Chapter 6: ध्यानयोग

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अध्याय 6

ध्यान योग

ध्यान का योग
योग की सबसे तकनीकी परिभाषा यहाँ है। आसन कैसे लें, मन को कैसे थामें, और सबसे ज़रूरी: मन को अपना दुश्मन नहीं, दोस्त बनाएँ।
47 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

अपने आप को अपने ही द्वारा ऊपर उठाओ, अपने आप को नीचे मत गिराओ। आत्मा ही अपना मित्र है, और आत्मा ही अपना शत्रु।

गीता 6.5

Chapter 6 panel 1

पाठ-संदर्भ

छठा अध्याय ध्यान-योग का है, सैंतालिस श्लोक। यह योग-साधना का सबसे विस्तृत वर्णन है पूरी गीता में, और पतंजलि-योग-सूत्रों (दूसरी सदी ईसा-पूर्व के क़रीब) से इसका सीधा-संबंध है। श्लोक तेरह में, “समं काय-शिरो-ग्रीवम् धारयन्” (शरीर, सिर, और गर्दन को एक-सीध में रख कर), योग-आसन का जो वर्णन है, वो पतंजलि के “स्थिर-सुख आसनम्” की ही प्रतिध्वनि है। आधुनिक-योग-पुनरुत्थान, बीसवीं सदी के पहले दशकों में टी. कृष्णमाचार्य और उनके शिष्यों ने, इसी अध्याय को आसन-अभ्यास का शास्त्रीय-आधार बनाया।

अध्याय का सार

छठा अध्याय ‘ध्यान योग’ है। पतंजलि के योगसूत्र इसी तरह की बारीकी के साथ आते हैं, लेकिन उनसे पहले गीता ने यहाँ इस विद्या को संकलित कर दिया।

कृष्ण पहले यह स्पष्ट करते हैं कि असली संन्यास बाहर का नहीं, अंदर का है। जो अपने कर्म-फल का त्याग करता है, वही असली योगी और संन्यासी दोनों है।

Chapter 6 panel 2

फिर तकनीक: एक स्थिर जगह, स्थिर आसन, सीधी रीढ़, आधा-खुले नेत्र, मन को एक बिंदु पर केन्द्रित। न ज़्यादा खाना, न ज़्यादा सोना; न बहुत कम भी।

Chapter 6 panel 3

इस अध्याय का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है मन के बारे में। अर्जुन कहता है, ‘यह मन बहुत चंचल है, हवा को रोकने जैसा कठिन।’ कृष्ण मानते हैं, मगर कहते हैं: अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आता है।

मुख्य श्लोक

श्लोक 6.5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
साधारण अनुवाद‘अपने आप से अपने को ऊपर उठाना है, अपने को नीचे नहीं गिरने देना। आत्मा ही अपना मित्र है, और आत्मा ही अपना शत्रु।’

पूरी आत्म-उत्थान की परम्परा का बीज एक श्लोक में। कोई बाहर से बचाने नहीं आएगा। आप ही अपने उद्धारक हैं।

Chapter 6 panel 4

श्लोक 6.6

बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
साधारण अनुवाद‘जिसने अपने को अपने से जीत लिया, उसके लिए आत्मा ही मित्र है। और जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही आत्मा शत्रु जैसी हो जाती है।’

पिछले श्लोक का निष्कर्ष। मित्र और शत्रु, दोनों आपके ही अंदर हैं। दोनों एक ही जगह बैठे हैं।

Chapter 6 panel 5

श्लोक 6.19

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे हवा-रहित जगह में रखा दीपक हिलता नहीं, वैसी ही उपमा है उस योगी की जो अपने चित्त को नियंत्रित करके आत्म-योग में स्थित है।’

ध्यान का सबसे सुंदर रूपक। हवा-रहित दीपक की लौ बिल्कुल सीधी जलती है। ध्यानी का मन भी ऐसा ही।

श्लोक 6.34

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
साधारण अनुवाद(अर्जुन कहता है:) ‘हे कृष्ण, यह मन बहुत चंचल है, उच्छृंखल, बलवान, दृढ़। इसे रोकना मुझे हवा को रोकने जैसा कठिन लगता है।’

अर्जुन की ईमानदार शिकायत। हर ध्यान करने वाला यही पाता है। मन एक नदी है, उल्टी दिशा में बहाना कठिन।

Chapter 6 panel 6

श्लोक 6.35

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
साधारण अनुवाद‘हे महाबाहो, बेशक मन कठिन है और चंचल। मगर हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आता है।’

कृष्ण का समाधान-सूत्र। दो साधन: अभ्यास (नियमित प्रयास) और वैराग्य (आसक्ति का छूटना)। दोनों मिलकर मन को थामते हैं।

सारएक वाक्य में: मन अपना दुश्मन है, अगर उसे थामना न आए। और थामने का तरीक़ा कोई जादू नहीं, रोज़ का अभ्यास और चीज़ों से अंदरूनी दूरी।