Chapter 9: राजविद्या-राजगुह्य योग।

Written by

in

अध्याय 9

राजविद्या राजगुह्य योग

राजसी ज्ञान
गीता का सबसे प्रिय अंश यहीं है: ”पत्ता, फूल, फल, पानी, जो भी मुझे प्रेम से देगा, मैं स्वीकार करूँगा।” और भक्ति में जात-कुल-लिंग कुछ नहीं देखा जाता।
34 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 8 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-संयुक्त भक्तों के योग-क्षेम का भार मैं उठाता हूँ।

गीता 9.22

Chapter 9 panel 1

पाठ-संदर्भ

नौवाँ अध्याय “राज-विद्या-राज-गुह्य-योग” है, चौतीस श्लोक। नाम-में-ही दो विशेषण, “राज” (श्रेष्ठ) और “गुह्य” (गुप्त)। कृष्ण कहते हैं कि वो जो ज्ञान अब बताने वाले हैं, वो “गुह्य से गुह्यतर” है। श्लोक छब्बीस की पंक्ति, “पत्रं पुष्पं फलं तोयम्” (पत्ता, फूल, फल, या जल जो भी मुझे श्रद्धा से दिया जाए), पूजा-विधि का सबसे प्रसिद्ध सूत्र-वाक्य है। चैतन्य-महाप्रभु (पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी के बंगाल) ने इस श्लोक को अपनी भक्ति-परम्परा का आधार-वाक्य बनाया।

अध्याय का सार

कृष्ण कहते हैं: ‘अब मैं आपको सबसे ऊपर का रहस्य बताता हूँ। यह राज-विद्या है, राज-गुह्य है, सबसे पवित्र, सबसे शान्ति देने वाला।’

तो रहस्य क्या है? कि वो कृष्ण सब में हैं और सब उन्हीं में हैं, मगर वो किसी से बँधे नहीं। यह ‘सर्वव्यापक मगर अनासक्त’ का विरोधाभास गीता का केंद्रीय भाव है।

Chapter 9 panel 2

इसके बाद कृष्ण भक्ति की पूरी तस्वीर देते हैं: कौन भक्त है, कौन अभक्त, और भक्ति का असली रूप क्या है। ‘पत्ता, फूल, फल, पानी, जो भी प्रेम से दिया जाए, मैं स्वीकार करूँगा।’

Chapter 9 panel 3

और अंत में सबसे सुंदर सर्व-समावेशी कथन: ‘मेरे लिए सब समान हैं, चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष, चाहे ऊँची जात का हो, चाहे नीची की। जो प्रेम से मेरे पास आए, मेरा है।’

Chapter 9 panel 4

मुख्य श्लोक

श्लोक 9.11

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
साधारण अनुवाद‘मूर्ख मेरा अपमान करते हैं, क्योंकि मैं मनुष्य-रूप में आया हूँ। वो मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते कि मैं भूतों का महान् ईश्वर हूँ।’

हम बाहर के रूप से धोखा खाते हैं। कृष्ण मनुष्य लग रहे हैं, तो भगवान कैसे होंगे? यही सोच रोकती है।

Chapter 9 panel 5

श्लोक 9.22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
साधारण अनुवाद‘जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन सदा-युक्त लोगों का योग-क्षेम (जो नहीं मिला उसका मिलना, और जो मिला उसकी रक्षा) मैं ख़ुद करता हूँ।’

गीता का सबसे आश्वासन देने वाला श्लोक। जो पूरी तरह अर्पित है, उसकी ज़िम्मेदारी कृष्ण लेते हैं।

श्लोक 9.26

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
साधारण अनुवाद‘जो भक्त मुझे प्रेम से एक पत्ता, फूल, फल, या पानी अर्पण करता है, उसका वो भक्ति-भरा प्रसाद मैं खा लेता हूँ।’

दिल का सबसे साधारण अर्पण काफ़ी है। महंगे प्रसाद की ज़रूरत नहीं। कृष्ण को मात्रा नहीं चाहिए, भाव चाहिए।

Chapter 9 panel 6

श्लोक 9.29

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
साधारण अनुवाद‘मैं सब प्राणियों में समान हूँ। मेरा कोई पसंद-नापसंद नहीं। पर जो भक्ति से मुझे भजते हैं, वो मेरे में हैं, और मैं उनके में।’

दो-तरफ़ा रिश्ता। कृष्ण किसी का पक्ष नहीं लेते, मगर जो उन्हें चुनता है, उसके साथ खड़े हो जाते हैं।

सारएक वाक्य में: भक्ति की भाषा सब समझ सकते हैं, चाहे जात-कुल कुछ भी हो। और जो भक्ति से एक पत्ता तक देगा, उसका सब कृष्ण देखेंगे।