ज्ञान-विज्ञान योग
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पाठ-संदर्भ
सातवाँ अध्याय “ज्ञान-विज्ञान-योग” है, तीस श्लोक। यहाँ कृष्ण अपनी विभूतियों का पहला परिचय देते हैं। श्लोक चार-पाँच में, अष्ट-धा-प्रकृति का सिद्धान्त रखा जाता है, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, और अहंकार। यह आठ-तत्त्व-दर्शन सांख्य-दर्शन के पच्चीस-तत्त्वों का एक संक्षिप्त-रूप है, और बाद के अद्वैत-दर्शन ने इसे फिर पुनर्व्यवस्थित किया। शंकराचार्य की अपनी “तत्त्व-बोध” रचना इसी आठ-तत्त्व-संरचना पर खड़ी है।
अध्याय का सार
यहाँ से गीता का दूसरा भाग शुरू होता है, जो भक्ति-योग की ओर झुकता है। अब तक कर्म और ज्ञान की बात हुई। अब कृष्ण अपनी पहचान बताना शुरू करते हैं।

वो कहते हैं: ‘मेरी दो प्रकृतियाँ हैं। एक अपरा (निचली), जिसमें पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार हैं। दूसरी परा (ऊँची), जो जीव-तत्व है। पूरी सृष्टि इन्हीं दोनों से बनी है।’

फिर वो अपनी विभूतियाँ बताते हैं: मैं जल का स्वाद हूँ, सूरज का प्रकाश, ओम् की ध्वनि, मनुष्यों में पौरुष, अग्नि में तेज, सब का बीज।
और एक ज़बरदस्त कथन: ‘हज़ारों मनुष्यों में कोई एक मुझे जानने का प्रयत्न करता है। उनमें भी, कोई एक ही मुझे सही तरह से जानता है।’

मुख्य श्लोक
श्लोक 7.7
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
श्लोक 7.16
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
चार दरवाज़े भक्ति के। दुख में आएँ, सवाल लेकर आएँ, ज़रूरत में आएँ, या ज्ञान में आएँ। चारों स्वीकार हैं।

श्लोक 7.19
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
यह बोध एक ही जन्म में आ जाए, यह दुर्लभ है। बहुत यात्राएँ करनी पड़ती हैं। अंत में पता चलता है, एक ही था सब जगह।
माला का रूपक। मणियाँ अलग-अलग दिखती हैं, मगर धागा एक। उसी तरह सब रूप अलग, उनके पीछे का तत्व एक।