Chapter 10: विभूति योग

Written by

in

अध्याय 10

विभूति योग

कृष्ण की विभूतियाँ
अर्जुन कहता है, ”आप अपनी विभूतियाँ बताइए।” कृष्ण लंबी सूची देते हैं, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, अक्षरों में अकार। हर श्रेणी का सर्वोत्तम मैं हूँ।
42 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 9 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥

सब वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देव-ऋषियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ, और सिद्धों में कपिल मुनि।

गीता 10.26

Chapter 10 panel 1

पाठ-संदर्भ

दसवाँ अध्याय विभूति-योग है, बयालिस श्लोक। यहाँ कृष्ण अपनी असंख्य विभूतियों की एक लम्बी सूची देते हैं, मैं हिमालय हूँ, मैं गंगा हूँ, मैं अश्वत्थ-वृक्ष हूँ, मैं अर्जुन हूँ। यह सूची एक तरह की ब्रह्मांडीय तालिका है, और भारत के भौगोलिक-सांस्कृतिक-धार्मिक भूगोल का एक शब्द-रूपी नक्शा। अड़तीसवें श्लोक का “दण्डो दमयतां अस्मि” (दमन-करने वालों में मैं दण्ड हूँ) ने बाद के नीति-शास्त्र में राज-दण्ड-व्यवस्था का दार्शनिक-आधार बनाया।

अध्याय का सार

अर्जुन को नौवें अध्याय के बाद और जिज्ञासा जागती है। वो कहता है, ‘आप जो हैं, मैं उसकी थोड़ी झलक देखना चाहता हूँ। मुझे अपनी विभूतियाँ बताइए।’

Chapter 10 panel 2

कृष्ण मानते हैं और लंबी सूची देते हैं। पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, समुद्र, सूर्य, चन्द्र, हर श्रेणी का सबसे श्रेष्ठ। ऋषियों में भृगु, अक्षरों में ‘अ’, छंदों में गायत्री।

Chapter 10 panel 3

महीनों में अगहन, ऋतुओं में वसंत। पांडवों में अर्जुन। मुनियों में व्यास। यह सूची सत्तर से ज़्यादा वस्तुओं तक जाती है।

अंत में कृष्ण कहते हैं: ‘मेरी विभूतियों का अंत नहीं। जहाँ भी कुछ ऐसा है जो आँख चुंधियाए, गहराई से प्रभावित करे, मेरी एक छोटी सी प्रकट कथा। पूरी सृष्टि का एक छोटा सा हिस्सा मेरी कुल विभूति है।’

Chapter 10 panel 4

मुख्य श्लोक

श्लोक 10.20

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
साधारण अनुवाद‘हे गुडाकेश (नींद को जीतने वाले, अर्जुन का एक नाम), मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही भूतों का आदि हूँ, मध्य हूँ, और अंत भी।’

विभूतियों की पहली घोषणा अंदर की है, बाहर की नहीं। ‘मैं आपके ही हृदय में हूँ।’

Chapter 10 panel 5

श्लोक 10.41

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम् ॥
साधारण अनुवाद‘जहाँ भी कुछ ऐश्वर्य, सौंदर्य, या तेज वाली चीज़ देखो, उसे मेरे तेज के एक अंश से उत्पन्न जानो।’

संक्षिप्त मार्ग। पूरी सूची मत याद रखो। जहाँ भी असाधारण कुछ दिखे, समझो कि वो कृष्ण की प्रकट कथा है।

Chapter 10 panel 6

श्लोक 10.42

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
साधारण अनुवाद‘या इस सब विस्तार से आपको क्या? हे अर्जुन, मैंने इस पूरी सृष्टि को अपने एक अंश से धारण कर रखा है।’

पूरा ब्रह्मांड कृष्ण के एक छोटे से हिस्से में है। उन्हें हम कितना भी जान लें, बाक़ी बहुत है।

सारएक वाक्य में: जहाँ भी कुछ बड़ा, सुंदर, या ज़बरदस्त दिखे, वो कृष्ण की एक छोटी सी झलक है। पूरा रूप तो अगले अध्याय में आएगा।