कर्म योग
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पाठ-संदर्भ
तीसरा अध्याय कर्म-योग का है, तेतालिस श्लोक। दूसरे अध्याय का सैंतालिसवाँ श्लोक यहाँ विस्तार पाता है। शंकराचार्य ने इस अध्याय पर लिखा कि “कर्म-योग ज्ञान-योग का पूर्व-निर्धारित मार्ग है”। रामानुजाचार्य का ग्यारहवीं सदी का भाष्य इस अध्याय को एक अलग-कोण से उठाता है, और अष्टावक्र-वेदान्ती परम्परा बारहवीं सदी के बाद इसी पर अपनी समीक्षा लिखती है। आज भी, तिलक की ग्यारह-सौ-पन्ने की “गीता-रहस्य” टीका, जो 1915 में मांडले-कारागार में लिखी गयी, इसी अध्याय को अपना केन्द्र मानती है।
अध्याय का सार
अध्याय 2 के बाद अर्जुन में एक नया असमंजस पैदा होता है। कृष्ण ने ज्ञान की भी बात की, कर्म की भी। अर्जुन सोचता है, ‘अगर ज्ञान बेहतर है तो मुझे यह खूनी काम क्यों करना चाहिए? मुझे संन्यासी बनने दीजिए।’
कृष्ण कहते हैं, ‘यह संभव ही नहीं। कोई भी एक पल भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति ख़ुद हमें कर्म में धकेलती है। तो प्रश्न यह नहीं कि कर्म करें या नहीं, प्रश्न यह है कि कैसे करें।’

इसके बाद कृष्ण ‘यज्ञ’ के विचार को कर्म पर लागू करते हैं। यज्ञ यानी अर्पण। जब आप अपना हर काम किसी बड़े उद्देश्य को अर्पित कर देते हैं, तब वही काम बंधन नहीं, मुक्ति का साधन बन जाता है।

और अंत में एक बहुत महत्वपूर्ण सबक: ‘दूसरे के धर्म पर चलने से अपने धर्म को निभाना बेहतर है, चाहे कितना भी कठिन हो।’ यह वाक्य पूरी गीता में दो बार आता है (3.35 और 18.47)।

मुख्य श्लोक
श्लोक 3.5
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
श्लोक 3.21
स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
नेतृत्व का बुनियादी सबक। जो ऊँचे स्थान पर हैं, उनके हर कर्म का असर पड़ता है। इसलिए उत्तरदायित्व भी अधिक।
श्लोक 3.27
अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥
असली कर्ता प्रकृति है, हम बस माध्यम हैं। अहंकार जब इसे ”मैंने किया” कहता है, बंधन शुरू होता है।

श्लोक 3.35
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
दूसरे की भूमिका को कभी अपना मत बनाओ। चाहे वो भूमिका कितनी ही आकर्षक क्यों न लगे।
अकर्म असंभव है। बैठे रहना भी एक कर्म है। तो प्रश्न यह नहीं कि कर्म करें या नहीं, बल्कि यह कि कैसे करें।