Chapter 1 – अर्जुन विषाद योग ।

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अध्याय 1

अर्जुन विषाद योग

अर्जुन का विषाद
महाभारत के युद्ध-मैदान पर अर्जुन की देह काँप उठती है। धनुष नीचे गिर जाता है। पहला अध्याय एक ऐसी इंसानी विफलता की तस्वीर है जिसे हम सब किसी न किसी रूप में जानते हैं।
47 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥

हे अच्युत! दोनों सेनाओं के बीच में मेरा रथ खड़ा कीजिए, ताकि मैं युद्ध की इच्छा रखने वालों को देख सकूँ।

गीता 1.21-22

अर्जुन और कृष्ण रथ पर, युद्ध-भूमि के बीच
अर्जुन-कृष्ण कुरुक्षेत्र की दोनों सेनाओं के बीच।

पाठ-संदर्भ

महाभारत के भीष्म-पर्व के पच्चीसवें अध्याय से बयालिसवें तक का यह अंश है। संदर्भ कुरुक्षेत्र के मैदान का, सेनापति-नियुक्ति के दिन, ईसा-पूर्व नौवीं-आठवीं सदी के क़रीब के एक ऐतिहासिक-काल का। पहले अध्याय में अर्जुन की मानसिक-स्थिति का सबसे विस्तृत वर्णन है, और यह वही “विषाद” है जो आगे कृष्ण के शिक्षण का प्रारम्भ-बिन्दु बनेगा। अद्वैत-परम्परा में इस विषाद को चेतना की एक विशिष्ट अवस्था माना गया है, जो शिक्षण का द्वार खोलती है।” आज की मनोवैज्ञानिक-शब्दावली में इसे नैदानिक अवसाद का चित्र कहा गया है, मगर इसका शास्त्रीय-अर्थ इससे कहीं विस्तृत है।

अध्याय का सार

महाभारत के युद्ध की शुरुआत में, कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव और पांडव सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। इस अध्याय में धृतराष्ट्र (जो अपने घर में बैठे हैं, इस दृश्य में नहीं हैं) अपने साथी संजय (जिनके पास दूरदर्शी दृष्टि थी) से युद्ध का वर्णन सुनते हैं। संजय अपनी दिव्य दृष्टि से युद्धभूमि का दृश्य धृतराष्ट्र को बताते हैं।

Arjuna, crowned, has sunk to the floor of the chariot at Krishna's feet, his bow and quiver scattered; the two armies blur in the distance
विषाद-योग की पूरी दृश्य-रचना। दो सेनाएँ धुँधलाई हुई, बीच में एक टूटा हुआ राजकुमार।

अर्जुन, जो पांडवों की ओर से मुख्य योद्धा हैं, अपने सारथी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वो उनका रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें ताकि वो अपने विरोधियों को देख सकें। जब अर्जुन अपने ही सम्बन्धियों, चचेरे भाइयों, गुरुजनों, और मित्रों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखते हैं, तो वो गहरे शोक और मानसिक संताप में डूब जाते हैं।

अर्जुन सोचते हैं कि इस युद्ध में विजयी होकर भी वो सुखी नहीं हो पाएँगे, क्योंकि यह युद्ध उनके अपने प्रियजनों के विनाश का कारण बनेगा। वो अपने कर्तव्य (लड़ूँ या न लड़ूँ?) को लेकर असमंजस में पड़ जाते हैं और अपना धनुष (जिसका नाम था गांडीव) नीचे रख देते हैं। वो कृष्ण से कहते हैं कि वो यह युद्ध नहीं लड़ सकते, और पूरी तरह से निराश हो जाते हैं।

निराश यानी अवसाद में आ जाते हैं। उस ज़माने में भी ऐसा होता था। ‘विषाद’ का एक अर्थ अवसाद भी है।

मुख्य श्लोक

श्लोक 1.1

धृतराष्ट्र उवाच ।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥
साधारण अनुवादधृतराष्ट्र ने पूछा, ‘हे संजय, धर्म-क्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठा हुए मेरे पुत्रों और पांडुपुत्रों ने क्या किया?’

पूरी गीता का आरम्भ। पूछने वाला अंधा है, बताने वाला दिव्य-दृष्टि वाला। पहली पंक्ति में ही ‘धर्म’ शब्द आता है, जो अंत तक राह दिखाएगा।

श्लोक 1.21-22

अर्जुन उवाच ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥
साधारण अनुवादअर्जुन ने कहा, ‘हे अच्युत, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, ताकि मैं देख सकूँ कि किनके साथ मुझे यह युद्ध करना है।’

यहाँ अर्जुन की पतन की शुरुआत है। उसने ‘देखने’ की माँग की, और जो देखा उसने उसे तोड़ दिया।

श्लोक 1.28

अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥
साधारण अनुवाद‘हे कृष्ण, अपने इन सब स्वजनों को युद्ध के लिए खड़ा देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, और मुँह सूख रहा है।’

शरीर का सच्चा वर्णन।शारीरिक है। पैर भारी, मुँह सूखा, हाथ काँपते।

श्लोक 1.47

Close-up of Arjuna's hands letting go: the bow slipping, an arrow falling to the chariot floor
गाण्डीव छूटा। एक हाथ ने इस अध्याय का पहला सच कह दिया।
सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥
साधारण अनुवादसंजय बोले, ‘ऐसा कहकर अर्जुन शोक से व्याकुल मन से, अपना धनुष-बाण फेंककर, रथ की पीठ पर बैठ गए।’

पहले अध्याय का अंत। धनुष गिर गया, अर्जुन बैठ गया। अब दूसरे अध्याय में कृष्ण का जवाब शुरू होंगे।

सारएक वाक्य में: एक दिन हम सब अर्जुन हैं, जो लड़ाई हमने टालने की कोशिश की, उसी के बीचों-बीच खड़े। पहला अध्याय यह दिखाता है कि उस पल का असली रूप कैसा होता है।