Chapter 5 – कर्म संन्यास योग

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अध्याय 5

कर्म संन्यास योग

कर्म का संन्यास
कर्म छोड़ दें या कर्म करते रहें? कृष्ण कहते हैं: दोनों समान हैं अगर भीतर का त्याग हो। बाहरी संन्यास से असली त्याग कहीं ऊँचा है।
29 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

जो आसक्ति त्याग कर अपने सब कर्म ब्रह्म को अर्पित कर के करता है, वह पाप से वैसे ही अलिप्त रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी से।

गीता 5.10

Chapter 5 panel 1

पाठ-संदर्भ

पाँचवाँ अध्याय “कर्म-संन्यास-योग” है, उनतीस श्लोक। यह सबसे छोटा अध्याय है, मगर सबसे केन्द्रित। मूल प्रश्न यह है, कर्म-त्याग और कर्म-योग में कौन-सा श्रेष्ठ है? कृष्ण का उत्तर एक तरह का विरोधाभास है, दोनों ही ले जाते हैं, मगर कर्म-योग आसान है। शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इस अध्याय को “गीता का छिपा हुआ केन्द्र” कहा।

अध्याय का सार

अर्जुन फिर पूछता है: ‘आप एक तरफ़ कर्म छोड़ने की बात करते हैं, दूसरी तरफ़ कर्म-योग की। दोनों में से कौन सा बेहतर है, साफ़ बताइए।’

Chapter 5 panel 2

कृष्ण जवाब देते हैं: ‘दोनों ही अच्छे हैं और दोनों से मुक्ति मिलती है। मगर बाहरी संन्यास से, अंदर के त्याग वाला कर्म-योगी बेहतर है। क्योंकि अंदर का त्याग, बाहर के त्याग को भी अपने अंदर समा लेता है।’

Chapter 5 panel 3

इसके बाद कृष्ण समता-दर्शन की बात करते हैं: ज्ञानी पुरुष ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते, और चांडाल, सब में एक ही चेतना देखता है। यह ‘समदर्शन’ है।

अंत में कृष्ण ब्रह्म-निर्वाण की स्थिति का वर्णन करते हैं: इन्द्रिय-विषयों से अलग, मन शान्त, ध्यान में स्थित। यह वही स्थिति है जो छठे अध्याय में और गहराई से खुलेगी।

Chapter 5 panel 4

मुख्य श्लोक

श्लोक 5.10

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
साधारण अनुवाद‘जो अपने कर्मों को ब्रह्म में अर्पित करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वो पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता पानी से।’

कमल-पत्र का रूपक। पानी में रहकर भी पानी नहीं छूता उसे। ज्ञानी भी संसार में रहकर संसार से बँधा नहीं।

Chapter 5 panel 5

श्लोक 5.18

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
साधारण अनुवाद‘विद्या-विनय वाले ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में, और चांडाल में भी पण्डित (ज्ञानी) समान दर्शन करते हैं।’

समदर्शन का प्रसिद्ध श्लोक। बाहर के रूप कुछ भी हों, भीतर एक ही चेतना है। ज्ञानी इसी एक को देखता है।

Chapter 5 panel 6

श्लोक 5.22

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
साधारण अनुवाद‘इन्द्रिय-संस्पर्श से जो भोग पैदा होते हैं, वो दुख की ही जड़ हैं। हे कौन्तेय, उनका आदि-अन्त है। बुद्धिमान उनमें नहीं रमता।’

हर बाहरी सुख का एक आदि है, एक अन्त है। इस लय में फँसना ही दुख है। ज्ञानी इस लय के बाहर जाता है।

सारएक वाक्य में: कर्म छोड़ना आसान है, ”मेरा कर्म” छोड़ना कठिन। ज्ञानी वही जो भीतर त्याग करता है, बाहर भले काम करता रहे।