Chapter 8: अक्षर ब्रह्म योग

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अध्याय 8

अक्षर ब्रह्म योग

अविनाशी ब्रह्म
मरते समय क्या सोचा था, अगला जन्म वही बन जाता है। तो मरते समय कृष्ण को याद रखो। यह छोटी सी बात ही असली विद्या है।
28 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

अंतकाल में मुझे ही स्मरण करते हुए जो शरीर त्याग कर जाता है, वह मेरे ही भाव को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।

गीता 8.5

Chapter 8 panel 1

पाठ-संदर्भ

आठवाँ अध्याय “अक्षर-ब्रह्म-योग” है, अट्ठाईस श्लोक। मरण-समय की प्रार्थना और अन्तिम-स्मरण का सिद्धान्त इसी अध्याय में है। श्लोक छह की पंक्ति, “अन्त-काले च माम् एव स्मरन्” (और अन्त-समय में जो मुझे स्मरण करता है), तिब्बत के बुद्धिस्ट-बार्डो-थोडोल की मरण-शिक्षा से कौतूहल-जनक रूप से मिलती है। दोनों परम्पराएँ अलग जड़ों से उठीं, मगर मरण-समय की चेतना-स्थिति पर इनका विचार आश्चर्यजनक रूप से समानांतर है।

अध्याय का सार

इस अध्याय में अर्जुन कई अध्यात्मिक शब्दों के अर्थ पूछता है: ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या? कर्म क्या? अधिभूत? अधिदैव? अधियज्ञ? और मरते समय कौन इन्हें जानता है?

Chapter 8 panel 2

कृष्ण एक-एक करके जवाब देते हैं। फिर एक मूल व्यावहारिक सबक देते हैं: ‘मरते समय जिस का चिंतन करते हैं, अगला जन्म वही बनता है।’

Chapter 8 panel 3

तो रास्ता क्या है? पूरी ज़िंदगी अभ्यास करो कि अंत में कृष्ण याद आएँ। और अगर अंत में याद आ गया, तो आगे का सब रास्ता तय।

Chapter 8 panel 4

अध्याय का अंत ‘ओम्’ की चर्चा से होता है। और स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीरों के पार जाने की तकनीक।

Chapter 8 panel 5

मुख्य श्लोक

श्लोक 8.5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
साधारण अनुवाद‘अंत-काल में जो मुझे ही याद करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वो मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं।’

मरते समय का एक थोड़ा-सा क्षण निर्णायक है। पर वो क्षण ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं आएगा, उसकी पूरी ज़िंदगी तैयारी है।

Chapter 8 panel 6

श्लोक 8.6

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
साधारण अनुवाद‘मनुष्य अंत में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वो वही पाता है। पूरी ज़िंदगी उसी भाव में जिया जो उसका अंतिम भाव हो।’

मरते समय जो याद आता है वो आधी ज़िंदगी का जोड़ है। तो रोज़ कैसा सोचा-समझा है, वो ही उस क्षण पर सामने आएगा।

सारएक वाक्य में: जैसा रोज़ सोचोगे वैसा अंत में याद आएगा, और जैसा अंत में याद आएगा वैसा अगला कदम होंगे।