
॥ दोहा ॥
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
अर्थ: अपने श्रीगुरु के चरण-कमलों की पावन धूल से मैं अपने मन रूपी दर्पण को पोंछकर स्वच्छ कर लेता हूँ। इस शुद्ध मन से अब मैं रघुकुल के श्रेष्ठ राजा श्रीराम का वह निर्मल यश गाने जा रहा हूँ, जो जीवन के चारों फल, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, प्रदान करने वाला है। तुलसीदासजी यह कहते हैं कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गुरु का स्मरण और मन की शुद्धि अनिवार्य है।
बल बुधि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अर्थ: अपने आप को बुद्धिहीन और अयोग्य मानते हुए मैं पवनपुत्र हनुमानजी का स्मरण करता हूँ। हे प्रभु, मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान कीजिए, तथा मेरे सभी कष्ट, रोग और मन के विकार दूर कर दीजिए। तुलसीदासजी अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए हनुमानजी से तीन वरदान माँगते हैं: शारीरिक बल, विवेकपूर्ण बुद्धि, और आत्मज्ञान की विद्या।
॥ चौपाई ॥
1. जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥#

अर्थ: हे हनुमानजी, जय हो। आप ज्ञान और सद्गुणों के सागर हैं। हे वानर-पति, आप तीनों लोकों में अपने तेज और यश से उजाला फैलाने वाले हैं। आपकी महिमा कहीं छिपी नहीं है; हर लोक में आपका नाम आदर से लिया जाता है।
2. राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥#

अर्थ: आप श्रीराम के दूत हैं और आपके बल की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। माता अंजनी के पुत्र होने के कारण आपका नाम अंजनिपुत्र है, और पवनदेव के अंश से जन्म लेने के कारण आप पवनसुत कहलाते हैं।
Background story: देवी अंजना एक पूर्व-जन्म के शाप के कारण पृथ्वी पर वानर-रूप में जन्मीं। वे शिव-भक्त थीं और उनके पति थे सुमेरु-वन के वानर-राजा केसरी। संतान की इच्छा से अंजना ने कठिन तपस्या की। एक दिन जब वे पूजा में थीं, तब पवनदेव ने उनकी झोली में एक दिव्य प्रसाद रख दिया, जो देवी अंजना ने श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया। कुछ मास बाद उनके यहाँ हनुमानजी का जन्म हुआ। इसी कारण हनुमानजी को ‘पवन-पुत्र’ और केसरी का ‘केसरी-नंदन’, दोनों कहा जाता है।
3. महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥#

अर्थ: आप महान वीर हैं, पराक्रमी हैं, और आपका शरीर वज्र के समान दृढ़ है; इसी कारण आपको बजरंगी (वज्र-अंग वाला) कहा जाता है। आप भक्तों की कुबुद्धि यानी भ्रम, दुराचार और ग़लत सोच को मिटाकर उन्हें सही मार्ग पर ले आते हैं। जिनके मन में सुबुद्धि रहती है, आप उनके साथी रहते हैं।
4. कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥#
अर्थ: आपके शरीर का रंग सोने जैसा सुनहरा है। आप सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण करते हैं, जिनसे आपकी शोभा और निखर जाती है। आपके कानों में कुंडल झूलते हैं, और आपके घुंघराले बाल मनोहर लगते हैं।
5. हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥#
अर्थ: आपके एक हाथ में वज्र (गदा) और दूसरे हाथ में विजय की ध्वजा सुशोभित है। ये दोनों आपकी शक्ति और विजय-सामर्थ्य के प्रतीक हैं। आपके कंधे पर मूँज घास से बना हुआ पवित्र जनेऊ शोभायमान है, जो आपकी तपस्या, ब्रह्मचर्य और विद्वत्ता का सूचक है। आप शक्ति और संयम दोनों के आदर्श हैं।
6. शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥#
अर्थ: आप भगवान शंकर के अंश से उत्पन्न हुए हैं; एक मान्यता के अनुसार आप रुद्र-अवतार हैं। साथ ही आप राजा केसरी के पुत्र भी हैं। आपका तेज और प्रताप इतना विशाल है कि सारा संसार आपकी वंदना करता है। देवता, मुनि, और मनुष्य, सभी आपके सामने नत-मस्तक होते हैं।
7. विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥#

अर्थ: आप विद्या के भण्डार हैं; चारों वेदों के ज्ञाता, व्याकरण और संगीत में पारंगत, और अनेक गुणों से युक्त हैं। परंपरा में आपको ‘नव व्याकरणों का ज्ञाता’ भी कहा गया है। आप अत्यंत चतुर और बुद्धिमान हैं। इतनी विशेषताओं के होते हुए भी आप सदैव श्रीराम की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है।
8. प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥#

अर्थ: आप प्रभु श्रीराम के चरित्र और लीलाओं को सुनने में रस लेते हैं; यह आपकी सबसे प्रिय प्रवृत्ति है। आपके हृदय में श्रीराम, लक्ष्मण और माँ सीता तीनों निरंतर विराजमान रहते हैं।
Background story: राम-राज्याभिषेक के बाद माता सीता ने प्रसन्न होकर अपनी मोतियों की माला उठाकर हनुमानजी को उपहार-स्वरूप दी। हनुमानजी ने हर मोती को दाँतों से तोड़कर देखा, और बोले, “इन मोतियों में तो मेरे राम नहीं हैं।” किसी ने jokingly पूछा, “क्या तुम्हारे शरीर में राम हैं?” तब हनुमानजी ने अपने नख से अपना वक्ष चीरा, और सभी उपस्थित जनों ने देखा कि वहाँ राम, लक्ष्मण और सीता विराजमान थे। यह event उनकी भक्ति की गहराई का साक्षात उदाहरण है, जो बाद की शताब्दियों में चित्रकला और मूर्तिकला का एक प्रसिद्ध विषय बना।
9. सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥#

अर्थ: आपने अपनी इच्छा से अत्यंत छोटा (सूक्ष्म) रूप धारण करके अशोक वाटिका में माँ सीता को दर्शन दिए, ताकि राक्षस आपको पहचान न सकें। बाद में विकराल रूप धारण करके पूरी लंका नगरी को अपनी पूँछ की आग से जला दिया। यह आपके रूप बदलने की और परिस्थिति के अनुसार कार्य करने की क्षमता का प्रमाण है।
Background Story: समुद्र पार करके लंका पहुँचने पर हनुमानजी ने अपना शरीर एक बिल्ली जितना छोटा कर लिया। अशोक वाटिका में पीड़ित सीता के सामने प्रकट होकर उन्होंने श्रीराम की अँगूठी सौंपी, राम का संदेश सुनाया, और सीता से राम की पहचान के लिए चूड़ामणि प्राप्त की। लौटते समय वाटिका के फल-फूल उजाड़ दिए, राक्षस सैनिकों को हराया, पर अंततः मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र से उन्हें बंदी बनाया। रावण के दरबार में उन्होंने अपने स्वामी का संदेश निर्भीक स्वर में सुनाया। दंड-स्वरूप उनकी पूँछ में तेल डूबा कपड़ा बाँधकर आग लगाई गई। हनुमानजी ने अपना शरीर विशाल कर लिया, बँधन तोड़े, और उसी जलती पूँछ से लंका के प्रमुख भवनों में आग लगा दी। अंत में उन्होंने समुद्र में पूँछ डुबोकर अग्नि शांत की और लौट आए।
10. भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥#
अर्थ: आपने विशाल रूप धारण करके अनेक राक्षसों का संहार किया। इस प्रकार आपने श्रीरामचंद्रजी के सारे कार्यों को सँवार दिया, यानी हर कठिन काम को पूरा कर दिखाया। राम के कार्य में आप कभी पीछे नहीं हटे।
11. लाय सजीवन लखन जियाए। श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥#
अर्थ: जब लक्ष्मणजी मेघनाद के शक्ति-बाण से मूर्छित हो गए थे, तब आप हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाए और लक्ष्मणजी के प्राण बचाए। इस पर श्रीराम इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने आपको अपने हृदय से लगा लिया।
Background story: लंका-युद्ध में मेघनाद ने शक्ति-बाण से लक्ष्मण को मूर्छित कर दिया। राज-वैद्य सुषेण ने बताया कि हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत से चार विशेष ओषधियाँ लानी होंगी, और सूर्योदय से पहले लानी होंगी, अन्यथा लक्ष्मण की रक्षा संभव नहीं। हनुमानजी उड़कर हिमालय पहुँचे। रास्ते में रावण का भेजा राक्षस कालनेमि उन्हें रोकने आया, पर हनुमान ने उसे पराजित किया। पर्वत पर पहुँचकर वे सही ओषधि पहचान नहीं पाए, इसलिए पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया और कंधे पर उठाए लंका लौटे। वैद्य सुषेण ने ओषधियाँ चुनीं, और लक्ष्मण को होश आ गया। यह कथा उत्तर भारत के मंदिरों में चित्रित सबसे लोकप्रिय दृश्यों में से एक है।
12. रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥#
अर्थ: श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा की और स्वयं कहा, “हनुमान, तुम मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान ही प्रिय हो।” रामायण में भरत का राम से गहरा प्रेम well-known है; इसलिए यह वचन हनुमानजी के प्रति राम के स्नेह की ऊँचाई दिखाता है।
13. सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥#
अर्थ: श्रीराम कहते हैं कि हे हनुमान, हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी सदा तुम्हारा यशगान करते रहते हैं। ऐसा कहकर लक्ष्मी-पति श्रीराम ने आपको अपने गले से लगा लिया। आशय यह है कि हनुमानजी का यश गाने के लिए एक जीभ अथवा सौ जीभ भी पर्याप्त नहीं।
14. सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥#
अर्थ: सनक, सनन्दन आदि चार ब्रह्म-कुमार, स्वयं ब्रह्माजी जैसे देवता और अन्य बड़े-बड़े मुनि, देवर्षि नारद, विद्या की देवी सरस्वती (शारदा), और शेषनाग (अहीश), ये सब भी आपका गुणगान करते हैं। सृष्टि के सबसे ऊँचे पदों पर बैठे हुए प्राणी भी आपकी स्तुति में लगे रहते हैं।
Background:
सनकादिक = चार ब्रह्मकुमार
ये ब्रह्माजी के मानसपुत्र हैं (ब्रह्माजी के मन से उत्पन्न हुए), न कि शारीरिक जन्म से। इनके नाम हैं -> सनक, सनन्दन, सनातन, और सनत्कुमार। ब्रह्माजी ने इन्हें सृष्टि-रचना के कार्य में लगाना चाहा, परन्तु इन चारों ने संसार के बन्धन को अस्वीकार कर दिया और बाल-ब्रह्मचारी रहकर केवल भगवत्-भक्ति और ज्ञान-साधना का मार्ग अपनाया। पुराणों के अनुसार ये सदैव पाँच वर्ष के बालक के रूप में रहते हैं । इनका शरीर कभी वृद्ध नहीं होता। ये नारायण के परम भक्त माने जाते हैं। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में इनका विस्तृत वर्णन मिलता है, विशेषकर जय-विजय (वैकुण्ठ के द्वारपाल) को श्राप देने की कथा में।
ब्रह्मादि = ब्रह्मा और अन्य देवता
ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता हैं। हिन्दू त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में प्रथम। “ब्रह्मादि” का अर्थ है “ब्रह्मा आदि”, अर्थात् ब्रह्मा से लेकर अन्य समस्त देवगण – इन्द्र, वरुण, अग्नि, वायु, इत्यादि। यह शब्द बताता है कि सृष्टि के सर्वोच्च देवता भी हनुमानजी का गुणगान करते हैं।
मुनीसा = महान मुनिगण
“मुनीसा” means मुनियों के ईश, यानी श्रेष्ठ ऋषि-मुनि। इसमें वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य, वाल्मीकि, व्यास आदि सभी महान तपस्वी सम्मिलित हैं जिन्होंने कठोर तपस्या और साधना से ज्ञान प्राप्त किया।
नारद = देवर्षि नारद
नारद भी ब्रह्माजी के मानसपुत्र हैं। इन्हें “देवर्षि” कहा जाता है (देवताओं के ऋषि)। इनकी विशेषताएँ अनेक हैं: ये निरन्तर “नारायण-नारायण” का जाप करते हुए तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में विचरण करते हैं। इनके हाथ में सदैव वीणा रहती है जिसे “महती” कहते हैं। ये भक्ति-मार्ग के आदि-प्रवर्तक माने जाते हैं। “नारद भक्ति सूत्र” इनकी प्रसिद्ध रचना है।
पुराणों में इन्हें कभी-कभी “कलह-प्रिय” भी कहा गया है, परन्तु इनके द्वारा उत्पन्न किया गया हर विवाद अन्ततः धर्म की स्थापना और भगवत्-लीला के लिए ही होता है।
सारद = देवी सरस्वती (शारदा)
शारदा, देवी सरस्वती का ही एक नाम है। ये विद्या, वाणी, संगीत, और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनके हाथों में वीणा, पुस्तक (वेद), माला, और कमण्डलु होता है। श्वेत (White) वस्त्र धारण करती हैं और श्वेत कमल पर विराजमान रहती हैं। हंस इनका वाहन है। चौपाई में इनका उल्लेख इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि स्वयं वाणी की देवी भी हनुमानजी के गुणों का पूर्ण वर्णन करने में असमर्थ हैं।
अहीश = शेषनाग
“अहीश” = अहि (सर्प) + ईश (स्वामी) = सर्पों के स्वामी, अर्थात् शेषनाग। इन्हें “अनन्त” भी कहा जाता है। ये सहस्र फणों (एक हज़ार मस्तकों) वाले दिव्य नाग हैं जिनके ऊपर भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं। पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण पृथ्वी शेषनाग के फण पर टिकी हुई है। श्रीराम के अवतार में शेषनाग ही लक्ष्मण के रूप में अवतरित हुए। सहस्र मुखों वाले होने के बावजूद, शेषनाग भी हनुमानजी के समस्त गुणों का वर्णन नहीं कर पाते।
15. जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥#
अर्थ: यमराज, धन के देवता कुबेर, और आठों दिशाओं की रक्षा करने वाले दिगपाल भी आपके यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते। फिर साधारण कवि और विद्वान (कोविद) कहाँ तक आपकी महिमा गा पाएँगे। तात्पर्य यह है कि आपकी महानता शब्दों की पहुँच से परे है।
16. तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥#
अर्थ: आपने वानर-राज सुग्रीव पर बड़ा उपकार किया। आपने उन्हें श्रीराम से मिलवाया, जिसके परिणाम-स्वरूप बाली का वध हुआ और सुग्रीव को किष्किंधा का राज-सिंहासन प्राप्त हुआ।
background story: बाली ने अपने छोटे भाई सुग्रीव को राज्य से निष्कासित कर दिया (exiled) था और उसकी पत्नी को भी अपने पास रख लिया था। सुग्रीव अपने कुछ साथियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे रहते थे, क्योंकि बाली को वहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं थी (एक ऋषि के शाप के कारण)। जब राम और लक्ष्मण सीता को खोजते हुए उस क्षेत्र में पहुँचे, तब हनुमानजी ने ब्राह्मण का रूप धारण करके उनसे परिचय किया, सुग्रीव से मिलवाया, और दोनों के बीच अग्नि-साक्षी मित्रता करवाई। इसी मित्रता के फलस्वरूप राम ने बाली का वध किया और सुग्रीव को सिंहासन मिला; बदले में सुग्रीव की सेना सीता-खोज और लंका-युद्ध में राम की सहायक बनी।
back-story behind that back-story:
यह कथा वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड में विस्तार से वर्णित है। पूरी पृष्ठभूमि इस प्रकार है:
दुन्दुभि एक अत्यन्त बलशाली असुर था जिसने महिष (भैंसे) का रूप धारण किया हुआ था। अपनी शक्ति के मद में उसने सबसे पहले समुद्र को युद्ध के लिए ललकारा। समुद्र ने कहा “मैं तुमसे युद्ध करने में समर्थ नहीं हूँ, तुम हिमवान (हिमालय पर्वत) के पास जाओ, वे तुम्हारे योग्य प्रतिद्वन्द्वी हो सकते हैं।”
दुन्दुभि ने हिमालय पर जाकर उन्हें भी ललकारा और अपने सींगों से पर्वत-शिखरों को तोड़ने लगा। हिमवान ने भी कहा — “मैं तपस्वी हूँ, योद्धा नहीं। यदि तुम्हें युद्ध का इतना ही शौक है, तो किष्किन्धा जाओ, वहाँ वानरराज बाली रहता है, वह इन्द्र का पुत्र है और तुम्हारी शक्ति की परीक्षा ले सकता है।”
दुन्दुभि किष्किन्धा पहुँचा और रात्रि में बाली को ललकारा। बाली ने दुन्दुभि के साथ भीषण युद्ध किया और अन्ततः उसे मार डाला। विजय के उन्माद में बाली ने दुन्दुभि के विशाल शव को उठाकर बहुत दूर फेंक दिया।
वह शव उड़ता हुआ ऋष्यमूक पर्वत पर जा गिरा, ठीक वहाँ जहाँ ऋषि मतंग का आश्रम था। शव गिरने से रक्त और मांस के छींटे ऋषि मतंग के आश्रम में, उनकी तपोभूमि पर, और उनके वृक्षों पर पड़े। इससे उनका आश्रम अपवित्र हो गया।
ऋषि मतंग अत्यन्त क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी तपोबल-दृष्टि से जान लिया कि यह कार्य बाली ने किया है। उन्होंने शाप दिया:
“जिसने यह शव मेरे आश्रम पर फेंका है, यदि वह कभी ऋष्यमूक पर्वत की सीमा में एक योजन (लगभग 12-15 किलोमीटर) के भीतर भी आया, तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में फट जाएगा।”
17. तुम्हरो मंत्र विभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥#
अर्थ: आपके दिए हुए परामर्श को विभीषण ने माना; उन्होंने अधर्मी रावण का साथ छोड़ा और श्रीराम की शरण में आए। इसी कारण युद्ध के बाद वे लंका के राजा बने। यह बात सारा संसार जानता है। यह दिखाता है कि आपकी सलाह कितनी दूरदर्शी और फलदायी होती है।
18. जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥#
अर्थ: सूर्य, जो पृथ्वी से हज़ारों योजन दूर है (एक विराट दूरी), उसे आपने बालक-रूप में मीठा फल समझकर निगल लिया था। यह आपकी शिशु-काल की लीला है, जो आपकी सहज शक्ति और निर्भयता का परिचय देती है।
background story: बाल्य-अवस्था में एक दिन हनुमानजी ने उगते सूर्य को पका हुआ लाल फल समझा और आकाश की ओर उड़ चले। उसी दिन आकाश में राहु भी सूर्य-ग्रहण लगाने आए थे; उन्होंने हनुमान को एक अन्य राहु समझ लिया। इंद्रदेव क्रोधित हुए और उन्होंने अपना वज्र हनुमान पर चलाया। वज्र हनुमान की ठुड्डी (हनु) पर लगा, जिससे वे मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इसी कारण उनका नाम ‘हनु-मान’ पड़ा। जब पवनदेव ने क्रोध में संसार की वायु रोक दी, तब सभी देवताओं ने आकर क्षमा माँगी, और हनुमानजी को अनेक वरदान दिए।
19. प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥#

अर्थ: प्रभु श्रीराम की अँगूठी (मुद्रिका) को अपने मुख में रखकर आप विशाल समुद्र को एक ही छलाँग में पार कर गए। आपके लिए यह कोई आश्चर्य नहीं था; यह आपके लिए सहज कार्य था। यह प्रसंग सीता-खोज का है, जब हनुमानजी 40-kms समुद्र पार करके लंका पहुँचे।
background story: समुद्र-लाँघने के लिए हनुमानजी महेन्द्र पर्वत पर चढ़े और छलाँग लगाई। रास्ते में समुद्र-देवता ने उन्हें विश्राम देने के लिए मैनाक पर्वत को ऊपर उठाया, परंतु हनुमान राम-कार्य में बिना रुके आगे बढ़ गए। मार्ग में सुरसा नामक नागमाता ने परीक्षा ली; हनुमान ने पहले अपना रूप विशाल किया, फिर छोटा करके उसके मुख में प्रवेश-निर्गम करके उसकी शर्त पूरी की। फिर सिंहिका नामक छाया-पकड़ने वाली राक्षसी का वध किया। इस पूरे मार्ग में उनकी गति, बुद्धि और संयम तीनों की परीक्षा हुई।
20. दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥#
अर्थ: संसार में जितने भी कठिन और असंभव से लगने वाले कार्य हैं, आपकी कृपा मिल जाने पर वे सब सरल हो जाते हैं। भक्त की कोई भी बड़ी समस्या हो, आपके अनुग्रह से आसानी से सुलझ जाती है।
21. राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥#
अर्थ: आप श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं, उनके दरबार के मुख्य द्वारपाल। आपकी अनुमति के बिना कोई भी भक्त वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। अर्थात् जो भी राम तक पहुँचना चाहता है, उसे पहले हनुमानजी को प्रसन्न करना होता है।
22. सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥#

अर्थ: जो आपकी शरण में आ जाता है, उसे सभी प्रकार के सुख सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। जब आप स्वयं रक्षक हैं, तो फिर किसी का भय नहीं रहता; न भूत का, न शत्रु का, न विपत्ति का।
23. आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक ते काँपै॥#
अर्थ: आपके तेज और शक्ति को सँभालने वाले केवल आप ही हैं; कोई दूसरा उसे धारण नहीं कर सकता। आपकी एक ललकार (हाँक) से तीनों लोक काँप उठते हैं। आपकी हुंकार ही शत्रुओं के नाश के लिए पर्याप्त है।
24. भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥#
अर्थ: जब कोई ‘महावीर हनुमान’ का नाम लेता है, तो भूत, प्रेत, पिशाच आदि नकारात्मक (negative energies) शक्तियाँ उसके पास नहीं फटकतीं। इसीलिए परंपरा में हनुमान-स्मरण को भय दूर करने का उपाय कहा गया है।
25. नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥#
अर्थ: जो भी निरंतर वीर हनुमानजी का नाम जपता है, उसके रोग नष्ट हो जाते हैं और शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं। पारंपरिक दृष्टि से हनुमान-जप को रोग-नाशक माना गया है।
26. संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥#

अर्थ: जो व्यक्ति मन से, कर्म से और वचन से, तीनों प्रकार से आप में ध्यान लगाता है, उसे हनुमानजी हर संकट से मुक्त कर देते हैं। अर्थात् सच्ची भक्ति तब होती है, जब सोच, आचरण और बोली तीनों में प्रभु का स्मरण बना रहे।
27. सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥#
अर्थ: तपस्वी राजा श्रीराम सबसे ऊपर हैं; वे सभी के स्वामी हैं। उन्हीं के सारे कार्यों को आपने सँवारा और पूरा किया है। चाहे सीता-खोज हो, लंका-दहन हो, या संजीवनी लाना, हर कार्य में आपकी भूमिका निर्णायक थी।
28. और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥#
अर्थ: इसके अतिरिक्त जो कोई अपनी कामना या मनोकामना लेकर आपके सामने आता है, उसे जीवन में अपार फल की प्राप्ति होती है। सच्चे मन से की गई कोई भी प्रार्थना आप पूरी कर देते हैं।
29. चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥#
अर्थ: सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग, चारों युगों में आपका प्रताप विद्यमान है। आप प्रसिद्ध हैं, और समस्त संसार में उजाला फैलाने वाले हैं। परंपरा मानती है कि आप अजर-अमर हैं और कलियुग में भी सशरीर विद्यमान हैं।
30. साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥#
अर्थ: आप साधु-संतों और धर्मपरायण लोगों के रक्षक हैं। आप असुरों का, अर्थात् अधर्मी प्रवृत्तियों का, नाश करने वाले हैं; और श्रीराम के परम प्रिय (दुलारे) भक्त हैं। जहाँ धर्म है, वहाँ आप हैं; जहाँ अधर्म है, वहाँ आपकी ललकार है।
31. अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥#
अर्थ: आप आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दाता हैं। ऐसा वरदान आपको स्वयं माँ जानकी (सीता) ने अशोक वाटिका में दिया था, जिसके बल पर आप भक्तों को भी ये सिद्धियाँ दे सकते हैं।
background story: अशोक वाटिका में जब हनुमानजी ने माता सीता को श्रीराम का संदेश और अँगूठी सौंपी, और उनकी पीड़ा में सहभागी बने, तब सीता ने प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान दिया कि वे भक्तों को अष्ट सिद्धि और नव निधि देने में समर्थ होंगे।
अष्ट सिद्धियाँ हैं: अणिमा (अत्यंत सूक्ष्म हो जाना), महिमा (विशाल हो जाना), गरिमा (अत्यंत भारी हो जाना), लघिमा (पंख-सा हल्का हो जाना), प्राप्ति (किसी भी वस्तु तक पहुँच पाना), प्राकाम्य (इच्छित को सिद्ध कर लेना), ईशित्व (प्रकृति पर अधिकार), और वशित्व (जीव-मात्र को वश में कर पाना)।
नव निधियाँ कुबेर के पास मानी गई नौ प्रकार की दिव्य संपदाएँ हैं। इनका विवरण इस प्रकार है:
1. पद्म निधि – इसके स्वामी का स्वभाव धार्मिक, परोपकारी और दानशील होता है। इस निधि से प्राप्त सम्पत्ति पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है और धर्मार्थ कार्यों में लगाई जाती है। पद्मनिधि का स्वामी सोने-चाँदी का संग्रह करता है, परन्तु उसका उपयोग सत्कार्यों में करता है। यह सबसे श्रेष्ठ निधियों में गिनी जाती है।
2. महापद्म निधि – इसमें सम्पत्ति और भी अधिक होती है और यह भी सात्त्विक प्रकृति की है। यह अक्षय (कभी न समाप्त होने वाली) होती है। इसके प्रभाव से व्यक्ति में उदारता, विद्या-प्रेम और आध्यात्मिक प्रवृत्ति आती है।
3. शंख निधि – इसका स्वामी स्वयं भोग-विलास करता है, परन्तु दूसरों को देने में कंजूसी करता है। सम्पत्ति केवल एक पीढ़ी तक रहती है, अगली पीढ़ी में automatically क्षीण हो जाती है। शंख निधि का स्वामी वैभवशाली जीवन जीता है किन्तु उसकी दानवृत्ति सीमित होती है।
4. मकर निधि – मकर (मगरमच्छ) के नाम पर है। इसका स्वामी अस्त्र-शस्त्र संग्रह करता है, सैन्य-शक्ति बढ़ाता है, और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। यह निधि क्षत्रिय-वृत्ति (योद्धा-स्वभाव) से जुड़ी है, सत्ता, प्रभुत्व (dominance), और रक्षा-सामर्थ्य इसके लक्षण हैं।
5. कच्छप निधि – जैसे कछुआ अपने अंगों को खोल के भीतर छिपा लेता है, वैसे ही इस निधि का स्वामी अपनी सम्पत्ति को छिपाकर रखता है। यह तामसिक प्रकृति की निधि है। ऐसा व्यक्ति न स्वयं भोगता है, न दूसरों को देता है, केवल संचय करता रहता है। यह कृपणता (कंजूसी) का प्रतीक मानी जाती है।
6. मुकुन्द निधि – “मुकुन्द” विष्णु का एक नाम है जिसका अर्थ है “मुक्ति देने वाला।” इस निधि का स्वामी राज्य-शासन, राजनीति, और सत्ता में कुशल होता है। यह निधि शासकीय वैभव और राजकीय ऐश्वर्य से जुड़ी है। इसे संगीत, कला, और भोग-विलास से भी जोड़ा गया है।
7. कुन्द निधि – कुन्द (चमेली जैसा एक श्वेत पुष्प) के नाम पर। इस निधि का स्वामी सात्त्विक परन्तु संसारी होता है, सम्पत्ति का उपभोग करता है, परिवार-कुटुम्ब को भी देता है, परन्तु उसकी दृष्टि अपने निकट के लोगों तक सीमित रहती है। कुछ पुराणों में इसके स्थान पर “नन्द निधि” का नाम भी मिलता है।
8. नील निधि – यह भी तामसिक प्रकृति की निधि है। इसका स्वामी बाहर से वैभवशाली दिखता है, परन्तु भीतर से उसका चरित्र सन्देहास्पद होता है। सम्पत्ति केवल तीन पीढ़ियों तक टिकती है।
9. खर्व निधि – “खर्व” का अर्थ है “बौना” या “छोटा।” यह निधियों में सबसे छोटी और सबसे अधिक तामसिक मानी गई है। इसका स्वामी मिश्रित धन-सम्पदा (सोना, चाँदी, अन्न, पशु आदि) रखता है परन्तु उसमें क्रोध, कृपणता, और अहंकार का प्रभाव अधिक होता है। यह सम्पत्ति अस्थायी होती है।
32. राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥#
अर्थ: राम-भक्ति रूपी अमृत (रसायन) आपके ही पास है। आप सदा श्रीराम के दास बनकर रहना पसंद करते हैं। ‘दास’ होना आपके लिए सबसे बड़ा पद है; यह भक्ति का सर्वोच्च भाव है।
33. तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥#
अर्थ: आपका भजन करने से भक्त स्वयं श्रीराम को प्राप्त कर लेता है। जन्म-जन्मांतर के दुख, पाप और संताप भूल जाते हैं। अर्थात् हनुमान-भक्ति राम तक पहुँचने का सुगम मार्ग है।
34. अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥#
अर्थ: आपके उपासक को अंत समय में रघुवर (श्रीराम) के धाम, अर्थात् साकेत या बैकुंठ, की प्राप्ति होती है। और यदि वह पुनर्जन्म लेता भी है, तो वह ‘हरि-भक्त’ के रूप में ही जाना जाता है; अर्थात् अगले जन्म में भी भक्ति की परंपरा बनी रहती है।
35. और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥#

अर्थ: भक्त को किसी अन्य देवता को अपने मन में धारण करने की आवश्यकता नहीं रहती। केवल हनुमानजी की सेवा-भक्ति से सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं। हनुमान-सेवा में सभी देवताओं की कृपा समाहित है, क्योंकि वे राम के परम भक्त हैं।
36. संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥#
अर्थ: जो भी बलवान वीर हनुमानजी का सच्चे मन से स्मरण करता है, उसके सारे संकट कट जाते हैं और सभी पीड़ाएँ मिट जाती हैं। यह पंक्ति यह बात फिर से दोहराती है कि हनुमान-नाम स्वयं में एक सुरक्षा है।
37. जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥#
अर्थ: हे स्वामी हनुमानजी, आपकी तीन बार जय हो, तन-मन-आत्मा तीनों से। जैसे एक गुरु अपने शिष्य पर करते हैं, वैसे ही आप मुझ पर अपनी कृपा बरसाइए। तुलसीदासजी यहाँ हनुमानजी को अपना गुरु-रूप मानकर पुकार रहे हैं।
38. जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥#
अर्थ: जो व्यक्ति इस चालीसा का सौ बार पाठ करता है, वह हर प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है; चाहे ये बंधन शारीरिक हों, मानसिक हों, या जेल जैसे बाहरी बंधन हों। इसके साथ उसे गहरा सुख प्राप्त होता है।
39. जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥#
अर्थ: जो इस हनुमान चालीसा को नियमपूर्वक पढ़ता है, उसे सिद्धि मिलती है। इस बात के साक्षी स्वयं गौरीपति भगवान शिव (गौरीसा) हैं। तुलसीदासजी शिव को साक्षी मानकर इस चालीसा की प्रभाविकता की पुष्टि करते हैं।
40. तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥#
अर्थ: तुलसीदास स्वयं को सदा श्रीहरि (भगवान राम) का दास कहते हैं। हे नाथ हनुमानजी, आप कृपा करके मेरे हृदय में स्थायी निवास कीजिए। यह चौपाई भक्त की मुख्य इच्छा व्यक्त करती है, कि हनुमानजी सदा उसके भीतर रहें।

॥ समापन दोहा ॥
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ: हे पवनपुत्र हनुमान, आप सभी संकटों को हरने वाले हैं, और स्वयं मंगल (शुभ) की साक्षात मूर्ति हैं। हे देवताओं के स्वामी, आप श्रीराम, लक्ष्मण और माँ सीता के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास कीजिए। इस प्रकार समापन-प्रार्थना चारों के एक साथ हृदय में वास का भाव व्यक्त करती है।
॥ बोलो बजरंग बली की जय ॥

Appendix for Good Boys and Girls that want to know more
निम्नलिखित खंड उन पाठकों (madam Shelpa ji) के लिए हैं जो हनुमान चालीसा की पृष्ठभूमि, ऐतिहासिक सन्दर्भ, और गहरे अर्थों में रुचि रखते हैं।
हनुमान चालीसा के गूढ़ शब्द
शाब्दिक अर्थ, आध्यात्मिक रहस्य, और वैज्ञानिक दृष्टि
गोस्वामी तुलसीदास की हनुमान चालीसा केवल एक भक्ति-स्तुति नहीं है। इसकी चालीस चौपाइयों में ऐसे शब्द और अवधारणाएँ छिपी हैं जो वैदिक विज्ञान, योग दर्शन, और आधुनिक भौतिकी के बीच एक अनोखा पुल बनाती हैं।
1 अष्ट सिद्धि (Ashta Siddhi)
शाब्दिक अर्थ
“अष्ट” का अर्थ है आठ, और “सिद्धि” का अर्थ है वह शक्ति जो साधना से प्राप्त हो। पतंजलि के योगसूत्र (विभूतिपाद, 3.45) में इन आठ सिद्धियों का वर्णन है:
- अणिमा: शरीर को अणु जितना सूक्ष्म कर लेना।
- महिमा: शरीर को असीमित विशाल कर लेना।
- गरिमा: स्वयं को अत्यन्त भारी बना लेना, जिसे कोई हिला न सके।
- लघिमा: स्वयं को भारहीन बना लेना, हवा से भी हल्का।
- प्राप्ति: किसी भी वस्तु या स्थान तक पहुँचने की क्षमता।
- प्राकाम्य: किसी भी इच्छा को सत्य कर लेने की शक्ति।
- ईशित्व: सृष्टि के तत्वों पर प्रभुत्व, स्वामित्व।
- वशित्व: किसी भी प्राणी या तत्व को अपने वश में करने की क्षमता।
आध्यात्मिक अर्थ
ये सिद्धियाँ केवल जादू या चमत्कार नहीं हैं। योग दर्शन में ये चेतना की अवस्थाएँ हैं। जब साधक का मन पूर्णतः शान्त और केन्द्रित हो जाता है (पतंजलि का “संयम”), तब ये क्षमताएँ स्वाभाविक रूप से प्रकट होती हैं। लेकिन पतंजलि स्वयं चेतावनी देते हैं (योगसूत्र 3.37): ये सिद्धियाँ समाधि में बाधक हैं, अन्तिम लक्ष्य नहीं।
हनुमान जी का सन्देश यह है कि उन्होंने इन सारी सिद्धियों को प्राप्त करके भी कभी अपने लिए प्रयोग नहीं किया। सब कुछ राम-सेवा में अर्पित कर दिया। यही वास्तविक सिद्धि है: शक्ति का अनासक्त उपयोग।
वैज्ञानिक दृष्टि
अणिमा और महिमा: Quantum field theory (Weinberg, 1995) के अनुसार कण (particle) तरंग (wave) भी है। एक electron एक बिन्दु भी है और एक probability cloud भी। यही अणिमा-महिमा का वैज्ञानिक रूपक है: एक ही सत्ता सूक्ष्मतम भी है और विशालतम भी।
लघिमा और गरिमा: Higgs Field (Higgs, 1964) की खोज ने दिखाया कि mass एक intrinsic गुण नहीं, बल्कि एक field के साथ interaction का परिणाम है।
प्राप्ति और प्राकाम्य: Quantum entanglement (Bell, 1964; Aspect et al., 1982) में दो कण दूरी की सीमा के बिना तुरन्त एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। Einstein ने इसे “spooky action at a distance” कहा था।

2 नव निधि (Nav Nidhi)
शाब्दिक अर्थ
“नव” का अर्थ है नौ, “निधि” का अर्थ है खज़ाना। पुराणों में ये नौ निधियाँ कुबेर की सम्पत्ति मानी गयी हैं:
- पद्म: कमल, ज्ञान और शुद्धता।
- महापद्म: विशाल कमल, असीमित सम्पत्ति।
- शंख: यश और कीर्ति।
- मकर: समृद्धि और शक्ति।
- कच्छप: स्थिरता और दीर्घायु।
- मुकुन्द: आनन्द और मुक्ति।
- नन्द: प्रसन्नता और पारिवारिक सुख।
- नील: सौभाग्य और रक्षा।
- खर्व: अपार धन।
आध्यात्मिक अर्थ
तुलसीदास कहते हैं हनुमान इन सबके “दाता” हैं, “भोक्ता” नहीं। सीता माता ने यह वरदान दिया क्योंकि हनुमान ने बिना माँगे सेवा की। यही लक्ष्मी का शाश्वत सिद्धान्त है: धन उसके पास टिकता है जो उसे बाँटता है।
वैज्ञानिक दृष्टि
Neuroscience में generosity का अध्ययन दिखाता है कि देने की क्रिया brain के reward center को सक्रिय करती है (Harbaugh et al., Science, 2007)। Seligman का PERMA model (2011) मानव कल्याण के जिन पाँच स्तम्भों को बताता है, नव निधि उसका अधिक विस्तृत संस्करण है।

3 अहिरावण (Ahiravana)
हनुमान चालीसा में प्रत्यक्ष नाम नहीं है, परन्तु “भीम रूप धरि असुर सँहारे” और पाताल-लोक के सन्दर्भ इस प्रसंग की ओर संकेत करते हैं। कथा कृत्तिवासी रामायण में विस्तार से आती है।
शाब्दिक अर्थ
“अहि” = सर्प, “रावण” = भयंकर गर्जना करने वाला। अहिरावण पाताल-लोक का शासक था। उसने विभीषण का रूप धारण करके राम और लक्ष्मण का अपहरण किया। हनुमान ने पाताल में प्रवेश किया, अपने पुत्र मकरध्वज का सामना किया, और पंचमुखी रूप धारण करके पाँच दीपक एक साथ बुझाकर अहिरावण का वध किया।
आध्यात्मिक अर्थ
“पाताल” वह अचेतन मन है जहाँ सबसे गहरे भय और संस्कार छिपे हैं। पाँच दीपक पाँच इन्द्रियों का प्रतीक हैं। पंचमुखी रूप का अर्थ है पाँचों इन्द्रियों पर एक साथ विजय।
वैज्ञानिक दृष्टि
Carl Jung का “Shadow” सिद्धान्त (Aion, 1951) कहता है कि अचेतन मन में एक “shadow self” रहता है। अहिरावण इसी shadow self है। Meditation अध्ययनों (Hölzel et al., 2011) से पता चला है कि नियमित ध्यान amygdala (भय का केन्द्र) को शान्त करता है और prefrontal cortex (विवेक) को सुदृढ़ करता है। यह भय पर विवेक की विजय है।

4 शत बार (Shat Baar)
शाब्दिक अर्थ
“शत” = सौ, “बार” = बार। जो सौ बार पढ़े, वह बन्धनों से मुक्त हो जाएगा और महासुख प्राप्त करेगा। गौरीश (शिव) इसके साक्षी हैं।
आध्यात्मिक अर्थ
“बन्दि” केवल शारीरिक कैद नहीं, मन के बन्धन हैं: भय, क्रोध, लोभ, मोह। “महासुख” उपनिषदों का “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तैत्तिरीय उपनिषद् 3.6) है। शिव को साक्षी बताना इस प्रतिज्ञा को सृष्टि के मूल सिद्धान्त जितना अटल बनाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि
Neuroplasticity: Hebb’s Law (1949): “Neurons that fire together, wire together.” पुनरावृत्ति neural pathways को मजबूत करती है।
Relaxation Response: Benson (Harvard, 1975) ने दिखाया कि repetitive prayer से cortisol, heart rate, और blood pressure कम होते हैं।
Autonomic Rhythms: Bernardi et al. (BMJ, 2001) ने दिखाया कि मन्त्र-जप श्वास को ~6 चक्र/मिनट तक धीमा करता है, जो baroreflex sensitivity के लिए आदर्श है।
सौ बार पाठ में लगभग 8-10 घण्टे लगते हैं। इतने लम्बे सत्र में मस्तिष्क की अवस्था मौलिक रूप से बदल जाती है।

5 “युग सहस्र योजन पर भानु”
शाब्दिक अर्थ
सूर्य “युग सहस्र योजन” की दूरी पर है, और बाल हनुमान ने उसे मीठा फल समझकर निगल लिया। इसमें एक गणितीय पहेली छिपी है:
= 15,36,00,000 किमी (153.6 million km)
वास्तविक दूरी: 14,96,00,000 किमी (149.6 million km)
अन्तर: केवल ~2.7%
(टिप्पणी: “योजन” की लम्बाई पर विद्वानों में मतभेद है। गणना “योजन” के मान पर निर्भर करती है।)
आध्यात्मिक अर्थ
बालक का सूर्य को फल समझना अद्वैत वेदान्त का सार है: जब अहंकार शिशु जैसा निर्मल हो, तो ब्रह्म (परम सत्य) दूर नहीं, हाथ की पहुँच में है।
वैज्ञानिक दृष्टि
Copernicus ने 1543 में heliocentric model प्रस्तुत किया, और Cassini ने 1672 में parallax विधि से सूर्य की दूरी का पहला reasonable अनुमान लगाया।
6 “राम रसायन तुम्हरे पासा”
शाब्दिक अर्थ
“रसायन” = रस (सार) से बना अमृत (elixir)। राम-नाम का रसायन हनुमान के पास है।
आध्यात्मिक अर्थ
यह शब्द तीन परम्पराओं को छूता है। आयुर्वेद में रसायन = कायाकल्प विज्ञान (चरक संहिता)। नाथ सम्प्रदाय में रसायन = आन्तरिक कीमियागरी (internal alchemy), स्थूल चेतना का सूक्ष्म में रूपान्तरण। भक्ति परम्परा में “राम रसायन” = राम-नाम स्वयं वह catalytic agent है जो चेतना बदलता है। यह बाहरी औषधि नहीं, ध्वनि-ऊर्जा है।
वैज्ञानिक दृष्टि
Psychoneuroimmunology दिखाता है कि मानसिक अवस्थाएँ immune system को प्रभावित करती हैं (Ader, 2007)। ध्यान से telomerase enzyme की सक्रियता बढ़ती है, जो कोशिकाओं की आयु बढ़ाती है (Jacobs et al., Psychoneuroendocrinology, 2011)। चेतना की अवस्था शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित करती है। यही आधुनिक “रसायन” है।

7 “सूक्ष्म रूप / विकट रूप”
शाब्दिक अर्थ
सूक्ष्म (अत्यन्त छोटा) रूप धारण करके सीता से मिले। विकट (विशाल, भयंकर) रूप धारण करके लंका जलायी।
आध्यात्मिक अर्थ
योग के तीन शरीरों का encoding: सूक्ष्म रूप = सूक्ष्म शरीर (प्राणमय/मनोमय कोश) में कार्य करना, अशोक वाटिका में दो आत्माओं का सूक्ष्म-स्तरीय संवाद। विकट रूप = स्थूल शरीर का चरम विस्तार, भौतिक संसार में शक्ति-प्रदर्शन। क्रिया साधक के लिए सिद्धान्त: प्रत्याहार में भीतर, सूक्ष्म; कर्म में बाहर, विराट।
वैज्ञानिक दृष्टि
Wave-particle duality (de Broglie, 1924): एक ही electron कभी बिन्दु (particle, सूक्ष्म) है, कभी तरंग (wave, विस्तृत)। Copenhagen interpretation (Bohr, 1927): प्रेक्षक (observer) तय करता है कि कण किस रूप में प्रकट होगा। हनुमान का रूप-परिवर्तन और quantum state-collapse एक ही सिद्धान्त के दो भाषाओं में वर्णन हैं।

8 “चारों जुग परताप तुम्हारा”
शाब्दिक अर्थ
चारों युगों (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग) में हनुमान का प्रताप व्याप्त है।
आध्यात्मिक अर्थ
हनुमान “चिरंजीवी” (अमर) हैं, काल (time) से परे। श्री युक्तेश्वर गिरि (The Holy Science, 1894) ने युग-चक्र को 24,000 वर्ष के precession cycle से जोड़ा, जिसमें मानव चेतना सतयुग और कलियुग के बीच दोलन करती है। हनुमान का “चारों जुग” में होना = उनकी चेतना इस दोलन से अप्रभावित है, सदैव सतयुग-स्तरीय।
वैज्ञानिक दृष्टि
Precession of equinoxes (अयनचलन) एक सत्यापित खगोलीय घटना है। पृथ्वी की धुरी ~25,772 वर्षों में एक पूर्ण चक्र पूरा करती है (Hipparchus, ~130 BCE; NASA Earth Fact Sheet)। श्री युक्तेश्वर का 24,000 वर्ष का अनुमान इसके निकट है।
9 “भूत पिशाच निकट नहीं आवै”
शाब्दिक अर्थ
हनुमान का नाम सुनने पर भूत और पिशाच निकट नहीं आते।
आध्यात्मिक अर्थ
सांख्य दर्शन में “भूत” = “जो हो चुका है” (past), पंच महाभूत, भौतिक अस्तित्व का जाल। “पिशाच” = “पिशित-आश” = भौतिक सुखों की तृष्णा। अर्थात्: हनुमान-स्मरण से अतीत के संस्कार और भौतिक लालसाएँ निकट नहीं आतीं। यह पतंजलि के “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” (योगसूत्र 1.2) का भक्ति-भाषा में अनुवाद है।
वैज्ञानिक दृष्टि
Rumination (अतीत पर बार-बार सोचना) और craving (तीव्र लालसा) anxiety और addiction के मूल कारण हैं (Nolen-Hoeksema, 1991)। Mindfulness-Based Cognitive Therapy (MBCT) का सम्पूर्ण ढाँचा इसी पर आधारित है: वर्तमान में लौटकर भूत और पिशाच से मुक्ति (Segal, Williams & Teasdale, 2002)। हनुमान-स्मरण एक anchoring technique है।
10 “प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं”
शाब्दिक अर्थ
राम की अँगूठी (मुद्रिका) मुँह में रखकर हनुमान ने समुद्र पार किया।
आध्यात्मिक अर्थ
“मुद्रिका” (ring) = वृत्त, न आदि न अन्त, अनन्त का प्रतीक। “मुख” = वाक् (divine word) की शक्ति। अनन्त के प्रतीक को वाणी में स्थापित करना = मन्त्र-सिद्धि, जब दिव्य नाम श्वास से अभिन्न हो जाता है। “जलधि” = भवसागर। “लांघना” = मोक्ष। क्रिया योग में यही होता है जब प्राणायाम इतना स्वाभाविक हो कि हर श्वास जप बन जाए।
वैज्ञानिक दृष्टि
Benson et al. (1990) ने दिखाया कि repetitive mantra से brain का default mode network (DMN) शान्त होता है। DMN वही network है जो self-referential thinking चलाता है (“मैं कौन हूँ, मुझे क्या चाहिए”)। जब यह शान्त होता है, अहंकार का सागर क्षणभर में पार हो जाता है।

11 “बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं”
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥”
शाब्दिक अर्थ
मुझे बल, बुद्धि, और विद्या दीजिए, मेरे कष्ट और दोष हर लीजिए।
आध्यात्मिक अर्थ
ये तीन पर्यायवाची नहीं, तीन पृथक ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ हैं:
(Will Power)
(Discriminative Action)
(Knowledge)
ये त्रिपुरा सुन्दरी (श्री विद्या परम्परा) की तीन मुख्य शक्तियाँ हैं। तुलसीदास चालीसा के प्रारम्भ में ही सृजन-शक्ति के सम्पूर्ण त्रिकोण का आह्वान करते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि
Angela Duckworth (Grit, 2016) का research दिखाता है कि सफलता के तीन independent pillars/ factors हैं: grit (दृढ़ता = बल), critical thinking (विवेक = बुद्धि), और curiosity (जिज्ञासा = विद्या)। IQ अकेले पर्याप्त नहीं; बिना grit के प्रतिभा व्यर्थ है। बिना विद्या के, बल और बुद्धि दिशाहीन रहते हैं।

12 “जय जय जय हनुमान गोसाईं”
शाब्दिक अर्थ
हनुमान गोसाईं की जय! गुरुदेव की भाँति कृपा कीजिए।
आध्यात्मिक अर्थ
“गोसाईं” = गो (इन्द्रियाँ) + स्वामी = इन्द्रियों का स्वामी। नाथ परम्परा में यह वह सिद्ध पुरुष है जिसने सम्पूर्ण इन्द्रिय-निग्रह प्राप्त किया है। तुलसीदास हनुमान को देवता और पूर्ण योगी दोनों के रूप में सम्बोधित करते हैं। गीता (2.61): “तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः” (सभी इन्द्रियों को वश में करके मुझमें स्थित हो)।
वैज्ञानिक दृष्टि
Executive function (Diamond, Annual Review of Psychology, 2013) neuroscience में impulse control, delayed gratification, और self-regulation की क्षमता है। “गोस्वामी” होना executive function की चरम अवस्था है। Mischel का Marshmallow Test (1972) दिखाता है: delayed gratification = जीवन में अधिक सफलता। यह “गोस्वामित्व” का सरलतम प्रयोग है।
13 “होय सिद्धि साखी गौरीसा”
शाब्दिक अर्थ
जो यह चालीसा पढ़ेगा, उसे सिद्धि प्राप्त होगी। गौरीसा (शिव) इसके साक्षी हैं।
आध्यात्मिक अर्थ
यहाँ अद्वैत छिपा है। गौरीसा = शिव। हनुमान = शिव के अवतार (रुद्रावतार)। तो जो वचन दे रहा है, जो पूरा करेगा, और जो साक्षी है, तीनों एक ही चेतना हैं। शंकराचार्य (विवेकचूड़ामणि, 254): “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।” एक भक्ति-दोहे में अद्वैत का सम्पूर्ण सार।
वैज्ञानिक दृष्टि
Quantum mechanics में observer effect: measurement करने वाला, प्रक्रिया, और जो measure हो रहा है, तीनों अविभाज्य हैं। John Wheeler का “participatory universe” (1990): प्रेक्षक ब्रह्माण्ड से पृथक नहीं, उसका सक्रिय भागीदार है। यह “साखी गौरीसा” का भौतिकी संस्करण है: देखने वाला, दिखने वाला, और देखने की क्रिया एक ही हैं।

पवनपुत्र: पवन कौन हैं, और हनुमान “पवनपुत्र” क्यों कहलाते हैं?
“पवनपुत्र हनुमान” चालीसा की दूसरी चौपाई में ही आ जाता है। सामान्य समझ यह होती है कि हनुमानजी वायु देवता के पुत्र हैं, जैसे हवा, आँधी, बयार। लेकिन वैदिक और उपनिषदीय साहित्य में “वायु” या “पवन” शब्द का अर्थ इतना सीमित नहीं है।

पवन की तीन परतें (layered meanings)
भारतीय परम्परा में “पवन” या “वायु” एक साथ तीन स्तरों पर चलता है:
- भौतिक पवन: (wind or air) वह हवा जो हम श्वास में लेते हैं, जो पेड़ों को हिलाती है, जो मौसम बनाती है।
- देवता पवन / वायु: ऋग्वेद के प्रमुख देवताओं में से एक, जिनका आह्वान सोम-यज्ञ में सबसे पहले किया जाता है। मरुत् इनके पुत्र-दल माने गये हैं। यम, अग्नि, वरुण के साथ वायु दिशा-पालकों में भी गिने जाते हैं (उत्तर-पश्चिम के अधिष्ठाता)। इनका वाहन मृग और ध्वज सिंह का बताया जाता है।
- सूत्रात्मन् पवन: उपनिषदीय परिभाषा, जिसमें पवन वह अदृश्य तत्व है जो सारी सृष्टि को एक सूत्र में पिरोता है। इसी अर्थ में पवन केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक ब्रह्माण्डीय तत्व का नाम भी है।
शास्त्रीय आधार
बृहदारण्यक उपनिषद् (3.7.2) में वायु को “सूत्रात्मन्” कहा गया है, अर्थात् वह सूत्र जो समस्त सृष्टि को एक में पिरोये हुए है। यह वह तत्व है जो सब में व्याप्त है, सबको जोड़ता है, पर स्वयं दिखता नहीं। यह सामान्य हवा का वर्णन नहीं, एक सर्वव्यापी ब्रह्माण्डीय शक्ति का वर्णन है।
तैत्तिरीय उपनिषद् (2.3) में कहा गया है कि प्राण से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि। यह क्रम भौतिक विज्ञान के “ऊर्जा से पदार्थ” (energy to matter) सिद्धान्त के निकट बैठता है।
प्रश्नोपनिषद् (2.2) में प्राण-वायु को केवल शरीर में नहीं, समूचे ब्रह्माण्ड में व्याप्त बताया गया है: “प्राणो ह वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च।” means प्राण ही सबसे पहला है और सबसे श्रेष्ठ भी।
विज्ञान से समानता: विद्युत-चुम्बकीय तरंग
Do not simply think of Hanuman as the son of Wind or Air! In his context, Pavan means waves (of what? read on).
1865 में James Clerk Maxwell ने विद्युत-चुम्बकीय तरंगों (electromagnetic waves) का समीकरणीय सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इन तरंगों के चार गुण “पवन” की उपनिषदीय परिभाषा के आश्चर्यजनक रूप से निकट बैठते हैं।
(2) अदृश्य विस्तार – इनका spectrum अत्यन्त विशाल है: रेडियो तरंगों से लेकर गामा किरणों तक। दृश्य प्रकाश इस विस्तार का केवल एक छोटा-सा टुकड़ा है। अधिकांश विद्युत-चुम्बकीय तरंगें हमारी आँख को नहीं दिखतीं, ठीक वैसे जैसे वैदिक पवन दिखता नहीं, पर सब कुछ उसी से जुड़ा है।
(3) ऊर्जा और सूचना का संवहन – तारों का प्रकाश, ऊष्मा, रेडियो संकेत, wifi, मोबाइल सिग्नल, सब इन्हीं तरंगों से चलते हैं। यह सूत्रात्मन् की भूमिका से सीधा मेल खाता है: वह अदृश्य धागा जो ब्रह्माण्ड को बाँधे हुए है।
(4) द्वैत-स्वरूप – Einstein ने 1905 में photoelectric effect के द्वारा दिखाया कि प्रकाश एक साथ तरंग भी है और कण भी (wave-particle duality)। यह भौतिकी का द्वैत-अद्वैत है, जो हनुमानजी की सूक्ष्म-और-विकट-रूप वाली लीला से भी विचित्र रूप से मेल खाता है।
योग और क्रिया की दृष्टि
क्रिया योग में जिसे “प्राण वायु” कहा जाता है, वह फेफड़ों की हवा (oxygen, nitrogen) नहीं है। प्राण वह सूक्ष्म Energy (electric)-धारा है जो श्वास के साथ चलती तो है, पर श्वास स्वयं नहीं है। जब क्रिया-साधना में मेरुदण्ड (spine) में ऊर्जा का प्रवाह होता है और चक्रों का जागरण होता है, तो यह वायुगतिकी (aerodynamics) नहीं, ऊर्जा-विज्ञान है।
हनुमान-लीलाओं की नई व्याख्या
यदि “पवन” का अर्थ इस ब्रह्माण्डीय विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा (Electromagnetism) से भी जुड़ता है, तो हनुमानजी की पौराणिक लीलाएँ एक नई दृष्टि से पढ़ी जा सकती हैं:
- अणिमा सिद्धि (अणु जितना छोटा होना): विद्युत-चुम्बकीय तरंगों की तरंगदैर्ध्य (wavelength) अणु के स्तर तक सूक्ष्म हो सकती है, जैसे X-ray या गामा-किरणें।
- महिमा सिद्धि (विराट रूप): रेडियो तरंगों की तरंगदैर्ध्य कई किलोमीटर तक लम्बी होती है।
- प्रकाश की गति से यात्रा: समुद्र-लाँघना, हिमालय से लंका तक पर्वत उठा लाना, लंका से सूर्य तक की छलाँग; एक ऊर्जा-माध्यम के लिए ये गतियाँ अस्वाभाविक नहीं।
- पर्वत उठाकर ले जाना: द्रव्यमान-ऊर्जा समकक्षता (E=mc²) का पौराणिक चित्रण।
यह कहना कि पौराणिक वर्णन = विज्ञान, सही नहीं है। परन्तु यह देखना कि वही प्रकृति के तथ्य, जिन्हें आधुनिक भौतिकी ने समीकरणों में लिखा, उन्हें ऋषियों ने रूपक और भक्ति-काव्य में पिरोकर बचाए रखा, एक सम्मानपूर्ण पाठ है।
निष्कर्ष: “पवनपुत्र” होने का भाव
इस eleborate level पर “पवनपुत्र” हनुमानजी वह मूर्त स्वरूप हैं, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि को जोड़ने वाली प्राण-ऊर्जा भक्ति, बल, और ज्ञान के रूप में प्रकट होती है। वे केवल “वायु के पुत्र” नहीं, बल्कि “प्राण के पुत्र” हैं, और प्राण (Life Force) ही वह है जो ब्रह्माण्ड का सूत्र है।
Summary
अष्ट सिद्धि बताती है कि मानव चेतना की क्षमता असीमित है।
नव निधि कहती है कि सच्ची सम्पत्ति देने में है, रखने में नहीं।
अहिरावण सिखाता है कि सबसे बड़ा शत्रु भीतर के अंधकार में छिपा है।
शत बार बताता है कि पुनरावृत्ति परिवर्तन की सबसे प्राचीन और सबसे वैज्ञानिक विधि है।
इन्हीं सूत्रों को आगे “गुप्त रहस्य” खंड विस्तार देता है: युग-सहस्र-योजन की गणितीय पहेली, राम-रसायन का आयुर्वेदिक-तांत्रिक आयाम, सूक्ष्म और विकट रूप में quantum duality की प्रतिध्वनि, और “गौरीसा” की साक्ष्य-भाषा में अद्वैत वेदान्त का सार।
अंत में “पवनपुत्र” खंड दिखाता है कि हनुमानजी की पहचान ही ब्रह्माण्डीय पवन-तत्व से जुड़ी है; वे भौतिक वायु के नहीं, उपनिषदीय सूत्रात्मन् और आधुनिक विज्ञान की विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा के पुत्र हैं, जिसमें माधवाचार्य की परम्परा ने त्रेता-द्वापर-कलियुग का एक सजीव वंश-क्रम भी पढ़ा।
हनुमान चालीसा एक बहुस्तरीय ग्रन्थ है। एक स्तर पर बच्चों की कहानी: बन्दर ने सूरज खाया, समुद्र कूदा, राक्षस मारे। दूसरे स्तर पर योग-शास्त्र का सारांश: इन्द्रिय-निग्रह, प्राणायाम, मन्त्र-सिद्धि। तीसरे स्तर पर ब्रह्माण्ड-विज्ञान: सूर्य की दूरी, युग-चक्र, चेतना की तरंग-प्रकृति।
तुलसीदास की प्रतिभा यह थी कि उन्होंने इन सभी स्तरों को एक ही रचना में इस प्रकार बुना कि एक अनपढ़ ग्रामीण और एक वेदान्ती विद्वान दोनों को अपनी-अपनी गहराई मिल सके।
यही सच्ची “सिद्धि” है, और गौरीश इसके साक्षी हैं।
हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा अवधी (अवध यानी लखनऊ) भाषा में रचित एक छोटा स्तोत्र है। इसकी बनावट सीधी है: शुरुआत में दो दोहे, फिर 40 चौपाइयाँ, और अंत में एक समापन दोहा। ‘चालीसा’ शब्द इन्हीं चालीस चौपाइयों से बना है। स्तोत्र में हनुमानजी के रूप, बल, बुद्धि, राम-भक्ति, और जीवन की प्रमुख घटनाओं का क्रमवार वर्णन है। भारतीय समाज में लाखों लोग आज भी प्रतिदिन, विशेषकर मंगलवार और शनिवार को, इसका पाठ करते हैं। पाठ का सामान्य समय दस से पंद्रह मिनट के बीच होता है, जिसके कारण यह एक व्यस्त modern life में भी सहज बैठ जाता है।
इस रचना का महत्त्व केवल धार्मिक नहीं। यह मध्यकालीन उत्तर भारत की सबसे अधिक याद रखी जाने वाली कविताओं में से एक है; भाषा, छंद-योजना, और चित्रमयता की दृष्टि से यह अवधी साहित्य का एक excellent sample है।

तुलसीदास कौन थे?
गोस्वामी तुलसीदास का जन्म प्रचलित मान्यता के अनुसार सन् 1532 AD में UP के राजापुर में हुआ। उनका देहांत 1623 AD में वाराणसी के अस्सी घाट पर हुआ। यानी उन्होंने लगभग 91 वर्ष का दीर्घ जीवन जिया।
तुलसीदास संस्कृत के गंभीर विद्वान थे। परंतु उनकी Historic पहचान इस बात से बनी कि उन्होंने अपनी प्रमुख रचनाएँ अवधी और ब्रजभाषा में लिखीं, जो उस समय साधारण गाँव-देहात की लोकभाषाएँ थीं। परंपरा शास्त्रों को केवल संस्कृत में रचने की थी, और लोकभाषा को उस गरिमा के लिए अयोग्य समझा जाता था। तुलसीदास ने इस मान्यता को तोड़ा, और इसके लिए उन्हें काशी के एक वर्ग के पंडितों का कठोर विरोध भी झेलना पड़ा। उनके समर्थकों का तर्क था कि यदि सामान्य स्त्री-पुरुष भगवान की कथा सुन न सकें, तो उस कथा का प्रयोजन ही क्या।
तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ
तुलसीदासजी ने बारह से अधिक ग्रंथ रचे। इनमें सबसे प्रसिद्ध हैं:
- श्रीरामचरितमानस (सन् 1574 में अयोध्या में आरंभ), अवधी में रामकथा की सबसे लोकप्रिय प्रस्तुति।
- विनय पत्रिका, ब्रजभाषा में आत्म-निवेदन और प्रार्थना का संग्रह।
- कवितावली, ब्रजभाषा में कवित्त और सवैया छंदों में रामकथा।
- दोहावली, नीति और भक्ति के चुने हुए दोहे।
- गीतावली तथा कृष्ण गीतावली, गीत-शैली की रचनाएँ।
- बरवै रामायण, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, रामलला नहछू, रामाज्ञा प्रश्न, वैराग्य संदीपनी, और हनुमान बाहुक।
इनमें श्रीरामचरितमानस उनकी सबसे बड़ी कृति है और हिन्दी साहित्य के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले ग्रंथों में गिनी जाती है।

हनुमान चालीसा कब लिखी गई?
हनुमान चालीसा की रचना-तिथि का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। विद्वानों के अनुसार यह तुलसीदासजी के परिपक्व जीवन-काल में, लगभग सन् 1580 से 1610 AD के बीच, लिखी गई। उस समय उनकी आयु कहीं 50-75 वर्ष के बीच रही होगी। यह रचना श्रीरामचरितमानस के पूरा हो जाने के बाद की है; तब तक तुलसीदास एक स्थापित और बहुप्रसिद्ध कवि बन चुके थे।
मानस के प्रसार का स्तर देखना हो तो इतना समझ लेना काफ़ी है: रचना के दो-तीन दशक के भीतर ही यह ग्रंथ अयोध्या, काशी, चित्रकूट, प्रयाग और गंगा-यमुना के मैदानों में घर-घर तक पहुँच चुका था। गाँवों में सामूहिक पाठ होते थे, और रामलीला की आधुनिक परंपरा की नींव इसी पर पड़ी। सूरदास और तुलसीदास दोनों के काव्य उस समय के लोकप्रिय कीर्तन-मंडलियों का आधार बन गए थे। इसलिए जब हनुमान चालीसा रची गई, तब तुलसीदास उत्तर भारत के सबसे प्रतिष्ठित भक्त-कवि थे। उनकी कथा-प्रस्तुति में हज़ारों श्रोता उपस्थित होते थे। अकबर के दरबार के कुछ विद्वानों, विशेषकर कवि रहीम, से उनका मैत्री-भाव भी बताया जाता है।
क्यों लिखी गई?
तुलसीदासजी को मुग़ल बादशाह अकबर ने किसी विवाद के चलते कारागार में डाल दिया था। वहीं उन्होंने हनुमान चालीसा रची। तुलसीदासजी ने आम जनता को एक छोटी, सरल, कंठस्थ होने योग्य प्रार्थना देना चाहा। रामचरितमानस दस हज़ार से अधिक पंक्तियों का ग्रंथ है, जो हर किसी के लिए सुलभ नहीं था। हनुमान चालीसा मात्र तैंतालीस पंक्तियों की रचना थी, जिसे किसान, व्यापारी, बालक, स्त्री, सभी आसानी से याद कर सकते थे। यह संक्षिप्त रूप ही इसकी सफलता का प्रमुख कारण बना।











