ध्यान योग
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पाठ-संदर्भ
छठा अध्याय ध्यान-योग का है, सैंतालिस श्लोक। यह योग-साधना का सबसे विस्तृत वर्णन है पूरी गीता में, और पतंजलि-योग-सूत्रों (दूसरी सदी ईसा-पूर्व के क़रीब) से इसका सीधा-संबंध है। श्लोक तेरह में, “समं काय-शिरो-ग्रीवम् धारयन्” (शरीर, सिर, और गर्दन को एक-सीध में रख कर), योग-आसन का जो वर्णन है, वो पतंजलि के “स्थिर-सुख आसनम्” की ही प्रतिध्वनि है। आधुनिक-योग-पुनरुत्थान, बीसवीं सदी के पहले दशकों में टी. कृष्णमाचार्य और उनके शिष्यों ने, इसी अध्याय को आसन-अभ्यास का शास्त्रीय-आधार बनाया।
अध्याय का सार
छठा अध्याय ‘ध्यान योग’ है। पतंजलि के योगसूत्र इसी तरह की बारीकी के साथ आते हैं, लेकिन उनसे पहले गीता ने यहाँ इस विद्या को संकलित कर दिया।
कृष्ण पहले यह स्पष्ट करते हैं कि असली संन्यास बाहर का नहीं, अंदर का है। जो अपने कर्म-फल का त्याग करता है, वही असली योगी और संन्यासी दोनों है।

फिर तकनीक: एक स्थिर जगह, स्थिर आसन, सीधी रीढ़, आधा-खुले नेत्र, मन को एक बिंदु पर केन्द्रित। न ज़्यादा खाना, न ज़्यादा सोना; न बहुत कम भी।

इस अध्याय का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है मन के बारे में। अर्जुन कहता है, ‘यह मन बहुत चंचल है, हवा को रोकने जैसा कठिन।’ कृष्ण मानते हैं, मगर कहते हैं: अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आता है।
मुख्य श्लोक
श्लोक 6.5
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
श्लोक 6.6
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
पिछले श्लोक का निष्कर्ष। मित्र और शत्रु, दोनों आपके ही अंदर हैं। दोनों एक ही जगह बैठे हैं।

श्लोक 6.19
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥
ध्यान का सबसे सुंदर रूपक। हवा-रहित दीपक की लौ बिल्कुल सीधी जलती है। ध्यानी का मन भी ऐसा ही।
श्लोक 6.34
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
अर्जुन की ईमानदार शिकायत। हर ध्यान करने वाला यही पाता है। मन एक नदी है, उल्टी दिशा में बहाना कठिन।

श्लोक 6.35
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
कृष्ण का समाधान-सूत्र। दो साधन: अभ्यास (नियमित प्रयास) और वैराग्य (आसक्ति का छूटना)। दोनों मिलकर मन को थामते हैं।
पूरी आत्म-उत्थान की परम्परा का बीज एक श्लोक में। कोई बाहर से बचाने नहीं आएगा। आप ही अपने उद्धारक हैं।