विभूति योग
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पाठ-संदर्भ
दसवाँ अध्याय विभूति-योग है, बयालिस श्लोक। यहाँ कृष्ण अपनी असंख्य विभूतियों की एक लम्बी सूची देते हैं, मैं हिमालय हूँ, मैं गंगा हूँ, मैं अश्वत्थ-वृक्ष हूँ, मैं अर्जुन हूँ। यह सूची एक तरह की ब्रह्मांडीय तालिका है, और भारत के भौगोलिक-सांस्कृतिक-धार्मिक भूगोल का एक शब्द-रूपी नक्शा। अड़तीसवें श्लोक का “दण्डो दमयतां अस्मि” (दमन-करने वालों में मैं दण्ड हूँ) ने बाद के नीति-शास्त्र में राज-दण्ड-व्यवस्था का दार्शनिक-आधार बनाया।
अध्याय का सार
अर्जुन को नौवें अध्याय के बाद और जिज्ञासा जागती है। वो कहता है, ‘आप जो हैं, मैं उसकी थोड़ी झलक देखना चाहता हूँ। मुझे अपनी विभूतियाँ बताइए।’

कृष्ण मानते हैं और लंबी सूची देते हैं। पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, समुद्र, सूर्य, चन्द्र, हर श्रेणी का सबसे श्रेष्ठ। ऋषियों में भृगु, अक्षरों में ‘अ’, छंदों में गायत्री।

महीनों में अगहन, ऋतुओं में वसंत। पांडवों में अर्जुन। मुनियों में व्यास। यह सूची सत्तर से ज़्यादा वस्तुओं तक जाती है।
अंत में कृष्ण कहते हैं: ‘मेरी विभूतियों का अंत नहीं। जहाँ भी कुछ ऐसा है जो आँख चुंधियाए, गहराई से प्रभावित करे, मेरी एक छोटी सी प्रकट कथा। पूरी सृष्टि का एक छोटा सा हिस्सा मेरी कुल विभूति है।’

मुख्य श्लोक
श्लोक 10.20
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
श्लोक 10.41
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम् ॥
संक्षिप्त मार्ग। पूरी सूची मत याद रखो। जहाँ भी असाधारण कुछ दिखे, समझो कि वो कृष्ण की प्रकट कथा है।

श्लोक 10.42
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
पूरा ब्रह्मांड कृष्ण के एक छोटे से हिस्से में है। उन्हें हम कितना भी जान लें, बाक़ी बहुत है।
विभूतियों की पहली घोषणा अंदर की है, बाहर की नहीं। ‘मैं आपके ही हृदय में हूँ।’