कर्म संन्यास योग
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पाठ-संदर्भ
पाँचवाँ अध्याय “कर्म-संन्यास-योग” है, उनतीस श्लोक। यह सबसे छोटा अध्याय है, मगर सबसे केन्द्रित। मूल प्रश्न यह है, कर्म-त्याग और कर्म-योग में कौन-सा श्रेष्ठ है? कृष्ण का उत्तर एक तरह का विरोधाभास है, दोनों ही ले जाते हैं, मगर कर्म-योग आसान है। शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इस अध्याय को “गीता का छिपा हुआ केन्द्र” कहा।
अध्याय का सार
अर्जुन फिर पूछता है: ‘आप एक तरफ़ कर्म छोड़ने की बात करते हैं, दूसरी तरफ़ कर्म-योग की। दोनों में से कौन सा बेहतर है, साफ़ बताइए।’

कृष्ण जवाब देते हैं: ‘दोनों ही अच्छे हैं और दोनों से मुक्ति मिलती है। मगर बाहरी संन्यास से, अंदर के त्याग वाला कर्म-योगी बेहतर है। क्योंकि अंदर का त्याग, बाहर के त्याग को भी अपने अंदर समा लेता है।’

इसके बाद कृष्ण समता-दर्शन की बात करते हैं: ज्ञानी पुरुष ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते, और चांडाल, सब में एक ही चेतना देखता है। यह ‘समदर्शन’ है।
अंत में कृष्ण ब्रह्म-निर्वाण की स्थिति का वर्णन करते हैं: इन्द्रिय-विषयों से अलग, मन शान्त, ध्यान में स्थित। यह वही स्थिति है जो छठे अध्याय में और गहराई से खुलेगी।

मुख्य श्लोक
श्लोक 5.10
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
श्लोक 5.18
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
समदर्शन का प्रसिद्ध श्लोक। बाहर के रूप कुछ भी हों, भीतर एक ही चेतना है। ज्ञानी इसी एक को देखता है।

श्लोक 5.22
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
हर बाहरी सुख का एक आदि है, एक अन्त है। इस लय में फँसना ही दुख है। ज्ञानी इस लय के बाहर जाता है।
कमल-पत्र का रूपक। पानी में रहकर भी पानी नहीं छूता उसे। ज्ञानी भी संसार में रहकर संसार से बँधा नहीं।