राजविद्या राजगुह्य योग
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पाठ-संदर्भ
नौवाँ अध्याय “राज-विद्या-राज-गुह्य-योग” है, चौतीस श्लोक। नाम-में-ही दो विशेषण, “राज” (श्रेष्ठ) और “गुह्य” (गुप्त)। कृष्ण कहते हैं कि वो जो ज्ञान अब बताने वाले हैं, वो “गुह्य से गुह्यतर” है। श्लोक छब्बीस की पंक्ति, “पत्रं पुष्पं फलं तोयम्” (पत्ता, फूल, फल, या जल जो भी मुझे श्रद्धा से दिया जाए), पूजा-विधि का सबसे प्रसिद्ध सूत्र-वाक्य है। चैतन्य-महाप्रभु (पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी के बंगाल) ने इस श्लोक को अपनी भक्ति-परम्परा का आधार-वाक्य बनाया।
अध्याय का सार
कृष्ण कहते हैं: ‘अब मैं आपको सबसे ऊपर का रहस्य बताता हूँ। यह राज-विद्या है, राज-गुह्य है, सबसे पवित्र, सबसे शान्ति देने वाला।’
तो रहस्य क्या है? कि वो कृष्ण सब में हैं और सब उन्हीं में हैं, मगर वो किसी से बँधे नहीं। यह ‘सर्वव्यापक मगर अनासक्त’ का विरोधाभास गीता का केंद्रीय भाव है।

इसके बाद कृष्ण भक्ति की पूरी तस्वीर देते हैं: कौन भक्त है, कौन अभक्त, और भक्ति का असली रूप क्या है। ‘पत्ता, फूल, फल, पानी, जो भी प्रेम से दिया जाए, मैं स्वीकार करूँगा।’

और अंत में सबसे सुंदर सर्व-समावेशी कथन: ‘मेरे लिए सब समान हैं, चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष, चाहे ऊँची जात का हो, चाहे नीची की। जो प्रेम से मेरे पास आए, मेरा है।’

मुख्य श्लोक
श्लोक 9.11
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
श्लोक 9.22
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
गीता का सबसे आश्वासन देने वाला श्लोक। जो पूरी तरह अर्पित है, उसकी ज़िम्मेदारी कृष्ण लेते हैं।
श्लोक 9.26
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
दिल का सबसे साधारण अर्पण काफ़ी है। महंगे प्रसाद की ज़रूरत नहीं। कृष्ण को मात्रा नहीं चाहिए, भाव चाहिए।

श्लोक 9.29
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
दो-तरफ़ा रिश्ता। कृष्ण किसी का पक्ष नहीं लेते, मगर जो उन्हें चुनता है, उसके साथ खड़े हो जाते हैं।
हम बाहर के रूप से धोखा खाते हैं। कृष्ण मनुष्य लग रहे हैं, तो भगवान कैसे होंगे? यही सोच रोकती है।