़ नाम है।

    पउड़ी 6

    ब्रहम गिआनी ब्रहम का बेता ॥ ब्रहम गिआनी एक संगि हेता ॥
    ब्रहम गिआनी कै होइ अचिंत ॥ ब्रहम गिआनी का निरमल मंत ॥
    ब्रहम गिआनी जिसु करै प्रभु आपि ॥ ब्रहम गिआनी का बड़ परतापु ॥
    ब्रहम गिआनी का दरसु बडभागी पाईऐ ॥ ब्रहम गिआनी कउ बलि बलि जाईऐ ॥
    ब्रहम गिआनी कउ खोजहि महेसुर ॥ नानक ब्रहम गिआनी आपि परमेसुर ॥6॥

    ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म का जानने वाला (बेता) है। एक (ईश्वर) से ही उसका प्रेम (हेता) है। वो अचिंत (चिंता-रहित) है। उसका मंत्र निर्मल है। उसे प्रभु ख़ुद बनाता है। उसका बड़ा प्रताप है। उसका दर्शन बड़भागी (बड़े भाग्यशाली) को मिलता है। उस पर बलिहारी जाना चाहिए।

    “ब्रहम गिआनी कउ खोजहि महेसुर”: शिव (महेसुर) भी ब्रह्मज्ञानी को खोजते हैं। “नानक ब्रहम गिआनी आपि परमेसुर”: नानक कहते हैं, ब्रह्मज्ञानी ख़ुद परमेश्वर है। ये गहरा वक्तव्य है: ब्रह्मज्ञानी और परमेश्वर में कोई भेद नहीं। जो ब्रह्म को जान लेता है, वो ब्रह्म ही हो जाता है।

    पउड़ी 7

    ब्रहम गिआनी की कीमति नाहि ॥ ब्रहम गिआनी कै सगल मन माहि ॥
    ब्रहम गिआनी का कउन जानै भेदु ॥ ब्रहम गिआनी कउ सदा अदेसु ॥
    ब्रहम गिआनी का कथिआ न जाइ अधाखरु ॥ ब्रहम गिआनी सबल का ठाकुरु ॥
    ब्रहम गिआनी की मिति कउन बखानै ॥ ब्रहम गिआनी की गति ब्रहम गिआनी जानै ॥
    ब्रहम गिआनी का अंतु न पारु ॥ नानक ब्रहम गिआनी कउ सदा नमसकारु ॥7॥

    ब्रह्मज्ञानी की कीमत लगाई नहीं जा सकती। सबके मन में वो बसता है। उसका भेद कौन जाने? उसे सदा नमस्कार (अदेसु) है। उसका आधा अक्षर भी बयान नहीं हो सकता। वो सबका ठाकुर (मालिक) है। उसकी मिति (सीमा) कौन बखाने? ब्रह्मज्ञानी की गति (अवस्था) सिर्फ़ ब्रह्मज्ञानी जानता है। उसका अंत नहीं, पार नहीं।

    “ब्रहम गिआनी की गति ब्रहम गिआनी जानै”: ये बड़ी ज़रूरी बात है। गुरु जी कह रहे हैं: बाहर से देखकर, शास्त्र पढ़कर, तर्क लगाकर ब्रह्मज्ञानी को नहीं समझा जा सकता। उसे सिर्फ़ वही समझ सकता है जो ख़ुद उस अवस्था में हो। ये अनुभव की बात है, बुद्धि की नहीं।

    पउड़ी 8

    ब्रहम गिआनी सभ स्रिसटि का करता ॥ ब्रहम गिआनी सद जीवै नही मरता ॥
    ब्रहम गिआनी मुकति जुगति जीअ का दाता ॥ ब्रहम गिआनी पूरन पुरखु बिधाता ॥
    ब्रहम गिआनी अनाथ का नाथु ॥ ब्रहम गिआनी का सभ ऊपरि हाथु ॥
    ब्रहम गिआनी का सगल अकारु ॥ ब्रहम गिआनी आपि निरंकारु ॥
    ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी ॥ नानक ब्रहम गिआनी सबल का धनी ॥8॥8॥

    आठवीं अष्टपदी का समापन, और ये सुखमनी साहिब के ऊँचे शिखरों में से है। ब्रह्मज्ञानी सारी सृष्टि का कर्ता है। वो सदा जीवित है, कभी मरता नहीं। वो मुक्ति और जीवन-विधि (जुगति) का दाता है। वो पूर्ण पुरुष, विधाता है। अनाथों का नाथ है। सब पर उसका हाथ (रक्षा) है। सारा आकार (दृश्य जगत) उसका है। और वो ख़ुद निराकार है।

    “ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी”: ब्रह्मज्ञानी की शोभा ख़ुद ब्रह्मज्ञानी को ही शोभती है, दूसरा उसका वर्णन नहीं कर सकता। “नानक ब्रहम गिआनी सबल का धनी”: ब्रह्मज्ञानी सबका मालिक (धनी) है।

    ये अष्टपदी इसलिए इतनी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये मनुष्य की ऊँची संभावना का चित्र खींचती है। गुरु जी कह रहे हैं कि इंसान के लिए ये मुमकिन है कि वो ब्रह्म को इतनी गहराई से जान ले कि ब्रह्म और वो एक हो जाएँ। ये दूर का सपना सुनाई दे सकता है, मगर गुरु की कृपा से संभव है।

    अष्टपदी 9

    सच्चे सेवक के लक्षण
    आठवीं अष्टपदी में ब्रह्मज्ञानी का चित्र खींचा। नवीं अष्टपदी ज़मीन पर उतरती है: रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सच्चा सेवक (भक्त) कैसा होता है? उसकी इंद्रियाँ कैसे काम करती हैं?
    Service Without Signature

    श्लोक

    उरि धारै जो अंतरि नामु ॥ सभ मै पेखै भगवानु ॥
    निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥ नानक ओहु अपरसु सगल निसतारै ॥1॥
    जो हृदय में नाम धारण करता है, सब में भगवान देखता है, पल-पल ठाकुर को नमस्कार करता है, नानक कहते हैं, वो अपरस (अछूता, विकारों से अछूता) सबका उद्धार करता है।

    पउड़ी 1

    मिथिआ नाही रसना परसु ॥ मन मह प्रीति निरंजन दरसु ॥
    पर त्रिअ रूपु न पेखै नेत्र ॥ साध की टहल संतसंगि हेत ॥
    करन न सुनै काहू की निंदा ॥ सभ ते जानै आपस कउ मंदा ॥
    गुर प्रसादि बिखिआ परहरै ॥ मन की बासना मन ते टरै ॥
    इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥ नानक कोटि मधे को ऐसा अपरसु ॥1॥

    गुरु जी इंद्रियों को एक-एक करके लेते हैं और बताते हैं कि सच्चे सेवक की इंद्रियाँ कैसे काम करती हैं:

    जीभ (रसना) झूठ नहीं बोलती। मन में निरंजन (निर्मल ईश्वर) के दर्शन की प्रीत है। आँखें (नेत्र) पराई स्त्री/पुरुष का रूप नहीं देखतीं। संतों की सेवा और सत्संग से प्रेम है। कान किसी की निंदा नहीं सुनते। सबसे अपने आप को कमतर (मंदा) जानता है। गुरु की कृपा से विषय-विकार छोड़ देता है। मन की वासना मन से ही टरती (हटती) है।

    “इंद्री जित पंच दोख ते रहत”: इंद्रियों को जीत लिया, पाँच दोषों से मुक्त है। “नानक कोटि मधे को ऐसा अपरसु”: करोड़ों में कोई एक ऐसा अपरस (विकारों से अछूता) होता है।

    पउड़ी 2

    बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥ बिसन की माइआ ते होइ भिंन ॥
    करम करत होवै निहकरम ॥ तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥
    काहू फल की इछा नही बाछै ॥ केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥
    मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥ सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
    आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै ॥ नानक ओहु बैसनो परम गति पावै ॥2॥

    “बैसनो” (वैष्णव, भक्त) वो है जिस पर ईश्वर प्रसन्न है और जो माया से अलग है। “करम करत होवै निहकरम”: कर्म करते हुए भी निष्कर्म है। ये गीता का भी केंद्रीय विचार है: काम करो, लेकिन फल की चिंता मत करो। गुरु जी इसे अपने शब्दों में कहते हैं।

    “काहू फल की इछा नही बाछै”: किसी फल की इच्छा नहीं रखता। “केवल भगति कीरतन संगि राचै”: केवल भक्ति और कीर्तन में रचा रहता है। “आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै”: ख़ुद जपता है और दूसरों को भी जपवाता है। सच्चा भक्त सिर्फ़ अपने लिए नहीं जपता, वो दूसरों को भी जोड़ता है।

    पउड़ी 3

    भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥ सगल तिआगै दुसट का संगु ॥
    मन ते बिनसै सगला भरमु ॥ करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥
    साधसंगि पापा मलु खोवै ॥ तिसु भगउती कि मति ऊतम होवै ॥
    भगवंत की टहल करै नित नीति ॥ मनु तनु अरपै बिसन परीति ॥
    हरि के चरन हिरदै बसावै ॥ नानक ऐसा भगउती भगवंत कउ पावै ॥3॥

    “भगउती” (भगवती, देवी का उपासक, या यहाँ शक्ति-भक्त) वो है जिसमें भगवंत की भक्ति का रंग चढ़ा है। दुष्टों की संगत छोड़ दी है। मन से सारा भ्रम मिट गया है। सारे पारब्रह्म की पूजा करता है (किसी एक देवता की नहीं, सबमें एक को देखता है)।

    साधसंगत में पापों का मैल धोता है। भगवंत की टहल (सेवा) नित्य-नियम से करता है। मन-तन अर्पित कर देता है। हरि के चरण हृदय में बसाता है। ऐसा भक्त भगवंत को पाता है।

    पउड़ी 4

    सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥ राम नामु आतम मह सोधै ॥
    राम नाम सारु रसु पीवै ॥ उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै ॥
    हरि की कथा हिरदै बसावै ॥ सो पंडितु फिरि जोनि न आवै ॥
    बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूलु ॥ सूखम मह जानै असथूलु ॥
    चहु वरना कउ दे उपदेसु ॥ नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु ॥4॥

    अब गुरु जी “पंडित” (विद्वान) की परिभाषा बदलते हैं। असली पंडित वो नहीं जिसने बहुत किताबें पढ़ी हैं। असली पंडित वो है जो मन को परबोधे (जगाए, समझाए)। जो राम नाम को अपनी आत्मा में खोजे। जो नाम-रस पीए। जिसके उपदेश से जगत जीवित हो। जो हरि की कथा हृदय में बसाए। जो फिर जन्म-मरण के चक्र में न आए।

    “सूखम मह जानै असथूलु”: सूक्ष्म में स्थूल को जाने, यानी छोटी-से-छोटी चीज़ में उस विशाल सत्य को देखे। “चहु वरना कउ दे उपदेसु”: चारों वर्णों को उपदेश दे, यानी भेदभाव न करे, सबको सिखाए।

    पउड़ी 5

    बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥ चहु वरना मह जपै कोऊ नामु ॥
    जो जो जपै तिस की गति होइ ॥ साधसंगि पावै जनु कोइ ॥
    करि किरपा अंतरि उर धारै ॥ पसु प्रेत मुगध पाथर कउ तारै ॥
    सबल रोग का अउखदु नामु ॥ कलिआण रूप मंगल गुण गाम ॥
    काहू जुगति किते न पाईऐ धरमि ॥ नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि ॥5॥

    “बीज मंत्रु सरब को गिआनु”: बीज-मंत्र (मूल मंत्र) सबका ज्ञान है, सबके लिए उपलब्ध है। “चहु वरना मह जपै कोऊ नामु”: चारों वर्णों में से कोई भी नाम जप सकता है। ये बड़ी महत्वपूर्ण बात है।सबका है।

    “पसु प्रेत मुगध पाथर कउ तारै”: पशु, प्रेत, मूर्ख, पत्थर तक को तार देता है। “सबल रोग का अउखदु नामु”: सारे रोगों की औषधि नाम है। “काहू जुगति किते न पाईऐ धरमि”: किसी युक्ति (तरीक़े) या किसी धर्म (कर्मकांड) से नहीं पाया जाता। “नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि”: जिसकी तक़दीर में शुरू से (धुर से) लिखा है, उसे मिलता है।

    पउड़ी 6

    जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥ तिस का नामु सति रामदासु ॥
    आतम रामु तिसु नदरी आइआ ॥ दास दसंतण भाइ तिनि पाइआ ॥
    सदा निकटि निकटि हरि जानु ॥ सो दासु दरगह परवानु ॥
    अपुने दास कउ आपि किरपा करै ॥ तिसु दास कउ सभ सोझी परै ॥
    सगल संगि आतम उदासु ॥ ऐसी जुगति नानक रामदासु ॥6॥

    जिसके मन में पारब्रह्म का निवास है, उसका सच्चा नाम “रामदास” (राम का दास) है। उसने आत्मा-राम को देख लिया है। दास-

    दसांतण (दासों के दास) के भाव से उसने पाया है। वो सदा हरि को पास जानता है। वो दरगाह (ईश्वर के दरबार) में मान्य है।

    “सगल संगि आतम उदासु”: सबके संग (साथ) रहते हुए भी आत्मा से उदास (विरक्त, अनासक्त) है। ये बड़ी बारीक बात है। उदासी का मतलब दुखी होना नहीं, उदासी का मतलब है लिपटना नहीं। वो सबके साथ है, हँसता है, काम करता है, लेकिन अंदर से चिपकता नहीं।

    पउड़ी 7

    प्रभ की आगिआ आतम हितावै ॥ जीवन मुकतु सोऊ कहावै ॥
    तैसा हरखु तैसा उसु सोगु ॥ सदा अनंदु तह नही बिओगु ॥
    तैसा सुवरनु तैसी उसु माटी ॥ तैसा अम्रितु तैसी बिखु खाटी ॥
    तैसा मानु तैसा अभिमानु ॥ तैसा रंकु तैसा राजानु ॥
    जो वरताए साई जुगति ॥ नानक ओहु पुरखु कहीऐ जीवन मुकति ॥7॥

    ये पउड़ी “जीवन मुक्त” (जीते-जी मुक्त) इंसान का वर्णन करती है। “प्रभ की आगिआ आतम हितावै”: प्रभु की आज्ञा को आत्मा का हित (भला) मानता है। वैसा ही हर्ष, वैसा ही शोक (यानी दोनों बराबर)। सदा आनंद, कभी वियोग नहीं। सोना और मिट्टी बराबर। अमृत और ज़हर बराबर। मान और अपमान बराबर। रंक (ग़रीब) और राजा बराबर।

    ये “बराबर” होना दरअसल एक गहरी होशियारी की निशानी है। इंसान तब सब कुछ बराबर देखता है जब उसे पता चल जाता है कि सब कुछ एक ही स्रोत से । सोना भी उसी का, मिट्टी भी उसी की। सुख भी उसी का, दुख भी उसी का। तो फ़र्क़ क्या?

    “जो वरताए साई जुगति”: जो (ईश्वर) करवाए, वही जीवन-विधि। “नानक ओहु पुरखु कहीऐ जीवन मुकति”: ऐसा पुरुष जीवन-मुक्त कहलाता है।

    पउड़ी 8

    पारब्रहम के सगले ठाउ ॥ जितु जितु घरि राखै तैसा तिन नाउ ॥
    आपे करन करावन जोगु ॥ प्रभ भावै सोई फुनि होगु ॥
    पसरिओ आपि होइ अनत तरंग ॥ लखे न जाहि पारब्रहम के रंग ॥
    जैसी मति दे तैसा परगास ॥ पारब्रहमु करता अबिनास ॥
    सदा सदा सदा दइआल ॥ सिमरि सिमरि नानक भए निहाल ॥8॥9॥

    नवीं अष्टपदी का समापन। पारब्रह्म के सारे स्थान हैं (वो हर जगह है)। जिस-जिस घर (शरीर, जीव) में जैसा रखे, वैसा उसका नाम (स्वभाव) है। वो ख़ुद करने और करवाने योग्य है। जो प्रभु को भाए, वही होंगे। वो अनंत तरंगों में फैला हुआ है। उसके रंग (लीलाएँ) लाखों में भी नहीं देखे जा सकते।

    “जैसी मति दे तैसा परगास”: जैसी बुद्धि देता है, वैसा प्रकाश (समझ) होता है। “सदा सदा सदा दइआल”: सदा, सदा, सदा दयालु है। “सदा” तीन बार, जैसे पहली अष्टपदी में “सिमरउ” तीन बार। गुरु जी जब कोई बात तीन बार कहें, तो वो हृदय में गहरी उतारनी है।

    अष्टपदी 10

    सृष्टि की विशालता
    दसवीं अष्टपदी ब्रह्मांड की विशालता का एक चक्कर लगाती है। “कई कोटि” (करोड़ों) से हर पंक्ति शुरू होती है। ये गुरु जी की अपनी cosmic meditation है, ईश्वर कितना बड़ा है, इसका अंदाज़ा लगाने का प्रयास।
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    श्लोक

    उसतति करहि अनेक जन अंतु न पारावार ॥
    नानक रचना प्रभि रची बहु बिधि अनिक प्रकार ॥1॥
    Ustati karahi anek jan ant na paaraavaar. Naanak rachna prabh rachee bahu bidh anik prakaar.
    अनेक जन (लोग) स्तुति करते हैं, लेकिन उसका अंत नहीं, पार नहीं। नानक कहते हैं, प्रभु ने अनेक विधियों और अनेक प्रकार से रचना रची है। ये श्लोक पूरी दसवीं अष्टपदी का सूत्र है: रचना इतनी विशाल है कि कोई गिन नहीं सकता।

    पउड़ी 1

    कई कोटि होए पूजारी ॥ कई कोटि आचार बिउहारी ॥
    कई कोटि भए तीरथ वासी ॥ कई कोटि बन भ्रमहि उदासी ॥
    कई कोटि बेद के सरोते ॥ कई कोटि तपीसुर होते ॥
    कई कोटि आतम धिआनु धारहि ॥ कई कोटि कबि काबि बीचारहि ॥
    कई कोटि नवतन नाम धिआवहि ॥ नानक करते का अंतु न पावहि ॥1॥

    “कई कोटि” (करोड़ों) की लय शुरू होती है। करोड़ों पूजारी हैं। करोड़ों आचार-व्यवहार वाले हैं। करोड़ों तीर्थवासी हैं। करोड़ों वन में भ्रमण करने वाले संन्यासी हैं। करोड़ों वेद के श्रोता हैं। करोड़ों तपस्वी हैं। करोड़ों आत्म-ध्यान धारते हैं। करोड़ों कवि काव्य-विचार करते हैं। करोड़ों नित-नये नाम ध्याते हैं।

    “नानक करते का अंतु न पावहि”: लेकिन नानक कहते हैं, कर्ता (ईश्वर) का अंत कोई नहीं पाता। इतने सारे लोग, इतने तरीक़ों से, इतनी साधना करते हैं, फिर भी वो अनंत रहता है। ये विनम्रता का पाठ है: आप कितना भी कर लो, वो आपसे बड़ा रहेगा।

    पउड़ी 2

    कई कोटि भए अभिमानी ॥ कई कोटि अंध अगिआनी ॥
    कई कोटि किरपन कठोर ॥ कई कोटि अभिग आतम निकोर ॥
    कई कोटि पर दरब कउ हिरहि ॥ कई कोटि पर दूखना करहि ॥
    कई कोटि माइआ स्रम माहि ॥ कई कोटि परदेस भ्रमाहि ॥
    जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥ नानक करते कि जानै करता रचना ॥2॥

    पहली पउड़ी में भक्तों की गिनती थी, अब विपरीत दिशा: करोड़ों अभिमानी हैं। करोड़ों अंधे अज्ञानी हैं। करोड़ों कृपण (कंजूस) और कठोर हैं। करोड़ों निर्दय हैं। करोड़ों पराया धन चुराते हैं। करोड़ों दूसरों को दुख देते हैं। करोड़ों माया के श्रम (मेहनत) में फँसे हैं। करोड़ों परदेश में भटकते हैं।

    गुरु जी भेद नहीं कर रहे। वो कह रहे हैं: ये सब भी ईश्वर की रचना है। भक्त भी, पापी भी, सब उसी के बनाए हैं। “जितु जितु लावहु तितु तितु लगना”: जिधर लगाए, उधर लगते हैं। “नानक करते कि जानै करता रचना”: कर्ता की रचना कर्ता ही जानता है। हम न्याय करने की स्थिति में नहीं हैं।

    पउड़ी 3

    कई कोटि सिध जती जोगी ॥ कई कोटि राजे रस भोगी ॥
    कई कोटि पंखी सपल उपाइ ॥ कई कोटि पाथर बिरख निपजाइ ॥
    कई कोटि पवण पाणी बैसंतर ॥ कई कोटि देस भू मंडल ॥
    कई कोटि ससीअर सूर नखत्र ॥ कई कोटि देव दानव इंद्र सिरि छत्र ॥
    सगल समगरी अपने सूति धारै ॥ नानक जिसु जिसु भावै तिसु तिसु निसतारै ॥3॥

    अब सृष्टि का विस्तार: करोड़ों सिद्ध, जती, योगी। करोड़ों राजा, रस-भोगी। करोड़ों पक्षी, सर्प। करोड़ों पत्थर, वृक्ष। करोड़ों वायु, जल, अग्नि। करोड़ों देश, भू-मंडल। करोड़ों चंद्रमा, सूर्य, नक्षत्र। करोड़ों देव, दानव, इंद्र।

    ये गुरबाणी की cosmic vision है। 1602 में, जब यूरोप में गैलिलियो अभी दूरबीन बना रहा था, गुरु अर्जन देव जी “कई कोटि ससीअर सूर नखत्र” (करोड़ों चंद्रमा, सूर्य, तारे) कह रहे थे।

    “सगल समगरी अपने सूति धारै”: सारी सामग्री अपने सूत (धागे) में धारण किए हुए है। ये वही माला-मोती वाला रूपक है जो चौथी अष्टपदी में आया था। एक धागा, करोड़ों मोती।

    पउड़ी 4

    कई कोटि राजस तामस सातक ॥ कई कोटि बेद पुरान सिम्रिति अरु सासत ॥
    कई कोटि कीए रतन समुद ॥ कई कोटि नाना प्रकार जंत ॥
    कई कोटि कीए चिर जीवे ॥ कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे ॥
    कई कोटि जख किंनर पिसाच ॥ कई कोटि भूत प्रेत सूकर म्रिगाच ॥
    सभ ते नेरै सभहू ते दूरि ॥ नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि ॥4॥

    करोड़ों राजस, तामस, सात्विक गुण। करोड़ों वेद, पुराण, स्मृति, शास्त्र। करोड़ों रत्न-समुद्र। करोड़ों प्रकार के जंतु। करोड़ों चिरंजीवी (बहुत लंबा जीने वाले)। करोड़ों पर्वत, मेरु, सुवर्णमय। करोड़ों यक्षकिन्नर, पिशाच। करोड़ों भूत, प्रेत, सूकर (सुअर), म्रिगाच (शिकारी जानवर)।

    “सभ ते नेरै सभहू ते दूरि”: सबसे पास, सबसे दूर। “नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि”: ख़ुद अलिप्त (निर्लेप) रहता हुआ भरपूर (सर्वव्यापक) है। ये विरोधाभास है: वो हर चीज़ में भरा है लेकिन किसी चीज़ से लिपटा नहीं। जैसे आकाश हर जगह है लेकिन किसी चीज़ से चिपकता नहीं।

    पउड़ी 5

    कई कोटि पाताल के वासी ॥ कई कोटि नरक सुरग निवासी ॥
    कई कोटि जनमहि जीवहि मरहि ॥ कई कोटि बहु जोनी फिरहि ॥
    कई कोटि बैठत ही खाहि ॥ कई कोटि घालहि थकि पाहि ॥
    कई कोटि कीए धनवंत ॥ कई कोटि माइआ मह चिंत ॥
    जह जह भाणा तह तह राखे ॥ नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे ॥5॥

    करोड़ों पाताल (निचले लोकों) के निवासी। करोड़ों नरक-स्वर्ग के निवासी। करोड़ों जन्मते, जीते, मरते हैं। करोड़ों योनियों में घूमते हैं। करोड़ों बैठे-बैठे खाते हैं (बिना मेहनत)। करोड़ों मेहनत करके थककर पाते हैं। करोड़ों धनवंत बनाए। करोड़ों माया में चिंतित हैं।

    “जह जह भाणा तह तह राखे”: जहाँ-जहाँ चाहा, वहाँ-वहाँ रखा। “नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे”: सब कुछ प्रभु के हाथ में है। ये एक ही वाक्य पूरी दसवीं अष्टपदी का सार है।

    पउड़ी 6

    कई कोटि भए बैरागी ॥ राम नाम संगि तिनि लिव लागी ॥
    कई कोटि प्रभ कउ खोजंते ॥ आतम मह पारब्रहमु लहंते ॥
    कई कोटि दरसन पिआस ॥ तिन कउ मिलिओ प्रभु अबिनास ॥
    कई कोटि मागहि सतसंगु ॥ पारब्रहमु तिन लागा रंगु ॥
    जिन कउ होए आपि सुप्रसंन ॥ नानक ते जन सदा धनि धनि ॥6॥

    अब सकारात्मक दिशा: करोड़ों वैरागी हुए, जिनकी लिव राम नाम में लगी। करोड़ों प्रभु को खोजते हैं, आत्मा में ही पारब्रह्म को पाते हैं। करोड़ों दर्शन के प्यासे हैं, उन्हें अविनाशी प्रभु मिला। करोड़ों सत्संग माँगते हैं, उन पर पारब्रह्म का रंग चढ़ा।

    “आतम मह पारब्रहमु लहंते”: आत्मा में ही पारब्रह्म को पाते हैं। बाहर नहीं, अंदर। ये बात बार-बार आती है। “नानक ते जन सदा धनि धनि”: ऐसे जन सदा धन्य-धन्य हैं।

    पउड़ी 7

    कई कोटि खाणी अरु खंड ॥ कई कोटि आकास ब्रहमंड ॥
    कई कोटि होए अवतार ॥ कई जुगति कीनो बिसथार ॥
    कई बार पसरिओ पासार ॥ सदा सदा एकं एकंकार ॥
    कई कोटि कीने बहु भाति ॥ प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति ॥
    ता का अंतु न जानै कोइ ॥ आपे आपि नानक प्रभु सोइ ॥7॥

    करोड़ों खाणी (जन्म के स्रोत: अंडज, जेरज, सेतज, उत्भुज) और खंड (भौगोलिक क्षेत्र)। करोड़ों आकाश और ब्रह्मांड। करोड़ों अवतार हुए। कई युक्तियों से विस्तार किया। कई बार पसारा (सृष्टि) फैलाया (ये Big Bang और Big Crunch जैसी बात है, सदियों पहले)। सदा-सदा एक ही एकंकार है।

    “प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति”: प्रभु से उत्पन्न हुए, प्रभु में ही समा जाते हैं। जैसे लहरें समुद्र से उठती हैं और समुद्र में ही गिरती हैं। “ता का अंतु न जानै कोइ”: उसका अंत कोई नहीं जानता। “आपे आपि नानक प्रभु सोइ”: वो ख़ुद ही ख़ुद है।

    पउड़ी 8

    कई कोटि पारब्रहम के दास ॥ तिन होवत आतम परगास ॥
    कई कोटि तत के बेते ॥ सदा निहारहि एको नेत्रे ॥
    कई कोटि नाम रसु पीवहि ॥ अमर भए सद सद ही जीवहि ॥
    कई कोटि नाम गुन गावहि ॥ आतम रसि सुखि सहजि समावहि ॥
    अपुने जन कउ सासि सासि समारे ॥ नानक ओइ परमेसुर के पिआरे ॥8॥10॥

    दसवीं अष्टपदी का समापन। करोड़ों पारब्रह्म के दास हैं, जिनकी आत्मा में प्रकाश है। करोड़ों तत्व के जानने वाले हैं, जो सदा एक ही को देखते हैं। करोड़ों नाम-रस पीते हैं, अमर हो गए, सदा-सदा जीते हैं। करोड़ों नाम-गुण गाते हैं, आत्म-रस में सुख-सहज समा जाते हैं।

    “अपुने जन कउ सासि सासि समारे”: अपने जनों (भक्तों) को साँस-साँस याद रखता है। “नानक ओइ परमेसुर के पिआरे”: वो परमेश्वर के प्यारे हैं। ये आख़िरी पंक्ति तसल्ली देती है: करोड़ों की भीड़ में भी, ईश्वर अपने हर एक भक्त को साँस-साँस याद रखता है। आप भीड़ में गुम नहीं हैं।

    अष्टपदी 11

    हुकम: ईश्वरी आज्ञा
    दसवीं अष्टपदी ने सृष्टि की विशालता दिखाई। ग्यारहवीं अष्टपदी उस सृष्टि को चलाने वाले सिद्धांत को बताती है: हुकम (ईश्वरी आज्ञा)। सब कुछ उसके हुकम से होता है, इंसान के हाथ में कुछ नहीं।
    Sow and Let Go

    श्लोक

    करण कारण प्रभु एकु है दूसरु नाही कोइ ॥
    नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि सोइ ॥1॥
    करण (करने वाला) और कारण (वजह) दोनों वो एक प्रभु ही है, दूसरा कोई नहीं। नानक उस पर बलिहारी है, जो जल में, थल में, आकाश (महीअलि) में, हर जगह है।

    पउड़ी 1

    करन करावन करनै जोगु ॥ जो तिसु भावै सोई होगु ॥
    खिन मह थापि उथापनहारा ॥ अंतु नही किछु पारावारा ॥
    हुकमे धारि अधर रहावै ॥ हुकमे उपजै हुकमि समावै ॥
    हुकमे ऊच नीच बिउहार ॥ हुकमे अनिक रंग प्रकार ॥
    करि करि देखै अपनी वडिआई ॥ नानक सभ मह रहिआ समाई ॥1॥

    “करन करावन करनै जोगु”: करने वाला, करवाने वाला, और करने योग्य, सब वो ही है। “जो तिसु भावै सोई होगु”: जो उसे भाए, वही होंगे। ये सुखमनी साहिब का सबसे बुनियादी सिद्धांत है: हुकम।

    “खिन मह थापि उथापनहारा”: पल भर में स्थापित करने और उखाड़ने वाला। “हुकमे धारि अधर रहावै”: हुकम से ही धरती को आधार (अधर) के बिना (अंतरिक्ष में) टिकाए रखता है। “हुकमे उपजै हुकमि समावै”: हुकम से उत्पन्न, हुकम में ही समा जाता है। “हुकमे ऊच नीच बिउहार”: ऊँच-नीच का सारा व्यवहार भी हुकम से है।

    “करि करि देखै अपनी वडिआई”: करके-करके (रचकर-रचकर) अपनी बड़ाई देखता है। ये बड़ा गहरा है: ईश्वर सृष्टि रचता है और फिर उसे देखकर प्रसन्न होता है, जैसे कोई कलाकार अपनी कृति देखकर।

    पउड़ी 2

    प्रभ भावै मानुख गति पावै ॥ प्रभ भावै ता पाथर तरावै ॥
    प्रभ भावै बिनु सास ते राखै ॥ प्रभ भावै ता हरि गुण भाखै ॥
    प्रभ भावै ता पतित उधारै ॥ आपि करै आपन बीचारै ॥
    दुहा सिरिआ का आपि सुआमी ॥ खेलै बिगसै अंतरजामी ॥
    जो भावै सो कार करावै ॥ नानक द्रिसटी अवरु न आवै ॥2॥

    “प्रभ भावै” (अगर प्रभु को भाए) से हर पंक्ति शुरू होती है: प्रभु चाहे तो इंसान को मनुष्य-गति (ऊँची अवस्था) दे दे। प्रभु चाहे तो पत्थर भी तैरा दे। प्रभु चाहे तो बिना साँस के भी रखे। प्रभु चाहे तो हरि-गुण बोलवा दे। प्रभु चाहे तो पतित (गिरे हुए) का उद्धार कर दे।

    “दुहा सिरिआ का आपि सुआमी”: दोनों छोरों (सृष्टि और प्रलय, जन्म और मृत्यु, सुख और दुख) का वो ख़ुद मालिक है। “खेलै बिगसै अंतरजामी”: खेलता है और प्रसन्न होता है, वो अंतर्यामी। “नानक द्रिसटी अवरु न आवै”: नानक की दृष्टि में दूसरा कोई नहीं आता।

    पउड़ी 3

    कहु मानुख ते किआ होइ आवै ॥ जो तिसु भावै सोई करावै ॥
    इस कै हाथि होइ ता सभु किछु लए ॥ जो तिसु भावै सोई करए ॥
    अनजानत बिखिआ मह रचै ॥ जे जानत आपन आप बचै ॥
    भरमे भूला दह दिसि धावै ॥ निमख माहि चारि कुंट फिरि आवै ॥
    करि किरपा जिसु अपनी भगति दए ॥ नानक ते जन नामि मिलए ॥3॥

    “कहु मानुख ते किआ होइ आवै”: कहो, इंसान से क्या हैं सकता है? ये सवाल कड़ा है। गुरु जी कह रहे हैं: इंसान अपने बल पर कुछ नहीं कर सकता।

    “अनजानत बिखिआ मह रचै”: अनजाने में (बिना समझे) विषय-विकारों में रचा (फँसा) रहता है। “जे जानत आपन आप बचै”: अगर जान ले (सच्चाई पहचान ले), तो अपने आप बच जाए। ये बड़ी उम्मीद की बात है: ज्ञान ही मुक्ति है। “भरमे भूला दह दिसि धावै, निमख माहि चारि कुंट फिरि आवै”: भ्रम में भटका हुआ दसों दिशाओं में दौड़ता है, पल भर में चारों कोनों में घूम आता है। मन की बेचैनी का इससे अच्छा वर्णन शायद ही कोई हो।

    पउड़ी 4

    खिन मह नीच कीट कउ राज ॥ पारब्रहम गरीब निवाज ॥
    जा का द्रिसटि कछू न आवै ॥ तिसु ततकाल दह दिसि प्रगटावै ॥
    जा कउ अपुनी करै बखसीस ॥ ता का लेखा न गनै जगदीस ॥
    जीअ पिंडु सभ तिस की रासि ॥ घटि घटि पूरन ब्रहम प्रगास ॥
    अपनी बनत आपि बनाई ॥ नानक जीवै देखि बडाई ॥4॥

    “खिन मह नीच कीट कउ राज”: पल भर में नीच कीट (कीड़े) को राज दे दे। “पारब्रहम गरीब निवाज”: पारब्रह्म ग़रीबों को नवाज़ने वाला (इज़्ज़त देने वाला) है। “जा का द्रिसटि कछू न आवै, तिसु ततकाल दह दिसि प्रगटावै”: जिसकी दृष्टि में कुछ नहीं आता (जो बिल्कुल अदृश्य, अनजान है), उसे तत्काल दसों दिशाओं में प्रसिद्ध कर दे।

    ये बात उन सब लोगों के लिए है जो सोचते हैं “मैं कुछ नहीं हूँ, मेरी कोई क़ीमत नहीं।” गुरु जी कहते हैं: ईश्वर चाहे तो एक पल में आपको कीड़े से राजा बना सकता है। आपकी हैसियत आप नहीं तय करते, वो तय करता है।

    पउड़ी 5

    इस का बलु नाही इसु हाथ ॥ करन करावन सभल को नाथ ॥
    आगिआकारी बपुरा जीउ ॥ जो तिसु भावै सोई फुनि थीउ ॥
    कबहू ऊच नीच मह बसै ॥ कबहू सोग हरख रंगि हसै ॥
    कबहू निंद चिंद बिउहार ॥ कबहू ऊभ आकास पइआल ॥
    कबहू बेता ब्रहम बीचार ॥ नानक आपि मिलावणहार ॥5॥

    “इस का बलु नाही इसु हाथ”: इसका (जीव का) बल नहीं, इसके हाथ में (कुछ) नहीं। ये कठोर सत्य है। “आगिआकारी बपुरा जीउ”: बेचारा जीव आज्ञाकारी (ईश्वर की आज्ञा का पालक) है। “बपुरा” (बेचारा) शब्द में करुणा है, गुरु जी जीव पर दया कर रहे हैं।

    कभी ऊँचे में, कभी नीचे में बसता है। कभी शोक, कभी हर्ष। कभी निंदा-चिंता के व्यवहार। कभी ऊपर आकाश, कभी पाताल। कभी ब्रह्म-विचार का ज्ञाता। ये ज़िंदगी का चित्र है: ऊपर-नीचे, ख़ुशी-ग़म, ज्ञान-अज्ञान, सब बदलता रहता है। “नानक आपि मिलावणहार”: मिलाने वाला वो ख़ुद है।

    पउड़ी 6

    कबहू निरति करै बहु भाति ॥ कबहू सोइ रहै दिनु राति ॥
    कबहू महा क्रोध बिकराल ॥ कबहूं सरब की होत रवाल ॥
    कबहू होइ बहै बड राजा ॥ कबहु भेखारी नीच का साजा ॥
    कबहू अपकीरति मह आवै ॥ कबहू भला भला कहावै ॥
    जिउ प्रभु राखै तिव ही रहै ॥ गुर प्रसादि नानक सचु कहै ॥6॥

    कभी नृत्य (नाच-गाना) करता है। कभी दिन-रात सोता रहता है। कभी भयंकर क्रोध में। कभी सबके चरणों की धूल। कभी बड़ा राजा बनता है। कभी नीच भिखारी का रूप। कभी बदनामी में। कभी “भला-भला” कहलाता है।

    “जिउ प्रभु राखै तिव ही रहै”: जैसे प्रभु रखे, वैसे ही रहता है। ये समर्पण है। ये “जिउ प्रभु राखै” स्वीकार करना कठिन काम है, क्योंकि इंसान का मन कहता है “मैं अपनी ज़िंदगी चला रहा हूँ।वो चला रहा है। आप सिर्फ़ कठपुतली नहीं हैं, लेकिन डोर उसके हाथ में है।

    पउड़ी 7

    कबहू होइ पंडितु करे बखिआनु ॥ कबहू मोनिधारी लावै धिआनु ॥
    कबहू तट तीरथि इसनान ॥ कबहू सिध साधिक मुखि गिआन ॥
    कबहू कीट हसति पतंग होइ जीआ ॥ अनिक जोनि भ्रमै भरमीआ ॥
    नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै ॥ जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै ॥
    जो तिसु भावै सोई होइ ॥ नानक दूजा अवरु न कोइ ॥7॥

    कभी पंडित बनकर व्याख्या करता है। कभी मौनी (मौन-धारी) बनकर ध्यान लगाता है। कभी तीर्थ-स्नान। कभी सिद्ध-साधक के मुँह से ज्ञान। कभी कीड़ा, कभी हाथी, कभी पतंगा। अनेक योनियों में भ्रमता रहता है।

    “नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै”: अनेक रूप, जैसे नाटक करने वाला (स्वांगी) दिखाता है। “जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै”: जैसे प्रभु को भाए, वैसे नचाता है। ये सृष्टि एक रंगमंच है, और ईश्वर निर्देशक है। हम सब अभिनेता हैं। भूमिकाएँ बदलती रहती हैं, लेकिन निर्देशक एक ही है।

    पउड़ी 8

    कबहू साधसंगति इहु पावै ॥ उसु असथान ते बहुरि न आवै ॥
    अंतरि होइ गिआन परगासु ॥ उसु असथान का नही बिनासु ॥
    मन तन नामि रते इक रंगि ॥ सदा बसहि पारब्रहम कै संगि ॥
    जिउ जल मह जलु आइ खटाना ॥ तिउ जोती संगि जोति समाना ॥
    मिटि गए गवन पाए बिसराम ॥ नानक प्रभ कै सद कुरबान ॥8॥11॥

    ग्यारहवीं अष्टपदी का समापन, और ये सुखमनी साहिब के सुंदर समापनों में से है।

    “कबहू साधसंगति इहु पावै, उसु असथान ते बहुरि न आवै”: कभी (किसी जन्म में, किसी पल में) ये जीव साधसंगत पा लेता है। उस स्थान (अवस्था) से फिर कभी नहीं लौटता। “अंतरि होइ गिआन परगासु”: अंदर ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। “उसु असथान का नही बिनासु”: उस स्थान (अवस्था) का कभी विनाश नहीं होता।

    “जिउ जल मह जलु आइ खटाना, तिउ जोती संगि जोति समाना”: जैसे पानी में पानी आकर मिल जाता है (फिर अलग नहीं किया जा सकता), वैसे ही ज्योति (आत्मा) ज्योति (परमात्मा) में समा जाती है। ये मिलन का सुंदर रूपक है। पानी पानी में मिलकर एक हो जाता है, कोई सीमा नहीं रहती, कोई भेद नहीं रहता।

    “मिटि गए गवन पाए बिसराम”: भटकना मिट गया, विश्राम पाया। ये पूरी ग्यारहवीं अष्टपदी का सार है: जब तक हुकम नहीं समझा, भटकना है। जब हुकम समझ आया, विश्राम है।

    अष्टपदी 12

    अहंकार का विनाश
    ग्यारहवीं अष्टपदी ने हुकम सिखाया। बारहवीं अष्टपदी हुकम के सबसे बड़े दुश्मन पर वार करती है: अहंकार। ये वो ज़हर है जो हर अच्छे काम को भी बेकार कर देता है।
    The Crown That Falls

    श्लोक

    सुखी बसै मसकीनीआ आपु निवारि तले ॥
    बड़े बड़े अहंकारीआ नानक गरबि गले ॥1॥
    विनम्र लोग (मसकीन) सुख से बसते हैं, अपने आप को नीचे (तले) रखकर। बड़े-बड़े अहंकारी, नानक कहते हैं, गर्व में गल जाते (नष्ट हो जाते) हैं। ये दो पंक्तियों में पूरी बारहवीं अष्टपदी का सार है: विनम्रता जीवन है, अहंकार मृत्यु।

    पउड़ी 1

    जिस कै अंतरि राज अभिमानु ॥ सो नरकपाती होवत सुआनु ॥
    जो जानै मै जोबनवंतु ॥ सो होवत बिसटा का जंतु ॥
    आपस कउ करमवंतु कहावै ॥ जनमि मरै बहु जोनि भ्रमावै ॥
    धन भूमि का जो करै गुमानु ॥ सो मूरखु अंधा अगिआनु ॥
    करि किरपा जिस कै हिरदै गरीबी बसावै ॥ नानक ईहा मुकतु आगै सुखु पावै ॥1॥

    गुरु जी एक-एक करके अहंकार के रूप बताते हैं और उनका अंजाम:

    जिसके अंदर राज (सत्ता) का अभिमान है, वो नरक का अधिकारी, कुत्ते (सुआनु) जैसा है। जो सोचे “मैं जवान हूँ (जोबनवंतु)”, वो विष्ठा (मल) का कीड़ा बनता है। जो अपने आप को कर्मवंत (कर्मों वाला, पुण्यात्मा) कहलाए, वो जन्म-मरण में भटकता है। जो धन-भूमि पर गुमान करे, वो मूर्ख, अंधा, अज्ञानी है।

    ये कड़ी भाषा है। गुरु जी जानबूझकर तीखे शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि अहंकार एक ऐसी बीमारी है जो मीठी दवाई से ठीक नहीं होती। “करि किरपा जिस कै हिरदै गरीबी बसावै”: कृपा करके जिसके हृदय में गरीबी (विनम्रता) बसा दे, वो इधर भी मुक्त, उधर भी सुखी।

    पउड़ी 2

    धनवंता होइ करि गरबावै ॥ त्रिण समानि कछु संगि न जावै ॥
    बहु लसकर मानुख ऊपरि करे आस ॥ पल भीतरि ता का होइ बिनास ॥
    सभ ते आप जानै बलवंतु ॥ खिन मह होइ जाइ भसमंतु ॥
    किसै न बदै आपि अहंकारी ॥ धरम राइ तिसु करे खुआरी ॥
    गुर प्रसादि जा का मिटै अभिमानु ॥ सो जनु नानक दरगह परवानु ॥2॥

    “धनवंता होइ करि गरबावै, त्रिण समानि कछु संगि न जावै”: धनवान बनकर गर्व करता है, लेकिन तिनके (त्रिण) जितना भी साथ नहीं जाता। ये सीधी बात है: आप कितना भी कमा लो, मरने के बाद एक पैसा भी साथ नहीं जाएगा।

    “बहु लसकर मानुख ऊपरि करे आस”: बड़ी-बड़ी फ़ौजें, इंसानों पर आस लगाता है। “पल भीतरि ता का होइ बिनास”: पल भर में सब नष्ट। “सभ ते आप जानै बलवंतु, खिन मह होइ जाइ भसमंतु”: ख़ुद को सबसे बलवान जानता है, पल भर में भस्म (राख) हो जाता है।

    “गुर प्रसादि जा का मिटै अभिमानु, सो जनु नानक दरगह परवानु”: गुरु की कृपा से जिसका अभिमान मिटे, वो दरगाह में परवान (स्वीकार) है।

    पउड़ी 3

    कोटि करम करै हउ धारे ॥ स्रमु पावै सगले बिरथारे ॥
    अनिक तपीसआ करै अहंकार ॥ नरक सुरग फिरि फिरि अवतार ॥
    अनिक जतन करि आतम नही द्रवै ॥ हरि दरगह कहु कैसे गवै ॥
    आपस कउ जो भला कहावै ॥ तिसहि भलाई निकटि न आवै ॥
    सबल की रेन जा का मनु होइ ॥ कहु नानक ता की निरमल सोइ ॥3॥

    “कोटि करम करै हउ धारे, स्रमु पावै सगले बिरथारे”: करोड़ों कर्म करे, लेकिन अगर “हउ” (अहंकार) धारे हुए है, तो सारी मेहनत बेकार है। ये बड़ी कड़वी दवाई है। इंसान सोचता है “मैंने इतना किया” और वो “मैंने” ही सारा काम बर्बाद कर देता है।

    “आपस कउ जो भला कहावै, तिसहि भलाई निकटि न आवै”: जो अपने आप को भला कहलवाए, उसके पास भलाई आती ही नहीं। और इसके विपरीत: “सबल की रेन जा का मनु होइ, कहु नानक ता की निरमल सोइ”: जिसका मन सबके चरणों की धूल (रेन) बन जाए, उसकी शोभा (सोइ) निर्मल है। फल से लदा हुआ पेड़ झुक जाता है। खाली पेड़ अकड़ा खड़ा रहता है। जो इंसान गुणों से भरा है, वो झुका हुआ दिखता है। जो खाली है, वो अकड़ दिखाता है। गुरु जी कहते हैं: झुकना भरे होने की निशानी है।

    पउड़ी 4

    जब लगु जानै मुझ ते कछु होइ ॥ तब इस कउ सुखु नाही कोइ ॥
    जब इह जानै मै किछु करता ॥ तब लगु गरभ जोनि मह फिरता ॥
    जब धारै कोऊ बैरी मीतु ॥ तब लगु निहचलु नाही चीतु ॥
    जब लगु मोह मगन संगि माइ ॥ तब लगु धरम राइ दए सजाइ ॥
    प्रभ किरपा ते बंधन तूटै ॥ गुर प्रसादि नानक हउ छूटै ॥4॥

    ये पउड़ी “जब लगु” (जब तक) की लय पर चलती है, हर पंक्ति एक शर्त बताती है:

    जब तक जाने “मुझसे कुछ होता है”, तब तक सुख नहीं। जब तक जाने “मैं कुछ करता हूँ”, तब तक गर्भ-योनि में घूमता रहता है। जब तक किसी को बैरी और किसी को मित्र माने, तब तक चित्त अस्थिर है। जब तक माया के मोह में मग्न है, तब तक धर्मराज सज़ा देता है।

    “प्रभ किरपा ते बंधन तूटै, गुर प्रसादि नानक हउ छूटै”: प्रभु की कृपा से बंधन टूटते हैं, गुरु की कृपा से “हउ” (मैं-पन, अहंकार) छूटता है। बंधन प्रभु की कृपा से टूटते हैं, अहंकार गुरु की कृपा से। गुरु का काम विशेष रूप से अहंकार तोड़ना है।

    पउड़ी 5

    सहस खटे लख कउ उठि धावै ॥ त्रिपति न आवै माइआ पाछै पावै ॥
    अनिक भोग बिखिआ के करै ॥ नह त्रिपतावै खपि खपि मरै ॥
    बिना संतोख नही कोऊ राजै ॥ सुपन मनोरथ ब्रिंथे सभ काजै ॥
    नाम रंगि सभु सुखु होइ ॥ बडभागी किसै परापति होइ ॥
    करन करावन आपे आपि ॥ सदा सदा नानक हरि जापि ॥5॥

    “सहस खटे लख कउ उठि धावै”: हज़ार कमाए तो लाख के लिए दौड़ पड़ता है। “त्रिपति न आवै”: तृप्ति नहीं आती। ये आज की consumer culture का बिल्कुल सटीक वर्णन है, चार सौ साल पहले लिखा हुआ। नया फ़ोन लिया, तो अगले मॉडल की इच्छा। बड़ा घर लिया, तो और बड़े का सपना।

    “बिना संतोख नही कोऊ राजै”: बिना संतोष के कोई राज़ी (संतुष्ट) नहीं। “सुपन मनोरथ ब्रिंथे सभ काजै”: सपने जैसी इच्छाओं में सारे काम व्यर्थ चले जाते हैं।

    “नाम रंगि सभु सुखु होइ, बडभागी किसै परापति होइ”: नाम के रंग में सारा सुख है, लेकिन ये बड़भागी (बड़े भाग्यशाली) को ही प्राप्त होता है।

    पउड़ी 6

    करन करावन करनैहारु ॥ इस कै हाथि कहा बीचारु ॥
    जैसी द्रिसटि करे तैसा होइ ॥ आपे आपि आपि प्रभु सोइ ॥
    जो किछु कीनो सु अपनै रंगि ॥ सभ ते दूरि सभहू कै संगि ॥
    बूझै देखै करै बिबेक ॥ आपहि एक आपहि अनेक ॥
    मरै न बिनसै आवै न जाइ ॥ नानक सद ही रहिआ समाइ ॥6॥

    “करन करावन करनैहारु, इस कै हाथि कहा बीचारु”: करने वाला, करवाने वाला वो ख़ुद है, इसके (जीव के) हाथ में कौन-सा विचार (क्या अधिकार) है? “सभ ते दूरि सभहू कै संगि”: सबसे दूर, सबके संग। ये विरोधाभास बार-बार आता है और हर बार नई गहराई देता है।

    “आपहि एक आपहि अनेक”: वो ख़ुद एक है, ख़ुद ही अनेक है। “मरै न बिनसै आवै न जाइ”: न मरता, न नष्ट होता, न आता, न जाता। “नानक सद ही रहिआ समाइ”: सदा ही समाया हुआ है।

    पउड़ी 7

    आपि उपदेसै समझै आपि ॥ आपे रचिआ सभ कै साथि ॥
    आपि कीनो आपन बिसथारु ॥ सभु कछु उस का ओहु करनैहारु ॥
    उस ते भिंन कहहु किछु होइ ॥ थान थनंतरि एकै सोइ ॥
    अपुने चलित आपि करणैहार ॥ कउतक करै रंग आपार ॥
    मन मह आपि मन अपुने माहि ॥ नानक कीमति कहनु न जाइ ॥7॥

    ये पउड़ी अद्वैत (non-duality) का शिखर है: वो ख़ुद उपदेश देता है, ख़ुद समझता है। ख़ुद सबके साथ रचा है। ख़ुद ही अपना विस्तार किया। सब कुछ उसका, वो ही करने वाला। उससे अलग (भिंन) कुछ हो ही नहीं सकता। हर जगह वही एक।

    “कउतक करै रंग आपार”: अपार (असीम) रंगों के कौतुक (तमाशे, खेल) करता है। “मन मह आपि मन अपुने माहि”: मन में वो है, और मन उसमें है। “नानक कीमति कहनु न जाइ”: कीमत बताई नहीं जा सकती।

    पउड़ी 8

    सति सति सति प्रभु सुआमी ॥ गुर परसादि किनी विखिआनी ॥
    सचु सचु सचु सभु कीना ॥ कोटि मधे किनै बिरलै चीना ॥
    भला भला भला आपका रूप ॥ अति सुंदर अपार अनूप ॥
    निरमल निरमल निरमल आपकी बाणी ॥ घटि घटि सुनी स्रवन बखानी ॥
    पवित्र पवित्र पवित्र पुनीत ॥ नामु जपै नानक मनि प्रीति ॥8॥12॥

    बारहवीं अष्टपदी का समापन एक स्तुति से होता है, और हर पंक्ति में एक शब्द तीन बार दोहराया गया है:

    “सति सति सति” (सत्य, सत्य, सत्य)। “सचु सचु सचु” (सच, सच, सच)। “भला भला भला” (अच्छा, अच्छा, अच्छा)। “निरमल निरमल निरमल” (शुद्ध, शुद्ध, शुद्ध)। “पवित्र पवित्र पवित्र” (पवित्र, पवित्र, पवित्र)।

    ये तीन-बार का दोहराव पहली पउड़ी के “सिमरउ सिमरि सिमरि” की याद दिलाता है। जब गुरु जी किसी बात को तीन बार कहें, वो बात हृदय में उतारनी है। “कोटि मधे किनै बिरलै चीना”: करोड़ों में किसी विरले ने ही पहचाना। ये अष्टपदी अहंकार के विनाश से शुरू हुई और ईश्वर की स्तुति पर समाप्त हुई, क्योंकि जहाँ अहंकार मिटता है, वहाँ स्तुति प्रकट होती है।

    अष्टपदी 13

    संतों की निंदा का फल
    बारहवीं अष्टपदी में अहंकार पर वार किया। तेरहवीं अष्टपदी अहंकार के एक ख़ास रूप को लेती है: संतों की निंदा। ये सुखमनी साहिब की सबसे कड़ी अष्टपदी है।

    श्लोक

    संत सरणि जो जनु परै सो जनु उधरनहार ॥
    संत की निंदा नानकहा बहुरि बहुरि अवतार ॥1॥
    जो जन संत की शरण में पड़े, वो उद्धार पाने वाला है। संत की निंदा करने वाला, नानक कहते हैं, बार-बार जन्म-मरण में पड़ता है। दो पंक्तियों में दो रास्ते: संत की शरण = मुक्ति। संत की निंदा = बार-बार जन्म।

    पउड़ी 1

    संत कै दूखनि आरजा घटै ॥ संत कै दूखनि जम ते नही छुटै ॥
    संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ॥ संत कै दूखनि नरक मह पाइ ॥
    संत कै दूखनि मति होइ मलीन ॥ संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
    संत के हते कउ रखै न कोइ ॥ संत कै दूखनि थान भ्रसटु होइ ॥
    संत क्रिपाल क्रिपा जे करै ॥ नानक संतसंगि निंदकु भी तरै ॥1॥

    “संत कै दूखनि” (संत को दुख देने से) की लय से हर पंक्ति शुरू होती है: आयु घटती है। यम से छुटकारा नहीं। सारा सुख चला जाता है। नरक में पड़ता है। बुद्धि मलिन (गंदी) हो जाती है। शोभा से हीन हो जाता है। संत को मारने वाले को कोई नहीं बचाता। स्थान भ्रष्ट हो जाता है।

    लेकिन अंत में एक उम्मीद की किरण: “संत क्रिपाल क्रिपा जे करै, नानक संतसंगि निंदकु भी तरै”: अगर कृपालु संत कृपा करे, तो संत-संगत में निंदक भी तर जाता है। संत की कृपा इतनी विशाल है कि वो अपने निंदक को भी तार सकती है।

    पउड़ी 2

    संत के दूखन ते मुखु भवै ॥ संतन कै दूखनि कागु जिउ लवै ॥
    संतन कै दूखनि सपल जोनि पाइ ॥ संत कै दूखनि त्रिगद जोनि किरमाइ ॥
    संतन कै दूखनि त्रिसना मह जलै ॥ संत कै दूखनि सभु को छलै ॥
    संत कै दूखनि तेजु सभु जाइ ॥ संत कै दूखनि नीचु नीचाइ ॥
    संत दोखी कउ थाउ को नाहि ॥ नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि ॥2॥

    संत की निंदा के और परिणाम: मुँह फिर जाता है (बदनामी)। कौवे जैसा बोलने लगता है (कर्कश, अशुभ)। सर्प-योनि पाता है। कीड़े-मकोड़ों की योनि मिलती है। तृष्णा में जलता है। सबको छलता है। तेज (ओज, प्रभाव) सब चला जाता है। नीच से नीच हो जाता है। संत-द्रोही को कोई स्थान नहीं।

    फिर वही उम्मीद: “नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि”: अगर संत को भाए (संत चाहें), तो वो भी गति (मुक्ति) पा सकते हैं। गुरु जी बार-बार ये दरवाज़ा खुला रख रहे हैं: चाहे कितना भी पतन हो, संत की कृपा से उद्धार संभव है।

    पउड़ी 3

    संत का निंदकु महा अतताई ॥ संत का निंदकु खिनु टिकनु न पाई ॥
    संत का निंदकु महा हतिआरा ॥ संत का निंदकु परमेसुरि मारा ॥
    संत का निंदकु राज ते हीनु ॥ संत का निंदकु दुखीआ अरु दीनु ॥
    संत के निंदक कउ सबल रोग ॥ संत के निंदक कउ सदा बिजोग ॥
    संत कि निंदा दोख मह दोखु ॥ नानक संत भावै तउ उस कउ भी मोखु ॥3॥

    संत का निंदक महा अत्याचारी है। उसे पल-भर भी टिकने की जगह नहीं मिलती। वो महा हत्यारा है (क्योंकि निंदा एक तरह की हत्या है, किसी की इज़्ज़त और भावना की हत्या)। परमेश्वर ने ख़ुद उसे मारा है। वो राज से हीन, दुखी और दीन है। उसे सारे रोग लगते हैं, सदा वियोग (बिछड़ना) रहता है। संत की निंदा सारे दोषों में गंभीर दोष है। लेकिन फिर वही दरवाज़ा: “नानक संत भावै तउ उस कउ भी मोखु”, अगर संत चाहे, तो उसे भी मोक्ष मिल सकता है।

    पउड़ी 4

    संत का दोखी सदा अपवितु ॥ संत का दोखी किसै कउ नही मितु ॥
    संत के दोखी कउ डानु लागै ॥ संत के दोखी कउ सभ तिआगै ॥
    संत कउ दोखी महा अहंकारी ॥ संत कउ दोखी सदा बिकारी ॥
    संत कउ दोखी जनमै मरै ॥ संत की दूखना सुख ते टरै ॥
    संत के दोखी कउ नाही ठाउ ॥ नानक संत भावै तउ लए मिलाइ ॥4॥

    संत का दोषी सदा अपवित्र है। किसी का मित्र नहीं। सबकी डाँट (डानु) खाता है। सब उसे त्याग देते हैं। वो महा अहंकारी है, सदा विकारी है। जन्मता-मरता रहता है। संत को दुख देने से सुख से दूर हो जाता है। उसे कोई ठिकाना नहीं। लेकिन अगर संत चाहे, तो मिला ले।

    गुरु जी “निंदक” और “दोखी” दोनों शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं। “निंदक” वो जो पीठ पीछे बुराई करे, “दोखी” वो जो सामने दुश्मनी करे। दोनों का अंजाम एक है।

    पउड़ी 5

    संत कउ दोखी अध बीच ते टूटै ॥ संत कउ दोखी किते काजि न पहूचै ॥
    संत के दोखी कउ उदिआन भ्रमाईऐ ॥ संत कउ दोखी उझड़ि पाईऐ ॥
    संत कउ दोखी अंतर ते थोथा ॥ जिउ सास बिना मिरतक कि लोथा ॥
    संत के दोखी कि जड़ किछु नाहि ॥ आपन बीजि आपे ही खाहि ॥
    संत के दोखी कउ अवरु न राखनहारु ॥ नानक संत भावै तउ ले उबारि ॥5॥

    “अध बीच ते टूटै”: बीच रास्ते से टूट जाता है (कोई काम पूरा नहीं होता)। किसी काम में नहीं पहुँचता (सफल नहीं होता)। जंगलों (उदिआन) में भटकाया जाता है। उलटे रास्ते (उझड़ि) पर डाल दिया जाता है। “अंतर ते थोथा, जिउ सास बिना मिरतक कि लोथा”: अंदर से खोखला है, जैसे बिना साँस के मुर्दे का शव। ये उपमा बहुत कड़ी है: निंदक ज़िंदा दिखता है, लेकिन अंदर से मुर्दा है।

    “आपन बीजि आपे ही खाहि”: अपना बोया हुआ ख़ुद ही खाता है। ये कर्म-सिद्धांत है: जो बोओगे, वो काटोगे।

    पउड़ी 6

    संत कउ दोखी इउ बिललाइ ॥ जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ ॥
    संत कउ दोखी भूखा नही राजै ॥ जिउ पावकु ईधनि नही धरापै ॥
    संत कउ दोखी छुटै एकेला ॥ जिउ बूआड़ि तिलु खेत मह दुहेला ॥
    संत कउ दोखी धरम ते रहत ॥ संत कउ दोखी सद मिथिआ कहत ॥
    किरतु निंदक कउ धुरि ही पइआ ॥ नानक जो तिसु भावै सोई थिआ ॥6॥

    ये पउड़ी तीन तीखी उपमाओं पर बनी है:

    निंदक ऐसे तड़पता है “जिउ जल बिहून मछुली”, जैसे बिना पानी की मछली। भूखा रहता है, तृप्त नहीं होता, “जिउ पावकु ईधनि नही धरापै”, जैसे अग्नि कितना भी ईंधन डालो, भरती नहीं। अकेला छूटता है, “जिउ बूआड़ि तिलु खेत मह दुहेला”, जैसे खेत में तिल का पौधा अकेला (बिना साथी) दुखी खड़ा रहता है।

    धर्म से दूर हो जाता है। सदा झूठ (मिथिआ) बोलता है। “किरतु निंदक कउ धुरि ही पइआ”: निंदक का ये कर्म (किरत) शुरू (धुर) से ही लिखा था। “जो तिसु भावै सोई थिआ”: जो ईश्वर को भाया, वही हुआ।

    पउड़ी 7

    संत कउ दोखी बिगड़ रूपु होइ जाइ ॥ संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ ॥
    संत कउ दोखी सदा सहकाईऐ ॥ संत कउ दोखी न मरै न जीवाईऐ ॥
    संत के दोखी कि पुजै न आसा ॥ संत कउ दोखी उठि चलै निरासा ॥
    संत कै दोखि न त्रिसटै कोइ ॥ जैसा भावै तैसा कोई होइ ॥
    पइआ किरतु न मेटै कोइ ॥ नानक जानै सचा सोइ ॥7॥

    निंदक का रूप बिगड़ जाता है (भीतर की कुरूपता बाहर आती है)। दरगाह में सज़ा मिलती है। सदा शक (सहकाईऐ, संदेह) में रहता है। न ठीक से मरता है, न ठीक से जीता (एक तरह की त्रिशंकु अवस्था)। उसकी आशा पूरी नहीं होती। निराश उठकर चला जाता है। संत-दोषी पर कोई भरोसा (त्रिसटै) नहीं करता।

    “पइआ किरतु न मेटै कोइ”: लिखा हुआ कर्म कोई नहीं मिटाता। “नानक जानै सचा सोइ”: सच्चा (ईश्वर) ही जानता है। एक बात समझने लायक़ है: गुरु जी “संत” से किसी ख़ास इंसान का मतलब नहीं ले रहे। “संत” वो हर इंसान है जिसमें ईश्वर बसता है। और “निंदा” का दायरा गाली-गलौज से कहीं बड़ा है: इसमें पीठ पीछे बुराई करना, अच्छाई को नकारना, और रास्ते में अड़चन डालना भी आता है।

    पउड़ी 8

    प्रभ की उसतति करहु दिनु राति ॥ तिसहि धिआवहु सासि गिरासि ॥
    सभु कछु वरतै तिस का कीआ ॥ जैसा करे तैसा को थीआ ॥
    अपना खेलु आपि करनैहारु ॥ दूसर कउन कहै बीचारु ॥
    जिस नो कृपा करै तिसु आपन नामु दए ॥ बडभागी नानक जन सए ॥8॥13॥

    सारे शरीर उसके हैं, वो ही करने वाला है। सदा उसे नमस्कार। दिन-रात उसकी स्तुति करो। साँस-ग्रास (साँस लेते, खाना खाते) उसे ध्याओ। सब कुछ उसका किया हुआ चल रहा है। जैसा करे, वैसा कोई बनता है। अपना खेल ख़ुद ही खेल रहा है, दूसरा कौन विचार करे? जिसे कृपा करे, उसे अपना नाम दे। ऐसे बड़भागी जन धन्य हैं।

    अष्टपदी 14

    मानुख की टेक छोड़ो
    तेरहवीं अष्टपदी ने संतों की निंदा की चेतावनी दी। चौदहवीं अष्टपदी एक और भ्रम तोड़ती है: इंसानों पर भरोसा करना। असली भरोसा सिर्फ़ ईश्वर पर होना चाहिए।
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    श्लोक

    तजहु सिआणप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ॥
    एक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु भउ जाइ ॥1॥
    चतुराई (सिआणप) छोड़ दो, हे श्रेष्ठ जनो, हरि राजा को सिमरो। एक ही आशा हरि की मन में रखो, नानक कहते हैं, दुख, भ्रम, और भय चले जाएँगे। “सिआणप” (चालाकी, चतुराई) छोड़ने की बात बड़ी है। इंसान सोचता है “मैं समझदार हूँ, मैं ख़ुद सँभाल लूँगा।” गुरु जी कहते हैं: ये चालाकी छोड़ो, बस उसे सिमरो।

    पउड़ी 1

    मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ॥ देवन का एकै भगवानु ॥
    जिस कै दीऐ रहै अघाइ ॥ बहुरि न त्रिसना लागै आइ ॥
    मारै राखै एको आपि ॥ मानुख कै किछु नाही हाथि ॥
    तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ ॥ तिस का नामु रखहु कंठि प्रोइ ॥
    सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ॥ नानक बिघनु न लागै कोइ ॥1॥

    “मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु”: इंसानों का सहारा (टेक) व्यर्थ (ब्रिथी) है, ये जान लो। “देवन का एकै भगवानु”: देने वाला सिर्फ़ एक भगवान है। ये बात सुनने में कड़ी लगती है, लेकिन गुरु जी ये नहीं कह रहे कि लोगों से रिश्ता मत रखो। कह रहे हैं कि अंतिम भरोसा, आख़िरी टेक, सिर्फ़ ईश्वर पर रखो।

    “मारै राखै एको आपि, मानुख कै किछु नाही हाथि”: मारना और बचाना, दोनों उसी एक के हाथ में है। इंसान के हाथ में कुछ नहीं। “तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ”: उसका हुकम समझो, तो सुख होंगे।

    “सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ”: तीन बार “सिमरि”, वही लय जो पहली पउड़ी में थी। पूरी सुखमनी साहिब एक वृत्त (circle) है, बार-बार उसी केंद्र पर लौटती है।

    पउड़ी 2

    उसतति मन मह करि निरंकार ॥ करि मन मेरे सति बिउहार ॥
    निरमल रसना अम्रितु पीउ ॥ सदा सुहेला करि लेहि जीउ ॥
    नैनहु पेखु ठाकुर का रंगु ॥ साधसंगि बिनसै सभ संगु ॥
    चरन चलउ मारगि गोबिंद ॥ मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद ॥
    कर हरि करम स्रवनि हरि कथा ॥ हरि दरगह नानक ऊजल मथा ॥2॥

    ये पउड़ी इंद्रियों को “सही दिशा” देती है: मन में निरंकार की स्तुति करो। सत्य का व्यवहार करो। जीभ से अमृत पीओ (नाम जपो)। आँखों से ठाकुर का रंग देखो। पैरों से गोबिंद (ईश्वर) के मार्ग पर चलो। हाथों से हरि का कर्म करो। कानों से हरि कथा सुनो।

    “हरि दरगह नानक ऊजल मथा”: हरि के दरबार में नानक का माथा उज्ज्वल (रोशन) होंगे। “ऊजल मथा” (रोशन माथा) बड़ा सुंदर प्रतीक है: पंजाबी में कहते हैं “माथा ऊँचा”, यानी इज़्ज़तदार। गुरु जी कहते हैं: अगर इंद्रियों का सही इस्तेमाल करो, तो ईश्वर के दरबार में माथा ऊँचा होंगे।

    पउड़ी 3

    बडभागी ते जन जग माहि ॥ सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥
    राम नाम जो करहि बीचार ॥ से धनवंत गनी संसार ॥
    मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ॥ सदा सदा जानहु ते सुखी ॥
    एको एकी एकी पछानै ॥ इत उत की ओहु सोझी जानै ॥
    नाम संगि जिस कउ मनु मानिआ ॥ नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥3॥

    जग में बड़भागी वो जन हैं जो सदा हरि के गुण गाएँ। राम नाम का विचार करने वाले ही असली धनवंत हैं। जो मन, तन, मुँह से हरि बोलें, वो सदा सुखी हैं। जो एक ही एक को पहचाने, वो इधर-उधर (इत-उत, इस लोक और उस लोक) दोनों की सोझी (समझ) जानता है।

    “नाम संगि जिस कउ मनु मानिआ, नानक तिनहि निरंजनु जानिआ”: जिसका मन नाम के संग मान गया (राज़ी हो गया, टिक गया), उसने निरंजन (निर्मल ईश्वर) को जान लिया।

    पउड़ी 4

    गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ॥ तिस कि जानहु त्रिसना बुझै ॥
    साधसंगि हरि हरि जसु कहत ॥ सबल रोग ते ओहु हरि जनु रहत ॥
    अनदिनु कीरतनु केवल बखिआनु ॥ गृहसत मह सोई निरबानु ॥
    एक ऊपरि जिसु जन की आसा ॥ तिस कि कटीऐ जम की फासा ॥
    पारब्रहम कि जिसु मनि भूख ॥ नानक तिसहि न लागहि दूख ॥4॥

    गुरु की कृपा से अपना आप सूझता है, तृष्णा बुझती है। साधसंगत में हरि का यश कहने से सारे रोग छूट जाते हैं। “अनदिनु कीरतनु केवल बखिआनु, गृहसत मह सोई निरबानु”: दिन-रात कीर्तन और बखान (वर्णन) करता है, गृहस्थ (घर-बार) में रहते हुए ही निर्वाण (मुक्त) है।गृहस्थ में रहकर भी निर्वाण पाया जा सकता है।

    “एक ऊपरि जिसु जन की आसा, तिस कि कटीऐ जम की फासा”: जो एक पर आशा रखे, उसकी जम (मृत्यु) की फाँसी कटती है।

    पउड़ी 5

    जिसु हरि प्रभु मनि चिति आवै ॥ सो संतु सुहेला नही डुलावै ॥
    जिसु प्रभु अपुना किरपा करै ॥ सो सेवकु कहु किस ते डरै ॥
    जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ ॥ अपने कारज मह आपि समाइआ ॥
    सोधत सोधत सोधत सीझिआ ॥ गुर प्रसादि ततु सभु बूझिआ ॥
    जब देखउ तब सभु किछु मूलु ॥ नानक सो सूखमु सोई असथूलु ॥5॥

    जिसे हरि प्रभु मन-चित्त में आ जाए, वो संत सुखी है, डोलता नहीं। जिस पर प्रभु कृपा करे, वो सेवक किससे डरे? “जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ”: जैसा है, वैसा ही दिखता है (भीतर-बाहर एक)। “सोधत सोधत सोधत सीझिआ”: खोजते-खोजते-खोजते सिद्ध हो गया। “सोधत” तीन बार कहा, जैसे “सिमरउ” तीन बार कहा था। खोज लगातार होनी चाहिए, एक बार से काम नहीं चलता।

    “जब देखउ तब सभु किछु मूलु”: जब देखता हूँ तो सब कुछ मूल (ईश्वर) ही दिखता है। “नानक सो सूखमु सोई असथूलु”: वो सूक्ष्म भी है, वो ही स्थूल भी है। परमाणु में भी वही, पर्वत में भी वही।

    पउड़ी 6

    नह किछु जनमै नह किछु मरै ॥ आपन चलितु आप ही करै ॥
    आवनु जावनु द्रिसटि अनद्रिसटि ॥ आगिआकारी धारी सभ स्रिसटि ॥
    आपे आपि सगल मह आपि ॥ अनिक जुगति रचि थापि उथापि ॥
    अबिनासी नाही किछु खंड ॥ धारण धारि रहिओ ब्रहमंड ॥
    अलख अभेव पुरख परताप ॥ आपि जपाइ त नानक जाप ॥6॥

    अपनी लीला ख़ुद खेल रहा है। आना-जाना, दिखना-अदिखना, सब उसका है। सारी सृष्टि उसकी आज्ञाकारी है। सबमें वो ही, अनेक युक्तियों से स्थापित और उखाड़ता रहता है। अविनाशी, कोई खंड (टुकड़ा, कमी) नहीं। ब्रह्मांड को धारण किए हुए है। अलख (अदृश्य), अभेव (रहस्यमय), पुरुष का प्रताप। “आपि जपाइ त नानक जाप”: वो ख़ुद जपवाए तभी नानक जप सकता है।

    पउड़ी 7

    जिन प्रभु जाता सु सोभावंत ॥ सगल संसार उधरै तिन मंत ॥
    प्रभ के सेवक सगल उधारन ॥ प्रभ के सेवक दूख बिसारन ॥
    आपे मेलि लए किरपाल ॥ गुर का सबदु जपि भए निहाल ॥
    उन कि सेवा सोई लागै ॥ जिसु नो कृपा करहि बडभागै ॥
    नामु जपत पावहि बिसरामु ॥ नानक तिन पुरख कउ ऊतम करि मानु ॥7॥

    जिन्होंने प्रभु को जाना, वो शोभावान हैं। उनके मंत्र से सारा संसार उधरता है। प्रभु के सेवक सबके उद्धारक हैं, दुख बिसारने वाले हैं। कृपालु ने ख़ुद मिला लिया। गुरु का शबद जपकर निहाल हुए। उनकी सेवा वही कर पाता है जिसे कृपा मिली (बड़भागा)। नाम जपते विश्राम पाते हैं। नानक कहते हैं, ऐसे पुरुष को उत्तम मानो।

    पउड़ी 8

    जो किछु करै सु प्रभ कै रंगि ॥ सदा सदा बसै हरि संगि ॥
    सहज सुभाइ होवै सो होइ ॥ करणैहारु पछाणै सोइ ॥
    प्रभ का कीआ जन मीठ लगाना ॥ जैसा सा तैसा द्रिसटाना ॥
    जिस ते उपजे तिसु माहि समाइ ॥ ओइ सूख निधान उनहू बनि आइ ॥
    आपस कउ आपि दीनो मानु ॥ नानक प्रभ जनु एको जानु ॥8॥14॥

    जो कुछ करता है, प्रभु के रंग (इच्छा) में करता है। सदा हरि के संग बसता है। “सहज सुभाइ होवै सो होइ”: सहज स्वभाव से जो होता है, होने दो। “करणैहारु पछाणै सोइ”: करने वाले (ईश्वर) को पहचानो।

    “प्रभ का कीआ जन मीठ लगाना”: प्रभु का किया हुआ भक्त को मीठा लगता है। ये वो पंक्ति है जो चौबीसवीं अष्टपदी के शीर्षक (“आपका कीआ मीठा लागै”) में गूँजेगी। “जैसा सा तैसा द्रिसटाना”: जैसा है, वैसा ही दिखता है (कोई छिपाव नहीं)। “जिस ते उपजे तिसु माहि समाइ”: जिससे उपजा, उसी में समा जाता है। “नानक प्रभ जनु एको जानु”: नानक कहते हैं, प्रभु और भक्त को एक ही जानो।

    अष्टपदी 15

    गुरु का आसरा
    चौदहवीं अष्टपदी ने कहा कि इंसानों का सहारा छोड़ो। पंद्रहवीं अष्टपदी बताती है कि असली सहारा कौन है: गुरु और ईश्वर। ये अष्टपदी गुरु की भूमिका को विस्तार से समझाती है।
    Shelter Is a Presence

    श्लोक

    सबल कला भरपूर प्रभ बिरथा जाननहार ॥
    जा कै सिमरनि उधरीऐ नानक तिसु बलिहार ॥1॥
    सब कलाओं से भरपूर प्रभु सबके दिल की जानने वाला है। जिसके सिमरन से उद्धार होता है, नानक उस पर बलिहारी है। “बिरथा जाननहार” (दिल की बात जानने वाला) बड़ा तसल्ली देने वाला शब्द है।वो पहले से जानता है।

    पउड़ी 1

    टूटी गाढनहार गोपाल ॥ सबल जीआ आपे प्रतिपाल ॥
    सगल की चिंता जिसु मनि माहि ॥ तिस ते बिरथा कोई नाहि ॥
    रे मन मेरे सदा हरि जापि ॥ अबिनासी प्रभु आपे आपि ॥
    आपन कीआ कछू न होइ ॥ जे सउ प्रानी लोचै कोइ ॥
    तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम ॥ गति नानक जपि एक हरि नाम ॥1॥

    “टूटी गाढनहार गोपाल”: टूटी हुई चीज़ों को जोड़ने वाला (गाँठने वाला) गोपाल (ईश्वर) है। ये पहली पंक्ति ही बड़ी तसल्ली देती है। ज़िंदगी में बहुत कुछ टूटता है: रिश्ते, सेहत, उम्मीदें, भरोसा। गुरु जी कहते हैं कि जोड़ने वाला एक ही है। “सबल जीआ आपे प्रतिपाल”: सब जीवों का वो ख़ुद पालन करता है।

    “सगल की चिंता जिसु मनि माहि, तिस ते बिरथा कोई नाहि”: जिसके मन में सबकी चिंता है, उससे कोई व्यर्थ (बेकार, अनदेखा) नहीं। हर इंसान, हर जीव, उसकी चिंता में शामिल है।

    “आपन कीआ कछू न होइ, जे सउ प्रानी लोचै कोइ”: अपने किए कुछ नहीं होता, चाहे सौ बार प्राणी चाहे। “तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम”: उसके बिना आपके कुछ काम नहीं।

    पउड़ी 2

    रूपवंतु होइ नाही मोहै ॥ प्रभ की जोति सगल घट सोहै ॥
    धनवंता होइ किआ को गरबै ॥ जा सभु किछु तिस का दीआ दरबै ॥
    अति सूरा जे कोउ कहावै ॥ प्रभ की कला बिना कह धावै ॥
    जे को होइ बहै दातारु ॥ तिसु देनहारु जानै गावारु ॥
    जिसु गुर प्रसादि तूटै हउ रोगु ॥ नानक सो जनु सदा अरोगु ॥2॥

    गुरु जी चार तरह के गर्व को तोड़ते हैं: रूपवान हो तो मोह मत करो, प्रभु की ज्योति हर शरीर में सोहती (शोभती) है। धनवान हो तो गर्व किस बात का, सब कुछ उसी का दिया हुआ है। बड़ा वीर (सूरा) कहलाओ, प्रभु की कला (शक्ति) के बिना कहाँ दौड़ोगे? बड़ा दानी बनो, तो जानो कि असली देने वाला वो है, आप तो बस माध्यम हैं।

    “जिसु गुर प्रसादि तूटै हउ रोगु, नानक सो जनु सदा अरोगु”: गुरु की कृपा से जिसका “हउ रोगु” (अहंकार का रोग) टूटे, वो सदा निरोग (अरोगु) है। गुरु जी अहंकार को “रोग” कह रहे हैं। ये बीमारी है, और इसका इलाज गुरु के पास है।

    पउड़ी 3

    जिउ मंदर कउ थामै थंमनु ॥ तिउ गुर का सबदु मनहि असथंमनु ॥
    जिउ पाखाणु नाव चड़ि तरै ॥ प्रानी गुर चरण लगतु निसतरै ॥
    जिउ अंधकार दीपक प्रगासु ॥ गुर दरसनु देखि मनि होइ बिगासु ॥
    जिउ महा उदिआन मह मारगु पावै ॥ तिउ साधू संगि मिलि जोति प्रगटावै ॥
    तिन संतन की बाछउ धूरि ॥ नानक की हरि लोचा पूरि ॥3॥

    ये पउड़ी चार सुंदर उपमाओं पर बनी है:

    जैसे मंदिर को खंभा (थंमनु) थामता है, वैसे गुरु का शबद मन को थामता (आधार देता) है। जैसे पत्थर नाव पर चढ़कर तैर जाता है (अकेला डूबता, लेकिन नाव पर तैरता है), वैसे प्राणी गुरु के चरणों में लगकर तर जाता है। जैसे अँधेरे में दीपक प्रकाश करता है, वैसे गुरु का दर्शन मन में प्रकाश करता है। जैसे महा जंगल (उदिआन) में रास्ता मिल जाए, वैसे साधू की संगत में ज्योति प्रकट होती है।

    ये चारों उपमाएँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी से हैं: खंभा, नाव, दीपक, जंगल का रास्ता। गुरु जी जटिल आध्यात्मिक सत्य को बिल्कुल सरल चित्रों में समझाते हैं।

    पउड़ी 4

    मन मूरख काहे बिललाईऐ ॥ पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥
    दूख सूख प्रभ देवनहार ॥ अवर तिआगि आप तिसहि चितार ॥
    कउन बसतु आई तेरै संगि ॥ लपटि रहिओ रसि लोभी पतंगि ॥
    राम नाम जपि हिरदय माहि ॥ नानक पति सेती घरि जाहि ॥4॥

    “मन मूरख काहे बिललाईऐ”: हे मूर्ख मन, क्यों बिलखता है? तक़दीर में जो लिखा है, वो पाएँगे। दुख-सुख देने वाला प्रभु है, और सब छोड़कर उसी को याद कर। “कउन बसतु आई तेरै संगि”: कौन-सी चीज़ आपके साथ आई है (जन्म के वक़्त)? “लपटि रहिओ रसि लोभी पतंगि”: लोभी पतंगे की तरह रस में लिपटा है (जैसे पतंगा रोशनी पर जलता है)। राम नाम हृदय में जपो, इज़्ज़त से घर (ईश्वर के दरबार) जाएँगे।

    पउड़ी 5

    जिसु वखर कउ लैनि आप आइआ ॥ राम नामु संतन घरि पाइआ ॥
    तजि अभिमानु लेहु मन मोलि ॥ राम नामु हिरदै मह तोलि ॥
    लादि खेपु संतह संगि चालु ॥ अवर तिआगि बिखिआ जंजाल ॥
    धंनि धंनि कहै सभु कोइ ॥ मुख ऊजल हरि दरगह सोइ ॥
    इहु वापारु विरला वापारै ॥ नानक ता कै सद बलिहारै ॥5॥

    “जिसु वखर कउ लैनि आप आइआ”: जिस माल (वखर) को लेने आप (इस दुनिया में) आया है, वो राम नाम है, संतों के घर मिलता है। “तजि अभिमानु लेहु मन मोलि”: अभिमान छोड़, मन को “मोल” (दाम) दे, यानी गुरु को बेच दे। “लादि खेपु संतह संगि चालु”: खेप (माल) लादकर संतों के संग चलो। “इहु वापारु विरला वापारै”: ये व्यापार कोई विरला ही करता है। ये पूरी पउड़ी व्यापारिक भाषा में है: वखर, मोल, लादि, खेपु, वापारु। गुरु जी कहते हैं कि ज़िंदगी एक बाज़ार है, और सबसे अच्छा सौदा नाम है।

    पउड़ी 6

    चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥ अरपि साध कउ अपना जीउ ॥
    साध कि धूरि करहु इसनानु ॥ साध ऊपरि जाईऐ कुरबानु ॥
    साध सेवा वडभागी पाईऐ ॥ साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
    अनिक बिघन ते साधू राखै ॥ हरि गुन गाइ अम्रित रसु चाखै ॥
    ओट गही संतह दरि आइआ ॥ सबल सूख नानक तिह पाइआ ॥6॥

    संतों के चरण धो-धोकर पीओ। अपना प्राण संत को अर्पित करो। संत की धूल से स्नान करो। संत पर कुर्बान जाएँ। संत की सेवा बड़े भाग्य से मिलती है। साधसंगत में हरि कीर्तन गाओ। अनेक विघ्नों से संत रक्षा करते हैं। हरि गुण गाकर अमृत-रस चखो। संतों के दर में आ गिरे, सारे सुख पा लिए।

    पउड़ी 7

    मिरतक कउ जीवालनहार ॥ भूखे कउ देवत अधार ॥
    सबल निधान जा की द्रिसटि माहि ॥ पुरब लिखे का लहना पाहि ॥
    सभु किछु तिस का ओहु करनी जोगु ॥ तिसु बिनु दूसर होआ न होगु ॥
    जपि जन सदा सदा दिनु रैणी ॥ सभ ते ऊच निमल इह करणी ॥
    करि किरपा जिस का नामु दीआ ॥ नानक सो जनु निरमलु थीआ ॥7॥

    मुर्दे को जिलाने वाला, भूखे को सहारा देने वाला। सब ख़ज़ाने जिसकी दृष्टि में हैं। पूर्व लिखा लहना (पाना) पाते हैं। सब कुछ उसका, वो ही करने योग्य, उसके बिना कुछ न हुआ, न होंगे। दिन-रात सदा जपो, ये सबसे ऊँची, निर्मल करनी है। कृपा करके जिसे नाम दिया, वो निर्मल हो गया।

    पउड़ी 8

    जा कै मनि गुर की परतीति ॥ तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
    भगतु भगतु सुनीऐ तिहु लोइ ॥ जा कै हिरदै एको होइ ॥
    सचु करणी सचु ता की रहत ॥ सचु हिरदै सति मुखि कहत ॥
    साची द्रिसटि साचा आकारु ॥ सचु वरतै साचा पासारु ॥
    पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता ॥ नानक सो जनु सचि समाता ॥8॥15॥

    जिसके मन में गुरु की प्रतीति (विश्वास) है, उसे हरि प्रभु याद आता है। तीनों लोकों में “भगत-भगत” सुनाई देता है (सब उसे भक्त कहते हैं)। जिसके हृदय में एक ही (ईश्वर) बसे। सच्ची करनी, सच्ची रहत, हृदय में सत्य, मुँह से सत्य। सच्ची दृष्टि, सच्चा आकार, सत्य चल रहा है, सच्चा पसारा। “पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता, नानक सो जनु सचि समाता”: जिसने पारब्रह्म को सच मानकर जाना, वो सत्य में समा गया।

    अष्टपदी 16

    परब्रह्म की अगम्यता
    सोलहवीं अष्टपदी ईश्वर की अगम्यता (पहुँच से परे होने) पर ध्यान केंद्रित करती है। वो रूप-रेखा-रंग से परे है।प्रेम से जाना जा सकता है।

    श्लोक

    रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥
    तिसहि बुझाइ नानका जिसु होवै सुप्रसंन ॥1॥
    न रूप, न रेखा, न रंग कुछ, तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से प्रभु भिन्न (अलग) है। उसे वो ही समझाता है, नानक कहते हैं, जिस पर प्रसन्न हो। ये श्लोक ईश्वर की “नेति-नेति” (ये भी नहीं, वो भी नहीं) परिभाषा है: उसे किसी भी रूप, रंग, या गुण में बाँधा नहीं जा सकता।

    पउड़ी 1

    अबिनासी प्रभु मन मह राखु ॥ मानुख की आप प्रीति तिआगु ॥
    तिस ते परै नाही किछु कोइ ॥ सबल निरंतरि एको सोइ ॥
    आपे बीना आपे दाना ॥ गहिर गंभीर गहीर सुजाना ॥
    पारब्रहम परमेसुर गोबिंद ॥ कृपा निधान दइआल बखसंद ॥
    साध आपके की चरनी पाउ ॥ नानक कै मनि इहु अनराउ ॥1॥

    “अबिनासी प्रभु मन मह राखु, मानुख की आप प्रीति तिआगु”: अविनाशी प्रभु को मन में रख, इंसानों से प्रीत (लगाव) त्याग दे। ये चौदहवीं अष्टपदी का ही विस्तार है। “तिस ते परै नाही किछु कोइ”: उससे परे (बाहर) कुछ भी नहीं। “सबल निरंतरि एको सोइ”: सबके अंदर वही एक है।

    “गहिर गंभीर गहीर सुजाना”: गहीर (गहरा), गंभीर (गंभीर), गहीर (और गहरा), सुजाना (बुद्धिमान)। ये शब्द एक के बाद एक गहराई बढ़ाते जाते हैं, जैसे समुद्र में उतरते जाएँ।

    “साध आपके की चरनी पाउ, नानक कै मनि इहु अनराउ”: आपके साधू के चरणों में गिरूँ, नानक के मन में यही अनुराग (इच्छा) है।

    पउड़ी 2

    मनसा पूरन सरना जोग ॥ जो करि पाइआ सोई होगु ॥
    हरन भरन जा कउ नेत्र फोर ॥ तिस कउ मंत्रु न जानै होर ॥
    आनद रूप मंगल सद जा कै ॥ सबल थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥
    राज मह राज जोग मह जोगी ॥ तप मह तपीसुर गृहसत मह भोगी ॥
    धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ॥ नानक तिसु पुरख का किनी अंतु न पाइआ ॥2॥

    “मनसा पूरन”: मनोकामना पूर्ण करने वाला। “सरना जोग”: शरण देने योग्य। “हरन भरन जा कउ नेत्र फोर”: हरने (लेने) और भरने (देने) में जिसे पलक झपकने (नेत्र फोर) भर लगे।

    “राज मह राज जोग मह जोगी, तप मह तपीसुर गृहसत मह भोगी”: राजाओं में राजा, योगियों में योगी, तपस्वियों में तपस्वी, और गृहस्थों में भोगी। वो हर रूप में श्रेष्ठ है। ये सुंदर पंक्ति है: ईश्वर मंदिर या जंगल तक सीमित नहीं रहता, वो राजमहल में भी राजा है और गृहस्थी में भी सबसे बड़ा भोगी है।

    पउड़ी 3

    जा की लीला कि मिति नाहि ॥ सगल देव हारे अवगाहि ॥
    पिता का जनमु कि जानै पूतु ॥ सगल परोई अपुने सूति ॥
    सुमति गिआनु धिआनु जिन दए ॥ जन दास नामु धिआवहि सए ॥
    तिहु गुण मह जा कउ भ्रमाए ॥ जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥
    ऊच नीच तिस के असथान ॥ जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥3॥

    जिसकी लीला की कोई सीमा नहीं, सारे देवता उसे नापने में थक-हारकर बैठ गए। पिता का जन्म पुत्र नहीं जानता (ईश्वर का मूल कोई नहीं जान सकता)। सारी रचना उसके सूत (धागे) में पिरोई है। जिसे सुमति, ज्ञान, ध्यान दिया, वो दास नाम ध्याते हैं। जिसे तीन गुणों में भटकाया, वो जन्मता-मरता, आता-जाता रहता है। ऊँचे-नीचे सब उसके स्थान हैं। जैसा जनवाए (दिखाए), वैसा नानक जानता है।

    पउड़ी 4

    नाना रूप नाना जा के रंग ॥ नाना भेख करहि एक रंग ॥
    नाना बिधि कीनो बिसथार ॥ प्रभु अबिनासी एकंकार ॥
    नाना चलित करे खिन माहि ॥ पूरि रहिओ पूरनु सभ ठाइ ॥
    नाना बिधि करि बनत बनाई ॥ अपनी कीमति आपे पाई ॥
    सभ घटि तिस के सभ तिस के ठाउ ॥ जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥4॥

    अनेक रूप, अनेक रंग, अनेक भेष, लेकिन एक ही सार। अनेक विधियों से विस्तार, लेकिन प्रभु अविनाशी एकंकार। पल भर में अनेक लीलाएँ, पूर्ण रूप से हर जगह भरा। अनेक विधियों से बनावट बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। सब शरीर उसके, सब ठिकाने उसके। जप-जपकर जीता है नानक, हरि नाम।

    पउड़ी 5

    नाम के धारे सगले जंत ॥ नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
    नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥ नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
    नाम के धारे आगास पाताल ॥ नाम के धारे सगल आकार ॥
    नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥ नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
    करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ॥ नानक चउथे पद मह सो जनु गति पाए ॥5॥

    ये “नाम के धारे” पउड़ी पूरी सृष्टि को नाम पर टिका हुआ दिखाती है: जंतु, खंड-ब्रह्मांड, स्मृति-वेद-पुराण, सुनना-ज्ञान-ध्यान, आकाश-पाताल, सारे आकार, सारी पुरियाँ (लोक) और भवन, सब नाम के सहारे। कानों से सुनकर नाम के संग उद्धार। कृपा करके जिसे नाम में लगाए, वो चौथे पद (तुरीयावस्था, सत्-रज-तम से परे) में गति पाता है।

    पउड़ी 6

    रूपु सति जा कउ सति असथानु ॥ पुरखु सति केवल परधानु ॥
    करतूति सति सति जा की बाणी ॥ सति पुरख सभ माहि समाणी ॥
    सति करणी निमल निरमली ॥ जिसहि बुझाइ तिसहि सभ भली ॥
    सति नामु प्रभ का सुखदाई ॥ बिस्वासु सति नानक गुर ते पाई ॥6॥

    “सति” (सत्य) की लय: रूप सत्य, स्थान सत्य। पुरुष सत्य, केवल प्रधान। करतूत सत्य, बाणी सत्य। सत्य पुरुष सबमें समाया। सत्य करनी निर्मल। जिसे समझाए, उसे सब भली (अच्छी) लगे। सत्य नाम प्रभु का सुखदायी। विश्वास सत्य, नानक गुरु से पाई।

    पउड़ी 7

    सति बचन साधू उपदेस ॥ सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
    सति निरति बूझै जे कोइ ॥ नामु जपत ता की गति होइ ॥
    आपि सति कीआ सभु सति ॥ आपे जानै अपनी मिति गति ॥
    जिस कि स्रिसटि सु करणैहारु ॥ अवर न बूझि करत बीचारु ॥
    करते की मिति न जानै कीआ ॥ नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥7॥

    संतों का उपदेश सत्य-वचन। सत्य वो जन जिसके हृदय में प्रवेश कर गया। सत्य-रीति समझे जो कोई, नाम जपने से उसकी गति हो। वो ख़ुद सत्य, उसका बनाया सब सत्य। अपनी सीमा (मिति) और गति ख़ुद जानता है। जिसकी सृष्टि है, वही करने वाला, दूसरा विचार करने लायक़ नहीं। कर्ता की सीमा रचना नहीं जानती। जो उसे भाए, वो चलता है।

    पउड़ी 8

    बिसमन बिसम भए बिसमाद ॥ जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद ॥
    प्रभ कै रंगि राचि जन रहे ॥ गुर कै बचनि पदारथि लहे ॥
    ओइ दाते दुख काटनहार ॥ जा कै संगि तरै संसार ॥
    जन का सेवकु सो वडभागी ॥ जन कै संगि एक लिव लागी ॥
    गुन गोबिंद कीरतनु जनु गावै ॥ गुर प्रसादि नानक फलु पावै ॥8॥16॥

    विस्मय ही विस्मय, विस्मित हो गए। जिसने समझा, उसे स्वाद आया। प्रभु के रंग में रचे-बसे भक्त, गुरु के वचन से चार पदार्थ पाए। वो दाता हैं, दुख काटने वाले, उनकी संगत में संसार तरता है। भक्तों का सेवक बड़भागी है, उनकी संगत में एक (ईश्वर) की लिव (ध्यान) लगी। गोबिंद के गुण-कीर्तन गाता है, गुरु की कृपा से फल पाता है।

    अष्टपदी 17

    सत: शाश्वत सत्य
    ये वो अष्टपदी है जिसका श्लोक बाबा श्रीचंद जी ने सुनाया था। “आदि सचु, जुगादि सचु” गुरु नानक देव जी का श्लोक है, जो जपुजी साहिब में भी आता है। ये अष्टपदी “सत” (सत्य) के स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करती है।
    श्लोक
    आदि सचु जुगादि सचु ॥
    है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥1॥
    आदि (शुरू) में सत्य, युगादि (युगों के शुरू) में सत्य। अभी भी सत्य, नानक कहते हैं, आगे भी सत्य रहेगा। ये जपुजी साहिब का मूल मंत्र है, और बाबा श्रीचंद जी ने जब गुरु अर्जन देव जी को ये सुनाया, तो गुरु जी ने इसे 17वीं अष्टपदी के शीर्ष पर रख दिया। ये चार शब्दों में अनंतता का बयान है: शुरू में सच, युगों में सच, अभी सच, हमेशा सच।

    पउड़ी 1

    चरन सति सति परसनहार ॥ पूजा सति सति सेवदार ॥
    दरसनु सति सति पेखनहार ॥ नामु सति सति धिआवनहार ॥
    आपि सति सति सभ धारी ॥ आपे गुण आपे गुणकारी ॥
    सबदु सति सति प्रभु बकता ॥ सुरति सति सति जसु सुनता ॥
    बुझनहार कउ सति सभ होइ ॥ नानक सति सति प्रभु सोइ ॥1॥

    ये पउड़ी “सति” (सत्य) शब्द को हर पंक्ति में दोहराती है, एक विशिष्ट लय बनाते हुए:

    चरण सत्य, उन्हें छूने वाला सत्य। पूजा सत्य, सेवादार सत्य। दर्शन सत्य, देखने वाला सत्य। नाम सत्य, ध्यान करने वाला सत्य। वो ख़ुद सत्य, सबको धारण करने वाला सत्य। शबद (वाणी) सत्य, बोलने वाला प्रभु सत्य। सुरति (चेतना) सत्य, यश सुनने वाला सत्य।

    “बुझनहार कउ सति सभ होइ”: जो समझ ले, उसके लिए सब कुछ सत्य हो जाता है। ये गहरी बात है: जब तक नहीं समझा, सब मिथ्या (झूठा) दिखता है (जैसा पाँचवीं अष्टपदी में बताया)। जब समझ आ जाए, तो वही सब सत्य हो जाता है।

    पउड़ी 2

    सति सरूपु रिदै जिनि मानिआ ॥ करन करावन तिनि मूलु पछानिआ ॥
    जा कै रिदै बिसवासु प्रभ आइआ ॥ ततु गिआनु तिसु मनि प्रगटाइआ ॥
    भै ते निरभउ होइ बसानां ॥ जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाना ॥
    बसतु माहि ले बसतु गडाई ॥ ता कउ भिंन न कहना जाई ॥
    बूझै बूझनहारु बिबेक ॥ नारायण मिले नानक एक ॥2॥

    जिसने सत्य-स्वरूप को हृदय में माना, उसने मूल (जड़, स्रोत) पहचान लिया। जिसके हृदय में प्रभु का विश्वास आया, उसके मन में तत्व-ज्ञान प्रकट हुआ। भय से निर्भय हो गया। जिससे उत्पन्न हुआ, उसी में समा गया।

    “बसतु माहि ले बसतु गडाई, ता कउ भिंन न कहना जाई”: वस्तु (आत्मा) को वस्तु (परमात्मा) में गाड़ दिया (मिला दिया), अब उसे अलग कहा ही नहीं जा सकता। ये ग्यारहवीं अष्टपदी के “जल मह जल” (पानी में पानी) वाले रूपक जैसा ही है, लेकिन एक और कोण से।

    पउड़ी 3

    ठाकुर का सेवकु आगिआकारी ॥ ठाकुर का सेवकु सदा पूजारी ॥
    ठाकुर के सेवक कै मनि परतीति ॥ ठाकुर के सेवक कि निमल रीति ॥
    ठाकुर कउ सेवकु जानै संगि ॥ प्रभ कउ सेवकु नाम कै रंगि ॥
    सेवक कउ प्रभ पालनहारा ॥ सेवक कि राखै निरंकारा ॥
    सो सेवकु जिसु दइआ प्रभु धारै ॥ नानक सो सेवकु सासि सासि समारै ॥3॥

    ठाकुर (मालिक) का सेवक आज्ञाकारी है, सदा पूजारी है। सेवक के मन में प्रतीति (विश्वास), उसकी रीति निर्मल। सेवक ठाकुर को संग (साथ) जानता है, नाम के रंग में रँगा है। प्रभु सेवक का पालन करता है, निरंकार रक्षा करता है। जिस पर दया करे, वो सेवक, नानक उसे साँस-साँस याद करता है।

    पउड़ी 4

    अपुने जन का पर्दा ढाकै ॥ अपने सेवक कि सरपर राखै ॥
    अपने दास कउ दे वडाई ॥ अपने सेवक कउ नामु जपाई ॥
    अपने सेवक कि आपि पति राखै ॥ ता कि गति मिति कोइ न लाखै ॥
    प्रभ के सेवक कउ को न पहूचै ॥ प्रभ के सेवक ऊच ते ऊचै ॥
    जो प्रभि अपनी सेवा लाइआ ॥ नानक सो सेवकु दह दिसि प्रगटाइआ ॥4॥

    अपने भक्त का पर्दा (दोष) ढक लेता है। ज़रूर रक्षा करता है। बड़ाई और नाम जपवाता है। सेवक की पत (इज़्ज़त) ख़ुद रखता है। प्रभु के सेवक को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता, वो ऊँचे-से-ऊँचा है। जिसे प्रभु ने अपनी सेवा में लगाया, उसे दसों दिशाओं में प्रकट किया।

    पउड़ी 5

    नीकी कीरी मह कल राखै ॥ भसम करै लसकर कोटि लाखै ॥
    जिस कउ सासु न काढत आपि ॥ ता कउ राखत दे करि हाथ ॥
    मानस जतन करत बहु भाति ॥ तिस के करतब बिरथे जाति ॥
    मारै न राखै अवरु न कोइ ॥ सबल जीआ कउ राखा सोइ ॥
    काहे सोच करहि रे प्रानी ॥ जपि नानक प्रभ अलख विडानी ॥5॥

    “नीकी कीरी मह कल राखै, भसम करै लसकर कोटि लाखै”: छोटी-सी चींटी में शक्ति रखता है, और करोड़ों-लाखों की फ़ौज को भस्म कर देता है। ये ईश्वर की विचित्र शक्ति है: वो कमज़ोर को ताक़तवर और ताक़तवर को कमज़ोर बना सकता है। जिसकी साँस ख़ुद न निकाले, उसकी हाथ देकर रक्षा करता है। इंसान के उपाय व्यर्थ। मारने-बचाने वाला और कोई नहीं। “काहे सोच करहि रे प्रानी”: हे प्राणी, क्यों चिंता करता है?

    पउड़ी 6

    बारं बार बार प्रभु जपीऐ ॥ पी अम्रितु इहु मनु तनु धरपीऐ ॥
    नाम रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ॥ तिसु किछु अवरु नाही द्रिसटाइआ ॥
    नामु धनु नामो रूपु रंगु ॥ नामो सुखु हरि नाम का संगु ॥

    बार-बार-बार प्रभु को जपो। अमृत पीकर मन-तन तृप्त करो। नाम-रत्न जिसने गुरमुख से पाया, उसे कुछ और नहीं दिखता। नाम ही धन, नाम ही रूप-रंग, नाम ही सुख, हरि नाम का संग ही सब कुछ।

    पउड़ी 7

    बोलहु जसु जिहबा दिनु राति ॥ प्रभि अपने जन कीनी दाति ॥
    करहि भगति आतम कै चाइ ॥ प्रभ अपने सिउ रहहि समाइ ॥
    आठ पहर प्रभ बसहि हजूरे ॥ कहु नानक सेई जन पूरे ॥7॥

    जीभ से दिन-रात यश बोलो। प्रभु ने अपने जनों को ये दात दी है। आत्मा के चाव (उत्साह) से भक्ति करते हैं। प्रभु में समाए रहते हैं। आठ पहर प्रभु को पास (हजूरे) जानते हैं। नानक कहते हैं, ऐसे ही जन पूरे (सम्पूर्ण) हैं।

    पउड़ी 8

    मन मेरे तिन की ओट लेहि ॥ मनु तनु अपना तिन जन देहि ॥
    जिनि जनि अपना प्रभू पछाता ॥ सो जनु सबल थोक का दाता ॥
    तिस की सरनि सबल सुख पावहि ॥ तिस कै दरसि सभ पाप मिटावहि ॥
    अवर सिआणप सगली छाडु ॥ तिसु जन की आप सेवा लागु ॥
    आवनु जावनु न होवी आपका ॥ नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा ॥8॥17॥

    हे मेरे मन, उन (संतों) का आसरा ले। मन-तन उन जनों को दे दे। जिस जन ने अपने प्रभु को पहचाना, वो सारी चीज़ों का दाता है। उसकी शरण में सारे सुख, उसके दर्शन से सारे पाप मिटते हैं। और सारी चतुराई छोड़कर उसकी सेवा में लगो। “आवनु जावनु न होवी आपका”: आपका आना-जाना (जन्म-मरण) नहीं रहेगा। “नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा”: ऐसे जन के सदा पैर पूजो।

    अष्टपदी 18

    सतगुरु और सिख
    अठारहवीं अष्टपदी सतगुरु और सिख (शिष्य) के रिश्ते को गहराई से खोलती है। ये रिश्ता कैसा होना चाहिए, गुरु क्या करता है, सिख को क्या करना चाहिए, इसका पूरा नक़्शा यहाँ है।

    श्लोक

    सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का नाउ ॥
    तिस कै संगि सिखु उधरै नानक हरि गुन गाउ ॥1॥
    जिसने सत्य-पुरुष (ईश्वर) को जान लिया, सतगुरु उसी का नाम है। उसकी संगत में सिख (शिष्य) उधर जाता है। नानक कहते हैं, हरि के गुण गाओ। ये श्लोक “सतगुरु” की परिभाषा देता है: सतगुरु वो है जिसने सत्य-पुरुष को जान लिया है। डिग्री, पद, या वंश से नहीं, अनुभव से।

    पउड़ी 1

    सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ॥ सेवक कउ गुरु सदा दइआल ॥
    सिख की गुरु दुरमति मलु हिरै ॥ गुर बचनी हरि नामु उचरै ॥
    सतिगुरु सिख के बंधन काटै ॥ गुर का सिखु बिकार ते हाटै ॥
    सतिगुरु सिख कउ नाम धनु देइ ॥ गुर का सिखु वडभागी हे ॥
    सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै ॥ नानक सतिगुरु सिख कउ जीअ नालि समारै ॥1॥

    ये पउड़ी गुरु-सिख के रिश्ते का blueprint है:

    सतगुरु सिख की प्रतिपाल (पालन-पोषण) करता है। सेवक पर सदा दयालु है। सिख की दुर्मति (बुरी बुद्धि) का मैल हरता (धोता) है। गुरु के वचनों से हरि नाम उच्चारण होता है। सतगुरु सिख के बंधन काटता है। गुरु का सिख विकारों से हटता (दूर होता) है। सतगुरु सिख को नाम-धन देता है। गुरु का सिख बड़भागी है।

    “सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै”: सतगुरु सिख का इहलोक (हलतु) और परलोक (पलतु) दोनों सँवारता है। “जीअ नालि समारै”: जीव के साथ (नालि) याद रखता है, यानी कभी नहीं भूलता।

    पउड़ी 2

    गुर कै गृहि सेवकु जो रहै ॥ गुर की आगिआ मन मह सहै ॥
    आपस कउ करि कछु न जनावै ॥ हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ॥
    मनु बेचै सतिगुर कै पासि ॥ तिसु सेवक के कारज रासि ॥
    सेवा करत होइ निहकामी ॥ तिस कउ होत प्रापति सुआमी ॥
    अपनी कृपा जिसु आपि करए ॥ नानक सो सेवकु गुर की मति लए ॥2॥

    “गुर कै गृहि सेवकु जो रहै”: जो सेवक गुरु के घर (संगत, शरण) में रहे। “गुर की आगिआ मन मह सहै”: गुरु की आज्ञा मन में सहे (स्वीकार करे, धारण करे)। “आपस कउ करि कछु न जनावै”: अपने बारे में कुछ नहीं जताए (दिखावा न करे)।

    “मनु बेचै सतिगुर कै पासि”: मन को बेच दे सतगुरु के पास। ये “बेचना” बड़ा तीखा शब्द है। जैसे कोई दुकान पर सामान बेचता है तो फिर उसका मालिक नहीं रहता, वैसे ही मन गुरु को दे दो, अब आपका नहीं रहा, गुरु का है। “तिसु सेवक के कारज रासि”: ऐसे सेवक के सारे काम रास (पूरे) होते हैं।

    “सेवा करत होइ निहकामी”: सेवा करते हुए निष्काम (बिना इच्छा के) हो। “तिस कउ होत प्रापति सुआमी”: उसे स्वामी (ईश्वर) की प्राप्ति होती है।

    पउड़ी 3

    बीस बिसवे गुर का मनु मानै ॥ सो सेवकु परमेसुर की गति जानै ॥
    सो सतिगुरु जिसु रिदै हरि नाउ ॥ अनिक बार गुर कउ बलि जाउ ॥
    सबल निधान जीअ का दाता ॥ आठ पहर पारब्रहम रंगि राता ॥
    ब्रहम मह जनु जन मह पारब्रहमु ॥ एकहि आपि नही कछु भरमु ॥
    सहस सिआणप लइआ न जाईऐ ॥ नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ ॥3॥

    “बीस बिसवे गुर का मनु मानै”: बीस बिसवे (सौ प्रतिशत, पूरी तरह) गुरु का मन माने (गुरु पर पूरा भरोसा हो)। “सो सेवकु परमेसुर की गति जानै”: वो सेवक परमेश्वर की गति (अवस्था) जानता है।

    “ब्रहम मह जनु जन मह पारब्रहमु”: ब्रह्म में जन (भक्त) है, जन में पारब्रह्म है। “एकहि आपि नही कछु भरमु”: एक ही है, कोई भ्रम नहीं। ये अद्वैत (non-duality) का फिर से दोहराव: गुरु, सिख, और ईश्वर, तीनों अलग नहीं हैं।

    “सहस सिआणप लइआ न जाईऐ”: हज़ार चतुराइयों से (गुरु) पाया नहीं जा सकता। “नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ”: ऐसा गुरु बड़े भाग्य से मिलता है।

    पउड़ी 4

    सफल दरसनु पेखत पुनीत ॥ परसत चरन गति निमल रीत ॥
    बैठत संगि राम गुन रवे ॥ पारब्रहम कि दरगह गवे ॥
    सुनि करि बचन करन आघाने ॥ मनि संतोखु आतम पतीआने ॥
    पूरा गुरु अड़ओ जा कउ मंत्रु ॥ अम्रित द्रिसटि पेखै होइ संत ॥
    गुण बिअंत कीमति नही पाइ ॥ नानक जिसु भावै तिसु ले मिलाइ ॥4॥

    सफल दर्शन, देखते ही पवित्र। चरण छूने से गति और निर्मल रीति। संग बैठने से राम गुण रचने लगते हैं। पारब्रह्म की दरगाह में पहुँचते हैं। वचन सुनकर कान तृप्त, मन में संतोष, आत्मा प्रतीत (संतुष्ट)। पूरे गुरु का मंत्र अटल, अमृत-दृष्टि से देखकर संत बना देता है। गुण अनंत, कीमत नहीं लगती। जिसे भाए, उसे मिला ले।

    पउड़ी 5

    जिहबा एक उसतति अनेक ॥ सति पुरख पूरन बिबेक ॥
    काहू बोल न पहुचत प्रानी ॥ अगम अगोचर प्रभ निरबानी ॥
    निरआहार निरवैर सुखदाई ॥ ता की कीमति किनी न पाई ॥

    एक जीभ, स्तुति अनेक। सत्य पुरुष, पूर्ण विवेक। कोई बोल प्राणी की पहुँच नहीं। अगम, अगोचर, निर्वाण-स्वरूप प्रभु। निर्आहार (बिना भोजन), निर्वैर (बिना वैर), सुखदायी। उसकी कीमत किसी ने नहीं पाई।

    पउड़ी 6

    इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ॥ अम्रितु पीवै अमरु सो होइ ॥
    उसु पुरख का नाही कदे बिनास ॥ जा कै मनि प्रगटे गुनतास ॥
    आठ पहर हरि का नामु लए ॥ सचु उपदेसु सेवक कउ दए ॥
    अंधकार दीपक प्रगासे ॥ नानक भ्रम मोह दुख तह ते नासे ॥6॥

    ये हरि-रस कोई विरला पाता है। अमृत पीता है, अमर हो जाता है। ऐसे पुरुष का कभी विनाश नहीं, जिसके मन में गुणों का ख़ज़ाना (गुनतास) प्रकट हो। आठ पहर हरि नाम ले, सच्चा उपदेश सेवक को दे। “अंधकार दीपक प्रगासे”: अँधेरे में दीपक जल गया। “नानक भ्रम मोह दुख तह ते नासे”: भ्रम, मोह, दुख वहाँ से नष्ट।

    पउड़ी 7

    तपति माहि ठाढि वरताई ॥ अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
    जनम मरन के मिटे अंदेसे ॥ साधू के पूरन उपदेसे ॥
    भउ चूका निरभउ होइ बसे ॥ सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
    जिस कउ सा तिनि किरपा धारी ॥ साधसंगि जपि नामु मुरारी ॥
    थिति पाई चूके भ्रम गवन ॥ सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥7॥

    तपिश में ठंडक बरसाई। आनंद हुआ, दुख भागे। जन्म-मरण की चिंता मिटी, संतों के पूर्ण उपदेश से। भय गया, निर्भय होकर बसा। सारे रोग मन से नष्ट। जिस पर कृपा धारी, साधसंगत में मुरारी का नाम जपा। स्थिति (ठहराव) पाई, भ्रम और भटकना बंद। कानों से हरि-हरि यश सुनो।

    पउड़ी 8

    निरगुणु आपि सरगुणु भी ओही ॥ कला धारि जिनि सगली मोही ॥
    अपने चरित प्रभि आपि बनाए ॥ अपुनी कीमति आपे पाए ॥
    हरि बिनु दूजा नाही कोइ ॥ सबल निरंतरि एको सोइ ॥
    ओटि पोटि रविआ रूप रंग ॥ भए प्रगास साध कै संग ॥
    रचि रचना अपनी कल धारी ॥ अनिक बार नानक बलिहारी ॥8॥18॥

    निर्गुण ख़ुद, सगुण भी वही। कला धारण करके सारी सृष्टि को मोह लिया। अपनी लीला ख़ुद बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। हरि के बिना दूसरा कोई नहीं, सबके अंदर वही एक। ओत-पोत (ताने-बाने) में, सारे रूप-रंगों में व्याप्त। प्रकाश साधू की संगत में हुआ। रचना रचकर अपनी शक्ति धारी, अनेक बार नानक बलिहारी।

    अष्टपदी 19

    माया की नश्वरता
    अठारहवीं अष्टपदी ने गुरु-सिख का रिश्ता बताया। उन्नीसवीं अष्टपदी एक बार फिर माया की नश्वरता पर लौटती है, लेकिन अब गहराई और है: भक्ति के बिना सब कुछ “छार” (राख) है।
    Yesterday's Treasure, Today's Clutter

    श्लोक

    साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
    हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥1॥
    भजन के बिना (कुछ) साथ नहीं चलता, विषय-विकार सब राख (छारु) हैं। हरि हरि नाम कमाना, नानक कहते हैं, यही असली धन (सार) है। “छारु” (राख) शब्द बहुत तीखा है। राख वो होती है जो जलने के बाद बचती है। गुरु जी कह रहे हैं कि माया जल चुकी है, बस राख है।
    पउड़ी 1
    संत जना मिलि करहु बीचारु ॥ एकै सिमरि नाम आधारु ॥
    अवरि उपाव सभि मीत बिसारहु ॥ चरन कमल रिद मह उरि धारहु ॥
    करन कारन सो प्रभु समरथु ॥ द्रिड़ करि गहहु नामु हरि वथु ॥
    इहु धनु संचहु होवहु भगवंत ॥ संत जना कउ निमल मंत ॥
    एक आस रखहु मन माहि ॥ सबल रोग नानक मिटि जाहि ॥1॥

    गुरु जी सीधे निर्देश देते हैं: संत जनों से मिलकर विचार करो। एक (ईश्वर) को सिमरो, नाम का आधार रखो। बाक़ी सारे उपाय और मित्रों को बिसारो। चरण-कमल हृदय में धारो। नाम हरि की “वथु” (वस्तु, सामान) है, उसे दृढ़ता से पकड़ो। ये धन इकट्ठा करो, भगवंत बनो। ये संत जनों का निर्मल मंत्र है। एक ही आशा मन में रखो, सारे रोग मिट जाएँगे।

    “इहु धनु संचहु होवहु भगवंत”: ये धन जमा करो और भगवंत (भगवान वाले, ईश्वर से जुड़े) बनो। “संचहु” (जमा करो) शब्द ध्यान देने लायक़ है। गुरु जी धन-संचय की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन धन नाम है।

    पउड़ी 2

    जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥ सो धनु हरि सेवा ते पावहि ॥
    जिसु सुख कउ नित बाछहि मीत ॥ सो सुखु साधू संगि परीत ॥
    जिसु सोभा कउ करहि भली करनी ॥ सा सोभा भजु हरि की सरनी ॥
    अनिक उपाई रोगु न जाइ ॥ रोगु मिटै हरि अवखधु लाइ ॥
    सबल निधान मह हरि नामु निधानु ॥ जपि नानक दरगहि परवानु ॥2॥

    जिस धन के लिए चारों कोनों में दौड़ते हैं, वो हरि की सेवा से मिलता है। जिस सुख को रोज़ चाहते हैं मित्रो, वो साधसंगत में प्रीति से मिलता है। जिस शोभा के लिए अच्छे काम करते हैं, वो हरि की शरण में मिलती है। अनगिनत उपायों से रोग नहीं जाता, हरि की औषधि लगाओ तो मिटता है। सारे ख़ज़ानों में हरि नाम सबसे बड़ा ख़ज़ाना है। जपो, दरगाह में परवान (स्वीकार) होंगे।

    पउड़ी 3

    मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥ दह दिसि धावत आवै ठाइ ॥
    ता का बिघनु न लागै कोइ ॥ जा कै रिदै बसै हरि सोइ ॥
    कलि तापी ठाढा हरि नाउ ॥ सिमरि सिमरि सदा सुखु पाउ ॥
    भउ बिनसै पूरन होइ आस ॥ भगति भाइ आतम प्रगास ॥
    तितु घरि जाइ बसै अबिनासी ॥ कहु नानक काटी जम फासी ॥3॥

    मन को हरि के नाम से जगाओ। दसों दिशाओं में भागता मन ठिकाने आ जाता है। जिसके हृदय में हरि बसे, उसे कोई विघ्न नहीं लगता। कलियुग की तपिश में खड़ा है हरि का नाम (शीतलता का स्रोत)। भय मिटता है, आशा पूरी होती है, भक्ति-भाव से आत्मा में प्रकाश होता है। उस घर (ठिकाने, अवस्था) में अविनाशी बसता है। नानक कहते हैं, जम (मृत्यु) की फाँसी कट गई।

    पउड़ी 4

    ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥ जनमि मरै सो काचो काचा ॥
    आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥ आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
    इउ रतन जनम का होइ उधारु ॥ हरि हरि सिमरि प्रान आधारु ॥
    अनिक उपाव न छूटनहारे ॥ सिम्रिति सासत बेद बीचारे ॥
    हरि की भगति करहु मनु लाइ ॥ मनि बंछत नानक फलु पाइ ॥4॥

    “ततु बीचारु कहै जनु साचा”: तत्व-विचार (मूल सत्य का चिंतन) सच्चा जन कहता है। “जनमि मरै सो काचो काचा”: जो जन्मता-मरता रहे, वो कच्चे-से-कच्चा है (अपक्व, अधूरा)। आवा-गवन प्रभु की सेवा से मिटता है। अपना आप त्यागकर गुरुदेव की शरण लो। ऐसे ही इस रत्न-जन्म (बहुमूल्य मनुष्य शरीर) का उद्धार होता है। हरि सिमरन ही प्राणों का आधार है।

    “अनिक उपाव न छूटनहारे, सिम्रिति सासत बेद बीचारे”: अनगिनत उपाय, स्मृतियाँ, शास्त्र, वेद विचारने से भी छुटकारा नहीं। हरि की भक्ति मन लगाकर करो, मन की इच्छा का फल मिलेगा।

    पउड़ी 5

    संगि न चालसि तेरै धना ॥ तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
    सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥ इन ते कहहु आप कवन सनाथा ॥
    राज रंग माइआ बिसथार ॥ इन ते कहहु कवन छुटकार ॥
    असु हसती रथ असवारी ॥ झूठा डंफु झूठु पासारी ॥
    जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥ नामु बिसारि नानक पछुताना ॥5॥

    “संगि न चालसि तेरै धना”: आपका धन आपके साथ नहीं चलेगा। “तूं किआ लपटावहि मूरख मना”: हे मूर्ख मन, आप क्यों लिपट रहा है? बेटे, मित्र, परिवार, पत्नी, इनसे क्या सहारा? राज, रंग, माया का विस्तार, इनसे कौन-सा छुटकारा? घोड़े, हाथी, रथ, सवारी, झूठा दिखावा, झूठा पसारा। “जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना”: जिसने ये सब दिए, उसे अनजान (बिगाना) नहीं पहचानता। “नामु बिसारि नानक पछुताना”: नाम बिसारकर पछताता है।

    पउड़ी 6

    गुर की मति तूं लेहि इआने ॥ भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥
    हरि की भगति करहु मन मीत ॥ निरमल होइ तुम्हारो चीत ॥
    चरन कमल राखहु मन माहि ॥ जनम जनम के किलबिख जाहि ॥
    आपि जपहु अवरा नामु जपावहु ॥ सुनत कहत रहत गति पावहु ॥
    सार भूत सति हरि को नाउ ॥ सहजि सुभाइ नानक गुन गाउ ॥6॥

    “गुर की मति तूं लेहि इआने”: हे अज्ञानी, गुरु की बुद्धि ले। “भगति बिना बहु डूबे सिआने”: भक्ति के बिना बड़े-बड़े सयाने डूब गए। हरि की भक्ति करो, चित्त निर्मल होंगे। चरण-कमल मन में रखो, जन्मों-जन्मों के पाप जाएँगे। ख़ुद जपो, दूसरों को जपवाओ। सुनते, कहते, रहते (जीवन जीते) गति (मुक्ति) पाएँगे। “सार भूत सति हरि को नाउ”: सारतत्व, सच, हरि का नाम है। सहज स्वभाव से गुण गाओ।

    पउड़ी 7

    गुन गावत आपकी उतरसि मैलु ॥ बिनसि जाइ हउमै बिखु फैलु ॥
    होइ अचिंतु बसै सुख नालि ॥ सासि ग्रासि हरि नामु समालि ॥
    छाडि सिआणप सगली मना ॥ साधसंगि पावहि सचु धना ॥
    हरि पूंजी संचि करहु बिउहारु ॥ ईहा सुखु दरगह जैकारु ॥
    सबल निरंतरि एको देखु ॥ कहु नानक जा कै मसतकि लेखु ॥7॥

    गुण गाते-गाते मैल उतरेगा। अहंकार-विष का फैलाव नष्ट होंगे। अचिंत (चिंता-मुक्त) होकर सुख के साथ बसोगे। साँस-ग्रास हरि नाम सँभालो। “छाडि सिआणप सगली मना”: हे मन, सारी चतुराई छोड़। साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे। हरि की पूँजी इकट्ठी करो और व्यापार करो। इधर (इस जन्म में) सुख, दरगाह में जयकार (विजय)। सबके अंदर एक ही को देखो। नानक कहते हैं, जिसके माथे पर लेख (तक़दीर) हो (वो ही ये देख पाता है)।

    पउड़ी 8

    एको जपि एको सालाहि ॥ एकु सिमरि एको मन आहि ॥
    एकस के गुन गाउ अनंत ॥ मनि तनि जापि एक भगवंत ॥
    एको एकी एकी हरि आपि ॥ पूरन पूरि रहिओ प्रभु बिआपि ॥
    अनिक बिसथार एक ते भए ॥ एकै अराधि परछत गए ॥
    मन तन अंतरि एकै प्रभ राता ॥ गुर प्रसादि नानक एकै जाता ॥8॥19॥

    उन्नीसवीं अष्टपदी का समापन “एक” शब्द की आवृत्ति से होता है: एक को जपो, एक की प्रशंसा करो, एक को सिमरो, एक ही मन में रखो। एक के अनंत गुण गाओ। मन-तन से एक भगवंत जपो। एक ही एक, हरि ख़ुद, पूर्ण रूप से व्याप्त। अनेक विस्तार एक से हुए, एक की आराधना से सारे बंधन गए। मन-तन में एक ही प्रभु रचा-बसा। गुरु की कृपा से नानक ने एक ही को जाना। ये “एक” का जाप पूरी उन्नीसवीं अष्टपदी का निचोड़ है: सब अनेकता एक से निकली है, एक में ही लौटती है।

    अष्टपदी 20

    याचना और समर्पण
    बीसवीं अष्टपदी पूरी सुखमनी साहिब की सबसे भावुक अष्टपदी है। गुरु जी याचक बनकर ईश्वर से माँगते हैं, और जो माँगते हैं वो नाम, भक्ति, और संत-संगत है।

    श्लोक

    फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥
    नानक की प्रभ बेनती अपनी भगती लाइ ॥1॥
    भटकते-भटकते, हे प्रभु, (आख़िरकार) आपकी शरण में आ पड़ा। नानक की प्रभु से विनती: अपनी भक्ति में लगा ले। “फिरत फिरत” (भटकते-भटकते) में पूरे जीवन की यात्रा समा गई। इतना भटका, इतनी जगह ढूँढा, आख़िर में आपके दरवाज़े पर आ गिरा। ये समर्पण का क्षण है।

    पउड़ी 1

    जाचकु जनु जाचै प्रभ दानु ॥ करि किरपा देवहु हरि नामु ॥
    साध जना की मागउ धूरि ॥ पारब्रहम मेरी सरधा पूरि ॥
    सदा सदा प्रभ के गुन गावउ ॥ सासि सासि प्रभ तुमहि धिआवउ ॥
    चरन कमल सिउ लागै प्रीति ॥ भगति करउ प्रभ की निट नीति ॥
    एक ओट एको आधारु ॥ नानकै मागै नामु प्रभ सारु ॥1॥

    “जाचकु जनु जाचै प्रभ दानु”: याचक (माँगने वाला) जन प्रभु से दान माँचता है। “करि किरपा देवहु हरि नामु”: कृपा करके हरि नाम दो। “साध जना की मागउ धूरि”: संत जनों की (चरणों की) धूल माँगता हूँ। “पारब्रहम मेरी सरधा पूरि”: हे पारब्रह्म, मेरी श्रद्धा पूरी करो।

    गुरु जी क्या माँग रहे हैं: नाम, संतों की धूल, गुण गाने का मौक़ा, चरण-कमल से प्रीत, भक्ति। ये सब “अंदरूनी” चीज़ें हैं। कोई बाहरी सुख नहीं माँगा, कोई धन नहीं, कोई सत्ता नहीं।

    पउड़ी 2

    प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥ हरि रसु पावै बिरला कोइ ॥
    जिन चाखिआ से जन त्रिपताने ॥ पूरन पुरख नही डोलाने ॥
    सुभर भरे प्रेम रस रंगि ॥ उपजै चाउ साध कै संगि ॥
    परे सरणि आन सभ तिआगि ॥ अंतरि प्रगास अनदिनु लिव लागि ॥
    बडभागी जपिआ प्रभु सोइ ॥ नानक नामि रते सुखु होइ ॥2॥

    प्रभु की दृष्टि से महासुख होता है। हरि-रस कोई विरला पाता है। जिन्होंने चखा, वो तृप्त हो गए, पूर्ण पुरुष, कभी नहीं डोलते। प्रेम-रस-रंग में लबालब (सुभर) भरे हैं। साधू की संगत में चाव (उत्साह) उपजता है। और सब छोड़कर शरण में आ गए। अंदर प्रकाश है, दिन-रात लिव (ध्यान) लगी रहती है। बड़भागी ने उस प्रभु को जपा, नाम में रँगे हुओं को सुख मिलता है।

    पउड़ी 3

    सेवक की मनसा पूरी भई ॥ सतिगुर ते निमल मति लई ॥
    जन कउ प्रभु होइओ दइआलु ॥ सेवकै कीनो सदा निहालु ॥
    बंधन काटि मुकति जनु भइआ ॥ जनम मरन दूखु भ्रमु गइआ ॥
    इछ पुनी सरधा सभ पूरी ॥ रवि रहिआ सद संगि हजूरी ॥
    जिस कउ सा तिनि लीआ मिलाइ ॥ नानक भगती नामि समाइ ॥3॥

    सेवक की मनोकामना पूरी हुई। सतगुरु से निर्मल बुद्धि ली। प्रभु दयालु हुआ, सेवक को सदा निहाल (प्रसन्न) किया। बंधन काटकर मुक्त हो गया। जन्म-मरण का दुख और भ्रम चला गया। इच्छा पूरी, श्रद्धा पूरी। सदा संग (साथ) हज़ूर (पास) रहता है। जिसे अपनाना था, उसे मिला लिया। नानक कहते हैं, भक्ति और नाम में समा गया।

    पउड़ी 4

    सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥ सो किउ बिसरै जि कीआ जानै ॥
    सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥ सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥
    सो किउ बिसरै जि अगनि मह राखै ॥ गुर प्रसादि को बिरला लाखै ॥
    सो किउ बिसरै जि बिखु ते काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥
    गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ ॥ प्रभु अपना नानक जन धिआइआ ॥4॥

    ये पउड़ी “सो किउ बिसरै” (उसे कैसे भूलें?) की लय पर चलती है, और हर पंक्ति एक वजह देती है:

    उसे कैसे भूलें जो (भक्त की) मेहनत को अस्वीकार नहीं करता? जो किए हुए को जानता है? जिसने सब कुछ दिया? जो जीवन का जीवन है? जिसने (गर्भ की) अग्नि में रक्षा की? जो विष (ज़हर, विकार) से निकालता है? जो जन्मों-जन्मों के टूटे हुए (रिश्ते, कर्म) जोड़ता (गाढ़ता) है?

    “गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ”: पूरे गुरु ने यही तत्व समझाया। “प्रभु अपना नानक जन धिआइआ”: नानक के जन ने अपना प्रभु ध्याया।

    पउड़ी 5

    साजन संत करहु इहु कामु ॥ आन तिआगि जपहु हरि नामु ॥
    सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पावहु ॥ आपि जपहु अवरह नामु जपावहु ॥
    भगति भाइ तरीऐ संसारु ॥ बिनु भगती तनु होसी छारु ॥
    सबल कलिआण सूख निधानु नामु ॥ बूडत जात पाइ बिसरामु ॥
    सगल दूख का होवत नासु ॥ नानक नामु जपहु गुणतासु ॥5॥

    “साजन संत करहु इहु कामु, आन तिआगि जपहु हरि नामु”: मित्रो, संतो, ये काम करो, और सब छोड़कर हरि नाम जपो। “सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पावहु”: सिमर-सिमर-सिमर सुख पाओ। ये “सिमरि” तीन बार, पहली अष्टपदी की प्रतिध्वनि। “आपि जपहु अवरह नामु जपावहु”: ख़ुद जपो, दूसरों को जपवाओ। “भगति भाइ तरीऐ संसारु, बिनु भगती तनु होसी छारु”: भक्ति-भाव से संसार तरो, भक्ति के बिना शरीर राख हो जाएगा। “छारु” (राख) वही शब्द है जो श्लोक में आया था। सारे दुखों का नाश होता है। गुणों के ख़ज़ाने (गुणतासु) का नाम जपो।

    पउड़ी 6

    उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥ मन तन अंतरि इही सुआउ ॥
    नेत्रहु पेखि दरसु सुखु होइ ॥ मनु बिगसै साध चरन धोइ ॥
    भगत जना कै मनि तनि रंगु ॥ बिरला कोऊ पावै संगु ॥
    एक बसतु दीजै करि मइआ ॥ गुर प्रसादि नामु जपि लइआ ॥
    ता की उपमा कही न जाइ ॥ नानक रहिआ सबल समाइ ॥6॥

    प्रीत उपजी, प्रेम-रस का चाव उठा। मन-तन में यही मक़सद है। आँखों से दर्शन देखकर सुख, मन खिलता है संत के चरण धोकर। भक्तों के मन-तन में रंग चढ़ा है, कोई विरला ही संगत पाता है। “एक बसतु दीजै करि मइआ”: एक वस्तु (नाम) दो कृपा करके। उसकी उपमा कही नहीं जा सकती, सबमें समाया हुआ है।

    पउड़ी 7

    प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥ भगति वछलु सदा किरपाल ॥
    अनाथ नाथ गोबिंद गुपाल ॥ सबल घटा करत प्रतिपाल ॥
    आदि पुरख कारण करतार ॥ भगत जना के प्रान अधार ॥
    जो जो जपै सु होइ पुनीत ॥ भगति भाइ लावै मन हीत ॥
    हम निरगुनीआर नीच अजान ॥ नानक तुमरी सरनि पुरख भगवान ॥7॥

    ईश्वर के नामों की माला: बख़्शने वाला, दीनों पर दयालु, भक्ति-वत्सल, सदा कृपालु, अनाथों का नाथ, गोबिंद, गोपाल, सबका पालनहार, आदि-पुरुष, कारण-करतार, भक्तों के प्राणों का आधार। जो जपे, पुनीत हो जाए। “हम निरगुनीआर नीच अजान”: हम गुणहीन, नीच, अज्ञानी। आपकी शरण में, हे पुरुष भगवान।

    पउड़ी 8

    सबल बैकुंठ मुकति मोख पाइ ॥ एक निमख हरि के गुन गाइ ॥
    अनिक राज भोग बडिआई ॥ हरि के नाम की कथा मनि भाई ॥
    बहु भोजन कापर संगीत ॥ रसना जपती हरि हरि नीत ॥
    भली सु करनी सोभा धनवंत ॥ हिरदै बसे पूरन गुर मंत ॥
    साधसंगि प्रभ देहु निवासु ॥ सबल सूख नानक परगासु ॥8॥20॥

    सारे बैकुंठ, मुक्ति, मोक्ष, एक पल हरि के गुण गाने से मिल जाते हैं। अनेक राज, भोग, बड़ाई, ये सब तब हैं जब हरि के नाम की कथा मन को भाई। जीभ हरि-हरि नित्य जपती रहे। भली करनी, शोभा, धनवंत, ये तब जब हृदय में पूरे गुरु का मंत्र बसा हो। “साधसंगि प्रभ देहु निवासु, सबल सूख नानक परगासु”: साधसंगत में निवास दो, सारे सुख प्रकाश हो जाएँगे।

    अष्टपदी 21

    सरगुण-निरगुण का रहस्य
    इक्कीसवीं अष्टपदी सुखमनी साहिब के गहरे दार्शनिक विषय पर आती है: ईश्वर सरगुण (गुणों वाला, साकार) भी है और निरगुण (गुणों से रहित, निराकार) भी।एक ही है।

    श्लोक

    सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥
    आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि ॥1॥
    सगुण भी ख़ुद, निर्गुण भी ख़ुद, निरंकार भी ख़ुद, शून्य-समाधि में भी ख़ुद। अपना बनाया, नानक कहते हैं, ख़ुद ही फिर जपता है। ये एक पंक्ति में पूरा वेदांत, पूरी सूफ़ी परंपरा, पूरा सिख दर्शन समा गया: रचनाकार और रचना अलग नहीं हैं।

    पउड़ी 1

    जब अकार इहु कछु न द्रिसटेता ॥ पाप पुंन तब कह ते होता ॥
    जब धारी आपन सुंन समाधि ॥ तब बैर बिरोध किसु संगि कमाति ॥
    जब इस कउ बरनु चिहनु न जापत ॥ तब हरख सोग कहु किसहि बिआपत ॥
    जब आपन आप आपि पारब्रहम ॥ तब मोह कहा किसु होवत भरम ॥
    आपन खेलु आपि वरतीजा ॥ नानक करनैहारु न दूजा ॥1॥

    गुरु जी सृष्टि से पहले की अवस्था की कल्पना करवाते हैं:

    जब कोई आकार (दृश्य जगत) नहीं दिखता था, तब पाप-पुण्य कहाँ से होते? जब वो अपनी शून्य-समाधि में था, तब बैर-विरोध किसके साथ? जब उसका न वर्ण (रंग) था, न चिह्न (पहचान), तब हर्ष-शोक किसे होता? जब वो ख़ुद ही पारब्रह्म था (और कुछ नहीं था), तब मोह किसे, भ्रम किसका?

    “आपन खेलु आपि वरतीजा”: अपना खेल ख़ुद ही खेल रहा है। “करनैहारु न दूजा”: करने वाला दूसरा कोई नहीं। ये सृष्टि-पूर्व की शून्य अवस्था का चित्र है, जहाँ सिर्फ़ “वो” था, और कुछ नहीं। अच्छा-बुरा, सुख-दुख, कोई द्वंद्व नहीं उठा था, चारों ओर शून्य पसरा हुआ था।

    पउड़ी 2

    जब होवत प्रभ केवल धनी ॥ तब बंध मुकति कहु किस की गनी ॥
    जब एकहि हरि अगम अपार ॥ तब नरक सुरग कहु कउन अउतार ॥
    जब निरगुण प्रभ सहज सुभाइ ॥ तब सिव सकति कहहु किथु ठाइ ॥
    जब आपहि आपि अपनी जोति धरै ॥ तब कवन निडरु कवन कत डरै ॥
    आपन चलित आपि करणैहार ॥ नानक ठाकुर अगम अपार ॥2॥

    जब प्रभु केवल (अकेला) स्वामी था, तब बंधन-मुक्ति किसकी गिनती? जब एक ही हरि अगम, अपार था, तब नरक-स्वर्ग-अवतार कहाँ? जब निर्गुण प्रभु सहज स्वभाव में था, तब शिव-शक्ति कहाँ? जब ख़ुद अपनी ज्योति ख़ुद धारण करता, तब कौन निडर, कौन किससे डरता? ये सब सवाल “जब-तब” की लय पर हैं, और हर सवाल का जवाब एक ही है: जब सिर्फ़ “वो” था, तो ये सारे द्वंद्व थे ही नहीं।

    पउड़ी 3

    जब आपहि आपि अपनी जोति धरै ॥ तब कवन निडरु कवन कत डरै ॥
    आपन चलित आपि करणैहार ॥ कउतक करै रंग आपार ॥

    ये पौराणिक “जब-तब” का विस्तार है। जब ख़ुद ही अपनी ज्योति धारे, तो डर किसका? अपनी लीला ख़ुद रचता है, अपार (असीम) रंगों के कौतुक (तमाशे) करता है।

    पउड़ी 4

    नाना रूप नाना जा के रंग ॥ नाना भेख करहि एक रंग ॥
    नाना बिधि कीनो बिसथार ॥ प्रभु अबिनासी एकंकार ॥

    जब ईश्वर ने ज्योति फैलाई, तब सृष्टि प्रकट हुई। अनेक रूप, रंग, भेष, लेकिन एक ही सार। अनेक विधियों से विस्तार किया, लेकिन प्रभु अविनाशी एक ओंकार ही है।

    पउड़ी 5

    नाम के धारे सगले जंत ॥ नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
    नाम के धारे आगास पाताल ॥ नाम के धारे सगल आकार ॥

    सारे जीव नाम के सहारे, सारे ब्रह्मांड नाम से टिके। आकाश-पाताल, सारे आकार, सब नाम पर टिके हैं। ये “नाम के धारे” की लय पूरी सृष्टि को नाम पर टिका हुआ दिखाती है।

    पउड़ी 6

    रूपु सति जा कउ सति असथानु ॥ पुरखु सति केवल परधानु ॥
    करतूति सति सति जा की बाणी ॥ सति पुरख सभ माहि समाणी ॥

    रूप सत्य, स्थान सत्य। पुरुष सत्य, केवल प्रधान। करतूत सत्य, बाणी सत्य। सत्य पुरुष सबमें समाया।

    पउड़ी 7

    सति बचन साधू उपदेस ॥ सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
    आपि सति कीआ सभु सति ॥ करते की मिति न जानै कीआ ॥

    संतों का उपदेश सत्य-वचन। सत्य वो जन जिसके हृदय में प्रवेश। वो ख़ुद सत्य, उसका बनाया सब सत्य। कर्ता की सीमा रचना नहीं जानती।

    पउड़ी 8

    बिसमन बिसम भए बिसमाद ॥ जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद ॥
    प्रभ कै रंगि राचि जन रहे ॥ गुर कै बचनि पदारथि लहे ॥
    ओइ दाते दुख काटनहार ॥ जा कै संगि तरै संसार ॥
    जन कउ सेवकु सोई वफ़ादार ॥ जन कै संगि एक लिव लागी ॥
    गुन गोबिंद कीरतनु जनु गावै ॥ गुर प्रसादि नानक फलु पावै ॥8॥21॥

    “बिसमन बिसम भए बिसमाद”: विस्मय ही विस्मय, विस्मित हो गए। “जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद”: जिसने समझा, उसे स्वाद आ गया। प्रभु के रंग में रचे-बसे भक्त, गुरु के वचन से पदार्थ (चार पदार्थ) पाए। वो दाता हैं, दुख काटने वाले, उनकी संगत में संसार तरता है। गोबिंद के गुण-कीर्तन गाता है, गुरु की कृपा से फल पाता है।

    अष्टपदी 22

    सृष्टि से पहले का शून्य
    इक्कीसवीं अष्टपदी ने सरगुण-निरगुण का दर्शन दिखाया। बाईसवीं अष्टपदी उस शून्य अवस्था को और गहराई से खोलती है, और फिर सृष्टि के प्रकट होने तक ले जाती है।

    श्लोक

    जब अकार इहु कछु न द्रिसटेता ॥ तब कहि ऊपजी कह इहु कता ॥
    कह माइआ जालु इहु कता ॥ आपन आपु किआ जानता ॥
    आपनै रंगि ता आपु चलाइओ ॥ ना कोइ मंदु न कोइ भलाइओ ॥

    ये श्लोक सवाल पूछता है: जब कुछ दिखता ही नहीं था, तब ये (सृष्टि) कहाँ से उपजी? ये कहाँ जाएगी? माया का जाल कहाँ था? वो (ईश्वर) अपने आप को ख़ुद क्या जानता? अपने रंग (इच्छा) में ख़ुद ही चलता था। न कोई बुरा, न कोई भला। ये प्रश्न पूछने का ही अपने-आप में एक साधना है: इन सवालों पर ध्यान लगाना मन को शून्य की तरफ़ ले जाता है।

    पउड़ी 1

    जब अकार इहु कछु न द्रिसटेता ॥ तब कहि ऊपजी कह इहु कता ॥
    जब एकहि हरि अगम अपार ॥ तब कउन छुटे कउन गइ पार ॥

    जब कुछ दिखता ही नहीं था, तब ये कहाँ से उपजी, कहाँ जाएगी? जब एक ही हरि अगम अपार था, तब कौन छूटा, कौन पार गया? ये सवाल ध्यान की तरफ़ ले जाते हैं: इन सवालों पर चिंतन मन को शून्य की तरफ़ खींचता है।

    पउड़ी 2

    जब धारी आपन सुंन समाधि ॥ तब बैर बिरोध किसु संगि कमाति ॥
    आपन आपु आपि परवानु ॥ आपहि रचिआ सभ कै साथि ॥

    जब शून्य-समाधि धारी, तब बैर-विरोध किसके संग? ख़ुद ही ख़ुद को ख़ुद परवान (स्वीकार)। ख़ुद ही सबके साथ रचा।

    पउड़ी 3

    जब हवा पाणी अगनी नाही ॥ तब कउन उपजै कउन बिलाई ॥

    जब हवा, पानी, अग्नि नहीं थी, तब कौन उपजा, कौन बिला (नष्ट हुआ)? जब धर्म-कर्म-वर्ण नहीं, तब कौन जपता? ये सारे प्रश्न एक ही ओर इशारा करते हैं: सृष्टि से पहले भी वही, सृष्टि के दौरान भी वही, सृष्टि के बाद भी वही।

    पउड़ी 4

    नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै ॥ जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै ॥

    अनेक रूप जैसे नाटक करने वाला (स्वांगी) दिखाता है। जैसे प्रभु को भाए, वैसे नचाता है। ये सृष्टि एक रंगमंच है।

    पउड़ी 5

    नाम के धारे सगले जंत ॥ नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
    नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥ नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
    नाम के धारे आगास पाताल ॥ नाम के धारे सगल आकार ॥
    नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥ नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
    करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ॥ नानक चउथे पद मह सो जनु गति पाए ॥5॥

    ये “नाम के धारे” पउड़ी शक्तिशाली है: सारे जीव नाम के सहारे। खंड-ब्रह्मांड नाम से टिके। स्मृति-वेद-पुराण नाम से टिके। सुनना-ज्ञान-ध्यान नाम से। आकाश-पाताल नाम से। सारे आकार नाम से। सारी पुरियाँ (लोक) और भवन नाम से। कान से सुनकर नाम के संग उद्धार। कृपा करके जिसे अपने नाम में लगाए, वो चौथे पद (तुरीयावस्था, परम अवस्था) में गति पाता है।

    पउड़ी 6

    रूपु सति जा कउ सति असथानु ॥ पुरखु सति केवल परधानु ॥
    करतूति सति सति जा की बाणी ॥ सति करणी निमल निरमली ॥

    “सति” (सत्य) की लय, 17वीं अष्टपदी की प्रतिध्वनि: रूप सत्य, स्थान सत्य। पुरुष सत्य, केवल प्रधान। करतूत सत्य, बाणी सत्य। सत्य करनी निर्मल, शुद्ध।

    पउड़ी 7

    सति बचन साधू उपदेस ॥ सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
    आपि सति कीआ सभु सति ॥ करते की मिति न जानै कीआ ॥
    नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥7॥

    संतों का उपदेश सत्य-वचन। सत्य वो जन जिसके हृदय में ईश्वर प्रवेश कर गया। वो ख़ुद सत्य, उसका बनाया सब सत्य। कर्ता की सीमा रचना नहीं जानती। जो उसे भाए, वो चलता है।

    पउड़ी 8

    अपने चरित प्रभि आपि बनाइ ॥ आपनी कीमति आपे पाइ ॥
    सभ घटि रविआ रूप रंग ॥ भए प्रगास साध कै संग ॥
    रचि रचना अपनी कल धारी ॥ अनिक बार नानक बलिहारी ॥8॥22॥

    अपनी लीला ख़ुद बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। सारे रूप-रंगों में व्याप्त, प्रकाश संत की संगत से होता है। रचना रचकर अपनी कला (शक्ति) धारी, अनेक बार नानक बलिहारी।

    अष्टपदी 23

    नाम ही सहारा
    तेईसवीं अष्टपदी पूरी सुखमनी साहिब के मूल विषय पर लौटती है: नाम ही एकमात्र सहारा है। ये पहली अष्टपदी की प्रतिध्वनि है, लेकिन अब 22 अष्टपदियों की यात्रा के बाद ये बात और गहरी गूँजती है।

    श्लोक

    सभ गुण आपके मै नही कोइ ॥
    बिनु गुण कीते भगति न होइ ॥
    सुरसती सिधि पीहि मँत्रु ॥
    करमे बवनू फेरू जँत्रु ॥

    ये श्लोक सारे गुण आपके हैं, मेरा कोई गुण नहीं। गुण के बिना भक्ति नहीं होती। गुरु जी ख़ुद को गुणहीन कहते हैं, और ये कहकर गुणों की पराकाष्ठा दिखाते हैं।

    पउड़ी 1

    संत जना मिलि बोलहु राम ॥ सबल निधान पूरन सभ काम ॥
    मन की बासना मन ते जाइ ॥ हरि का प्रतापु मन मह आइ ॥
    अनिक बिघन ते भए निरारे ॥ साधू अपुने रखनहारे ॥

    संत जनों से मिलकर राम बोलो। सारे ख़ज़ाने पूरे, सारे काम पूरे। मन की वासना मन से जाती है, हरि का प्रताप मन में आता है। अनेक विघ्नों से छुटकारा मिलता है, साधू ही रखवाले (रक्षक) हैं।

    पउड़ी 2

    करउ बेनती सुनहु मेरे मीता ॥ संत टहल की बेला ईता ॥
    ईहा खाटि चलहु हरि लाह ॥ आगै बसनु सुहेला जाह ॥

    विनती करता हूँ, सुनो मेरे मित्र। संतों की सेवा का यही वक़्त (ईता) है। यहाँ (इस जन्म में) हरि का लाभ कमाकर चलो, आगे (परलोक में) सुख से बसोगे। “ईहा खाटि” (यहाँ कमाओ) में व्यापार की भाषा है: ये जन्म एक बाज़ार है, और सबसे अच्छा सौदा नाम है।

    पउड़ी 3

    गुन गावत आपकी उतरसि मैल ॥ बिनसि जाइ हउमै बिखु फैल ॥
    छाडि सिआणप सगली मना ॥ साधसंगि पावहि सचु धना ॥
    हरि पूंजी संचि करहु बिउहार ॥ ईहा सुखु दरगह जैकार ॥

    गुण गाते मैल उतरेगा, अहंकार-विष मिटेगा। “छाडि सिआणप सगली मना”: हे मन, सारी चतुराई छोड़। साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे। हरि की पूँजी जमा करो, व्यापार करो। इधर सुख, दरगाह में जयकार।

    पउड़ी 4

    ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥ जनमि मरै सो काचो काचा ॥
    इउ रतन जनम का होइ उधार ॥ हरि हरि सिमरि प्रान आधार ॥

    तत्व-विचार सच्चा जन कहता है। जो जन्मता-मरता रहे, वो कच्चे-से-कच्चा। इस रत्न-जन्म का उद्धार ऐसे होता है: हरि-हरि सिमरो, वही प्राणों का आधार।

    पउड़ी 5

    संगि न चालसि तेरै धना ॥ तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
    सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥ इन ते कहहु आप कवन सनाथा ॥
    गुर की मति तूं लेहि इआने ॥ भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥

    आपका धन साथ नहीं चलेगा, हे मूर्ख मन। बेटे, मित्र, परिवार, पत्नी, इनसे क्या सहारा? हे अज्ञानी, गुरु की बुद्धि ले। भक्ति के बिना बड़े-बड़े सयाने डूब गए। ये उन्नीसवीं अष्टपदी का ही भाव है, अंतिम अष्टपदियों में पूरी सुखमनी साहिब की recap हो रही है।

    पउड़ी 6

    गुन गावत आपकी उतरसि मैलु ॥ बिनसि जाइ हउमै बिखु फैलु ॥
    होइ अचिंतु बसै सुख नालि ॥ सासि ग्रासि हरि नामु समालि ॥
    छाडि सिआणप सगली मना ॥ साधसंगि पावहि सचु धना ॥

    गुण गाते मैल उतरेगा, अहंकार-विष मिटेगा। अचिंत होकर सुख के साथ बसोगे। साँस-ग्रास हरि नाम सँभालो। सारी चतुराई छोड़ो, साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे।

    पउड़ी 7

    तपति माहि ठाढि वरताई ॥ अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
    जनम मरन के मिटे अंदेसे ॥ साधू के पूरन उपदेसे ॥
    भउ चूका निरभउ होइ बसे ॥ सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
    जिस कउ सा तिनि किरपा धारी ॥ साधसंगि जपि नामु मुरारी ॥
    थिति पाई चूके भ्रम गवन ॥ सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥7॥

    तपिश में ठंडक बरसाई। आनंद हुआ, दुख भागे। जन्म-मरण की चिंता मिटी, संतों के पूर्ण उपदेश से। भय गया, निर्भय होकर बसा। सारे रोग मन से नष्ट। जिस पर कृपा धारी, साधसंगत में मुरारी का नाम जपा। “थिति पाई चूके भ्रम गवन”: ठहराव पाया, भ्रम और भटकना बंद। कानों से हरि-हरि यश सुनो।

    पउड़ी 8

    एको जपि एको सालाहि ॥ एकु सिमरि एको मन आहि ॥
    एकस के गुन गाउ अनंत ॥ मनि तनि जापि एक भगवंत ॥
    एको एकी एकी हरि आपि ॥ पूरन पूरि रहिओ प्रभु बिआपि ॥
    अनिक बिसथार एक ते भए ॥ एकै अराधि परछत गए ॥
    मन तन अंतरि एकै प्रभ राता ॥ गुर प्रसादि नानक एकै जाता ॥8॥23॥

    तेईसवीं अष्टपदी का समापन “एक” की लय से: एक को जपो, एक की प्रशंसा, एक को सिमरो, एक मन में। एक के अनंत गुण गाओ। मन-तन से एक भगवंत जपो। एक ही, पूर्ण, व्याप्त। अनेक विस्तार एक से हुए। एक की आराधना से बंधन गए। मन-तन में एक ही प्रभु रचा। गुरु की कृपा से नानक ने एक ही को जाना। “सभु गुण आपके मै किछु नाहि”: ये पहली अष्टपदी के “सिमरउ सिमरि सिमरि” का पूरा वृत्त बंद करता है।

    अष्टपदी 24

    “आपका कीआ मीठा लागै”
    ये सुखमनी साहिब की अंतिम अष्टपदी है। पूरी रचना इसी एक भाव पर आकर रुकती है: “आपका कीआ मीठा लागै”, जो तूने किया, वो मीठा लगे। ये पूर्ण समर्पण है।
    Whatever You Do Is Sweet

    श्लोक

    करण कारण समरथु हय लाथी कछू न होइ ॥
    हरि सरणाई छुटीऐ हरि बिना मुकति न होइ ॥

    करने का कारण (शक्ति) उसके पास है, (उसके बिना) कुछ नहीं हो सकता। हरि की शरण में छुटकारा मिलता है, हरि के बिना मुक्ति नहीं। ये पूरी सुखमनी साहिब का अंतिम श्लोक है, और ये पहले श्लोक (“आदि गुरए नमः”) की ही प्रतिध्वनि है: शुरुआत शरण में, अंत भी शरण में।

    पउड़ी 1

    प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥ प्रभ कै सिमरनि कबहु न झूरे ॥
    प्रभ कै सिमरनि हरि गुन बानी ॥ प्रभ कै सिमरनि सहजि समानी ॥
    प्रभ कै सिमरनि निहचल आसनु ॥ प्रभ कै सिमरनि कमल बिगासनु ॥
    प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥ सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥
    सिमरहि से जन जिन कउ प्रभ मइआ ॥ नानक तिन जन सरनी पइआ ॥

    ये पहली अष्टपदी की सातवीं पउड़ी के शब्द लगभग वही हैं। पूरी सुखमनी साहिब एक वृत्त है जो अपने शुरुआती बिंदु पर लौट आया। 24 अष्टपदियों, 192 पउड़ियों की यात्रा के बाद, गुरु जी वहीं खड़े हैं जहाँ से चले थे: सिमरन। लेकिन अब ये शब्द पहले से कहीं ज़्यादा गहरे गूँजते हैं, क्योंकि अब हम जानते हैं कि सिमरन क्या है, क्यों है, और कैसे है।

    पउड़ी 2

    सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥ हरि का नामु जपत होइ सुखीआ ॥
    लाख करोड़ी बंधु न परै ॥ हरि का नामु जपत निसतरै ॥
    अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै ॥ हरि का नामु जपत आघावै ॥
    जिह मारगि एहु जात एकेला ॥ तह हरि नामु संगि होत सुहेला ॥
    ऐसा नामु मन सदा धिआईऐ ॥ नानक गुरमुखि परम गति पाईऐ ॥2॥

    ये दूसरी अष्टपदी की दूसरी पउड़ी की लगभग शब्दश: पुनरावृत्ति है। सारी सृष्टि का राजा भी दुखी, लेकिन नाम जपने से सुखी। लाखों-करोड़ों बंधन नहीं छूटते, नाम से छूटते हैं। माया प्यास नहीं बुझाती, नाम बुझाता है। जिस रास्ते पर अकेला जाता है, वहाँ भी नाम साथी। 24 अष्टपदियों बाद ये शब्द वही हैं, लेकिन अब इनका वज़न बढ़ गया है क्योंकि बीच में 22 अष्टपदियों ने इसी बात को हर कोण से समझाया।

    पउड़ी 3

    ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥ जनमि मरै सो काचो काचा ॥
    आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥ आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
    इउ रतन जनम का होइ उधार ॥ हरि हरि सिमरि प्रान आधार ॥

    तत्व-विचार सच्चा जन कहता है: जो जन्मता-मरता रहे, वो कच्चा। आवा-गवन प्रभु की सेवा से मिटता है। अपना आप त्यागकर गुरुदेव की शरण लो। ऐसे ही रत्न-जन्म का उद्धार, हरि सिमरन ही प्राणों का आधार।

    पउड़ी 4

    संगि न चालसि तेरै धना ॥ तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
    सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥ इन ते कहहु आप कवन सनाथा ॥
    जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥ नामु बिसारि नानक पछुताना ॥

    आपका धन साथ नहीं चलेगा, हे मूर्ख मन। बेटे, मित्र, परिवार, पत्नी, इनसे क्या सहारा? जिसने दिए,नाम बिसारकर पछताता है। ये उन्नीसवीं अष्टपदी से लगभग वही शब्द हैं। गुरु जी जानबूझकर दोहरा रहे हैं, जैसे कोई शिक्षक परीक्षा से पहले ज़रूरी बातें दोबारा-तिबारा कहता है।

    पउड़ी 5

    गुर की मति तूं लेहि इआने ॥ भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥
    हरि की भगति करहु मन मीत ॥ निरमल होइ तुम्हारो चीत ॥
    चरन कमल राखहु मन माहि ॥ जनम जनम के किलबिख जाहि ॥

    हे अज्ञानी, गुरु की बुद्धि ले। भक्ति के बिना बड़े-बड़े सयाने डूब गए। हरि की भक्ति करो मन-मित्र, चित्त निर्मल होंगे। चरण-कमल मन में रखो, जन्मों-जन्मों के पाप (किलबिख) जाएँगे।

    पउड़ी 6

    गुन गावत आपकी उतरसि मैलु ॥ बिनसि जाइ हउमै बिखु फैलु ॥
    होइ अचिंतु बसै सुख नालि ॥ सासि ग्रासि हरि नामु समालि ॥
    छाडि सिआणप सगली मना ॥ साधसंगि पावहि सचु धना ॥

    गुण गाते मैल उतरेगा, अहंकार-विष नष्ट होंगे। अचिंत होकर सुख के साथ बसोगे। साँस-ग्रास हरि नाम सँभालो। सारी चतुराई छोड़ो, साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे।

     

    पउड़ी 7

    तपति माहि ठाढि वरताई ॥ अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
    जनम मरन के मिटे अंदेसे ॥ साधू के पूरन उपदेसे ॥
    भउ चूका निरभउ होइ बसे ॥ सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
    जिस का सा तिनि किरपा धारी ॥ साधसंगि जपि नामु मुरारी ॥
    थिति पाई चूके भ्रम गवन ॥ सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥7॥

    तपिश में ठंडक बरसाई। आनंद हुआ, दुख भागे भाई। जन्म-मरण की चिंता (अंदेसे) मिटी, संतों के पूर्ण उपदेश से। भय गया, निर्भय होकर बसा। सारे रोग मन से नष्ट। जिसका था, उसने कृपा धारी। साधसंगत में मुरारी (ईश्वर) का नाम जपा। स्थिति (ठहराव) पाई, भ्रम और भटकना चूका। सुनो नानक, कानों से हरि-हरि यश सुनो।

    “थिति पाई चूके भ्रम गवन”: ठहराव पाया, भटकना बंद हुआ। ये “थिति” (स्थिरता) शब्द पूरी सुखमनी साहिब का लक्ष्य है: मन को ठहराव दिलाना। सुखमनी (मन की शान्ति) यही तो है: भटकना रुके, ठहराव आए।

    पउड़ी 8: अंतिम पउड़ी

    निरगुणु आपि सरगुणु भी ओही ॥ कला धारि जिनि सगली मोही ॥
    अपने चरित प्रभि आपि बनाए ॥ अपनी कीमति आपे पाए ॥
    हरि बिनु दूजा नाही कोइ ॥ सबल निरंतरि एको सोइ ॥
    ओटि पोटि रविआ रूप रंग ॥ भए प्रगास साध कै संग ॥
    रचि रचना अपनी कल धारी ॥ अनिक बार नानक बलिहारी ॥8॥24॥

    सुखमनी साहिब की अंतिम पउड़ी।

    “निरगुणु आपि सरगुणु भी ओही”: निर्गुण ख़ुद, सगुण भी वही। “कला धारि जिनि सगली मोही”: कला (शक्ति) धारण करके सारी सृष्टि को मोह लिया। “अपने चरित प्रभि आपि बनाए”: अपनी लीला ख़ुद बनाई। “अपनी कीमति आपे पाए”: अपनी कीमत ख़ुद ही पाता है (कोई और नहीं जानता)।

    “हरि बिनु दूजा नाही कोइ”: हरि के बिना दूसरा कोई नहीं। “सबल निरंतरि एको सोइ”: सबके अंदर वही एक। “ओटि पोटि रविआ रूप रंग”: ताने-बाने (ओत-पोत) में, सारे रूप और रंगों में व्याप्त। “भए प्रगास साध कै संग”: प्रकाश साधू की संगत में हुआ।

    “रचि रचना अपनी कल धारी, अनिक बार नानक बलिहारी”: रचना रचकर अपनी शक्ति धारी, अनेक बार नानक बलिहारी जाता है।

    ये अंतिम दो पंक्तियाँ पूरी सुखमनी साहिब का सार हैं: एक ने सब रचा, सब में वो ही है, और हम बस बलिहारी जा सकते हैं। 24 अष्टपदियों में जो कहा, वो इन दो पंक्तियों में समा गया। “रचि रचना” (रचना रची) में सारी सृष्टि है। “अनिक बार बलिहारी” में सारा समर्पण।

    In Conclusion

    सुखमनी साहिब एक वृत्त (circle) है। शुरू “सिमरन” से होती है, अंत “सिमरन” पर। बीच में 24 अष्टपदियाँ इंसान को हर कोण से, हर तरीक़े से, बार-बार एक ही बात समझाती हैं: नाम जपो, संगत करो, अहंकार छोड़ो, हुकम मानो।

    गुरु अर्जन देव जी ने ये रचना उस दौर में लिखी जब वो ख़ुद बहुत कठिन परिस्थितियों से गुज़र रहे थे। कुछ ही साल बाद उन्होंने अपना बलिदान दिया। इस संदर्भ में सुखमनी साहिब का हर शब्द और गहरा हो जाता है: ये अग्नि-परीक्षा से गुज़रते हुए इंसान का सीधा अनुभव है, जो किसी विद्वान की किताबी थ्योरी से बहुत आगे की चीज़ है।

    “आपका कीआ मीठा लागै” कहना आसान है। लेकिन जब सब कुछ छिन रहा हैं, जब शरीर तपाया जा रहा हैं, तब भी कहना कि “जो तूने किया, वो मीठा है”, ये गुरु अर्जन देव जी की शान है। सुखमनी साहिब वो तैयारी है जो उस अंतिम परीक्षा से पहले की गई।

    इस पृष्ठ पर प्रस्तुत अर्थ और टीका एक विनम्र प्रयास है। गुरबाणी की गहराई किसी एक टीके में नहीं आ सकती। ये बस एक दरवाज़ा है। अंदर जाना आपका काम है।

    Appendix Insight: What Does Sukhmani Teach?

     

    साथ में पढ़ें · Companion Texts

  • हनुमान चालीसा

    हनुमान चालीसा · Hanuman Chalisa

    तैंतालीस लाइनें, दस मिनट का पाठ, और एक पूरी ज़िंदगी की हिम्मत। कहते हैं तुलसीदास ने इसे एक जेल की कोठरी में रचा, और वहीं से यह दुनिया की सबसे ज़्यादा दोहराई जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक बन गई। आइए, धागे को सिरे से पकड़ते हैं।

    2 दोहे · 40 चौपाई · 1 समापन दोहा · पढ़ने का समय ~ 20 मिनट · पहले से कुछ ज़रूरी नहीं · साथ में अच्छा लगेगा: भगवद् गीता

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    अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

    जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
    जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥

    जय हो हनुमान, ज्ञान-गुणों के सागर। जय कपीश, तीनों लोकों में उजाले वाले।

    चालीसा, पहली चौपाई

    पहले एक बात

    एक कहानी है, और शायद सच भी। कहते हैं तुलसीदास को मुग़ल बादशाह अकबर ने किसी विवाद में जेल में डाल दिया था। उसी कोठरी में, उन्होंने हनुमान चालीसा रची। सोचिए, दुनिया की सबसे ज़्यादा दोहराई जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक, एक बंद कमरे में, एक बंदी के हाथों।

    बनावट एकदम सीधी है: शुरू में दो दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ (इन्हीं चालीस से “चालीसा” नाम बना), और अंत में एक समापन दोहा। भाषा अवधी है, अवध, यानी आज का लखनऊ-इलाक़ा, की लोकभाषा। तुलसीदास संस्कृत के बड़े विद्वान थे, पर उन्होंने यह जान-बूझ कर आम लोगों की ज़बान में लिखा, ताकि किसान, बच्चा, बूढ़ा, हर कोई इसे कंठस्थ कर सके।

    और वही इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है। इसे पढ़ने के लिए बस साथ चलिए, पहले से कुछ जानना ज़रूरी नहीं। हर चौपाई में हनुमान जी का कोई न कोई रूप, कोई न कोई कहानी खुलती है, और हम हर लहर के साथ उसका भाव पकड़ते चलेंगे।

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    पूरा पाठ (PDF)

    देखिए तुलसीदास कहाँ से शुरू करते हैं। राम की तारीफ़ से नहीं, अपना मन साफ़ करने से। पहले दोहे में वे अपने गुरु के चरण-कमलों की पावन धूल से अपने मन रूपी आईने को पोंछ लेते हैं, और तभी श्रीराम का वह निर्मल यश गाने चलते हैं जो जीवन के चारों फल देता है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। पहले आईना साफ़ कीजिए, फिर उसमें कुछ दिखेगा। दूसरे दोहे में वे ख़ुद को बुद्धिहीन और अधूरा मानते हुए पवनपुत्र का स्मरण करते हैं, और तीन चीज़ें माँगते हैं, बल, बुद्धि और विद्या, साथ ही यह कि उनके सारे कष्ट और मन के विकार दूर हो जाएँ। ग़ौर कीजिए, एक महाकवि ख़ुद को “बुद्धिहीन” कह रहा है। यही वह सच्चा खुलापन है जिसके बिना कोई सीख भीतर उतरती ही नहीं। और जो तीन वरदान वे यहाँ माँगते हैं, पूरी चालीसा एक तरह से इन्हीं तीन के इर्द-गिर्द घूमती है।

    श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
    बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

    Opening illustration: a student bows to a seated guru; caption: श्री गुरु चरण सरोज रज
    गुरु-वंदना से शुरू। पहले मन का आईना, फिर उसमें दर्शन।

    बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
    बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

    अब चालीसा अपना सुर तय करती है, और पहली ही लहर में वह हनुमान जी का परिचय खोलती है। पहली लाइन में “सागर” शब्द है, समुंदर, यानी कोई एक गुण नहीं, गुणों की कोई थाह नहीं। वे ज्ञान और अच्छे गुणों के समुंदर हैं, वानरों के स्वामी, तीनों लोकों में अपने तेज से उजाला फैलाने वाले। फिर तुलसीदास उनकी जड़ें बताते हैं: वे श्रीराम के दूत हैं और उनके बल की किसी से तुलना नहीं हो सकती, माता अंजनी के पुत्र, और पवनदेव के अंश से जन्मे होने के कारण पवनसुत भी। तीसरी चौपाई एक नन्ही सी बात छिपाए है, वे महावीर हैं, पराक्रमी हैं, वज्र जैसे दृढ़ शरीर वाले “बजरंगी”, पर वे सिर्फ़ बल वाले नहीं हैं। वे कुबुद्धि और भ्रम मिटाते हैं और सुबुद्धि वालों के साथी बन जाते हैं, “सुमति के संगी”। बल और समझ, दोनों एक साथ, एक के बिना दूसरा अधूरा।

    1

    जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

    Hanuman holding mace; caption: जय हनुमान ज्ञान गुण सागर; labels Strength · Wisdom · Devotion
    बल, बुद्धि, और भक्ति, एक ही आकृति में।

    2

    राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥

    एक छोटी कहानी: देवी अंजना एक पुराने शाप के कारण धरती पर वानर-रूप में जन्मीं। वे शिव-भक्त थीं, और उनके पति थे वानर-राज केसरी। संतान की चाह में अंजना ने कठिन तपस्या की। एक दिन, पूजा के बीच, पवनदेव ने उनकी झोली में एक दिव्य प्रसाद रख दिया, जिसे उन्होंने श्रद्धा से ग्रहण किया। कुछ महीनों बाद हनुमान जी का जन्म हुआ। इसीलिए वे “पवन-पुत्र” भी हैं और केसरी के “केसरी-नंदन” भी, दोनों नाम साथ-साथ चलते हैं।

    3

    महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

    An ordinary figure with a calm inner glow; the power within
    महावीर का बल बाहर का बल नहीं, भीतर की एक स्थिरता है।

    अगली लहर हनुमान जी का रूप आँखों के सामने खींच देती है, और जान-बूझ कर। उनके शरीर का रंग सोने जैसा सुनहरा है, सुंदर वस्त्र और आभूषण, कानों में झूलते कुंडल, घुंघराले बाल जो मन मोह लेते हैं। भक्ति में तस्वीर लंगर का काम करती है, मन को एक जगह बाँध देती है। फिर तुलसीदास इसी तस्वीर में ताक़त और संयम साथ रख देते हैं: एक हाथ में वज्र यानी गदा, दूसरे में विजय की ध्वजा, और कंधे पर मूँज घास का बना पवित्र जनेऊ, जो उनकी तपस्या और विद्वत्ता का सूचक है। एक हाथ में ताक़त, कंधे पर संयम, असली बात यही जोड़ी है। छठी चौपाई उनकी दो जड़ें खोलती है, वे भगवान शंकर के अंश से उपजे हैं, एक मान्यता उन्हें रुद्र-अवतार कहती है, और साथ ही राजा केसरी के पुत्र भी। एक दैवी जड़, एक धरती की, ऊपर और नीचे दोनों से जुड़े हुए, और उनका तेज इतना विशाल कि सारा संसार प्रणाम करता है।

    4

    कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥

    A wise figure pondering then acting; wisdom and action paired
    विद्या के साथ चतुराई, और काज की तत्परता।

    5

    हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

    6

    शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥

    यहाँ चालीसा का सबसे प्यारा मोड़ आता है। सातवीं चौपाई हनुमान जी की क़ाबिलियत गिनाती है, वे विद्या के भंडार हैं, चारों वेदों के ज्ञाता, व्याकरण और संगीत में पारंगत, बेहद चतुर और बुद्धिमान। और इतना सब होते हुए भी लाइन का अंत आता है, “राम काज करिबे को आतुर”, हमेशा श्रीराम की सेवा के लिए आतुर। सारी क़ाबिलियत, और फिर भी सेवा को तत्पर, यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है और बड़ी ताक़त की असली परीक्षा भी। आठवीं चौपाई बताती है उनकी सबसे प्यारी आदत: वे राम की लीलाओं और कथाओं को सुनने में रस लेते हैं, और उनके हृदय में राम, लक्ष्मण और सीता, तीनों हमेशा बसे रहते हैं।

    7

    विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥

    8

    प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥

    एक छोटी कहानी: राम के राज्याभिषेक के बाद, ख़ुश हो कर माता सीता ने अपनी मोतियों की माला हनुमान जी को भेंट कर दी। हनुमान जी ने एक-एक मोती दाँतों से तोड़ कर देखा, और बोले, “इनमें तो मेरे राम नहीं हैं।” किसी ने हँसी में पूछा, “तो क्या आपके शरीर में राम हैं?” हनुमान जी ने अपने नख से अपना वक्ष चीर दिया, और सबने देखा, वहाँ राम, लक्ष्मण और सीता विराजमान थे। यह दृश्य सदियों से चित्रकारों और मूर्तिकारों का प्रिय विषय रहा है।

    A reminder of forgotten strength; Jambavan-style recall scene
    जब हनुमान को अपनी शक्ति याद आती है। संजीवनी का काज इसी याद से होता है।

    अब चालीसा रामायण के पराक्रम में उतरती है। नवीं चौपाई एक ही पंक्ति में दो उल्टे रूप रखती है, सबसे छोटा और सबसे विकराल, और दोनों इच्छा से। हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धर कर अशोक वाटिका में माँ सीता को दर्शन दिए, ताकि राक्षस पहचान न सकें, और बाद में विकराल रूप धर कर पूरी लंका को अपनी पूँछ की आग से जला डाला। असली ताक़त इसी में है कि कब कौनसा रूप चाहिए, यह तय कर पाना। दसवीं चौपाई में वे विशाल रूप धर कर अनेक राक्षसों का संहार करते हैं और श्रीरामचंद्र के सारे कठिन काम सँवार देते हैं। “सँवारे” शब्द प्यारा है, “किए” नहीं, यानी काम सिर्फ़ निपटाया नहीं, उसे सुंदर बना दिया। फिर ग्यारहवीं चौपाई का वह अमर दृश्य: मेघनाद के शक्ति-बाण से मूर्छित लक्ष्मण के लिए हनुमान जी हिमालय के द्रोणगिरि से संजीवनी ले आए और उनके प्राण बचाए, और राम इतने ख़ुश हुए कि उन्हें हृदय से लगा लिया।

    9

    सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

    एक छोटी कहानी: समुद्र पार कर के लंका पहुँचने पर हनुमान जी ने अपना शरीर एक बिल्ली जितना छोटा कर लिया। अशोक वाटिका में दुखी सीता के सामने प्रकट हो कर उन्होंने राम की अँगूठी सौंपी, संदेश सुनाया, और पहचान के लिए चूड़ामणि ली। लौटते समय वाटिका उजाड़ी, राक्षस-सैनिकों को हराया, फिर रावण के दरबार में निडर हो कर अपने स्वामी का संदेश सुनाया। सज़ा में उनकी पूँछ में आग लगाई गई, और उसी जलती पूँछ से उन्होंने लंका के बड़े भवन फूँक डाले।

    10

    भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥

    A strong figure bowed in service; humility holding strength
    ताक़त सेवा में नीची होकर ही पूरी होती है।

    11

    लाय सजीवन लखन जियाए। श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥

    एक छोटी कहानी: वैद्य सुषेण ने बताया कि द्रोणगिरि से चार ख़ास ओषधियाँ, सूर्योदय से पहले, लानी होंगी। हनुमान जी उड़ कर हिमालय पहुँचे। रास्ते में रावण के भेजे राक्षस कालनेमि को हराया। पर्वत पर सही बूटी पहचान नहीं पाए, तो क्या किया? पूरा पर्वत ही उखाड़ कर कंधे पर उठा लाए। उत्तर भारत के मंदिरों में यह दृश्य, पर्वत उठाए उड़ते हनुमान, सबसे ज़्यादा बनने वाली तस्वीरों में से एक है।

    अगली लहर बताती है कि राम ख़ुद हनुमान जी को कैसे देखते हैं। बारहवीं चौपाई में राम उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं और कहते हैं, “हनुमान, आप मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान ही प्यारे हैं।” रामायण में भरत का राम से प्रेम सबसे गहरे रिश्तों में गिना जाता है, और उसी कतार में रखना अपने भीतर जगह दे देना है। तेरहवीं चौपाई में राम कहते हैं कि हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी सदा उनका यशगान करते हैं, और ऐसा कह कर लक्ष्मीपति राम उन्हें गले लगा लेते हैं। आशय सीधा है, हनुमान जी का यश गाने के लिए एक जीभ क्या, हज़ार जीभें भी कम पड़ें। कभी-कभी तारीफ़ का सबसे सच्चा रूप यही है, यह मान लेना कि शब्द कम पड़ रहे हैं।

    12

    रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

    13

    सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

    Yama, Kubera, dikpalas hearing Hanuman's name; gods listen
    जम-कुबेर-दिगपाल, सब हनुमान का यश सुनते हैं।

    अब पूरी सृष्टि उनकी स्तुति में जुटती है, और यही इस लहर का ज़ोर है। चौदहवीं चौपाई में सनक आदि चार ब्रह्म-कुमार, ब्रह्मा जैसे देवता और बड़े-बड़े मुनि, देवर्षि नारद, विद्या की देवी शारदा, और शेषनाग, ये सब हनुमान जी का गुणगान करते हैं। जो ख़ुद इतने ऊँचे हैं वे भी झुक रहे हैं, यही असली ऊँचाई की पहचान है। पंद्रहवीं चौपाई और आगे जाती है: यमराज, धन के देवता कुबेर, और आठों दिशाओं के रक्षक दिगपाल भी उनके यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते, फिर साधारण कवि और विद्वान कहाँ तक गा पाएँगे। तुलसीदास ख़ुद को भी इसी कतार में रख रहे हैं, मैं भी एक कवि हूँ, मेरे शब्द भी कम पड़ेंगे, यह कवि की एक प्यारी ईमानदारी है।

    14

    सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

    (इन नामों में हर एक की अपनी कहानी है, नारद की वीणा, शारदा के हंस, शेषनाग के हज़ार फण। उनमें उतरना हो तो नीचे गहरी डुबकी वाला हिस्सा है।)

    15

    जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥

    सोलहवीं और सत्रहवीं चौपाई एक जोड़ी की तरह चलती हैं, दोनों यह दिखाती हैं कि सही समय पर एक सही क़दम इतिहास का रुख़ बदल देता है। सोलहवीं में हनुमान जी ने वानर-राज सुग्रीव पर बड़ा उपकार किया, उन्हें श्रीराम से मिलवाया, और इसी का नतीजा था कि सुग्रीव को किष्किंधा का राज-सिंहासन मिला। एक सही परिचय, और आगे की पूरी राम-कथा खड़ी हो गई। सत्रहवीं में हनुमान जी की दी सलाह को विभीषण ने माना, अधर्मी रावण का साथ छोड़ा, राम की शरण में आए, और युद्ध के बाद लंका के राजा बने। सोलहवीं में एक सही परिचय ने इतिहास बदला, सत्रहवीं में एक सही सलाह ने, सही समय पर सही बात कह देने में भी एक ताक़त है।

    16

    तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

    एक छोटी कहानी: सुग्रीव को उनके भाई बाली ने राज्य से निकाल दिया था, और वे कुछ साथियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे रहते थे। जब राम और लक्ष्मण सीता को खोजते हुए वहाँ पहुँचे, तो हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धर कर उनसे परिचय किया, सुग्रीव से मिलवाया, और दोनों के बीच अग्नि-साक्षी मित्रता करवाई। इसी मित्रता से आगे की पूरी कहानी बनी, सुग्रीव की वानर-सेना ही सीता-खोज और लंका-युद्ध में राम की ताक़त बनी। एक सही परिचय, और इतिहास का रुख़ बदल गया।

    17

    तुम्हरो मंत्र विभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

    Hanuman moving from Lanka back home; the return that brings life
    भीम-रूप धर के असुर-संहार, और फिर वापस जीवन की ओर।

    अब दो बचपन और यात्रा वाली चौपाइयाँ, दोनों में एक असंभव काम सहज दिखाया गया है। अठारहवीं में वह मशहूर दृश्य है: सूर्य, जो धरती से हज़ारों योजन दूर है, उसे हनुमान जी ने बचपन में एक मीठा फल समझ कर निगल लिया था। उन्नीसवीं में श्रीराम की अँगूठी मुँह में रख कर वे विशाल समुद्र एक ही छलाँग में पार कर गए, और लाइन कहती है यह कोई अचरज नहीं था, यह तो सहज काम था। इतना बड़ा काम, और कहा गया “अचरज नाहीं”, कोई बड़ी बात नहीं।

    18

    A small Hanuman child leaping in the sky with arms outstretched toward the sun, the earth and a river spread far below
    जुग सहस्र जोजन पर भानु · बच्चा हनुमान सूर्य को मीठा फल समझ कर निगलने उड़ चला।

    जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

    एक छोटी कहानी: बचपन में एक दिन हनुमान जी ने उगते सूरज को एक पका लाल फल समझ लिया और आकाश की ओर उड़ चले। उसी दिन राहु भी सूर्य-ग्रहण लगाने आ रहे थे; उन्होंने हनुमान को एक और राहु समझ लिया। इंद्र ग़ुस्से में आए और अपना वज्र चला दिया। वज्र हनुमान की ठुड्डी, संस्कृत में “हनु”, पर लगा, और वे मूर्छित हो कर गिर पड़े। इसी से उनका नाम पड़ा: “हनु-मान।” फिर पवनदेव ने ग़ुस्से में संसार की हवा रोक दी, सब देवता क्षमा माँगने आए, और हनुमान जी को ढेरों वरदान दे गए।

    (इस “हज़ार योजन” में एक गणित की पहेली भी छिपी है, कुछ लोग इसे सूरज की असली दूरी से जोड़ते हैं। यह दिलचस्प है, पर सबके लिए नहीं। उतरना हो तो गहरी डुबकी में चलिए।)

    19

    प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

    एक छोटी कहानी: समुद्र लाँघने के लिए हनुमान जी महेन्द्र पर्वत पर चढ़े और छलाँग लगाई। रास्ते में समुद्र-देवता ने उन्हें सुस्ताने के लिए मैनाक पर्वत ऊपर उठाया, पर हनुमान राम-काम में बिना रुके आगे बढ़ गए। फिर नागमाता सुरसा ने परीक्षा ली, और सिंहिका नाम की राक्षसी का सामना हुआ। पूरे रास्ते में उनकी गति, बुद्धि और संयम, तीनों परखे गए। और एक प्यारी बात: इतना बड़ा काम, और लाइन कहती है “अचरज नाहीं”, कोई बड़ी बात नहीं।

    Hanuman crossing the ocean toward Lanka
    लंका जलाने से पहले की पूरी यात्रा, समुंदर-लंघन।

    यहाँ चालीसा का सुर बदल जाता है, अब वह पाठ करने वाले की ओर मुड़ती है। बीसवीं चौपाई एक सीधा भरोसा देती है: संसार के जितने भी कठिन और लगभग असंभव से लगने वाले काम हैं, हनुमान जी की कृपा मिल जाए तो वे सब आसान हो जाते हैं, “दुर्गम” और “सुगम” के बीच की दूरी उतनी पक्की नहीं जितनी दिखती है। इक्कीसवीं में वे श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं, मुख्य द्वारपाल, उनकी अनुमति के बिना कोई वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता, यानी जो राम तक पहुँचना चाहे उसे पहले हनुमान जी से होकर जाना है, भक्ति का रास्ता सेवा से होकर जाता है। बाईसवीं में जो उनकी शरण में आ जाता है उसे हर तरह का सुख सहज मिल जाता है, और जब रक्षक वे ख़ुद हों तो किसी का डर नहीं रहता, “काहू को डर ना”। चालीसा बार-बार इसी एक भाव पर लौटती है, डर का घटना, और शायद यही इसकी सबसे बड़ी देन है।

    20

    दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

    21

    राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

    22

    सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥

    Blessings that clear obstacles; a path opens
    संकट से छूट, यही हनुमान-नाम का काम।

    अब नाम की महिमा वाली लहर आती है, और यह सबसे ज़्यादा पाठ की जाने वाली पंक्तियों में है। तेईसवीं चौपाई एक बारीक बात कहती है: हनुमान जी का तेज इतना है कि उसे सँभालने वाले केवल वे ख़ुद हैं, कोई और उसे धारण नहीं कर सकता, और उनकी एक ललकार से तीनों लोक काँप उठते हैं। ताक़त होना एक बात है, उसे सँभाल पाना दूसरी और बड़ी बात। चौबीसवीं में जब कोई “महावीर हनुमान” का नाम लेता है, तो भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक शक्तियाँ पास नहीं फटकतीं, एक नाम, और मन का अँधेरा कोना थोड़ा रोशन। पच्चीसवीं में जो लगातार वीर हनुमान का नाम जपता है उसके रोग नष्ट होते हैं और शरीर-मन की पीड़ाएँ दूर होती हैं, और यहाँ “निरंतर” शब्द चाबी है, एक बार का जप नहीं, लगातार। छब्बीसवीं एक सुंदर शर्त रखती है: जो मन से, काम से और बोली से, तीनों तरह से ध्यान लगाता है, उसे हनुमान जी हर संकट से छुड़ा देते हैं। जो सोचते हैं, जो करते हैं, जो बोलते हैं, तीनों एक सुर में हों, असली भक्ति यही एका है।

    23

    A child asleep on a mat at night while a storm rages outside; a luminous protective Hanuman form arcs over the child like a shield
    भूत पिशाच निकट नहिं आवै · हनुमान का नाम लिया, और रात की बेचैनी दूर हो गई।

    आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक ते काँपै॥

    24

    भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥

    (इस “भूत-पिशाच” के एक गहरे, मनोवैज्ञानिक अर्थ में जाना हो, तो गहरी डुबकी में बात है।)

    25

    नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

    26

    संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

    अगली लहर राम और हनुमान जी के रिश्ते को और फल की बात को जोड़ती है। सत्ताईसवीं में तपस्वी राजा श्रीराम सबसे ऊपर हैं, सबके स्वामी, और उन्हीं के सारे काम हनुमान जी ने सँवारे और पूरे किए, “तपस्वी राजा”, राजा यानी ताक़त और तपस्वी यानी संयम, राम दोनों एक साथ हैं। अट्ठाईसवीं में जो कोई अपनी मनोकामना ले कर उनके सामने आता है उसे जीवन में अपार फल मिलता है, सच्चे मन से की गई कोई प्रार्थना ख़ाली नहीं जाती। उनतीसवीं में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग, चारों युगों में उनका प्रताप मौजूद है, वे प्रसिद्ध हैं और सारे संसार में उजाला फैलाने वाले, परम्परा उन्हें अजर-अमर मानती है, कलियुग में भी सशरीर मौजूद, और समय के पार होने का यह भाव अपने आप में एक सुकून देता है। तीसवीं में वे साधु-संतों के रक्षक हैं, असुरों यानी अधर्मी प्रवृत्तियों के नाशक, और श्रीराम के सबसे “दुलारे” भक्त। इस “दुलारे” पर ज़रा रुकिए, यह “महान भक्त” नहीं कहता, घर का सबसे प्यारा कहता है, इस पूरी वीरता-गाथा के बीच एक नन्हा सा कोमल शब्द।

    27

    सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥

    28

    और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥

    29

    चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

    30

    साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥

    अब चालीसा भक्ति के सबसे गहरे भाव की ओर बढ़ती है। इकतीसवीं में वे आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दाता हैं, और ऐसा वरदान उन्हें ख़ुद माँ जानकी ने अशोक वाटिका में दिया था, यानी जो उन्हें मिला, वह उन्होंने आगे बाँटने के लिए ही लिया। बत्तीसवीं में एक प्यारी बात है: राम-भक्ति रूपी अमृत यानी रसायन उन्हीं के पास है, और फिर भी जो वे चुनते हैं वह है हमेशा श्रीराम का दास बने रहना। सब कुछ पास है, सिद्धियाँ, निधियाँ, अमृत, और चुनाव “दास” होने का, भक्ति का सबसे ऊँचा भाव यहीं है। तैंतीसवीं में उनका भजन करने से भक्त ख़ुद श्रीराम को पा लेता है और जन्म-जन्मांतर के दुख भूल जाता है, सेवक का दरवाज़ा, स्वामी का घर। चौंतीसवीं एक कोमल भरोसा देती है: उपासक को अंत समय में राम के धाम की प्राप्ति होती है, और अगर वह फिर जन्म ले भी, तो “हरि-भक्त” के रूप में ही, भक्ति की डोर अगले जन्म में भी बनी रहती है।

    31

    अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

    एक छोटी कहानी: अशोक वाटिका में जब हनुमान जी ने सीता को राम का संदेश और अँगूठी सौंपी, और उनकी पीड़ा में सच्चे मन से शामिल हुए, तब सीता ने ख़ुश हो कर वरदान दिया, कि वे भक्तों को आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने में समर्थ होंगे। यानी जो उन्हें मिला, वह उन्होंने आगे बाँटने के लिए ही लिया।

    (आठ सिद्धियाँ कौनसी, नौ निधियाँ क्या, हर एक की अपनी पहचान है। पूरी सूची और उनका अर्थ गहरी डुबकी में है। नहीं उतरना, तो आगे बढ़िए, कहानी ऐसे भी पूरी है।)

    The four gifts of Hanuman: Strength, Wisdom, Fearlessness, Devotion; a to-do list beside
    अष्ट-सिद्धि, नौ-निधि का सार चार-गुण में: बल, बुद्धि, निर्भयता, भक्ति।

    32

    राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥

    33

    तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥

    34

    अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥

    अब अनन्यता का भाव आता है, एक जगह पूरा मन लगा देना। पैंतीसवीं में भक्त को किसी और देवता को मन में बसाने की ज़रूरत नहीं रहती, केवल हनुमान जी की सेवा-भक्ति से ही सब तरह के सुख मिल जाते हैं, और इसमें कोई संकीर्णता नहीं, क्योंकि हनुमान जी ख़ुद राम के परम भक्त हैं, उनकी सेवा में सब देवताओं की कृपा अपने आप समाई है। छत्तीसवीं वही बात दोहराती है जो चालीसा पहले कह चुकी है: जो बलवान वीर हनुमान का सच्चे मन से स्मरण करता है उसके सारे संकट कट जाते हैं और सब पीड़ाएँ मिट जाती हैं। यह दोहराव यूँ है जैसे एक भरोसेमंद दोस्त एक ज़रूरी बात दोबारा कह दे, ताकि वह दिल में बैठ जाए।

    35

    और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥

    A steady mind through obstacles; calm through trouble
    संकट कटे, पीड़ा मिटे, मन ठहर जाए।

    36

    संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

    आख़िरी चार चौपाइयाँ चालीसा को इसके समापन की ओर ले जाती हैं, और तुलसीदास की अपनी पुकार सामने आती है। सैंतीसवीं में वे हनुमान जी को तीन बार जय कहते हैं, तन से, मन से, आत्मा से, और प्रार्थना करते हैं कि जैसे एक गुरु अपने शिष्य पर कृपा करता है वैसे ही उन पर कृपा बरसे, “गोसाईं” शब्द का अर्थ ही है इन्द्रियों का स्वामी, जिसने ख़ुद को साध लिया वही दूसरे को राह दिखा सकता है। अड़तीसवीं में जो इस चालीसा का सौ बार पाठ करता है वह हर तरह के बंधनों से छूट जाता है और उसे गहरा सुख मिलता है, और याद रखिए तुलसीदास ने यह ख़ुद एक जेल में लिखी थी, “छूटहि बंदि” उनके लिए सिर्फ़ रूपक नहीं, अपना जिया हुआ सच था। उनतालीसवीं में जो इसे नियम से पढ़ता है उसे सिद्धि मिलती है, और इसके साक्षी ख़ुद गौरीपति भगवान शिव हैं, यह वादा हल्के में नहीं किया गया। और चालीसवीं, आख़िरी चौपाई में, तुलसीदास ख़ुद को सदा श्रीहरि का दास कहते हैं और बस एक चीज़ माँगते हैं, “हे नाथ, कृपा कर के मेरे हृदय में स्थायी डेरा डाल दीजिए।” चालीस चौपाइयाँ महिमा गाती रहीं, और अंत में सब कुछ छोड़ कर बस यही एक इच्छा, मेरे हृदय में रह जाइए।

    37

    जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

    38

    जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥

    39

    जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

    (इस एक लाइन में अद्वैत वेदान्त का एक गहरा सूत्र भी छिपा है, वादा करने वाला, पूरा करने वाला, और गवाह, तीनों एक ही। इसमें उतरना हो तो गहरी डुबकी में चलिए।)

    40

    तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

    चालीसा एक प्रार्थना से शुरू हुई थी, मन का आईना साफ़ करने की, और एक प्रार्थना पर ख़त्म होती है, उस साफ़ हुए हृदय में सबको बसा लेने की। समापन दोहे में तुलसीदास पवनपुत्र को सब संकटों का हरन करने वाला और ख़ुद मंगल की साक्षात मूरत कहते हैं, और देवताओं के स्वामी से बस इतनी विनती करते हैं कि वे राम, लक्ष्मण और सीता के साथ सदा उनके हृदय में बसें। शुरू और अंत, एक ही धागे से बँधे।

    पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
    राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

    ॥ बोलो बजरंग बली की जय ॥

    तुलसीदास की एक झलक

    गोस्वामी तुलसीदास का जन्म, प्रचलित मान्यता के अनुसार, सन् 1532 में उत्तर प्रदेश के राजापुर में हुआ, और देहांत 1623 में वाराणसी के अस्सी घाट पर। यानी लगभग 91 साल का लंबा जीवन।

    वे संस्कृत के गहरे विद्वान थे। पर उनकी असली पहचान इस एक हिम्मत वाले फ़ैसले से बनी, उन्होंने अपनी बड़ी रचनाएँ अवधी और ब्रजभाषा में लिखीं, गाँव-देहात की लोकभाषाओं में। उस ज़माने में शास्त्र सिर्फ़ संस्कृत में रचे जाते थे, और लोकभाषा को उस गरिमा के लायक़ नहीं समझा जाता था। तुलसीदास ने यह दीवार तोड़ी, और इसके लिए काशी के कुछ पंडितों का कड़ा विरोध भी झेला। उनका सीधा सा तर्क था: अगर आम स्त्री-पुरुष भगवान की कथा सुन ही न सकें, तो उस कथा का फ़ायदा क्या।

    उनकी सबसे बड़ी कृति है श्रीरामचरितमानस, दस हज़ार से ज़्यादा लाइनों का ग्रंथ, जो हिन्दी का सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला ग्रंथ माना जाता है। और हनुमान चालीसा? वह उसकी ठीक उल्टी है, सिर्फ़ तैंतालीस लाइनें, ताकि किसान, व्यापारी, बच्चा, स्त्री, हर कोई इसे आसानी से याद कर सके। यही छोटा रूप ही इसकी सबसे बड़ी कामयाबी की वजह बना।

    पढ़ कर आगे क्या

    अगर “गहरी डुबकी” वाली परतें खोलने का मन है, वह पन्ना यहाँ है

    इसी site पर: भगवद् गीता भी ठीक उसी एक बात पर लौटती है जिस पर चालीसा बार-बार लौटती है, डर का घटना, और काम में अनासक्ति। चौपाई 7 (“सारी क़ाबिलियत, फिर भी सेवा के लिए आतुर”) और गीता का 2.47 आपस में बात करते हैं।

    और एक सवाल जेब में रखिए: चालीसा कहती है हनुमान जी “सुमति के संगी” हैं, सही सोच के दोस्त। आज एक मौक़ा देखिए जहाँ थोड़ी ज़्यादा हिम्मत और थोड़ी ज़्यादा साफ़ सोच, दोनों एक साथ काम आ सकती थीं।

    मूल पाठ: हनुमान चालीसा, गोस्वामी तुलसीदास, अवधी भाषा (16वीं सदी, सार्वजनिक डोमेन)।

    आगे पढ़ने के लिए: ↓ Hanuman Chalisa by Devdutt Pattanaik (PDF · 7.3 MB)।

    स्थायी URL: /hanuman-chalisa/

    आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21

    साथ में पढ़ें · Companion Texts

    Four small panels: The Mind, Devotion, Service, Practice — a closing strip

    और पढ़ने के लिए · PDF

    देवदत्त पट्टनायक की पुस्तक ‘My Hanuman Chalisa’ का pdf। हनुमान-कथा का सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक पाठ।

    पट्टनायक की पुस्तक (PDF)
  • Listening for the Quiet Part

    Reflection · January 2, 2025

    The question of who a person is from one moment to the next seldom arrives in a quiet room. It presses in while a decision waits, or while an explanation is offered for an action already taken, or during the restless hour before dawn when an old narrative tugs for attention. Continuity sounds like a calm topic fit for metaphysics, yet it presents itself amid ordinary noise. Agency sounds abstruse yet appears when habit pulls one way and choice insists on another. Knowing seems familiar, carrying undertones of self-important wisdom before turning into modest acts of looking again.

    Hands pouring chai from a brass kettle into a glass on a wooden counter; an open book and house keys beside it; a temple shikhara through the window
    एक सुबह की रस्म। चाय, किताब, खिड़की, और कोई सवाल जो रात भर भीतर ठहरा रहा।

    Books and articles on these topics, read for their practical spine rather than their doctrinal edges, outlined a workable portrait of the responsible self. What does it mean to be conscious rather than merely seeking experiences and comprehending information? How does memory support the sense of a persisting “I,” and where does memory mislead agency and audit? How does one differentiate intentions from doctrines, and why can first-person knowledge be special or fallible? My own path into such musings has not followed a straight line from birthplace to bookshelf. Growing up in India in a landscape from which some practices of meditation and metaphysics emerged, such words were not in the air, and deliberate study of the mind had to wait until much later. Once that door of perception into the self opened, books, lectures, and experiences were easier to find. None of that made me a scholar. It did something more ordinary and more useful. It gave access to methods that could be tried when buying groceries, when reflecting on the lyrics of a song, or on a chair in a small apartment.

    Four people seated at a table sharing a meal, but each looking down at their own smartphone; oranges and chai cups between them
    एक टेबल, चार लोग, चार स्क्रीन। आवाज़ कहीं और से सुनी जा रही है।

    Translating for People I Love

    Last year I undertook a different exercise. During the holidays, some casual conversations led to crafting easy-to-read commentaries of the Bhagavad Gita and Japji Sahib for a few curious friends and family members. The aim was modest. I wanted a version in vernacular Hindi that would carry the text’s practical sense without sending readers running for a glossary.

    Commenting on the original Sanskrit and Punjabi texts forced attention to sentence and sense. It asked me to choose a word for a concept that can be left as a grand term. It asked for a picture that would show how a verse lands on a weekday. The work deepened my own grasp, not just of the ancient concepts, but the intentions and despairs of daily living. A verse that had floated past before would stop the eye. A claim that had sounded like beautifully polished granite would reveal a working joint. Explaining for others made the material plainer for me.


    Effort, Action, Attention

    The Gita enters with a figure who must act and cannot. The counsel one receives is often lofty in tone, yet the practical thread is spare. One owns effort, not outcomes. Results matter, but they cannot be the master of motive, or the mind becomes a weathervane.

    The text proposes a daily craft. Choose an action that can be spoken aloud and defended. Keep attention to the task that path of action requires. Let outcomes fall where they fall. In workplaces crowded with competing agendas, that triangle of effort, path of action, and attention gives ordinary decisions an intelligible frame.

    Translating for people I love removed the temptation to gild the instruction. A sibling cannot be impressed into comprehension. She will only keep reading if the line earns it.


    Shared Memory, Shared Address

    Stories that communities tell are recited and enacted at homes, with gestures and with words. Signs are placed on thresholds and wrists. Days are counted. Work weeks are left at the edges for others.

    These practices train memory and bind promise. Continuity becomes a shared address. A person knows the kind of people to whom they belong and the obligations that follow. Identity becomes a durable arrangement of speech and ritual, rather than a private claim. Life presents instructive contrasts with the Gita’s focus on interior steadiness.


    The Instrument of Listening

    The Japji Sahib opens with a direct sentence about truth and order. Thinking alone cannot secure what matters most. Order holds, whether announced or not.

    The first response is listening. Listening here means attention that lets instruction arrive without static. Singing and recitation follow. Repeated words alter posture and allow memory to do quiet work. Ego becomes a noise source. Humility becomes an instrument for clearer sight. With less vanity in the room, the world returns to scale and action finds a steadier center.


    The Chair, the Breath, the Noticing

    Sitting in silent introspection brings the subject down to a chair, noticing the breath, noticing sensations, noticing thought, noticing noticing. The method avoids grand claims about the self and leans on repetition.

    From this repetition come two abilities. Attention returns to task without drama. Experience is reported without embroidery.

    Agency gains muscles from those abilities. A policy cannot be owned if attention cannot stay. A claim to knowledge is weaker when sensation and story blur into each other. Progress in this craft does not announce itself with visions. Progress shows up when the mind comes back one beat sooner than it did last week.


    The Braid

    Taken together, these sources set aside the hunt for a single creed and instead name habits that keep a person steady and honest.

    The Gita forms a spine for action. Communal practices surround a life with memory and structure that prevent drift. The Japji shapes a posture of awe and service. Contemplative practice sharpens the simple instrument of attention. Continuity then looks like the persistence of a responsible subject who remembers, avows, and explains. That persistence is held together by story, order, and communities that call a drifting member back to form.

    Agency reduces to something manageable once viewed in this light. It is owned effort under a considered policy. It has a public voice. A person who exercises it can state what is being attempted, can carry on in the face of ordinary resistance, and when changing course can give reasons that respect prior avowals. The Gita makes this sound teachable by separating effort from reward and by drilling attention. Shared practices make it feasible by placing persons within rules and stories that reduce improvisation under pressure. The Japji smooths the edges by trading vanity for service. Daily exercises supply the discipline without which none of the rest holds.

    Writing commentary for family proved to be its own test of agency. It required a policy for each section, a refusal to chase ornament, and a willingness to revise when an aunt asked a fair question that exposed a loose plank.


    Knowledge as Craft

    Knowing takes the shape of a craft rather than a hoard. In the Gita, knowledge purifies by dissolving error, and the path runs through humility, inquiry, effort, and instruction. The relationship between student and teacher is a practice of clear questions and honest work.

    In textual traditions, knowledge is transmitted through memory, counsel, and dispute. It is argued in courts and kitchens and preserved in prayer and song. The Japji adds a salient note. Some understanding arrives as gift. Preparation matters, yet mastery does not account for the whole story.

    Meditative practice insists that certainty often begins as a sensation with a story attached. The practice separates the two and lowers the temperature of conviction. Evidence does not suffer from that correction. It benefits. A line in my holiday draft would become simple once I stopped protecting a favorite phrase. Keystrokes on my laptop became a form of meditation.


    What This Asks of Us

    None of this requires strenuous metaphysics. A reader may believe in an enduring essence, or in a constructed profile, or may suspend judgment. The framework stands with a minimum. There must be enough stability for promise and blame to make sense. There must be enough order in the world to make alignment sensible. There must be enough humility to accept correction. There must be practice, the unshowy work that keeps structures from sagging.

    My own biography reinforces that lesson. Growing up in India did not confer automatic understanding of the practices at hand. Beginning serious study later in an adopted country did not cut me off from their roots. Practice and attention did the connecting.


    A Single Day

    Consider how the material lands in a single day.

    A manager meets a decision and feels the pull of delay. The Gita’s distinction frees the mind from servitude to outcomes and returns attention to policy and effort. Memory of prior promises to staff and customers, and of the story the organization claims to tell, anchor the decision. Listening that treats anxiety as weather rather than command makes space for clarity. A brief pause lets the first wave pass. A written policy, two candid conversations, and a decision follow. Ownership of the outcome remains. None of this feels like mysticism. It feels like craft.

    In a classroom a teacher senses a room drifting. The Gita suggests returning attention to task again and again. Communal wisdom suggests a story about why the material matters, offered in a way that allows students to carry some of it themselves. The Japji encourages service that quiets the need to dominate the space. Reflective habits give a measure: which phrases restore attention and which dig a deeper rut. The hour can be rescued without theatrics. The same pattern helped me turn a सघन verse into an accessible paragraph while keeping faith with the text.

    Institutions can take the same medicine. A company can write policies that plain speech can carry, repeat them, and revise them publicly when they cause harm. A court can pair reasoned opinions with respect for precedent and still remain open to revision when facts and values demand it. A community can mark time with rituals that remind neighbors of shared obligations and shared delights. These gestures look simple in description and demanding in practice. They are joints that let a body move without tearing itself. The rhythm of festivals and laws carries institutional memory forward.


    Objections, Fairly Stated

    Common objections deserve full statement.

    One says that this account sneaks in a heavy notion of the self. The reply is that the argument needs only a locus of responsibility and memory, not a metaphysical block of identity.

    Another says that covenant and shared story threaten freedom. The reply is that such structures can release persons from the panic of inventing a self every morning and can carry difficult promises across seasons.

    A third says that knowledge should be evidence and nothing else. The reply is that evidence must be gathered and read by someone. Habits of humility and correction protect that reading from familiar distortions.

    These replies owe a debt to the patient clarity of teachers and to the frank questions that came from relatives reading my drafts at the kitchen table.


    When Alarms Sound

    Emergencies reveal the worth of these disciplines. When alarms sound and rumors run, trained attention separates signal from noise long enough to ask one more question. Shared memory recalls that panics end, and that decisions carry consequences beyond the hour. A posture of service restrains the urge to make crisis a stage.

    None of this guarantees bliss or even equanimity. It does reduce foolishness at moments when foolishness is costly. The same steadiness makes a translation effort bearable when the clock runs late and a sentence refuses to come clean.


    Joints, Not Borders

    From a distance the sources seem to draw maps that refuse to overlap. The Gita cares about personal effort and steadiness. Communal traditions care about law and story. The Japji cares about truth and order. Contemplative disciplines care about breath and sensation.

    Up close the joints appear. A steadied mind remembers and serves. A shared story supports sustained effort. Listening sharpens the uptake of evidence. Attention to breath holds a promise in place. The links show themselves once the texts are allowed to inform practice rather than compete for total explanation. Reading, practice, and the act of explaining to others braid into one rope.


    Begin With What Can Be Trained

    There is always a temptation to sort the largest questions before moving. These sources suggest a different procedure.

    Begin with what can be trained and tested. Set one intention that can be spoken. Keep one period for quiet observation. Seek one candid counsel before a hard choice. Close the day with one truthful review and one planned correction. Give thanks for one insight that felt received.

    This is maintenance that keeps a life in repair while inquiry continues. The same sequence keeps a translator honest. It protects living language from the glow of grand terms.


    Why Trust Follows

    A person formed in this way becomes easier to trust, not because failure never occurs, but because failure fits a story that others can follow. Promises made earlier are remembered rather than hidden. Reasons are offered without spin. Sources of learning are named. The future does not replicate the past, but random shocks lose some power because attention and care arrive on time.

    My own understanding has grown through the simple stubborn work of reading, sitting, explaining, and being corrected by people who wanted clarity more than ornament.


    A Practical Answer

    One last question often comes up. Must the deepest claims behind these traditions be true for the practices to work?

    Contemplative discipline offers the practical answer. Sit and see. Attention that returns is useful regardless of one’s verdict on eternity. Humility makes strangers audible. Shared memory steadies a neighborhood even when neighbors disagree about ultimate foundations.

    The practices do not force a single doctrine. They offer a way to carry on with integrity while questions remain alive.

    In my case the path looped from India to America and back again through experience. The words that had lived in the air of childhood became readable through the habits learned in a new country. And the effort to say those words clearly for friends and family returned the favor by making the meaning of action and attention more exact.

  • Welcome to the Wacky, Wonderful Lulla Family Corner!

    This is where we celebrate the joys, adventures, and cherished moments of our family. From our traditions and stories to exciting updates and special milestones, this space reflects who we are and what we love. Whether you’re here to connect, learn more about us, or simply share in the warmth of our journey, we’re glad to have you as part of our extended family. Dive in and feel at home!

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  • भगवद् गीता

    भगवद् गीता

    भगवद् गीता

    कुरुक्षेत्र के बीचों-बीच रथ पर खड़े दो लोगों की बातचीत
    700 श्लोक, 18 अध्याय, और एक रथ पर खड़े दो लोग
    भीष्म पर्व के अध्याय पच्चीस से बयालिस तक, युद्ध शुरू होने से ठीक पहले की पंद्रह मिनट की बातचीत, जो आगे ढाई हज़ार साल भारतीय सोच का केन्द्र-बिन्दु बनी रही।
    पूरा पाठ-समय अनुमानतः साठ मिनट

    एक दिन हर इंसान अर्जुन बनता है। जो लड़ाई वो टालना चाहता है, वही उसे लड़नी पड़ती है। जिन रिश्तों के सामने उसके हाथ काँपते हैं, उन्हीं के बीच उसे फ़ैसला लेना पड़ता है। और तब, अपने रथ पर खड़े-खड़े, वो भीतर के सारथी से पूछता है, मैं क्या करूँ। गीता तब काम आती है।

    Krishna driving a five-horse chariot up a winding mountain road; Arjuna seated behind, the path climbing toward a temple on the ridge
    रथ। एक तरफ़ कृष्ण, सारथी; दूसरी तरफ़ अर्जुन, धनुर्धर।

    भगवद् गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अंश है, अध्याय पच्चीस से बयालिस। संख्या में सात सौ श्लोक, अठारह अध्यायों में बँटे हुए। संदर्भ यह है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाएँ आमने-सामने हैं, युद्ध छिड़ने में मिनट बाक़ी हैं, और एक रथ पर खड़ा अर्जुन अपने सारथी कृष्ण से पूछता है कि वो लड़े या न लड़े। बाक़ी सब इसी प्रश्न का खुलना है।

    यह संवाद का तरीक़ा, गुरु और शिष्य के बीच का प्रश्नोत्तर, उपनिषद्-साहित्य की पुरानी शैली है। दसवीं-नवीं सदी ईसा-पूर्व के क़रीब, बृहदारण्यक और छान्दोग्य की वाणियाँ इसी तरह बँधी थीं। गीता उसी परम्परा को आगे लेकर चलती है, और शायद यही कारण है कि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इसे अपने “प्रस्थान-त्रयी” (तीन-स्थान-त्रिक) में रखा, उपनिषदों और ब्रह्म-सूत्र के साथ। तीनों एक ही दर्शन-पथ के तीन प्रवेश-द्वार हैं।

    पाठ का केन्द्रीय शिक्षण-वाक्य अब कहावत की तरह जीवित है। कर्म पर हमारा अधिकार है, फल पर नहीं। चिन्ता छोड़, काम कर। यह सूत्र दूसरे अध्याय के सैंतालिसवें श्लोक से आता है, और गीता का आधा वज़न इसी एक वाक्य पर है। बाक़ी पाठ इस सूत्र की अनेक परतें खोलता है, ज्ञान, भक्ति, ध्यान, समर्पण के रूप में।

    गीता को धार्मिक ग्रंथ के साथ-साथ एक जीवन-व्यवहार-मार्गदर्शिका के रूप में भी पढ़ा जाता रहा है। गांधी जी का अंग्रेज़ी अनुवाद 1929 में आया, और उन्होंने अपनी आत्म-कथा में लिखा कि गीता उनके सबसे कठिन निर्णयों में साथ रही। आज भी, कई पाठक इसे रोज़ाना उठाते हैं, किसी एक श्लोक पर बैठते हैं, उसी के साथ दिन शुरू करते हैं।

    कथा-सार

    पहले अध्याय में एक मनुष्य टूटता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाएँ आमने-सामने हैं। अर्जुन अपने रथ को बीच में खड़ा कराते हैं, और सामने अपने ही चाचा, गुरु, भाई-बंधु देखते हैं। हाथ काँपते हैं, धनुष गिरता है। अर्जुन कहते हैं, मैं नहीं लड़ सकता। यही गीता का प्रारम्भ है। अध्याय का नाम भी इसी मानसिक अवस्था पर है, अर्जुन-विषाद-योग।

    अगले पाँच अध्यायों में कृष्ण का उत्तर एक तरह का दार्शनिक-ज्ञान-दान है। आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। जिसको आप मार रहे हैं, वो आत्मा नहीं है। और इसी के साथ कर्म-योग का सूत्र आता है, कर्म पर आपका अधिकार है, फल पर नहीं। फल की चिन्ता छोड़ कर काम करते रहो। दूसरे अध्याय का सैंतालिसवाँ श्लोक यह कहता है, और शेष चार अध्याय इसी एक वाक्य की परतें खोलते हैं।

    सातवें अध्याय से बारहवें तक का बीच का हिस्सा भक्ति-तत्त्व का है। कृष्ण अपनी विभूतियाँ बताते हैं, अपने ब्रह्माण्डीय रूप का परिचय देते हैं। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को विश्व-रूप का दर्शन होता है, एक ऐसी कल्पना जिसने जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर को 1945 में ट्रिनिटी-परीक्षण के बाद उद्धृत करने पर मजबूर किया, “अब मैं काल बन गया, संसार का संहार करने वाला।” अर्जुन काँप उठते हैं, और उसी पल कृष्ण उन्हें फिर शान्त करते हैं।

    अंतिम छह अध्याय फिर ज्ञान पर लौटते हैं। तीन गुणों का विश्लेषण, पुरुषोत्तम का स्वरूप, दैवी और आसुरी सम्पदा। और सबसे अन्तिम पाठ-वाक्य, अठारहवें अध्याय का छियासठवाँ श्लोक, सब-धर्मों को छोड़ कर मेरी शरण में आओ, मैं आपको सब पापों से मुक्त करूँगा, शोक मत करो। अर्जुन का संदेह यहीं मिटता है, धनुष फिर उठ जाता है, और युद्ध शुरू हो जाता है।

    पाठक के कुछ शुरुआती प्रश्न

    उपनिषद् कितने हैं और गीता उनसे कैसे जुड़ी है। परंपरागत संख्या एक सौ आठ है, मगर मुख्य उपनिषदों की संख्या दस है, जिन पर शंकराचार्य ने भाष्य लिखे। ये वेदों के अंतिम भाग हैं, इसी कारण इन्हें “वेदान्त” भी कहा जाता है। गीता का दर्शन इन्हीं की धरती पर खड़ा है, और कई श्लोक सीधे उपनिषद्-वाक्यों की पुनर्व्याख्या हैं।

    दस मुख्य उपनिषद् कौन-से हैं। ईशावास्य, कठकेनप्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, और बृहदारण्यक। हर एक की अपनी शैली है। कठ नचिकेता-यम-संवाद के नाटकीय रूप में, छान्दोग्य कथाओं से भरा, बृहदारण्यक सबसे विस्तृत और याज्ञवल्क्य-केन्द्रित।

    गीता क्यों पढ़ें। सवाल अपने आप में पुराना है, और हर पाठक अपने उत्तर के साथ आता है। एक उपयोगी उत्तर यह है कि गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो आपके निर्णयों के साथ रहता है, उन्हें थोड़ा-थोड़ा हल्का करता है। एक पंक्ति यदि उठ कर मन में बैठ जाए, तो दिन का आकार बदल जाता है।

    संख्या में कितना है। अठारह अध्याय, सात सौ श्लोक। प्रति-अध्याय औसत उनतालिस श्लोक, मगर अध्याय एक तेईस से लेकर अध्याय बारह बीस तक की रेंज है। पूरा पाठ बिना रुके लगभग एक घंटा।

    अध्याय 2 और अध्याय 18 पूरी गीता का सार हैं। जल्दी हो तो इन्हीं दो से शुरू कर सकते हैं।

    यह 18 पाठ मूलतः दिसंबर 2024 में एक WhatsApp समूह के लिए लिखे गए थे, और बाद में थोड़े और साफ़ किए गए। शुरुआत अध्याय 1 से कीजिए।

    साथ में पढ़ें · Companion Texts

  • Chapter 1 – अर्जुन विषाद योग ।

    अध्याय 1

    अर्जुन विषाद योग

    अर्जुन का विषाद
    महाभारत के युद्ध-मैदान पर अर्जुन की देह काँप उठती है। धनुष नीचे गिर जाता है। पहला अध्याय एक ऐसी इंसानी विफलता की तस्वीर है जिसे हम सब किसी न किसी रूप में जानते हैं।
    47 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।
    यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥

    हे अच्युत! दोनों सेनाओं के बीच में मेरा रथ खड़ा कीजिए, ताकि मैं युद्ध की इच्छा रखने वालों को देख सकूँ।

    गीता 1.21-22

    अर्जुन और कृष्ण रथ पर, युद्ध-भूमि के बीच
    अर्जुन-कृष्ण कुरुक्षेत्र की दोनों सेनाओं के बीच।

    पाठ-संदर्भ

    महाभारत के भीष्म-पर्व के पच्चीसवें अध्याय से बयालिसवें तक का यह अंश है। संदर्भ कुरुक्षेत्र के मैदान का, सेनापति-नियुक्ति के दिन, ईसा-पूर्व नौवीं-आठवीं सदी के क़रीब के एक ऐतिहासिक-काल का। पहले अध्याय में अर्जुन की मानसिक-स्थिति का सबसे विस्तृत वर्णन है, और यह वही “विषाद” है जो आगे कृष्ण के शिक्षण का प्रारम्भ-बिन्दु बनेगा। अद्वैत-परम्परा में इस विषाद को चेतना की एक विशिष्ट अवस्था माना गया है, जो शिक्षण का द्वार खोलती है।” आज की मनोवैज्ञानिक-शब्दावली में इसे नैदानिक अवसाद का चित्र कहा गया है, मगर इसका शास्त्रीय-अर्थ इससे कहीं विस्तृत है।

    अध्याय का सार

    महाभारत के युद्ध की शुरुआत में, कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव और पांडव सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। इस अध्याय में धृतराष्ट्र (जो अपने घर में बैठे हैं, इस दृश्य में नहीं हैं) अपने साथी संजय (जिनके पास दूरदर्शी दृष्टि थी) से युद्ध का वर्णन सुनते हैं। संजय अपनी दिव्य दृष्टि से युद्धभूमि का दृश्य धृतराष्ट्र को बताते हैं।

    Arjuna, crowned, has sunk to the floor of the chariot at Krishna's feet, his bow and quiver scattered; the two armies blur in the distance
    विषाद-योग की पूरी दृश्य-रचना। दो सेनाएँ धुँधलाई हुई, बीच में एक टूटा हुआ राजकुमार।

    अर्जुन, जो पांडवों की ओर से मुख्य योद्धा हैं, अपने सारथी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वो उनका रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें ताकि वो अपने विरोधियों को देख सकें। जब अर्जुन अपने ही सम्बन्धियों, चचेरे भाइयों, गुरुजनों, और मित्रों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखते हैं, तो वो गहरे शोक और मानसिक संताप में डूब जाते हैं।

    अर्जुन सोचते हैं कि इस युद्ध में विजयी होकर भी वो सुखी नहीं हो पाएँगे, क्योंकि यह युद्ध उनके अपने प्रियजनों के विनाश का कारण बनेगा। वो अपने कर्तव्य (लड़ूँ या न लड़ूँ?) को लेकर असमंजस में पड़ जाते हैं और अपना धनुष (जिसका नाम था गांडीव) नीचे रख देते हैं। वो कृष्ण से कहते हैं कि वो यह युद्ध नहीं लड़ सकते, और पूरी तरह से निराश हो जाते हैं।

    निराश यानी अवसाद में आ जाते हैं। उस ज़माने में भी ऐसा होता था। ‘विषाद’ का एक अर्थ अवसाद भी है।

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 1.1

    धृतराष्ट्र उवाच ।
    धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
    मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥
    साधारण अनुवादधृतराष्ट्र ने पूछा, ‘हे संजय, धर्म-क्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठा हुए मेरे पुत्रों और पांडुपुत्रों ने क्या किया?’

    पूरी गीता का आरम्भ। पूछने वाला अंधा है, बताने वाला दिव्य-दृष्टि वाला। पहली पंक्ति में ही ‘धर्म’ शब्द आता है, जो अंत तक राह दिखाएगा।

    श्लोक 1.21-22

    अर्जुन उवाच ।
    सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।
    यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥
    कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥
    साधारण अनुवादअर्जुन ने कहा, ‘हे अच्युत, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, ताकि मैं देख सकूँ कि किनके साथ मुझे यह युद्ध करना है।’

    यहाँ अर्जुन की पतन की शुरुआत है। उसने ‘देखने’ की माँग की, और जो देखा उसने उसे तोड़ दिया।

    श्लोक 1.28

    अर्जुन उवाच ।
    दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
    सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥
    साधारण अनुवाद‘हे कृष्ण, अपने इन सब स्वजनों को युद्ध के लिए खड़ा देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, और मुँह सूख रहा है।’

    शरीर का सच्चा वर्णन।शारीरिक है। पैर भारी, मुँह सूखा, हाथ काँपते।

    श्लोक 1.47

    Close-up of Arjuna's hands letting go: the bow slipping, an arrow falling to the chariot floor
    गाण्डीव छूटा। एक हाथ ने इस अध्याय का पहला सच कह दिया।
    सञ्जय उवाच ।
    एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
    विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥
    साधारण अनुवादसंजय बोले, ‘ऐसा कहकर अर्जुन शोक से व्याकुल मन से, अपना धनुष-बाण फेंककर, रथ की पीठ पर बैठ गए।’

    पहले अध्याय का अंत। धनुष गिर गया, अर्जुन बैठ गया। अब दूसरे अध्याय में कृष्ण का जवाब शुरू होंगे।

    सारएक वाक्य में: एक दिन हम सब अर्जुन हैं, जो लड़ाई हमने टालने की कोशिश की, उसी के बीचों-बीच खड़े। पहला अध्याय यह दिखाता है कि उस पल का असली रूप कैसा होता है।
  • Chapter 2 – सांख्य योग 

    श्रीमद्भगवद्गीता · Bhagavad Gita

    अध्याय 2 · सांख्य योग · Sankhya Yoga

    अध्याय 1 में अर्जुन रथ के बीच ढह गए थे। यहीं से कृष्ण उन्हें उठाते हैं। आत्मा की पहचान, कर्म-योग की पहली झलक, और स्थितप्रज्ञ की तस्वीर, पूरी गीता का बीज एक ही अध्याय में। बहुत लोग कहते हैं, गीता पढ़नी है तो यहीं से शुरू कीजिए।

    72 श्लोक · पढ़ने का समय ~ 90 मिनट · पहले से कुछ ज़रूरी नहीं; अध्याय 1 साथ हो तो अच्छा, पर ज़रूरी नहीं · साथ में अच्छा लगेगा: कठ उपनिषद् · योग सूत्र पाद 2

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

    आपका अधिकार सिर्फ़ कर्म पर है, फल पर कभी नहीं। कर्म के फल का हेतु मत बनिए, और न ही अकर्म में आसक्ति रखिए।

    गीता 2.47

    पहले एक बात

    अध्याय 1 में अर्जुन ढह जाते हैं। अध्याय 2 में कृष्ण असल में शुरू करते हैं। यही वजह है कि कई शिक्षक कहते हैं, गीता पढ़नी है तो अध्याय 2 से शुरू कीजिए, अध्याय 1 बाद में लौट कर।

    Krishna, garlanded and crowned, raises one hand mid-teaching; Arjuna leans in, fingers to his lips, the chariot canopy above them
    दूसरे अध्याय का पहला फ़्रेम। पहली बार कृष्ण उत्तर देते हैं, और अर्जुन सुनने के लिए तैयार हो जाते हैं।

    यह अध्याय तीन साफ़ हिस्सों में बँटता है। पहले 30 श्लोक (2.1-2.30): आत्मा की बात। अगले 23 (2.31-2.53): कर्म-योग की पहली पेशकश, उस मशहूर 2.47 समेत। आख़िरी 19 (2.54-2.72): स्थितप्रज्ञ की तस्वीर, एक ठहरा हुआ इंसान दिखता कैसा है।

    पूरी गीता की हर आगे की बात इसी अध्याय में बीज-रूप में मौजूद है। अध्याय 3 से 18 तक बस इसी को खोलते हैं। इसीलिए यह अध्याय इतना भारी-भरकम काम का है।

    इसे कैसे पढ़ें

    A farmer in white kneels in tilled earth, planting seed in a careful row; above him a four-panel sky shows storm, drought, sun, and lightning
    कर्मण्येवाधिकारस्ते · बीज आपका, मिट्टी आपकी, हाथ आपका। बारिश-धूप आपकी नहीं।

    क्रम से पढ़िए। असली खंभे: 2.11, 2.20, 2.22, 2.27, 2.38, 2.47, 2.48, 2.55, 2.62-63, 2.69, 2.70। ये ग्यारह पकड़ में आ गए, तो बाक़ी 61 इन्हीं के इर्द-गिर्द अपने आप जुड़ जाते हैं।

    पूरा अध्याय 1 अर्जुन के टूट जाने में बीत गया था। अब संजय हमें ज़रा पास ले आते हैं। उस अर्जुन की आँखें तरस से भरी, आँसुओं से भीगी, बेचैन। ऐसे हताश अर्जुन से मधुसूदन ने यह वचन कहे। एक बात गौर कीजिए, यहाँ “मधुसूदन” नाम क्यों? क्योंकि अर्जुन के भीतर बैठे भ्रम-रूपी “मधु” राक्षस को मारने का काम अभी शुरू होने वाला है। संस्कृत में नाम कभी यूँ ही नहीं चुने जाते। कहानी यहीं से उठती है।

    Six terraced waterfall-ponds descending a hillside: the top pool clear with a lotus, the next still bright, then orange, then grey, then dark, ending in a deep whirlpool
    ध्यायतो विषयान्पुंसः · ध्यान-संग-काम-क्रोध-संमोह-स्मृति-विभ्रम-बुद्धि-नाश: छह चरणों की ढलान।
    Two wooden stands of folded cloth; hands lifting an old worn garment from one and reaching for a bright new one on the other
    वासांसि जीर्णानि यथा विहाय · जैसे पुराने वस्त्र छोड़ कर नए पहने जाते हैं।

    2.1

    सञ्जय उवाच
    तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
    विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

    कृष्ण की पहली चाल सीधी थी। कोई हमदर्दी वाली भूमिका नहीं, सीधा सामना। तीन ओर से घेरा, यह कमज़ोरी आप जैसे योद्धा को शोभा नहीं देती, यह ऊँचे लोक नहीं देती, यह कीर्ति नहीं देती। और फिर पहला हुक्म, इस ओछी दिल की कमज़ोरी को छोड़ कर उठिए। शब्द “क्षुद्र” जान-बूझ कर चुना गया, ताकि अर्जुन की अपनी छवि हिल जाए। और “उत्तिष्ठ”, पहले शरीर से उठिए, क्योंकि काम के बिना सूझ भी नहीं ठहरती। अर्जुन ढहा हुआ है; कृष्ण भी साथ ढह जाते तो कुछ हिलता ही नहीं।

    2.2 · 2.3

    श्रीभगवानुवाच
    कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
    अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥

    क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
    क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

    अर्जुन अपने ढहने का बचाव करते हैं, और उसका दिल एक सच्चा नैतिक सवाल है, भीष्म और द्रोण तो पूज्य हैं, इन पर बाण कैसे चलाऊँ? वे कृष्ण को “मधुसूदन” और “अरिसूदन” कह कर एक हल्के तंज़ की तरह पुकारते हैं, आप दुश्मन मारते हैं, पर मेरे ये दुश्मन तो पूज्य हैं। फिर बात और गाढ़ी हो जाती है, इन महान गुरुओं को मार कर मिले भोग तो खून में सने होंगे, उससे तो भिक्षा माँग कर खाना भला। नीचे जो डर बैठा है वह आने वाले पछतावे का है, पर कृष्ण आगे दिखाएँगे कि यह पछतावा एक ग़लत मान्यता पर टिका है।

    2.4 · 2.5

    अर्जुन उवाच
    कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
    इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

    गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
    हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान्॥

    अर्जुन ईमानदार हैं, नतीजे का पहले से पता नहीं, हम जीतें या वे, कौन कह सकता है। और जिन्हें मार कर जीना ही न चाहें, वही सामने खड़े हैं। यह पूरी जड़ता का बौद्धिक चेहरा है। फिर वे खुले तौर पर मान लेते हैं, मेरा स्वभाव कायरता के दोष से दबा है, मैं धर्म को लेकर उलझा हूँ। और यहीं असली मोड़ आता है, “शिष्यस्ते अहं शाधि माम् त्वां प्रपन्नम्”, मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, मुझे सिखाइए। दोस्त अब शिष्य बन रहा है। कृष्ण ने अब तक एक भी सीख नहीं दी, क्योंकि सीख तभी काम करती है जब सुनने वाला सच में तैयार हो। उससे पहले की सलाह, चाहे कितनी अच्छी हो, पत्थर पर पानी है।

    2.6 · 2.7

    न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
    यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

    कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
    यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥

    अर्जुन एक बहुत ज़रूरी बात कहते हैं, कोई भी बाहरी उपलब्धि इस भीतरी हाल को ठीक नहीं करेगी। बिना प्रतिद्वंद्वी का समृद्ध राज्य मिले, देवताओं का राज भी मिले, फिर भी इन्द्रियों को सुखा देने वाला यह ग़म नहीं हटेगा। यह वही घड़ी है जो हर कामयाब इंसान कभी न कभी जीता है, सब कुछ है, फिर भी कुछ कमी है। कृष्ण की पूरी सीख की नींव यही है, अगर बाहरी हल नाकाफ़ी न दिखें, तो भीतरी सीख का कोई मतलब ही नहीं। इतना कह कर गुडाकेश ने हृषीकेश से, “मैं नहीं लड़ूँगा,” कहा और चुप हो गए। नामों का चुनाव बारीक है, नींद जीतने वाला अब इन्द्रियों के स्वामी से बात कर रहा है, ज़िंदगी-भर की उपलब्धियाँ इस घड़ी से नहीं बचा रहीं।

    2.8 · 2.9

    न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
    अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥

    सञ्जय उवाच
    एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
    न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

    अब दोनों सेनाओं के बीच, उस हताश अर्जुन से हृषीकेश मानो मुस्कुराते हुए बोले। यह “प्रहसन् इव” वाली मुस्कान बहुत वज़न रखती है, एक जानती हुई, कोमल, लगभग मज़े वाली मुस्कान, जैसे कह रहे हों, आप जिसे परेशानी समझ रहे हैं वह असल में परेशानी है ही नहीं। यह मुस्कान ज़रूरी है, क्योंकि असली सीख यहीं से शुरू होती है, और कृष्ण भारी या नाटकीय नहीं, एकदम सहज हैं। फिर पहली असली सीख आती है, आप शोक उन पर कर रहे हैं जिन पर शोक नहीं चाहिए, और साथ ही ज्ञान जैसी बातें भी कर रहे हैं। समझदार न मरे हुओं पर शोक करते हैं, न जीवितों पर। दोनों, शोक और ज्ञान, एक साथ नहीं चल सकते। यही गीता की पहली असली सीख है, और एक तरह से पूरी गीता का दिल।

    2.10 · 2.11

    तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
    सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥

    श्रीभगवानुवाच
    अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
    गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

    अब कृष्ण आत्मा वाला तर्क खोलते हैं, और ध्यान दीजिए कि वे इसे सीधे नहीं, दोहरे निषेध के रास्ते कहते हैं, ऐसा कभी नहीं था कि मैं न था, या आप न थे, या ये राजा न थे; और ऐसा भी न होगा कि हम आगे न रहें। सीधी सकारात्मक बात आसानी से एक धार्मिक तकिया-कलाम बन जाती है; निषेध पाठक को रुक कर सोचने पर मजबूर करता है। फिर पहली और सबसे सुथरी तस्वीर, इसी एक शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं, फिर भी “मैं” वही रहता है। ठीक वैसे ही मृत्यु के बाद नया शरीर मिलता है, और धीर इंसान यहाँ नहीं भटकता। अगर पहले वाले बदलाव पर हम शोक नहीं करते, तो दूसरे पर क्यों?

    2.12 · 2.13

    न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
    न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥

    देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
    तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

    अब इन्द्रिय-अनुभव की जड़ की पड़ताल। ठंड-गर्मी, सुख-दुख आते कहाँ से हैं? इन्द्रियों का चीज़ों से संपर्क, यही स्रोत। ये आते-जाते हैं, नश्वर हैं, इन्हें सह लेना सीखिए। जिस पल लगे कि यह दर्द अब सहा नहीं जाता, याद रखिए, यह दर्द एक संपर्क का नतीजा है, और संपर्क आते-जाते रहते हैं, यह भी जाएगा। और जिस इंसान को ये संपर्क हिला नहीं पाते, जो सुख और दुख में एक-सा रहता है, वही अमरता के लायक़ हो जाता है। “तितिक्षा” चुपचाप सब झेल लेना नहीं, एक सक्रिय क्षमता है जो बनाई जा सकती है। यह “कुछ महसूस न होना” नहीं, महसूस होने पर भी पहचान का न ढहना है।

    2.14 · 2.15

    मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
    आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

    यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
    समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

    अब गीता का सबसे निचोड़ा हुआ दार्शनिक वाक्य, पूरा अद्वैत वेदान्त एक श्लोक में। दो ख़ाने हैं, सत् जो असल में है और असत् जो असल में नहीं है। सत् कभी “नहीं” नहीं होता, असत् कभी टिक कर “है” नहीं रहता। सच देखने वाले दोनों का आख़िरी स्वभाव देख चुके हैं, इसलिए किसी नश्वर चीज़ के खोने पर परेशान नहीं होते। एक सीधी जाँच, कौन-सी चीज़ बदलाव के बीच भी टिकी रहती है और कौन खुद बदल जाती है? जो टिकी रहती है वही असल में वहाँ है। फिर कृष्ण सत् की पहचान देते हैं, वह अविनाशी है और सब में फैला हुआ है, उसका नाश कोई नहीं कर सकता। यह कोई शरीर में बंद चिंगारी नहीं, हर जगह फैली जागरूकता है। और यह बात अर्जुन के युद्ध-डर को सीधे छूती है, जो “वे” असल में हैं, वह मारा ही नहीं जा सकता।

    2.16 · 2.17

    नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
    उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥

    अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
    विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

    अब पहली बार कृष्ण असल हुक्म देते हैं, “लड़िए।” तर्क की कड़ी सीधी है, ये शरीर नाशवान हैं, पर इनके भीतर का शरीरी नित्य है, अविनाशी है, नापा नहीं जा सकता। आपका “मारना” असल में मारना है ही नहीं, क्योंकि आप उनकी नाशवान परत से जुड़ रहे हैं, नित्य परत से नहीं। फिर एक हिम्मत वाला दावा, जो इसे मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, दोनों नहीं समझते, क्योंकि दोनों आत्मा को क्रिया का कर्ता मान रहे हैं। आत्मा क्रिया नहीं करती, शरीर करता है। एक चेतावनी ज़रूरी है, यह मारने की छूट नहीं, एक दार्शनिक पकड़ है; नैतिक संदर्भ आगे बना रहेगा।

    2.18 · 2.19

    अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
    अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

    य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
    उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

    अब आत्मा के वर्णन का सबसे मशहूर श्लोक, चार विशेषण एक पर एक। यह न कभी जन्म लेती है, न मरती है, न “हो कर फिर नहीं रहेगी” वाली है। अज, यानी जन्मा ही नहीं, “शुरुआत” इस पर लागू ही नहीं। नित्य, समय में सदा। शाश्वत, स्वभाव में अटल। पुराण, सबसे मूल। शरीर मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती। और कृष्ण आगे बढ़ाते हैं, जो इसे अविनाशी, नित्य, अजन्मा, अव्यय जान लेता है, वह किसको मरवाएगा, किसको मारेगा? सवाल का जवाब सवाल में ही है। आप उसे मार कैसे सकते हैं जो मारा ही नहीं जा सकता? यह श्लोक कठ उपनिषद् से लगभग हू-ब-हू उठाया गया है, कृष्ण एक बहुत पुरानी सीख दोहरा रहे हैं।

    2.20 · 2.21

    न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
    अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

    वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
    कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥

    अब वह तस्वीर जो सबसे मशहूर है और सबसे काम की, जैसे इंसान पुराने कपड़े छोड़ कर नए ले लेता है, वैसे ही देहधारी आत्मा पुराना शरीर छोड़ कर नए में चली जाती है। कपड़े बदलना मामूली बात है, कोई सदमा नहीं; मृत्यु को इसी अंदाज़ में देखिए। कोई कहेगा कि कपड़े और शरीर की तुलना बराबर की नहीं, शरीर तो हमारी पहचान है। कृष्ण ठीक यही मान्यता ललकार रहे हैं, शरीर पहचान है, यही मान्यता ग़लत है। और इसी आत्मा को कोई हथियार नहीं काटते, आग नहीं जलाती, पानी नहीं भिगोते, हवा नहीं सुखाती, क्योंकि वह हर भौतिक तत्व से अछूती है। अगर शरीर कपड़े हैं, तो उसकी उम्र भी कोई संकट नहीं, यह सब सामान्य है।

    2.22 · 2.23

    वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
    तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

    नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
    न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

    पिछले श्लोक के “नहीं” अब आत्मा के विशेषण बन जाते हैं। यह न कटती, न जलती, न भीगती, न सूखती; नित्य है, सब जगह फैली हुई, अटल, न हिलने वाली, आदि-काल की। “सर्व-गत” चाबी शब्द है, आत्मा “मेरे अंदर” वाली कोई छोटी चिंगारी नहीं, हर जगह फैली है। फिर तीन और विशेषण और निचोड़, यह अव्यक्त है, अचिन्त्य है, अविकार्य है; यह जान कर शोक नहीं करना चाहिए। “अचिन्त्य” दिलचस्प है, इसे सोच से पूरी तरह पकड़ा नहीं जा सकता, कोई भी मानसिक मॉडल इसे पूरा नहीं समेटता। 2.11 से चला आ रहा तर्क यहाँ पूरा होता है, अगर आप यह सब समझ गए, तो शोक मत कीजिए।

    2.24 · 2.25

    अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
    नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

    अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
    तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥

    कृष्ण के तर्क में एक प्यारी लचक है। वे कहते हैं, मान भी लीजिए कि आत्मा बार-बार जन्म लेती और मरती है, तब भी शोक का आधार नहीं। क्यों? क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु तय है, और जो मरा है उसका जन्म तय है; जो टाला ही न जा सके, उस पर शोक करना सबसे ज़्यादा बर्बाद की हुई मेहनत है। समय, ध्यान, भावनात्मक ऊर्जा, सब सीमित है; इसे न-टाली-जा-सकने वाली बातों पर लगाने से नतीजे वही रहते हैं, बस तकलीफ़ बढ़ती जाती है। दोनों पक्ष जाँच लेने की यह तरकीब अच्छी है, आत्मा नित्य हो तो शोक बेमतलब, क्षणभंगुर हो तो भी बेमतलब।

    2.26 · 2.27

    अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
    तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

    जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
    तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

    हर प्राणी का एक पैटर्न है, शुरुआत में अनप्रकट, बीच में प्रकट, अंत में फिर अनप्रकट; हम बस बीच वाला हिस्सा देखते हैं और उसी को असली मान बैठते हैं। फिर शोक कैसा? जैसे एक लहर समुद्र से उठती है, थोड़ी देर उठान में रहती है, फिर समुद्र में मिल जाती है; लहर के मिटने पर समुद्र शोक नहीं करता। फिर कृष्ण एक ईमानदार बात कबूलते हैं, कोई इस आत्मा को अचरज की तरह देखता है, कोई अचरज की तरह बोलता है, कोई सुनता है, पर सुन कर भी असल में कोई इसे जान नहीं पाता। आत्मा का विचार सच में अचरज भरा है, पर उससे टकराने और उसे जीने के बीच एक खाई है।

    2.28 · 2.29

    अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
    अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

    आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
    आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥

    अब आत्मा वाले हिस्से का समापन। सबके शरीर में रहने वाला यह देहधारी हमेशा न मारा जा सकने वाला है, इसलिए किसी भी प्राणी पर शोक नहीं करना चाहिए। एक ज़रूरी बात गौर कीजिए, “सर्वस्य देहे”, सबके शरीर में; यह कृष्ण-अर्जुन की निजी बात नहीं रही, सब प्राणियों पर लागू है। यहाँ से तर्क करवट लेता है। पहले बीस श्लोक दार्शनिक थे; अब कृष्ण ज़मीन पर आते हैं, अगर metaphysics न भी मनवाए, तो भी अपना स्वधर्म देख कर डगमगाना नहीं चाहिए, एक योद्धा के लिए धर्मयुद्ध से बेहतर कुछ नहीं। “स्वधर्म” यानी वह भूमिका जिसमें आप रखे गए हैं, उसकी सारी माँगों समेत; अपनी भूमिका का धर्म छोड़ देना एक चूक है।

    2.30 · 2.31

    देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
    तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

    स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
    धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

    अब कृष्ण नज़रिया पलटते हैं। अर्जुन इस युद्ध को संकट देख रहे हैं, कृष्ण इसे मौक़ा बता रहे हैं, यह युद्ध यूँ ही आ पड़ा है और स्वर्ग का खुला दरवाज़ा है, ऐसा युद्ध भाग्यशाली योद्धा ही पाते हैं। फिर वे अर्जुन की अपनी बात उलट देते हैं, अर्जुन सोच रहे हैं युद्ध करना पाप है, कृष्ण कहते हैं युद्ध न करना पाप है, क्योंकि इस धर्मसंगत युद्ध को छोड़ने पर स्वधर्म और साख दोनों खो कर पाप ही हाथ आएगा। आप एक ख़ास जगह पर खड़े हैं, और यह भूमिका निभा कर ही आपका धर्म पूरा होता है; इसे छोड़ना भी एक काम है, और उसका भी वज़न है।

    2.32 · 2.33

    यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
    सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥

    अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
    ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

    अब कृष्ण सामाजिक-साख का दबाव डालते हैं, और यह उपदेश नहीं, एक हक़ीक़त की बात है। लोग आपकी बदनामी को न मिटने वाली कहानी की तरह सुनाते रहेंगे, और एक इज़्ज़तदार इंसान के लिए बदनामी मृत्यु से भी बुरी है। ये महारथी सोचेंगे कि आप डर के मारे युद्ध से हटे; जिनके सामने आप बड़े थे, उनके सामने अब छोटे पड़ जाएँगे। और यह वाजिब भी है, मैदान में आ कर लौट जाने पर लोग नीयत की उदार व्याख्या नहीं करते। यह आध्यात्मिक सीख और ज़मीनी सलाह का मेल है।

    2.34 · 2.35

    अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
    सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥

    भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
    येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥

    ताने की कल्पना कृष्ण पहले ही करा देते हैं, आपके दुश्मन कई न कहने लायक बातें बोलेंगे, आपकी क़ाबिलियत की निंदा करेंगे, और एक योद्धा के लिए उसकी क़ाबिलियत पर शक से ज़्यादा चुभने वाली कोई बात नहीं। फिर दोनों तरफ़ जीत वाली बात, मारे गए तो स्वर्ग, जीत गए तो पृथ्वी का राज, इसलिए पक्के इरादे के साथ युद्ध के लिए उठिए। इसे नियतिवाद समझने की ज़रूरत नहीं; यह घबराहट घोलने वाली बात है, क्योंकि जिस भी नतीजे से आप डर रहे हैं, वह नतीजा असल में कोई समस्या ही नहीं। कल्पना कीजिए एक फ़ैसले की मेज़ जहाँ हर ख़ाने में अच्छा नतीजा है; ऐसी मेज़ पर जड़ हो जाना बेमतलब है।

    2.36 · 2.37

    अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः।
    निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥

    हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
    तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

    यहीं कर्म-योग का पहला फ़ॉर्मूला आता है। सुख-दुख, फ़ायदा-नुक़सान, जीत-हार, इन तीन जोड़ियों को बराबर मान कर युद्ध में जुट जाइए, तब कोई पाप नहीं लगेगा। यह बेपरवाही नहीं, ध्यान देते हुए न-चिपकना है; आप पूरी ताक़त से जुटते हैं, पर नतीजे को ले कर कोई पसंद-नापसंद नहीं। फिर एक ऐलान, अब तक सांख्य की समझ बताई, अब योग की सुनिए; यह समझ लग गई तो आप कर्म-बंधन से छूट जाएँगे। सांख्य “देखना” है, योग “करना”; दोनों एक-दूसरे के पूरक। और “कर्म-बन्ध” वज़नदार है, कर्म तो होते ही रहेंगे, पर बंधन वैकल्पिक है; बंधन तभी बनता है जब काम चिपका हुआ हो।

    2.38 · 2.39

    सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
    ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

    एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
    बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

    यह रास्ता हिम्मत बँधाता है, इसमें शुरुआती मेहनत बेकार नहीं जाती, कोई उल्टा असर नहीं; थोड़ा-सा भी अभ्यास सबसे बड़े डर से बचा लेता है। वह सबसे बड़ा डर अस्तित्व का गहरा डर है, बाक़ी सब डर इसी से निकलते हैं, और यह वही ब्याज-पर-बढ़ने वाला सिद्धांत है। यहाँ पक्के इरादे वाली बुद्धि एक होती है, जबकि बिना इरादे वालों की बुद्धियाँ कई शाखाओं वाली और अनगिनत। एक पक्के इरादे वाले इंसान की बात एक वाक्य में पूरी आ जाती है; एक बेइरादा इंसान के विचार हर दिशा में फैलते हैं और कहीं नहीं पहुँचते। ऊँचे दर्जे का काम करने वाले लोग लगभग हमेशा इसी एक साफ़ केंद्रीय प्रतिबद्धता वाले होते हैं।

    2.40 · 2.41

    नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
    स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥

    व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
    बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥

    अब कृष्ण एक हिम्मत वाली आलोचना करते हैं, और यह तीखी इसलिए है कि वे खुद वैदिक हस्ती हैं। कुछ नासमझ लोग फूलों जैसी दिखावटी बातों में बहक जाते हैं, वेद की रस्मी बातों में लगे रहते हैं और कहते हैं “इससे आगे कुछ नहीं।” वे इच्छा से चलते हैं, स्वर्ग को ही सबसे ऊँचा मानते हैं, और भोग-रुतबे के लिए कई रस्मों में लगे रहते हैं। यानी धार्मिक दिखने वाली गतिविधि असल में उपभोग वाली प्रेरणा पर चल रही है; स्वर्ग, धन, ताक़त, ये इनाम अहंकार के ही सजे-धजे रूप हैं। कृष्ण वेद के अक्षरशः अर्थ और वेद की गहराई के बीच फ़र्क कर रहे हैं।

    2.42 · 2.43

    यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
    वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥

    कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
    क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥

    जो भोग और रुतबे में चिपके हैं और जिनकी चेतना उनसे खिंच गई है, उनकी पक्के-इरादे वाली बुद्धि समाधि में नहीं ठहरती; जिस मन का ध्यान दुनियावी इनामों में बिखरा रहता है, वह गहरा ठहराव नहीं कर सकता। इसलिए कृष्ण एक हिम्मत वाला हुक्म देते हैं, वेद तीनों गुणों के दायरे में हैं, आप तीनों गुणों के पार जाइए; जोड़ियों से मुक्त, नित्य सत्ता में टिके, पाने-बचाने की चिंता से आज़ाद, अपने में बसे हुए बनिए। “निर्योगक्षेम” चाबी शब्द है, योग यानी जो पास नहीं उसे पाना, क्षेम यानी जो पास है उसे बचाना; दोनों चिंता के स्रोत हैं। ज़्यादातर पेशेवर ज़िंदगी इन्हीं दो चिंताओं में बीतती है, एक संतुलित इंसान इन दोनों के पार से काम करता है।

    2.44 · 2.45

    भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
    व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

    त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
    निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥

    एक सुंदर तस्वीर, एक छोटे कुएँ में थोड़ा पानी है, उसका एक ख़ास काम है; पर जब चारों ओर बाढ़ हो, तो उस कुएँ की ख़ास ज़रूरत नहीं रहती, बाढ़ पहले से उस काम को समेट लेती है। उसी तरह वेद ख़ास आध्यात्मिक फ़ायदे देते हैं, पर एक जाग चुके इंसान के लिए वे फ़ायदे पहले से पास हैं। इसे वेद-विरोधी बात समझने की ग़लती मत कीजिए; यह स्तर-की-बात है, वेद हर स्तर पर काम के हैं, बस सबसे ऊँचे स्तर पर पीछे छूट जाते हैं। और अब गीता का सबसे मशहूर और सबसे काम का श्लोक आता है।

    2.46 · 2.47

    यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
    तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

    इस एक श्लोक को चार हिस्सों में देखिए। एक, काम पर आपका हक़ है, यह आपकी ज़िम्मेदारी है। दो, फल पर हक़ नहीं, नतीजे आपके बस में नहीं। तीन, फल को प्रेरणा मत बनाइए। चार, और यह बारीक है, काम न करने में भी चिपकिए मत; “फल नहीं चाहिए तो कुछ क्यों करूँ” यह ग़लत नतीजा है। यह असल में फ़ैसले की गुणवत्ता और नतीजे की गुणवत्ता का फ़र्क है, फ़ैसले पर आपका सौ प्रतिशत बस चलता है, नतीजा आधा फ़ैसला और आधा क़िस्मत। यह लापरवाही की छूट नहीं, उल्टा; जब नतीजा लक्ष्य ही नहीं, तो “बस इतना काफ़ी” वाला शॉर्टकट चलता ही नहीं, मेहनत खुद मंज़िल बन जाती है। स्टोइक दर्शन भी हू-ब-हू यही कहता है, जो बस में है उस पर ध्यान, जो नहीं उसे जाने दीजिए।

    2.48 · 2.49

    योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
    सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

    दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
    बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

    यहीं गीता की पहली योग-परिभाषा आती है, “समत्वं योग उच्यते”। योग में टिक कर, चिपक छोड़ कर, कामयाबी और नाकामी में एक-सा रहते हुए काम कीजिए; यही एक-सा रहना योग है। यह परिभाषा ख़ास है क्योंकि यह योग को एक भीतरी हालत से बाँधती है, किसी अभ्यास से नहीं। चिपका हुआ काम बुद्धि-योग से बहुत घटिया है, इसलिए बुद्धि में शरण ढूँढिए; जो सिर्फ़ फल के लिए काम करते हैं वे कृपण हैं, क्योंकि उनकी सारी गतिविधि नतीजे की मर्ज़ी पर चलती है, नतीजा आया तो खुश, नहीं आया तो गुस्सा, यह आज़ादी की ज़िंदगी नहीं। यह योग ध्यान के गद्दे से बहुत आगे जाता है, हर पल जाँचा जा सकता है, समत्व है या नहीं।

    2.50 · 2.51

    बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
    तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥

    कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
    जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥

    अब दूसरी योग-परिभाषा, “योगः कर्मसु कौशलम्”। कौशल यानी कुशलता, पर “चीज़ें फटाफट निपटाना” वाले अर्थ में नहीं; यहाँ इसका मतलब है काम इस तरह करना कि वह बंधन न बनाए। बुद्धि से जुड़ा इंसान अच्छे और बुरे, दोनों काम छोड़ देता है, क्योंकि अच्छे काम भी अगर “मैं कर रहा हूँ” वाली पहचान के साथ हों तो उनकी भी कर्म-राख बनती है। ऐसे समझदार लोग फल छोड़ कर जन्म-बंधन से मुक्त हो कर “अनामय”, यानी रोग-मुक्त अवस्था में पहुँचते हैं; यह सिर्फ़ शरीर का रोग नहीं, मन का, अस्तित्व का रोग है, एक ऐसी हालत जहाँ भीतर कोई हलचल नहीं।

    2.52 · 2.53

    यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
    तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

    श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
    समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

    जब आपकी बुद्धि भ्रम के दलदल को पार कर जाएगी, तब सुनी और सुनी जाने वाली बातों के प्रति आप उदासीन हो जाएँगे; गहरी साफ़ी मिलते ही शास्त्रों पर निर्भरता घट जाती है, और यह शास्त्र-विरोध नहीं, एक सहज प्रगति है। स्कूल में किताब ज़रूरी थी, कॉलेज में वैकल्पिक, expert के स्तर पर वह भीतर बस चुकी; शास्त्रों के साथ भी यही। फिर जब शास्त्रों की भरमार में उलझी आपकी बुद्धि ठहर जाएगी, समाधि में अडिग होगी, तब आप योग पा लेंगे। ठहरा हुआ मन ही योग है, इतना सीधा है। और यहीं अर्जुन अपना पहला सवाल पूछते हैं।

    2.54 · 2.55

    अर्जुन उवाच
    स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
    स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥

    श्रीभगवानुवाच
    प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
    आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

    अर्जुन कोई परिभाषा नहीं, बर्ताव के निशान माँगते हैं, स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है? कृष्ण की पहली पहचान, जब इंसान मन में बैठी सारी इच्छाएँ छोड़ देता है और अपने में ही अपने से संतोष पा लेता है, तब वह स्थितप्रज्ञ है, क्योंकि जो चाहिए था वह पहले से भीतर है। “मनोगतान्” बारीक शब्द है, इच्छाएँ मन में आई हुई, यानी बाहरी नहीं, भीतरी राख। फिर एक तीन-तरफ़ा जाँच, दुख आता है पर मन हिलता नहीं, सुख आता है पर तलब नहीं, और भीतर खिंचाव-डर-गुस्सा ग़ायब; ऐसा इंसान ठहरी-समझ वाला मुनि कहलाता है।

    2.56 · 2.57

    दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
    वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

    यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
    नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

    जो हर जगह बिना चिपके है, और जो भी अच्छा-बुरा मिले उसका न जश्न मनाए, न उसे ठुकराए, उसकी समझ ठहरी हुई है। इसे सुन्न हो जाना समझने की भूल मत कीजिए; यहाँ बात ज़्यादा प्रतिक्रिया के थम जाने की है, खुशी आती है पर डुबा देने वाली नहीं, उदासी आती है पर जकड़ने वाली नहीं। और सबसे प्यारी तस्वीर, जैसे कछुआ अपने अंगों को सब तरफ़ से समेट लेता है, वैसे ही जब यह इंसान इन्द्रियों को उनकी चीज़ों से समेट लेता है, तब उसकी समझ ठहरी हुई है। कछुआ ख़तरा भाँप कर अंग समेट लेता है, हालात साफ़ हुए तो निकाल लेता है; वही चालू-बंद वाला क़ाबू इन्द्रियों पर एक स्थितप्रज्ञ के पास है।

    A turtle drawn fully into its shell in a garden of lotus, fruits, peacock-feathers, and incense; the river beyond stays still
    यथा सर्वशः कूर्मो अंगानि · कछुआ अपनी इन्द्रियाँ खींच लेता है, स्थितप्रज्ञ वैसे ही।

    2.58 · 2.59

    यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
    इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

    विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
    रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥

    एक बारीक बात, ज़बरदस्ती के परहेज़ से इन्द्रिय-चीज़ें हट तो जाती हैं, पर “रस”, यानी बची हुई चाह, भीतर रह जाती है; एक असली स्थितप्रज्ञ की वह चाह भी ग़ायब हो जाती है, क्योंकि उसे कुछ बेहतर मिल गया है। टिकाऊ त्याग ज़ोर लगाने से नहीं, कुछ बेहतर दिख जाने से आता है। फिर एक ज़मीनी चेतावनी, यह रास्ता आसान नहीं; एक अनुभवी साधक का मन भी उथल-पुथल मचाने वाली इन्द्रियाँ ज़बरदस्ती कहीं और खींच ले जाती हैं। पता है आप क्या कर रहे हैं, फिर भी इन्द्रिय की खींच तेज़ हो सकती है, इससे हिम्मत नहीं हारनी, यह सबके साथ होता है।

    2.60 · 2.61

    यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
    इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

    तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
    वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

    रास्ते का दो-कदम वाला फ़ॉर्मूला है, एक, इन्द्रियों पर क़ाबू, और दो, ध्यान सबसे ऊँचे बिंदु की ओर; इसी मेल से समझ ठहरती है। फिर सबसे मशहूर “गिरावट की सीढ़ी” शुरू होती है। इन्द्रिय-चीज़ों पर मन टिकाते रहने से उनसे चिपक बनती है, चिपक से इच्छा, इच्छा से गुस्सा। ज़रूरी बात यह कि सब कुछ बस मन के टिकने से शुरू होता है, शरीर की हरकत से नहीं; जो इंसान बस मन ही मन इन्द्रिय-चीज़ों पर मँडरा रहा है, वह पहले से सीढ़ी पर उतर चुका है। बिना मतलब किसी चीज़ पर मन का मँडराना ही पूरी सीढ़ी की बुनियाद रख देता है।

    2.62 · 2.63

    ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
    सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

    क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
    स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

    पूरी सीढ़ी अब साफ़ है, गुस्से से भ्रम, भ्रम से याद का गड़बड़ाना, याद खोने से बुद्धि का नाश, और बुद्धि नष्ट होते ही इंसान खुद नष्ट हो जाता है। मन टिकाना, चिपक, इच्छा, गुस्सा, भ्रम, याद, बुद्धि, नष्ट होना, सब कुछ सिर्फ़ “मन ही मन मँडराने” से। अब इसका इलाज, वही इन्द्रियाँ, वही चीज़ें, पर खिंचाव और चिढ़ छुड़ाई हुई; अपने क़ाबू में रखी इन्द्रियों के साथ चीज़ों के बीच चलते हुए ऐसा सधा इंसान शांति पाता है। इसे परहेज़ समझने में चूक हो जाएगी; यहाँ बात एक समझदार भागीदारी की है, जिसमें आप अब भी खाते हैं, सुनते हैं, बातें करते हैं, पर भीतर की प्रतिक्रिया शांत रहती है।

    2.64 · 2.65

    रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
    आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

    प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
    प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

    उस शांति में सब दुख मिट जाते हैं, और साफ़ मन वाले की बुद्धि जल्दी पक्की तरह जम जाती है; शांति एक बार आ कर रुक जाने वाली घटना नहीं, यह आगे के बदलावों की एक श्रृंखला चालू कर देती है। और इसकी उल्टी दिशा भी सच है, जो जुड़ा नहीं उसमें न बुद्धि है न गहरा मनन, और बिना मनन शांति नहीं, और अशांत को सुख कहाँ। यानी सुख चाहिए तो शांति, शांति चाहिए तो मनन, मनन चाहिए तो योग; सुख का रास्ता असल में योग से शुरू होता है। ज़्यादातर लोग सीधे “खुश होने” से शुरू करते हैं, और इसीलिए हो नहीं पाते।

    2.66

    नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
    न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥

    एक सुंदर तस्वीर, पानी में नाव शांत है, पर तेज़ हवा आते ही वह कहीं भी बह जाती है; जिस इंसान का मन भटकती इन्द्रियों के पीछे चलता है, उसकी समझ उसी नाव की तरह बह जाती है। असली बात यह कि मन passive न हो और इन्द्रियाँ आगे-आगे न चलें, यह उलटना चाहिए, इन्द्रियाँ passive, मन आगे। इसलिए जिसकी इन्द्रियाँ चीज़ों से सब तरफ़ से रोकी हुई हैं, उसी की समझ ठहरी हुई है। यह बात कृष्ण बार-बार दोहराते हैं, क्योंकि यही जड़ है।

    2.67 · 2.68

    इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
    तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

    तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
    इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

    शायद गीता का सबसे सुंदर श्लोक, एक उलटबाँसी। जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह देखने वाले मुनि के लिए रात है। “रात” यानी जो दिखाई नहीं देता; आम प्राणी बाहरी दुनिया में जागते और भीतरी में सोए रहते हैं, मुनि इसका उल्टा है। यह तुलना किसी को ऊँचा-नीचा नहीं बनाती, बस दो अलग रुख़ बताती है। फिर समुद्र वाली तस्वीर, जैसे भरे हुए अडिग समुद्र में सब नदियों का पानी आता है पर वह छलकता नहीं, वैसे ही जिसमें सब इच्छाएँ समाती हैं पर वह हिलता नहीं, वही शांति पाता है। स्थितप्रज्ञ में इच्छाएँ उठ सकती हैं, वे दबाई नहीं जा रहीं, पर भीतर पहले से इतना है कि नदी का आना मूल हालत नहीं बदलता; जो खुद इच्छाओं का पीछा करता है, वह कभी नहीं ठहरता।

    2.69 · 2.70

    या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
    यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

    आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
    तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

    शांति की एक पक्की जाँच-सूची, जो सारी इच्छाएँ छोड़ कर, तलब-रहित, “मेरा”-रहित और “मैं”-रहित हो कर चलता है, वही शांति पाता है। “निर्मम” और “निरहंकार” एक ज़रूरी जोड़ी हैं, क्योंकि ज़्यादातर अहंकार “मुझे यह चाहिए” और “यह मेरा है” से बना होता है; इन दोनों को छोड़ना अहंकार की रसद काट देना है। और अब अध्याय का समापन, यह ब्राह्मी अवस्था है; इसे पा कर इंसान भटकता नहीं, और इसमें मृत्यु के समय भी टिका रहे तो ब्रह्म-निर्वाण पाता है। दो बातें गाँठ बाँध लीजिए, एक बार यह अवस्था पा लेने पर वापस नहीं फिसलते; और मृत्यु का पल सबसे वज़नदार है, उस पल की हालत अगली मंज़िल तय करती है। कृष्ण ने टूटे हुए अर्जुन को 72 श्लोकों में स्थितप्रज्ञता का पूरा नक्शा दे दिया है; अध्याय 3 से 18 तक बस इसी नक्शे के हिस्से खुलेंगे। यह अध्याय बीज-रूप में पूरी गीता है।

    2.71 · 2.72

    विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
    निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥

    एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
    स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

    पढ़ कर आगे क्या

    सीधा अगला पन्ना: अध्याय 3 (कर्म योग)। अध्याय 2 ने कर्म-योग की एक झलक दी थी (2.39-2.53)। अध्याय 3 उसी को 43 श्लोकों में गहराई से खोलता है।

    बाहर का एक सुझाव: स्वामी तदात्मानंद की अध्याय 2 वाली audio talk (Arsha Bodha Center), एक सटीक अद्वैत-वेदान्त नज़रिया जो अध्याय 2 की महीन चालें खोलता है। उसका transcript यहाँ भी मौजूद है

    और एक सवाल जेब में रखिए: आज एक फ़ैसला आप कर रहे हैं, क्या आप “कर्मण्येवाधिकारस्ते” वाले रुख़ से कर रहे हैं या “मा फलहेतुर्भू” वाले? यह छोटी सी आत्म-जाँच 2.47 को theory से उठा कर ज़िंदगी में ला देती है।

    मूल पाठ: श्रीमद्भगवद्गीता, मानक देवनागरी संस्करण (क्रम और स्वर के लिए शंकर-भाष्य परम्परा)।

    जिन भाष्यों से मदद ली: शंकर-भाष्य, मधुसूदन सरस्वती की गूढ़ार्थ-दीपिका, Eknath Easwaran का अनुवाद, स्वामी दयानंद सरस्वती (आर्ष विद्या), स्वामी तदात्मानंद (Arsha Bodha)।

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    आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21

  • Chapter 3 – कर्म योग

    अध्याय 3

    कर्म योग

    कर्म का मार्ग
    अर्जुन पूछता है, ‘अगर ज्ञान बेहतर है तो मुझे लड़ने को क्यों कह रहे हैं?’ कृष्ण समझाते हैं कि कर्म छोड़ा नहीं जा सकता, बस उसे करने का ढंग बदला जा सकता है।
    43 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 8 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
    स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

    श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, वैसा ही दूसरे लोग भी करते हैं। वह जो प्रमाण-रूप कर्म करता है, सारा संसार उसी का अनुसरण करता है।

    गीता 3.21

    Chapter 3 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    तीसरा अध्याय कर्म-योग का है, तेतालिस श्लोक। दूसरे अध्याय का सैंतालिसवाँ श्लोक यहाँ विस्तार पाता है। शंकराचार्य ने इस अध्याय पर लिखा कि “कर्म-योग ज्ञान-योग का पूर्व-निर्धारित मार्ग है”। रामानुजाचार्य का ग्यारहवीं सदी का भाष्य इस अध्याय को एक अलग-कोण से उठाता है, और अष्टावक्र-वेदान्ती परम्परा बारहवीं सदी के बाद इसी पर अपनी समीक्षा लिखती है। आज भी, तिलक की ग्यारह-सौ-पन्ने की “गीता-रहस्य” टीका, जो 1915 में मांडले-कारागार में लिखी गयी, इसी अध्याय को अपना केन्द्र मानती है।

    अध्याय का सार

    अध्याय 2 के बाद अर्जुन में एक नया असमंजस पैदा होता है। कृष्ण ने ज्ञान की भी बात की, कर्म की भी। अर्जुन सोचता है, ‘अगर ज्ञान बेहतर है तो मुझे यह खूनी काम क्यों करना चाहिए? मुझे संन्यासी बनने दीजिए।’

    कृष्ण कहते हैं, ‘यह संभव ही नहीं। कोई भी एक पल भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति ख़ुद हमें कर्म में धकेलती है। तो प्रश्न यह नहीं कि कर्म करें या नहीं, प्रश्न यह है कि कैसे करें।’

    Chapter 3 panel 2

    इसके बाद कृष्ण ‘यज्ञ’ के विचार को कर्म पर लागू करते हैं। यज्ञ यानी अर्पण। जब आप अपना हर काम किसी बड़े उद्देश्य को अर्पित कर देते हैं, तब वही काम बंधन नहीं, मुक्ति का साधन बन जाता है।

    Chapter 3 panel 3

    और अंत में एक बहुत महत्वपूर्ण सबक: ‘दूसरे के धर्म पर चलने से अपने धर्म को निभाना बेहतर है, चाहे कितना भी कठिन हो।’ यह वाक्य पूरी गीता में दो बार आता है (3.35 और 18.47)।

    Chapter 3 panel 4

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 3.5

    न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
    कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
    साधारण अनुवाद‘कोई भी एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण हर एक से कोई न कोई कर्म करवा ही लेते हैं।’

    अकर्म असंभव है। बैठे रहना भी एक कर्म है। तो प्रश्न यह नहीं कि कर्म करें या नहीं, बल्कि यह कि कैसे करें।

    Chapter 3 panel 5

    श्लोक 3.21

    यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
    स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
    साधारण अनुवाद‘श्रेष्ठ पुरुष जो जो करता है, वही दूसरे लोग भी करते हैं। वो जो आदर्श रखता है, उसी का अनुसरण लोग करते हैं।’

    नेतृत्व का बुनियादी सबक। जो ऊँचे स्थान पर हैं, उनके हर कर्म का असर पड़ता है। इसलिए उत्तरदायित्व भी अधिक।

    श्लोक 3.27

    प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
    अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥
    साधारण अनुवाद‘सारे कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा हो रहे हैं। अहंकार में भरा हुआ मनुष्य सोचता है, ”मैं कर रहा हूँ।” ‘

    असली कर्ता प्रकृति है, हम बस माध्यम हैं। अहंकार जब इसे ”मैंने किया” कहता है, बंधन शुरू होता है।

    Chapter 3 panel 6

    श्लोक 3.35

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
    स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
    साधारण अनुवाद‘अपना धर्म (कर्तव्य) अधूरा हो तो भी दूसरे के धर्म को अच्छी तरह निभाने से बेहतर है। अपने धर्म में मरना भी श्रेय है, दूसरे का धर्म भयावह है।’

    दूसरे की भूमिका को कभी अपना मत बनाओ। चाहे वो भूमिका कितनी ही आकर्षक क्यों न लगे।

    सारएक वाक्य में: कर्म से बच नहीं सकते, बस उसे बदल सकते हैं, अर्पण की तरह करें, ”मेरा” कहना छोड़ें, और अपनी भूमिका को अपनी ही रहने दें।
  • Chapter 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग

    अध्याय 4

    ज्ञान कर्म संन्यास योग

    कर्म का ज्ञान
    कृष्ण कहते हैं, ‘मैंने यही ज्ञान पहले सूर्य को दिया था।’ और फिर अवतार का तत्त्व खुलता है, और कर्म-अकर्म-विकर्म का बारीक भेद।
    42 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 9 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

    हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

    गीता 4.7

    Chapter 4 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    चौथा अध्याय “ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग” है, बयालिस श्लोक। पहले-श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि उन्होंने यह विद्या मूल-रूप से सूर्य को बतायी थी, सूर्य ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को, और इसी क्रम से राजा-ऋषियों ने सिखाया। यह एक तरह का वैदिक-परम्परा का दावा है। फिर अवतार-तत्त्व आता है। श्लोक सात, “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः” (जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं आता हूँ), भगवद् गीता की दूसरी सबसे-प्रसिद्ध पंक्ति है, अड़तालीसवें के बाद। तेरहवें श्लोक में चार-वर्ण की उत्पत्ति की चर्चा है, जो बाद के दक्षिण-भारतीय आचार्यों, विशेषतः मध्व के लिए, सामाजिक-दर्शन का आधार-वाक्य बना।

    अध्याय का सार

    इस अध्याय में कृष्ण एक बहुत बड़ा कथन करते हैं: ‘यह योग मैंने सूर्य को दिया था, सूर्य ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को। फिर यह विद्या लुप्त हो गई। आज मैं आपको (अर्जुन को) यही पुरानी विद्या फिर दे रहा हूँ।’

    अर्जुन उलझन में पड़ जाता है: ‘आप का जन्म अभी हुआ, सूर्य का तो बहुत पहले। यह कैसे संभव है?’ कृष्ण जवाब में ‘अवतार’ का सिद्धान्त समझाते हैं: ‘जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं प्रकट होता हूँ।’

    Chapter 4 panel 2

    इसके बाद कृष्ण कर्म के तीन रूप समझाते हैं: कर्म, अकर्म, और विकर्म (दूषित कर्म)। बारीक बात यह है कि कर्म और अकर्म दिखने में अलग हैं, मगर सही दृष्टि से देखें तो एक हो सकते हैं।

    Chapter 4 panel 3

    अंत में कृष्ण ज्ञान-यज्ञ की महिमा बताते हैं। हर तरह का यज्ञ बाहर का है, मगर ज्ञान-यज्ञ अंदर का है, और सब से ऊँचा।

    Chapter 4 panel 4

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 4.7-8

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
    साधारण अनुवाद‘हे भारत, जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं अपने आप को प्रकट करता हूँ। साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों के विनाश के लिए, और धर्म-स्थापना के लिए, मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।’

    अवतार के सिद्धान्त का स्रोत। दो श्लोक मिलकर बहुत बार उद्धृत होते हैं। ‘युगे युगे’ का यह नाद आज भी मंदिरों में सुनाई देता है।

    Chapter 4 panel 5

    श्लोक 4.11

    ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
    साधारण अनुवाद‘जो जिस तरह से मेरी शरण में आते हैं, मैं भी उन्हें उसी तरह से अपनाता हूँ। मनुष्य हर तरह से मेरे रास्ते पर ही चलते हैं।’

    भक्ति-योग का बीज। सब रास्ते कृष्ण तक जाते हैं, बस आने वाले का ढंग अलग-अलग हो सकता है।

    श्लोक 4.18

    कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
    स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
    साधारण अनुवाद‘जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वही बुद्धिमान है, वही योग-युक्त है, वही पूरा कर्म करने वाला है।’

    बारीक विरोधाभास। कोई काम करता दिखता है मगर भीतर निश्चल है, तो वो असल में अकर्म है। और कोई बैठा है मगर भीतर हलचल है, तो वो कर्म कर रहा है।

    Chapter 4 panel 6

    श्लोक 4.34

    तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
    उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
    साधारण अनुवाद‘इसे (आत्म-ज्ञान को) प्रणिपात (विनम्र प्रणाम), सही प्रश्न, और सेवा से जान। तत्त्व-देखने वाले ज्ञानी आपको ज्ञान देंगे।’

    शिक्षा का त्रिवेणी-संगम। विनम्रता, सही सवाल, सेवा। तीनों के बिना ज्ञान आता नहीं, और रुकता नहीं।

    सारएक वाक्य में: यह ज्ञान पुराना है, बस फिर-फिर खोता है और मिलता है। और इसे पाने का रास्ता विनम्रता, सही प्रश्न, और सेवा है।
  • Chapter 5 – कर्म संन्यास योग

    अध्याय 5

    कर्म संन्यास योग

    कर्म का संन्यास
    कर्म छोड़ दें या कर्म करते रहें? कृष्ण कहते हैं: दोनों समान हैं अगर भीतर का त्याग हो। बाहरी संन्यास से असली त्याग कहीं ऊँचा है।
    29 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
    लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

    जो आसक्ति त्याग कर अपने सब कर्म ब्रह्म को अर्पित कर के करता है, वह पाप से वैसे ही अलिप्त रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी से।

    गीता 5.10

    Chapter 5 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    पाँचवाँ अध्याय “कर्म-संन्यास-योग” है, उनतीस श्लोक। यह सबसे छोटा अध्याय है, मगर सबसे केन्द्रित। मूल प्रश्न यह है, कर्म-त्याग और कर्म-योग में कौन-सा श्रेष्ठ है? कृष्ण का उत्तर एक तरह का विरोधाभास है, दोनों ही ले जाते हैं, मगर कर्म-योग आसान है। शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इस अध्याय को “गीता का छिपा हुआ केन्द्र” कहा।

    अध्याय का सार

    अर्जुन फिर पूछता है: ‘आप एक तरफ़ कर्म छोड़ने की बात करते हैं, दूसरी तरफ़ कर्म-योग की। दोनों में से कौन सा बेहतर है, साफ़ बताइए।’

    Chapter 5 panel 2

    कृष्ण जवाब देते हैं: ‘दोनों ही अच्छे हैं और दोनों से मुक्ति मिलती है। मगर बाहरी संन्यास से, अंदर के त्याग वाला कर्म-योगी बेहतर है। क्योंकि अंदर का त्याग, बाहर के त्याग को भी अपने अंदर समा लेता है।’

    Chapter 5 panel 3

    इसके बाद कृष्ण समता-दर्शन की बात करते हैं: ज्ञानी पुरुष ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते, और चांडाल, सब में एक ही चेतना देखता है। यह ‘समदर्शन’ है।

    अंत में कृष्ण ब्रह्म-निर्वाण की स्थिति का वर्णन करते हैं: इन्द्रिय-विषयों से अलग, मन शान्त, ध्यान में स्थित। यह वही स्थिति है जो छठे अध्याय में और गहराई से खुलेगी।

    Chapter 5 panel 4

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 5.10

    ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
    लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
    साधारण अनुवाद‘जो अपने कर्मों को ब्रह्म में अर्पित करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वो पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता पानी से।’

    कमल-पत्र का रूपक। पानी में रहकर भी पानी नहीं छूता उसे। ज्ञानी भी संसार में रहकर संसार से बँधा नहीं।

    Chapter 5 panel 5

    श्लोक 5.18

    विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
    शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
    साधारण अनुवाद‘विद्या-विनय वाले ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में, और चांडाल में भी पण्डित (ज्ञानी) समान दर्शन करते हैं।’

    समदर्शन का प्रसिद्ध श्लोक। बाहर के रूप कुछ भी हों, भीतर एक ही चेतना है। ज्ञानी इसी एक को देखता है।

    Chapter 5 panel 6

    श्लोक 5.22

    ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
    आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
    साधारण अनुवाद‘इन्द्रिय-संस्पर्श से जो भोग पैदा होते हैं, वो दुख की ही जड़ हैं। हे कौन्तेय, उनका आदि-अन्त है। बुद्धिमान उनमें नहीं रमता।’

    हर बाहरी सुख का एक आदि है, एक अन्त है। इस लय में फँसना ही दुख है। ज्ञानी इस लय के बाहर जाता है।

    सारएक वाक्य में: कर्म छोड़ना आसान है, ”मेरा कर्म” छोड़ना कठिन। ज्ञानी वही जो भीतर त्याग करता है, बाहर भले काम करता रहे।
  • Chapter 6: ध्यानयोग

    अध्याय 6

    ध्यान योग

    ध्यान का योग
    योग की सबसे तकनीकी परिभाषा यहाँ है। आसन कैसे लें, मन को कैसे थामें, और सबसे ज़रूरी: मन को अपना दुश्मन नहीं, दोस्त बनाएँ।
    47 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

    अपने आप को अपने ही द्वारा ऊपर उठाओ, अपने आप को नीचे मत गिराओ। आत्मा ही अपना मित्र है, और आत्मा ही अपना शत्रु।

    गीता 6.5

    Chapter 6 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    छठा अध्याय ध्यान-योग का है, सैंतालिस श्लोक। यह योग-साधना का सबसे विस्तृत वर्णन है पूरी गीता में, और पतंजलि-योग-सूत्रों (दूसरी सदी ईसा-पूर्व के क़रीब) से इसका सीधा-संबंध है। श्लोक तेरह में, “समं काय-शिरो-ग्रीवम् धारयन्” (शरीर, सिर, और गर्दन को एक-सीध में रख कर), योग-आसन का जो वर्णन है, वो पतंजलि के “स्थिर-सुख आसनम्” की ही प्रतिध्वनि है। आधुनिक-योग-पुनरुत्थान, बीसवीं सदी के पहले दशकों में टी. कृष्णमाचार्य और उनके शिष्यों ने, इसी अध्याय को आसन-अभ्यास का शास्त्रीय-आधार बनाया।

    अध्याय का सार

    छठा अध्याय ‘ध्यान योग’ है। पतंजलि के योगसूत्र इसी तरह की बारीकी के साथ आते हैं, लेकिन उनसे पहले गीता ने यहाँ इस विद्या को संकलित कर दिया।

    कृष्ण पहले यह स्पष्ट करते हैं कि असली संन्यास बाहर का नहीं, अंदर का है। जो अपने कर्म-फल का त्याग करता है, वही असली योगी और संन्यासी दोनों है।

    Chapter 6 panel 2

    फिर तकनीक: एक स्थिर जगह, स्थिर आसन, सीधी रीढ़, आधा-खुले नेत्र, मन को एक बिंदु पर केन्द्रित। न ज़्यादा खाना, न ज़्यादा सोना; न बहुत कम भी।

    Chapter 6 panel 3

    इस अध्याय का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है मन के बारे में। अर्जुन कहता है, ‘यह मन बहुत चंचल है, हवा को रोकने जैसा कठिन।’ कृष्ण मानते हैं, मगर कहते हैं: अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आता है।

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 6.5

    उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
    साधारण अनुवाद‘अपने आप से अपने को ऊपर उठाना है, अपने को नीचे नहीं गिरने देना। आत्मा ही अपना मित्र है, और आत्मा ही अपना शत्रु।’

    पूरी आत्म-उत्थान की परम्परा का बीज एक श्लोक में। कोई बाहर से बचाने नहीं आएगा। आप ही अपने उद्धारक हैं।

    Chapter 6 panel 4

    श्लोक 6.6

    बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
    अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
    साधारण अनुवाद‘जिसने अपने को अपने से जीत लिया, उसके लिए आत्मा ही मित्र है। और जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही आत्मा शत्रु जैसी हो जाती है।’

    पिछले श्लोक का निष्कर्ष। मित्र और शत्रु, दोनों आपके ही अंदर हैं। दोनों एक ही जगह बैठे हैं।

    Chapter 6 panel 5

    श्लोक 6.19

    यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
    योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥
    साधारण अनुवाद‘जैसे हवा-रहित जगह में रखा दीपक हिलता नहीं, वैसी ही उपमा है उस योगी की जो अपने चित्त को नियंत्रित करके आत्म-योग में स्थित है।’

    ध्यान का सबसे सुंदर रूपक। हवा-रहित दीपक की लौ बिल्कुल सीधी जलती है। ध्यानी का मन भी ऐसा ही।

    श्लोक 6.34

    चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
    तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
    साधारण अनुवाद(अर्जुन कहता है:) ‘हे कृष्ण, यह मन बहुत चंचल है, उच्छृंखल, बलवान, दृढ़। इसे रोकना मुझे हवा को रोकने जैसा कठिन लगता है।’

    अर्जुन की ईमानदार शिकायत। हर ध्यान करने वाला यही पाता है। मन एक नदी है, उल्टी दिशा में बहाना कठिन।

    Chapter 6 panel 6

    श्लोक 6.35

    असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
    साधारण अनुवाद‘हे महाबाहो, बेशक मन कठिन है और चंचल। मगर हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आता है।’

    कृष्ण का समाधान-सूत्र। दो साधन: अभ्यास (नियमित प्रयास) और वैराग्य (आसक्ति का छूटना)। दोनों मिलकर मन को थामते हैं।

    सारएक वाक्य में: मन अपना दुश्मन है, अगर उसे थामना न आए। और थामने का तरीक़ा कोई जादू नहीं, रोज़ का अभ्यास और चीज़ों से अंदरूनी दूरी।
  • Chapter 7: ज्ञान-विज्ञान योग

    अध्याय 7

    ज्ञान-विज्ञान योग

    ज्ञान और विवेक
    कृष्ण अब अपनी असली पहचान बताना शुरू करते हैं। ”मैं ही सब कुछ हूँ, मगर हज़ारों में एक ही मुझे ठीक से जान पाता है।”
    30 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 7 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
    मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

    हे धनंजय! मुझसे परे कुछ भी नहीं। यह सब मुझ में पिरोया हुआ है, जैसे मणियाँ धागे में।

    गीता 7.7

    Chapter 7 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    सातवाँ अध्याय “ज्ञान-विज्ञान-योग” है, तीस श्लोक। यहाँ कृष्ण अपनी विभूतियों का पहला परिचय देते हैं। श्लोक चार-पाँच में, अष्ट-धा-प्रकृति का सिद्धान्त रखा जाता है, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, और अहंकार। यह आठ-तत्त्व-दर्शन सांख्य-दर्शन के पच्चीस-तत्त्वों का एक संक्षिप्त-रूप है, और बाद के अद्वैत-दर्शन ने इसे फिर पुनर्व्यवस्थित किया। शंकराचार्य की अपनी “तत्त्व-बोध” रचना इसी आठ-तत्त्व-संरचना पर खड़ी है।

    अध्याय का सार

    यहाँ से गीता का दूसरा भाग शुरू होता है, जो भक्ति-योग की ओर झुकता है। अब तक कर्म और ज्ञान की बात हुई। अब कृष्ण अपनी पहचान बताना शुरू करते हैं।

    Chapter 7 panel 2

    वो कहते हैं: ‘मेरी दो प्रकृतियाँ हैं। एक अपरा (निचली), जिसमें पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार हैं। दूसरी परा (ऊँची), जो जीव-तत्व है। पूरी सृष्टि इन्हीं दोनों से बनी है।’

    Chapter 7 panel 3

    फिर वो अपनी विभूतियाँ बताते हैं: मैं जल का स्वाद हूँ, सूरज का प्रकाश, ओम् की ध्वनि, मनुष्यों में पौरुष, अग्नि में तेज, सब का बीज।

    और एक ज़बरदस्त कथन: ‘हज़ारों मनुष्यों में कोई एक मुझे जानने का प्रयत्न करता है। उनमें भी, कोई एक ही मुझे सही तरह से जानता है।’

    Chapter 7 panel 4

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 7.7

    मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
    मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
    साधारण अनुवाद‘हे धनंजय, मुझसे ऊँचा कुछ भी नहीं। यह सारी सृष्टि मुझ में पिरोई हुई है, जैसे धागे में मणियाँ।’

    माला का रूपक। मणियाँ अलग-अलग दिखती हैं, मगर धागा एक। उसी तरह सब रूप अलग, उनके पीछे का तत्व एक।

    Chapter 7 panel 5

    श्लोक 7.16

    चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
    आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
    साधारण अनुवाद‘हे अर्जुन, चार प्रकार के पुण्यात्मा मुझे भजते हैं: आर्त (दुख में), जिज्ञासु (जानने वाला), अर्थार्थी (कुछ चाहने वाला), और ज्ञानी।’

    चार दरवाज़े भक्ति के। दुख में आएँ, सवाल लेकर आएँ, ज़रूरत में आएँ, या ज्ञान में आएँ। चारों स्वीकार हैं।

    Chapter 7 panel 6

    श्लोक 7.19

    बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
    वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
    साधारण अनुवाद‘बहुत जन्मों के अंत में, ज्ञानी मेरी शरण में आता है, यह जानकर कि ”वासुदेव ही सब कुछ है।” ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है।’

    यह बोध एक ही जन्म में आ जाए, यह दुर्लभ है। बहुत यात्राएँ करनी पड़ती हैं। अंत में पता चलता है, एक ही था सब जगह।

    सारएक वाक्य में: कृष्ण कहते हैं, मैं ही सब रूपों में हूँ, सब रास्तों पर हूँ। बस मुझे पहचानने वाले कम हैं।
  • Chapter 8: अक्षर ब्रह्म योग

    अध्याय 8

    अक्षर ब्रह्म योग

    अविनाशी ब्रह्म
    मरते समय क्या सोचा था, अगला जन्म वही बन जाता है। तो मरते समय कृष्ण को याद रखो। यह छोटी सी बात ही असली विद्या है।
    28 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
    यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

    अंतकाल में मुझे ही स्मरण करते हुए जो शरीर त्याग कर जाता है, वह मेरे ही भाव को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।

    गीता 8.5

    Chapter 8 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    आठवाँ अध्याय “अक्षर-ब्रह्म-योग” है, अट्ठाईस श्लोक। मरण-समय की प्रार्थना और अन्तिम-स्मरण का सिद्धान्त इसी अध्याय में है। श्लोक छह की पंक्ति, “अन्त-काले च माम् एव स्मरन्” (और अन्त-समय में जो मुझे स्मरण करता है), तिब्बत के बुद्धिस्ट-बार्डो-थोडोल की मरण-शिक्षा से कौतूहल-जनक रूप से मिलती है। दोनों परम्पराएँ अलग जड़ों से उठीं, मगर मरण-समय की चेतना-स्थिति पर इनका विचार आश्चर्यजनक रूप से समानांतर है।

    अध्याय का सार

    इस अध्याय में अर्जुन कई अध्यात्मिक शब्दों के अर्थ पूछता है: ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या? कर्म क्या? अधिभूत? अधिदैव? अधियज्ञ? और मरते समय कौन इन्हें जानता है?

    Chapter 8 panel 2

    कृष्ण एक-एक करके जवाब देते हैं। फिर एक मूल व्यावहारिक सबक देते हैं: ‘मरते समय जिस का चिंतन करते हैं, अगला जन्म वही बनता है।’

    Chapter 8 panel 3

    तो रास्ता क्या है? पूरी ज़िंदगी अभ्यास करो कि अंत में कृष्ण याद आएँ। और अगर अंत में याद आ गया, तो आगे का सब रास्ता तय।

    Chapter 8 panel 4

    अध्याय का अंत ‘ओम्’ की चर्चा से होता है। और स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीरों के पार जाने की तकनीक।

    Chapter 8 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 8.5

    अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
    यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
    साधारण अनुवाद‘अंत-काल में जो मुझे ही याद करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वो मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं।’

    मरते समय का एक थोड़ा-सा क्षण निर्णायक है। पर वो क्षण ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं आएगा, उसकी पूरी ज़िंदगी तैयारी है।

    Chapter 8 panel 6

    श्लोक 8.6

    यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
    तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
    साधारण अनुवाद‘मनुष्य अंत में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वो वही पाता है। पूरी ज़िंदगी उसी भाव में जिया जो उसका अंतिम भाव हो।’

    मरते समय जो याद आता है वो आधी ज़िंदगी का जोड़ है। तो रोज़ कैसा सोचा-समझा है, वो ही उस क्षण पर सामने आएगा।

    सारएक वाक्य में: जैसा रोज़ सोचोगे वैसा अंत में याद आएगा, और जैसा अंत में याद आएगा वैसा अगला कदम होंगे।
  • Chapter 9: राजविद्या-राजगुह्य योग।

    अध्याय 9

    राजविद्या राजगुह्य योग

    राजसी ज्ञान
    गीता का सबसे प्रिय अंश यहीं है: ”पत्ता, फूल, फल, पानी, जो भी मुझे प्रेम से देगा, मैं स्वीकार करूँगा।” और भक्ति में जात-कुल-लिंग कुछ नहीं देखा जाता।
    34 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 8 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
    तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

    जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-संयुक्त भक्तों के योग-क्षेम का भार मैं उठाता हूँ।

    गीता 9.22

    Chapter 9 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    नौवाँ अध्याय “राज-विद्या-राज-गुह्य-योग” है, चौतीस श्लोक। नाम-में-ही दो विशेषण, “राज” (श्रेष्ठ) और “गुह्य” (गुप्त)। कृष्ण कहते हैं कि वो जो ज्ञान अब बताने वाले हैं, वो “गुह्य से गुह्यतर” है। श्लोक छब्बीस की पंक्ति, “पत्रं पुष्पं फलं तोयम्” (पत्ता, फूल, फल, या जल जो भी मुझे श्रद्धा से दिया जाए), पूजा-विधि का सबसे प्रसिद्ध सूत्र-वाक्य है। चैतन्य-महाप्रभु (पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी के बंगाल) ने इस श्लोक को अपनी भक्ति-परम्परा का आधार-वाक्य बनाया।

    अध्याय का सार

    कृष्ण कहते हैं: ‘अब मैं आपको सबसे ऊपर का रहस्य बताता हूँ। यह राज-विद्या है, राज-गुह्य है, सबसे पवित्र, सबसे शान्ति देने वाला।’

    तो रहस्य क्या है? कि वो कृष्ण सब में हैं और सब उन्हीं में हैं, मगर वो किसी से बँधे नहीं। यह ‘सर्वव्यापक मगर अनासक्त’ का विरोधाभास गीता का केंद्रीय भाव है।

    Chapter 9 panel 2

    इसके बाद कृष्ण भक्ति की पूरी तस्वीर देते हैं: कौन भक्त है, कौन अभक्त, और भक्ति का असली रूप क्या है। ‘पत्ता, फूल, फल, पानी, जो भी प्रेम से दिया जाए, मैं स्वीकार करूँगा।’

    Chapter 9 panel 3

    और अंत में सबसे सुंदर सर्व-समावेशी कथन: ‘मेरे लिए सब समान हैं, चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष, चाहे ऊँची जात का हो, चाहे नीची की। जो प्रेम से मेरे पास आए, मेरा है।’

    Chapter 9 panel 4

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 9.11

    अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
    परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
    साधारण अनुवाद‘मूर्ख मेरा अपमान करते हैं, क्योंकि मैं मनुष्य-रूप में आया हूँ। वो मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते कि मैं भूतों का महान् ईश्वर हूँ।’

    हम बाहर के रूप से धोखा खाते हैं। कृष्ण मनुष्य लग रहे हैं, तो भगवान कैसे होंगे? यही सोच रोकती है।

    Chapter 9 panel 5

    श्लोक 9.22

    अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
    तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
    साधारण अनुवाद‘जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन सदा-युक्त लोगों का योग-क्षेम (जो नहीं मिला उसका मिलना, और जो मिला उसकी रक्षा) मैं ख़ुद करता हूँ।’

    गीता का सबसे आश्वासन देने वाला श्लोक। जो पूरी तरह अर्पित है, उसकी ज़िम्मेदारी कृष्ण लेते हैं।

    श्लोक 9.26

    पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
    तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
    साधारण अनुवाद‘जो भक्त मुझे प्रेम से एक पत्ता, फूल, फल, या पानी अर्पण करता है, उसका वो भक्ति-भरा प्रसाद मैं खा लेता हूँ।’

    दिल का सबसे साधारण अर्पण काफ़ी है। महंगे प्रसाद की ज़रूरत नहीं। कृष्ण को मात्रा नहीं चाहिए, भाव चाहिए।

    Chapter 9 panel 6

    श्लोक 9.29

    समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
    ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
    साधारण अनुवाद‘मैं सब प्राणियों में समान हूँ। मेरा कोई पसंद-नापसंद नहीं। पर जो भक्ति से मुझे भजते हैं, वो मेरे में हैं, और मैं उनके में।’

    दो-तरफ़ा रिश्ता। कृष्ण किसी का पक्ष नहीं लेते, मगर जो उन्हें चुनता है, उसके साथ खड़े हो जाते हैं।

    सारएक वाक्य में: भक्ति की भाषा सब समझ सकते हैं, चाहे जात-कुल कुछ भी हो। और जो भक्ति से एक पत्ता तक देगा, उसका सब कृष्ण देखेंगे।
  • Chapter 10: विभूति योग

    अध्याय 10

    विभूति योग

    कृष्ण की विभूतियाँ
    अर्जुन कहता है, ”आप अपनी विभूतियाँ बताइए।” कृष्ण लंबी सूची देते हैं, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, अक्षरों में अकार। हर श्रेणी का सर्वोत्तम मैं हूँ।
    42 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 9 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
    गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥

    सब वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देव-ऋषियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ, और सिद्धों में कपिल मुनि।

    गीता 10.26

    Chapter 10 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    दसवाँ अध्याय विभूति-योग है, बयालिस श्लोक। यहाँ कृष्ण अपनी असंख्य विभूतियों की एक लम्बी सूची देते हैं, मैं हिमालय हूँ, मैं गंगा हूँ, मैं अश्वत्थ-वृक्ष हूँ, मैं अर्जुन हूँ। यह सूची एक तरह की ब्रह्मांडीय तालिका है, और भारत के भौगोलिक-सांस्कृतिक-धार्मिक भूगोल का एक शब्द-रूपी नक्शा। अड़तीसवें श्लोक का “दण्डो दमयतां अस्मि” (दमन-करने वालों में मैं दण्ड हूँ) ने बाद के नीति-शास्त्र में राज-दण्ड-व्यवस्था का दार्शनिक-आधार बनाया।

    अध्याय का सार

    अर्जुन को नौवें अध्याय के बाद और जिज्ञासा जागती है। वो कहता है, ‘आप जो हैं, मैं उसकी थोड़ी झलक देखना चाहता हूँ। मुझे अपनी विभूतियाँ बताइए।’

    Chapter 10 panel 2

    कृष्ण मानते हैं और लंबी सूची देते हैं। पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, समुद्र, सूर्य, चन्द्र, हर श्रेणी का सबसे श्रेष्ठ। ऋषियों में भृगु, अक्षरों में ‘अ’, छंदों में गायत्री।

    Chapter 10 panel 3

    महीनों में अगहन, ऋतुओं में वसंत। पांडवों में अर्जुन। मुनियों में व्यास। यह सूची सत्तर से ज़्यादा वस्तुओं तक जाती है।

    अंत में कृष्ण कहते हैं: ‘मेरी विभूतियों का अंत नहीं। जहाँ भी कुछ ऐसा है जो आँख चुंधियाए, गहराई से प्रभावित करे, मेरी एक छोटी सी प्रकट कथा। पूरी सृष्टि का एक छोटा सा हिस्सा मेरी कुल विभूति है।’

    Chapter 10 panel 4

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 10.20

    अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
    अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
    साधारण अनुवाद‘हे गुडाकेश (नींद को जीतने वाले, अर्जुन का एक नाम), मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही भूतों का आदि हूँ, मध्य हूँ, और अंत भी।’

    विभूतियों की पहली घोषणा अंदर की है, बाहर की नहीं। ‘मैं आपके ही हृदय में हूँ।’

    Chapter 10 panel 5

    श्लोक 10.41

    यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
    तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम् ॥
    साधारण अनुवाद‘जहाँ भी कुछ ऐश्वर्य, सौंदर्य, या तेज वाली चीज़ देखो, उसे मेरे तेज के एक अंश से उत्पन्न जानो।’

    संक्षिप्त मार्ग। पूरी सूची मत याद रखो। जहाँ भी असाधारण कुछ दिखे, समझो कि वो कृष्ण की प्रकट कथा है।

    Chapter 10 panel 6

    श्लोक 10.42

    अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
    विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
    साधारण अनुवाद‘या इस सब विस्तार से आपको क्या? हे अर्जुन, मैंने इस पूरी सृष्टि को अपने एक अंश से धारण कर रखा है।’

    पूरा ब्रह्मांड कृष्ण के एक छोटे से हिस्से में है। उन्हें हम कितना भी जान लें, बाक़ी बहुत है।

    सारएक वाक्य में: जहाँ भी कुछ बड़ा, सुंदर, या ज़बरदस्त दिखे, वो कृष्ण की एक छोटी सी झलक है। पूरा रूप तो अगले अध्याय में आएगा।
  • Chapter 11: विश्वरूप दर्शन योग

    अध्याय 11

    विश्व-रूप दर्शन योग

    ब्रह्मांडीय रूप का दर्शन
    अर्जुन ने कहा, ”मुझे दिखाइए।” कृष्ण ने अपना विश्व-रूप दिखाया, सब देवता, सब लोक, समय का गला। अर्जुन काँप उठा।
    55 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
    ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥

    मैं काल हूँ, संसार का संहार करने वाला, बढ़ा हुआ। मैं इन सब को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हूँ। आपके बिना भी ये योद्धा नहीं बचेंगे।

    गीता 11.32

    विश्व-रूप, कृष्ण का ब्रह्मांडीय रूप
    विश्व-रूप, सब लोक, सब देवता, सब काल कृष्ण के एक रूप में।

    पाठ-संदर्भ

    ग्यारहवाँ अध्याय भगवद् गीता का सबसे नाटकीय-हिस्सा है। पचपन श्लोक, और इन्हीं में कृष्ण अपना विश्व-रूप अर्जुन को दिखाते हैं। श्लोक बत्तीस की पंक्ति, “कालो अस्मि लोक-क्षय-कृत्” (मैं काल हूँ, संसार का संहार करने वाला), इतिहास में सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में से एक बन गयी। जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, जिन्होंने अमेरिकी मैनहैटन-परियोजना का नेतृत्व किया, ने 16 जुलाई 1945 के ट्रिनिटी-परीक्षण के बाद इस पंक्ति को उद्धृत किया। ओपेनहाइमर भौतिक-विज्ञानी थे, पर उन्होंने संस्कृत सीखी थी और गीता को मूल में, बीसवीं सदी के तीसरे दशक में पढ़ा था। उन्होंने अपने जीवन-काल में दो-तीन बार सार्वजनिक-इंटरव्यू में यह पंक्ति दोहरायी।

    अध्याय का सार

    अर्जुन ने अध्याय 10 के बाद कहा, ‘आपने अपनी विभूतियाँ बता दीं। अब असली रूप दिखाइए।’ कृष्ण ने पहले बताया कि साधारण आँखों से यह दिखेगा नहीं, और ‘दिव्य-चक्षु’ दिए।

    और तब वो रूप दिखा। हज़ारों मुख, हज़ारों आँखें, हज़ारों भुजाएँ। सब देवता उसी में, सब लोक उसी में, सूर्य-चन्द्र-तारे उसी में। और सामने एक मुख, जिसमें सब सेनाएँ अंदर जा रही थीं।

    अर्जुन घबरा गया। पूछा, ‘आप कौन हैं?’ कृष्ण ने जवाब दिया: ‘मैं काल हूँ, संसार के नाश का कारण। यह सेनाएँ तो मार ही दी जा चुकी हैं। आप बस निमित्त बन।’

    अर्जुन ने हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी कि मित्र समझकर ‘अरे कृष्ण’ कहता रहा। फिर प्रार्थना की कि वो साधारण रूप में लौट आएँ। कृष्ण लौट आए। और कहा, ‘यह रूप आपको इसलिए दिखाया कि कोई और इसे नहीं देख पाता। यह केवल भक्ति से देखा जा सकता है।’

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 11.32

    श्रीभगवानुवाच ।
    कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
    लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
    ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
    येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
    साधारण अनुवाद‘मैं काल हूँ, संसार का नाश करने वाला, और बढ़ता हुआ हूँ। मैं यहाँ लोकों को समेटने में लगा हूँ। आपके बिना भी, इन सब विरोधी सेनाओं में खड़े योद्धा नहीं बचेंगे।’

    पूरी गीता का सबसे चौंकाने वाला कथन। यह वही ‘कालोऽस्मि’ है जो ओपेनहाइमर के मन में ट्रिनिटी-परीक्षण के समय उभरा था।

    श्लोक 11.33

    तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
    जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
    मयैवैते निहताः पूर्वमेव
    निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
    साधारण अनुवाद‘इसलिए उठ, यश पा। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोग। ये पहले से ही मेरे द्वारा मार दिए गए हैं। आप बस निमित्त बन, हे सव्यसाची।’

    कृष्ण का सबसे साफ़ निर्देश। ‘आप तो केवल माध्यम हैं।’ इस बोध में कर्ता-भाव गिर जाता है।

    श्लोक 11.55

    A small fishing boat with a golden sail rides a rough sea; figures struggle in the water around it; sunlight breaks through to the boat
    विश्वरूप के बाद की प्रार्थना। काल का दर्शन हो चुका, और भक्त उसी रूप से रक्षा माँगता है।
    मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
    निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
    साधारण अनुवाद‘जो मेरा कर्म करता है, मुझे ही परम मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति-रहित है, सब प्राणियों से वैर-रहित है, हे पाण्डव, वही मुझे प्राप्त होता है।’

    पूरे अध्याय का समापन सूत्र। पाँच गुण: मेरा काम, मेरा लक्ष्य, मेरा प्रेम, अनासक्ति, और सब के प्रति निर्वैरता।

    सारएक वाक्य में: समय ख़ुद कृष्ण है, और जो लड़ाई होनी है वो पहले से तय। आप तो बस अपना हिस्सा निभाने के लिए हैं।
  • Chapter 12: भक्ति योग

    अध्याय 12

    भक्ति योग

    भक्ति का मार्ग
    अर्जुन पूछता है, ”भगवान को रूप-समेत मानें या निराकार?” कृष्ण कहते हैं: ”दोनों से मिल सकते हैं, पर साधारण इंसान के लिए रूप-वाला रास्ता आसान है।”
    20 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
    निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

    जो किसी से द्वेष नहीं करता, सब भूतों का मित्र है, करुणामय है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुख में सम है, क्षमाशील है।

    गीता 12.13

    Chapter 12 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    बारहवाँ अध्याय भक्ति-योग है, बीस श्लोक। यह सबसे छोटा अध्याय है, मगर भक्ति-परम्परा का मूल पाठ। श्लोक पन्द्रह से बीस तक, भक्त के लक्षण बताए जाते हैं, अद्वेष्टा, मैत्र, करुण, निर्मम, निरहंकार, सम-दुःख-सुख। रामानुजाचार्य ने इसी अध्याय को अपनी विशिष्टाद्वैत-दर्शन का केन्द्र-बिन्दु बनाया, और बारहवीं सदी के बाद का दक्षिण-भारतीय भक्ति-आन्दोलन इसी पर खड़ा है।

    अध्याय का सार

    अर्जुन का सीधा सवाल: ‘कौन सा भक्त ज़्यादा निपुण है? जो आप जैसे साकार को भजता है, या जो निराकार ब्रह्म को?’

    Chapter 12 panel 2

    कृष्ण का जवाब बहुत व्यावहारिक है: ‘दोनों मेरे पास आते हैं। मगर निराकार का रास्ता बहुत कठिन है। साधारण मनुष्य के लिए रूप-समेत भक्ति आसान है।’

    Chapter 12 panel 3

    फिर वो उन गुणों की सूची देते हैं जो भक्त को प्रिय बनाते हैं। सब प्राणियों से वैर नहीं, मित्रता, करुणा, ममता-अहंकार से मुक्त, सुख-दुख में समान, क्षमाशील, संतुष्ट, हमेशा युक्त, दृढ़-निश्चयी।

    Chapter 12 panel 4

    गीता के अध्यायों में यह सबसे छोटा है, मगर इसकी एक-एक पंक्ति याद रखने लायक है। संक्षेप में भक्त के स्वभाव का पूरा चित्र।

    Chapter 12 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 12.13-14

    अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
    निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
    संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
    मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
    साधारण अनुवाद‘जो सब प्राणियों से बैर नहीं रखता, मित्रवत् और करुण है, ममता-अहंकार से मुक्त, सुख-दुख में समान, क्षमा-शील, हमेशा संतुष्ट, संयमित, दृढ़ निश्चय वाला, अपना मन-बुद्धि मुझे अर्पित किए हुए, वो भक्त मुझे प्रिय है।’

    दो श्लोक मिलकर भक्त के स्वभाव का एक पूरा चित्र। नौ गुण गिनाते हैं। इन्हें रोज़ पढ़ें, याद रखें।

    Chapter 12 panel 6

    श्लोक 12.15

    यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
    हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
    साधारण अनुवाद‘जिससे लोग दुखी नहीं होते, और लोगों से जो दुखी नहीं होता, जो हर्ष, क्रोध, भय, उद्वेग, इन सब से मुक्त है, वो मुझे प्रिय है।’

    दूसरे लोग आपसे कैसा महसूस करते हैं, यह भी आपकी भक्ति का सबूत है। अंतर-व्यक्तिक शान्ति।

    सारएक वाक्य में: भक्ति का रास्ता आसान है क्योंकि उसमें ख़ुद को छोड़ना है, समझना नहीं। और भक्त वही जो किसी को दुखी न करे, और ख़ुद किसी से दुखी न हो।
  • Chapter 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

    अध्याय 13

    क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

    क्षेत्र और क्षेत्र को जानने वाला
    शरीर ”क्षेत्र” है, और जो उसे जानता है वो ”क्षेत्रज्ञ”। इस भेद को पहचानना ही ज्ञान का बीज है।
    35 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 8 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
    विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥

    जो सब भूतों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को देखता है, जो विनाशशील के बीच अविनाशी को देखता है, वही वस्तुतः देखता है।

    गीता 13.27

    Chapter 13 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    तेरहवाँ अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग है, पैंतीस श्लोक। मूल-दर्शन क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का विभाजन है। श्लोक तेरह में, “सर्वतः पाणि-पादम्” (सब ओर हाथ-पैर वाला), जो ब्रह्म-स्वरूप का प्रसिद्ध श्लोक है, मूलतः श्वेताश्वतर उपनिषद् से लिया गया है। यह बहु-शास्त्रों से तत्त्व-सम्मेलन गीता की एक केन्द्रीय-विशेषता है। आदि शंकराचार्य ने इस अध्याय पर अपनी सबसे विस्तृत भगवद् गीता-भाष्य लिखी।

    अध्याय का सार

    गीता का तीसरा भाग शुरू होता है, जिसमें ज्ञान-योग प्रधान है। पहला सूत्र: शरीर ‘क्षेत्र’ है, और जो इसे जानता है वो ‘क्षेत्रज्ञ’।

    Chapter 13 panel 2

    क्षेत्र में क्या है? पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, दस इन्द्रियाँ, पाँच विषय, इच्छा-द्वेष, सुख-दुख, चेतना, धृति। यह सब क्षेत्र है।

    Chapter 13 panel 3

    और क्षेत्रज्ञ? वो शुद्ध चेतना है, जो इस क्षेत्र को देखती-परखती है। उसका कोई हाथ-पैर नहीं, मगर सब हाथ-पैर उसी में हैं। वो अंदर-बाहर, चर-अचर, पास-दूर सब में है।

    Chapter 13 panel 4

    अध्याय का अंत ‘समदर्शन’ पर है: जो सब प्राणियों में एक ही परम-आत्मा को देखता है, वो ख़ुद का नाश नहीं करता, और तब परम गति को पाता है।

    Chapter 13 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 13.27

    समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
    विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥
    साधारण अनुवाद‘जो सब प्राणियों में समान-स्थित, और नश्वर में अविनाशी रूप से स्थित परमेश्वर को देखता है, वही (असल में) देखता है।’

    ‘जो देखता है, वो देखता है’ दो बार। पहली ‘देख’ यह सूक्ष्म दर्शन है, दूसरी ‘देख’ यह सच्चा दर्शन। एक ही शब्द, दो अलग गहराइयाँ।

    Chapter 13 panel 6
    सारएक वाक्य में: यह शरीर एक खेत है, और इसे जानने वाला कोई और है। उस फ़र्क़ को समझना ही ज्ञान की शुरुआत है।
  • Chapter 14: गुणत्रय विभाग योग

    अध्याय 14

    गुणत्रय विभाग योग

    तीन गुणों का विभाग
    हर मनुष्य तीन रस्सियों से बँधा है, सत्त्व, रजस, तमस। तीनों को पहचानना और तीनों के पार जाना, यही गुणातीत बनना है।
    27 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
    जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥

    इन तीनों गुणों के पार जा कर देही जन्म-मृत्यु-जरा-दुख से मुक्त हो कर अमृत को प्राप्त करता है।

    गीता 14.20

    Chapter 14 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    चौदहवाँ अध्याय गुण-त्रय-विभाग-योग है, सत्ताईस श्लोक। तीन-गुणों का सिद्धान्त सांख्य-दर्शन का आधारभूत-वाक्य है, सत्त्व, रजस्, तमस्। भगवान् श्रीकृष्ण इन्हें अपने स्वरूप से उत्पन्न बताते हैं। श्लोक छब्बीस का, “मां च योऽव्यभिचारेण भक्ति-योगेन सेवते” (जो मुझे अव्यभिचार-भक्ति से सेवा करता है), तेरहवीं सदी के मध्व-आचार्य के द्वैत-दर्शन का आधार-वचन बना। चैतन्य-परम्परा भी इसी श्लोक को अपनी भक्ति-व्याख्या का केन्द्र मानती है।

    अध्याय का सार

    अध्याय का विषय: सत्त्व, रजस, और तमस, ये तीन गुण जो प्रकृति में मिश्रित हैं। हर मनुष्य के अंदर तीनों होते हैं, मगर अनुपात अलग।

    Chapter 14 panel 2

    सत्त्व: स्वच्छता, प्रकाश, संतुलन। जब सत्त्व बढ़ता है, ज्ञान-विवेक बढ़ते हैं। रजस: गतिशीलता, इच्छा, आसक्ति। जब रजस बढ़ता है, बेचैनी, लोभ, और अनगिनत कर्मों की आदत बढ़ती है। तमस: जड़ता, अंधकार, मोह। जब तमस बढ़ता है, आलस्य, निद्रा, और बुद्धि का धूमिल होना बढ़ता है।

    Chapter 14 panel 3

    तीनों मिलकर मनुष्य को बाँधते हैं। मुक्ति का रास्ता है, तीनों से ऊपर उठना, ‘गुणातीत’ बनना। ऐसा साधक तीनों गुणों को देखता है, मगर उनसे बँधा नहीं होता।

    Chapter 14 panel 4

    अध्याय का अंत गुणातीत के लक्षणों पर है: जो हर्ष-शोक में समान, स्थिर, कर्म-कर्ता और कर्म-फल से अलग।

    Chapter 14 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 14.5

    सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
    निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
    साधारण अनुवाद‘सत्त्व, रजस, तमस, ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं। ये हे महाबाहो, इस शरीर में रहने वाले अव्यय (अमर) आत्मा को बाँध देते हैं।’

    तीन रस्सियाँ। हम सब इन्हीं से बँधे हैं। अंतर बस यह कि किस की पकड़ ज़्यादा है। पहचान पहली चीज़ है।

    Chapter 14 panel 6

    श्लोक 14.22

    प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
    न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
    साधारण अनुवाद‘हे पाण्डव, (गुणातीत वो है जो) प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रजस), और मोह (तमस), इनके आने पर इनसे द्वेष नहीं करता, और न जाने पर इनकी चाह करता है।’

    गुणातीत का व्यावहारिक वर्णन। तीनों आते-जाते रहेंगे। बस इनके आने-जाने से प्रभावित न होइए।

    सारएक वाक्य में: तीन रस्सियों को पहचानिए, सत्त्व, रजस, तमस, और तीनों के आने-जाने का दर्शक बनिए। यही मुक्ति है।
  • Chapter 15: पुरुषोत्तम योग

    अध्याय 15

    पुरुषोत्तम योग

    परम पुरुष
    एक उल्टा पीपल का पेड़ है, जड़ें ऊपर, शाखाएँ नीचे। यह संसार है। और इसे काटने का औज़ार ”वैराग्य” है।
    20 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
    मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

    जीव-लोक में जीव-रूप मेरा ही सनातन अंश है। मन समेत छह इन्द्रियाँ प्रकृति में स्थित हैं, और जीव इन्हें खींचता है।

    गीता 15.7

    उल्टा पीपल का वृक्ष, जड़ें ऊपर, शाखाएँ नीचे
    अश्वत्थ-वृक्ष, जड़ ब्रह्म में, शाखाएँ संसार में।

    पाठ-संदर्भ

    पन्द्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम-योग है, बीस श्लोक। प्रारम्भिक श्लोकों में अश्वत्थ-वृक्ष का दृष्टान्त आता है, “ऊर्ध्व-मूलम् अधः-शाखम्” (ऊपर मूल, नीचे शाखाएँ), जो कठोपनिषद् के एक श्लोक की सीधी-प्रतिध्वनि है। यह दृष्टान्त संसार-वृक्ष का है, उल्टा-खड़ा हुआ। दान्ते की “इन्फर्नो” (1320 के क़रीब इटली में लिखी) में एक मिलती-जुलती कल्पना है, हालाँकि सीधा-प्रभाव नहीं माना जाता। पन्द्रहवें श्लोक का, “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः” (मैं सब के हृदय में बैठा हूँ), अद्वैत-वेदान्त का मूल-कथन है।

    अध्याय का सार

    अध्याय की शुरुआत एक प्राचीन रूपक से होती है, उल्टा अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे। यह रूपक कठोपनिषद् 2.3.1 में भी आता है। यानी असली स्रोत ऊपर (ब्रह्म) है, और संसार उसकी शाखाओं की तरह नीचे फैला है।

    इसे काटने का औज़ार क्या है? वैराग्य का तेज़ कुल्हाड़ा। एक बार जड़ काट दी जाए, सब शाखाएँ अपने आप गिर जाती हैं।

    फिर कृष्ण ‘पुरुषोत्तम’ की परिभाषा देते हैं: संसार में दो पुरुष हैं, क्षर (बदलने वाला) और अक्षर (न बदलने वाला)। दोनों से परे एक तीसरा है, उत्तम पुरुष, यानी कृष्ण स्वयं।

    और अंत में एक सुंदर पंक्ति: ‘मैं ही सब हृदयों में बैठा हूँ, स्मृति-ज्ञान-अपोहन (भूलना) मुझ से ही होते हैं।’

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 15.1

    ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
    छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
    साधारण अनुवाद‘ऊपर मूल वाले, नीचे शाखाओं वाले अश्वत्थ-वृक्ष को अव्यय (अविनाशी) कहा गया है। उसकी पत्तियाँ वेद-छंद हैं। जो इसे जानता है, वही वेद-ज्ञानी है।’

    उपनिषदों से सीधा उठाया गया रूपक। जड़ें ऊपर, उसके पार है।

    श्लोक 15.7

    ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
    मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
    साधारण अनुवाद‘इस जीव-लोक में जीव-रूप में मेरा ही एक सनातन अंश है। वो प्रकृति में स्थित छह इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ + मन) को आकर्षित करता है।’

    हर जीव कृष्ण का अंश है। पूरा नहीं, बस एक हिस्सा। और वो हिस्सा शरीर की इन्द्रियों के साथ काम करता है।

    श्लोक 15.15

    सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
    मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
    वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
    वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
    साधारण अनुवाद‘मैं सब के हृदय में स्थित हूँ। स्मृति, ज्ञान, और भूलना, सब मुझ से ही होते हैं। सब वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। मैं ही वेदान्त का रचयिता हूँ, और वेदों को जानने वाला भी।’

    एक श्लोक में कृष्ण की पूरी पहचान। हर याद, हर ज्ञान, हर भूलना उन्हीं से आता है।

    सारएक वाक्य में: संसार एक उल्टा पेड़ है, जिसकी जड़ ब्रह्म में है। और हर जीव उस ब्रह्म का ही एक छोटा सा अंश।
  • Chapter 16: देवासुर संपद विभाग योग

    अध्याय 16

    दैवासुर सम्पद विभाग योग

    दैवी और आसुरी गुण
    मनुष्य की दो तरह की प्रकृति होती है, दैवी और आसुरी। दोनों की लंबी सूची। यह एक पहचान-पुस्तिका है।
    24 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
    कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

    काम, क्रोध, लोभ, ये तीन नरक के द्वार हैं, आत्मा का नाश करने वाले। इसलिए इन तीनों को त्यागना चाहिए।

    गीता 16.21

    Chapter 16 panel 8
    Chapter 16 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    सोलहवाँ अध्याय दैवी-आसुरी-सम्पद्-विभाग-योग है, चौबीस श्लोक। मूल-विभाजन दो-प्रवृत्तियों का है, दैवी और आसुरी। यह विभाजन मानवीय-स्वभाव का है, बाहरी-दुश्मनों का नहीं। श्लोक छह में, “द्वौ भूत-सर्गौ लोके अस्मिन्” (इस-लोक में दो-तरह की प्रवृत्तियाँ बनाई गयी हैं)। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में इसे व्यक्तित्व-वर्गीकरण कहा गया है। बीसवीं सदी के मनोवैज्ञानिक एरिख फ्रॉम और कार्ल युंग ने इस-तरह के द्विविध-विभाजनों पर विस्तृत-लेखन किया, हालाँकि गीता से सीधा-संदर्भ नहीं था।

    अध्याय का सार

    इस अध्याय का विषय बहुत साफ़ है: मनुष्य की प्रकृति दो तरह की होती है। दैवी और आसुरी।

    Chapter 16 panel 2

    दैवी गुणों की एक लंबी सूची: अभय, चित्त की पवित्रता, ज्ञान-योग में स्थिरता, दान, संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध-मुक्ति, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (दूसरों की चुगली नहीं), दया, लोभ-मुक्ति, सौम्यता, ह्री (विनम्र-लज्जा), अचापलम् (स्थिरता), तेज, क्षमा, धृति, शौचम्, अद्रोह, अमानित्व।

    Chapter 16 panel 3

    आसुरी गुणों की भी सूची: दम्भ, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान। ये गुण मनुष्य को बाँधते हैं।

    Chapter 16 panel 4

    अंत में ‘काम-क्रोध-लोभ’ को कृष्ण ‘त्रिविधं नरकस्य द्वारम्’ (नरक के तीन दरवाज़े) कहते हैं। इन्हें छोड़ने वाला अपना कल्याण करता है।

    Chapter 16 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 16.1-3

    श्रीभगवानुवाच ।
    अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
    दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥
    अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
    दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥
    तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
    भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
    साधारण अनुवाद‘अभय, चित्त की शुद्धि, ज्ञान-योग में स्थिरता, दान, संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध-मुक्ति, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (चुगली नहीं), जीवों पर दया, लोभ-मुक्ति, सौम्यता, विनम्रता, स्थिरता, तेज, क्षमा, धृति, शुद्धता, अद्रोह, अति-मान न होना, हे भारत, ये दैवी सम्पदा में जन्मे व्यक्ति के गुण हैं।’

    छब्बीस गुणों की सूची। हर एक एक अभ्यास है। सब साथ नहीं आते, मगर एक-एक करके बढ़ाए जा सकते हैं।

    Chapter 16 panel 6

    श्लोक 16.21

    त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
    कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
    साधारण अनुवाद‘नरक के तीन दरवाज़े हैं, जो आत्म-नाश करते हैं: काम, क्रोध, और लोभ। इन तीनों को त्याग देना चाहिए।’

    तीन सबसे ख़तरनाक शत्रु। काम (इच्छा), क्रोध, लोभ। इन्हें पहचानिए और दूर रखिए, यही पूरा संदेश।

    Chapter 16 panel 7
    सारएक वाक्य में: दो तरह के लोग होते हैं, एक जो अपने अंदर का प्रकाश बढ़ाते हैं, दूसरे जो अंधेरा। यह चुनाव रोज़ का है।
  • Chapter 17: श्रद्धा त्रय विभाग योग

    अध्याय 17

    श्रद्धा-त्रय विभाग योग

    श्रद्धा के तीन प्रकार
    हर एक की एक श्रद्धा होती है, और वो श्रद्धा उसके गुण के अनुसार होती है। तो जिसकी जैसी श्रद्धा, उसका वैसा भगवान।
    28 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
    देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकमुच्यते ॥

    देना कर्तव्य है, ऐसा मान कर जो दान बिना उपकार की अपेक्षा के, उचित देश-काल-पात्र को दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहलाता है।

    गीता 17.20

    Chapter 17 panel 8
    Chapter 17 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    सत्रहवाँ अध्याय श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग है, अट्ठाईस श्लोक। श्रद्धा के तीन प्रकार, सात्त्विक, राजसिक, तामसिक। यह विभाजन तीन-गुणों के अनुसार है, जो चौदहवें अध्याय में बताए गए। तीसरे-श्लोक की एक प्रसिद्ध पंक्ति है, “श्रद्धा-मयो अयं पुरुषः, यो यच्छ्रद्धः स एव सः” (मनुष्य श्रद्धा-मय है। जिसकी जो श्रद्धा, वो वैसा ही)। यह आधुनिक पहचान-सिद्धान्त से अद्भुत-तौर पर मेल खाता है, हालाँकि श्रद्धा शब्द का आधुनिक-शब्दावली में सही-अनुवाद कठिन है।

    अध्याय का सार

    अध्याय 16 में दैवी-आसुरी प्रकृति देखी। अब 17वें में पूछा जाता है: जो लोग शास्त्र-अनुसार नहीं चलते, मगर अपनी श्रद्धा से पूजा-यज्ञ करते हैं, उनकी निष्ठा कैसी है?

    Chapter 17 panel 2

    कृष्ण कहते हैं: ‘हर एक की श्रद्धा उसके अपने स्वभाव के अनुसार होती है। तो जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसा ही वो है।’

    Chapter 17 panel 3

    तीन गुणों के अनुसार तीन तरह की श्रद्धा, तीन तरह का भोजन, तीन तरह का यज्ञ, तीन तरह का तप, तीन तरह का दान। हर चीज़ का सात्त्विक, राजसिक, और तामसिक रूप।

    Chapter 17 panel 4

    और अंत में ‘ओम् तत् सत्’ का सूत्र, हर शुभ कर्म इन तीनों शब्दों से शुरू होता है, और बिना श्रद्धा के किया हुआ सब ‘असत्’ है।

    Chapter 17 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 17.3

    सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
    श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
    साधारण अनुवाद‘हे भारत, हर एक की श्रद्धा उसके स्वभाव (सत्त्व) के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसा ही वो है।’

    आप जो मानते हैं, वही आप हैं। यही अंदर की पहचान है।

    Chapter 17 panel 6

    श्लोक 17.20

    दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
    देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
    साधारण अनुवाद‘जो दान ”दिया जाना चाहिए” इस भाव से बिना बदले की उम्मीद के, सही देश, सही समय, और सही पात्र को दिया जाए, वो सात्त्विक दान है।’

    सात्त्विक दान की पाँच शर्तें: कर्तव्य-भाव, बिना बदले की अपेक्षा, सही जगह, सही समय, सही व्यक्ति।

    Chapter 17 panel 7
    सारएक वाक्य में: जो आप मानते हैं, वही आप हैं। और श्रद्धा से किया हर शुभ काम भी तीन गुणों के अनुसार रंग पाता है।
  • Chapter 18: मोक्ष संन्यास योग

    अध्याय 18

    मोक्ष संन्यास योग

    अंतिम शरणागति
    18वाँ अध्याय पूरी गीता का सार है। और अंत में एक ही पंक्ति: ”सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आएँ।” अर्जुन का संदेह मिटा, धनुष उठा।
    78 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 14 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

    सब धर्मों को त्याग कर एकमात्र मेरी शरण में आ। मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत कर।

    गीता 18.66

    Chapter 18 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    अठारहवाँ अध्याय भगवद् गीता का सबसे लम्बा है, अठहत्तर श्लोक। यह एक तरह का सार-संग्रह है, पूरी गीता का। हर पुराने विषय की पुनः-स्मृति, हर अवधारणा की पुनः-व्याख्या। आखिरी श्लोक, छियासठवाँ, “सर्व-धर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज” (सब धर्मों को छोड़ कर मेरी अकेले की शरण में आओ), को कई परम्पराओं में “चरम-श्लोक” कहा जाता है। रामानुजाचार्य की ग्यारहवीं-सदी की श्रीवैष्णव-परम्परा ने इसी श्लोक को अपनी मूल-शरणागति-वाणी बनाया, और बाद के दक्षिण-भारतीय आचार्यों ने इसी पर सबसे विस्तृत भाष्य लिखे।

    अध्याय का सार

    गीता का सबसे लंबा अध्याय, और सब का सार। कृष्ण यहाँ पिछले 17 अध्यायों की सारी बातें फिर से इकट्ठा करते हैं, मगर एक नई दिशा से।

    Chapter 18 panel 2

    पहले ‘त्याग’ और ‘संन्यास’ के बीच का फ़र्क़ साफ़ करते हैं। फिर पाँच कारण बताते हैं किसी भी कर्म के, अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, इन्द्रियाँ, चेष्टा, और दैव। अकेला अहंकार कर्ता नहीं।

    फिर तीन गुणों के हिसाब से सब का विभाजन: ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति, सुख। हर के तीन रंग।

    Chapter 18 panel 3

    और तब वर्ण-धर्म: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के कर्म।स्वभाव-व्यवस्था है। हर एक का धर्म उसके अपने स्वभाव से जुड़ा है।

    Chapter 18 panel 4

    अंत में सबसे शक्तिशाली श्लोक, 18.66, ‘सब धर्मों को छोड़, मेरी शरण में आ। मैं आपको सब पापों से मुक्त करूँगा। शोक मत कर।’ अर्जुन का संदेह मिटता है। वो धनुष उठाते हैं, युद्ध शुरू होता है।

    Chapter 18 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 18.47

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
    स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
    साधारण अनुवाद‘अपना धर्म अधूरा भी हो, तो भी दूसरे का अच्छा धर्म निभाने से बेहतर है। स्वभाव-नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप नहीं पाता।’

    3.35 की पुनरावृत्ति, मगर ज़्यादा मज़बूती से। यह दोहराव कुछ बता रहा है, यह बात बार-बार सुनने लायक है।

    Chapter 18 panel 6

    श्लोक 18.61

    ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
    भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
    साधारण अनुवाद‘हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है। माया के द्वारा सब प्राणियों को यंत्र पर चढ़ाकर घुमाता है।’

    ईश्वर हृदय में है, और सब को घुमा रहा है। हम ख़ुद नहीं चलते, हम यंत्र पर चढ़े हैं।

    श्लोक 18.65

    मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
    मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
    साधारण अनुवाद‘मन मुझ में रख, भक्त बन, यज्ञ मेरे लिए कर, मुझे ही नमस्कार कर। आप मुझे ही पाएगा, सच्चे वचन में कहता हूँ, क्योंकि आप मुझे प्रिय है।’

    पाँच कार्य, एक वचन। मन-भक्ति-यज्ञ-नमन-कृष्ण। और बीच में एक भावुक पंक्ति: ‘क्योंकि आप मुझे प्रिय है।’

    Chapter 18 panel 7

    श्लोक 18.66

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
    साधारण अनुवाद‘सब धर्मों को छोड़कर एक मेरी शरण में आ। मैं आपको सब पापों से मुक्त करूँगा, शोक मत कर।’

    गीता का अंतिम सूत्र। ‘चरम-श्लोक’ कहलाता है। पूरी 700 श्लोकों की किताब इस एक पंक्ति में सिमट जाती है।

    Chapter 18 panel 8

    श्लोक 18.78

    यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
    साधारण अनुवाद(संजय का अंतिम कथन:) ‘जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं, और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य, और नीति, सब निश्चित। यह मेरा मत है।’

    पूरी गीता की अंतिम मुहर। संजय ने सारा वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाया है। और एक वाक्य में निचोड़: कृष्ण + अर्जुन = विजय। ज्ञान + कर्म = सफलता।

    सारएक वाक्य में: सब रास्तों का अंत एक ही जगह जाता है, सब छोड़कर शरणागत होना। और जहाँ कृष्ण-अर्जुन साथ हैं, वहाँ जीत निश्चित है।
  • जपजी साहिब

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