शोणितपुर के प्रासाद में उस रात न कोई शत्रु था, न कोई सेना। दैत्यराज बाण अकेला अपनी सहस्र भुजाओं से ताली बजाता, पाँव पटकता, ताण्डव के आवेग में डूबा हुआ था। वह किसी को ललकारने नहीं, अपने आराध्य महेश्वर को रिझाने के लिए नाच रहा था। और भक्तवत्सल शंकर उस नृत्य से सचमुच प्रसन्न हो उठे।
शोणितपुर का स्वामी
बाण कोई साधारण असुर न था। दिति के वंश में हिरण्यकशिपु हुए, उनके पुत्रों में प्रह्लाद विष्णुभक्त निकले; प्रह्लाद के पुत्र विरोचन, और विरोचन के पुत्र वही महादानी बलि, जिन्होंने वामनरूपधारी विष्णु को सारी पृथ्वी दान कर दी थी। उन्हीं बलि का औरस पुत्र था बाण। वह शिवभक्त था, मानी था, उदार और सत्यप्रतिज्ञ भी। उसने तीनों लोकों को और उनके अधिपतियों को बल से जीतकर शोणितपुर को अपनी राजधानी बनाया था। शंकर की कृपा ऐसी थी कि देवता तक उस शिवभक्त के किंकर-से हो गए थे; उसके राज्य में देवताओं के सिवा और कोई प्रजा दुखी न थी।
उस नृत्य से प्रसन्न होकर जब शंकर ने वर माँगने को कहा, तब शिव की ही माया से मोहित बाण ने वह वर माँगा, जो कोई विरला ही माँगता। उसने कहा, “प्रभो, आप मेरे रक्षक बन जाइए। पुत्रों और गणों सहित मेरे नगर के अध्यक्ष बनकर सदा मेरे पास ही निवास कीजिए।” भक्तवत्सल शम्भु ने वह वर दे दिया, और अपने पुत्रों और गणों के साथ शोणितपुर में ही रहने लगे।
सहस्र भुजाओं का बोझ
पर ऐश्वर्य के साथ गर्व भी बढ़ता गया। एक दिन नृत्य से शिव को संतुष्ट कर, यह जानकर कि पार्वतीवल्लभ प्रसन्न हैं, बाण हाथ जोड़कर बोला, “देवाधिदेव! आपकी ही कृपा से मैं बली हुआ। पर आपने जो मुझे एक सहस्र भुजाएँ दी हैं, वे अब मुझे भार-सी लगती हैं; क्योंकि इस त्रिलोकी में आपके सिवा मुझे अपनी जोड़ का कोई योद्धा ही नहीं मिलता। इन पर्वत-सी भुजाओं को लेकर युद्ध के बिना मैं क्या करूँ? नगरों और पर्वतों को चूर करता हुआ मैं दिग्गजों तक जा पहुँचा, पर वे भी भयभीत होकर भाग खड़े हुए। यम, अग्नि, वरुण, कुबेर, निर्ऋति और इन्द्र तक को जीतकर मैंने करद बना लिया। अब कोई ऐसा युद्ध बताइए, जिसमें या तो ये भुजाएँ शत्रु के शस्त्रों से जर्जर होकर गिरें, या मैं शत्रुओं की भुजाएँ सहस्रों की गिनती में गिराऊँ।”
यह सुनकर महामन्युस्वरूप चन्द्रशेखर को कुछ रोष आ गया। अट्टहास करके वे बोले, “अरे अभिमानी! आप बलि के पुत्र और हमारे भक्त हैं; ऐसी बात आपके मुँह से शोभा नहीं देती। अब आपका दर्प चूर होगा। शीघ्र ही आपको हमारे समान बलवान् के साथ महान् भीषण युद्ध मिलेगा, और उस संग्राम में ये पर्वत-सी भुजाएँ कट-कटकर भूमि पर गिरेंगी। जब बिना किसी वायु के ही आपके आयुधागार का मयूरध्वज अपने आप गिर पड़े, तब समझ लीजिएगा कि वह युद्ध आ पहुँचा।” इतना कहकर गर्वहारी शंकर मौन हो गए।
ऊषा का स्वप्न
कुछ काल बीता, और सचमुच एक दिन बाण का वह ध्वज बिना हवा के टूटकर गिर पड़ा। बाण युद्ध की प्रतीक्षा में हर्षित हो उठा। पर संकट किसी और ही द्वार से आया। वैशाख मास में माधव की पूजा करके, माङ्गलिक श्रृंगार से सजी बाण की कन्या ऊषा अपने गुप्त अन्तःपुर में सोई थी। उसी रात देवी पार्वती की शक्ति से उसे स्वप्न में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का मिलन हुआ। जागने पर वह व्याकुल हो उठी और अपनी सखी चित्रलेखा से उस स्वप्न-पुरुष को ला देने का हठ करने लगी।
चित्रलेखा मन्त्री कुम्भाण्ड की पुत्री थी, बड़ी बुद्धिमती। उसने देवताओं, गन्धर्वों, नागों और मनुष्यों के चित्र बनाने शुरू किए। वृष्णिवंशियों के चित्रों में जब उसने शूर, वसुदेव, राम, कृष्ण, प्रद्युम्न और फिर प्रद्युम्न-नन्दन अनिरुद्ध का चित्र खींचा, तब उसे देखकर ऊषा लज्जा से गड़ गई। “जो रात मेरे पास आया और भोर होते ही मेरे चित्त-रूपी रत्न को चुरा ले गया, वह चोर यही है,” उसने कहा। योगिनी चित्रलेखा तीसरे पहर द्वारका जा पहुँची और पलंग पर बैठे अनिरुद्ध को महल से उठा लाई।
अन्तःपुर के पहरेदारों ने जब उस दिव्य युवक को कन्या के पास देखा, तो दौड़कर बाण से सब कह दिया। कुपित बाण स्वयं वहाँ पहुँचा। पहले उसने दस हज़ार सैनिक भेजे, पर अनिरुद्ध ने उन्हें पल भर में काल के हवाले कर दिया। सेना पर सेना आती रही और कटती रही। तब अनिरुद्ध ने बाण का वध करने के लिए कालाग्नि-सी भयंकर शक्ति उठाई और रथ पर बैठे बाण पर प्रहार किया। गहरी चोट खाकर बाण उसी क्षण घोड़ों सहित वहाँ से अन्तर्धान हो गया। फिर उसी बलिपुत्र ने छल से अनिरुद्ध को नागपाश में बाँधकर पिंजरे में डाल दिया।
बाण ने क्रोध में इस बंदी को घास-फूस से ढके गहरे कुएँ में ढकेलकर मार डालने की आज्ञा दी। पर उसके धर्मबुद्धि मन्त्री कुम्भाण्ड ने रोका, “देव, तनिक विचार तो कीजिए। रूप-रंग में यह तो विष्णु-सा दीखता है। नागों के डसने पर भी यह हमें तृण-सा समझ रहा है; ऐसे वीर को मारना उचित नहीं।” फिर उसने अनिरुद्ध से भी कहा, “नराधम! आप दैत्यराज की स्तुति कर, हार मानकर हाथ जोड़ लीजिए; इसी में आपकी मुक्ति है।” अनिरुद्ध ने तमककर उत्तर दिया, “दुराचारी निशाचर! क्षत्रिय के लिए रणभूमि में सम्मुख लड़ते हुए मरना ही श्रेय है; भूमि पर पड़कर हाथ जोड़े दीन की तरह मरना कदापि नहीं।”
इसी बीच एक आकाशवाणी हुई, “महाबली बाण! आप बलि के पुत्र हैं, कुछ विचार कीजिए। शिव समस्त प्राणियों के ईश्वर, कर्मों के साक्षी और परमेश्वर हैं; यह सारा जगत् उन्हीं के अधीन है। उनकी इच्छा से निर्बल भी बलवान् हो जाता है। लीला रचने में निपुण भगवान् शंकर इस समय आपके गर्व को चूर कर देंगे।” यह सुनकर बाण ने वध का विचार छोड़ दिया। उधर नागपाश में बँधे अनिरुद्ध ने दुर्गा का स्मरण किया, “शरणागतवत्सले! मैं नागपाश में बँधा विष-ज्वाला से जल रहा हूँ; शीघ्र पधारिए और मेरी रक्षा कीजिए।” कृष्ण-चतुर्दशी की महारात्रि में कालिका प्रकट हुईं, उन भयानक नागों को भस्म कर नागपाश को छिन्न-भिन्न कर दिया, और अनिरुद्ध को बन्धनमुक्त कर पुनः अन्तःपुर पहुँचा दिया। मुक्त होकर अनिरुद्ध अपनी प्रिया ऊषा के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।
शोणितपुर पर श्रीकृष्ण
इधर नारद के मुख से जब यह समाचार पहुँचा कि अनिरुद्ध बाण के नागपाश में बँधे हैं, तब श्रीकृष्ण बारह अक्षौहिणी सेना और प्रद्युम्न आदि वीरों को लेकर शोणितपुर पर चढ़ आए। उधर भगवान् रुद्र भी अपने भक्त के पक्ष में सज-धजकर आ डटे। फिर तो कृष्ण और शिव का बड़ा भयानक युद्ध हुआ; दोनों ओर से ज्वर छोड़े गए। अन्त में श्रीकृष्ण ने स्वयं रुद्र के पास आकर उनका स्तवन किया, “सर्वव्यापी शंकर! गुणों से निर्लिप्त रहकर भी आप ही गुणों को प्रकाशित करते हैं। आप ही गर्वहारी हैं; इस गर्विले बाण को वर भी आपने ही दिया था। इसलिए आपकी ही आज्ञा से मैं इसकी भुजाएँ काटने आया हूँ। महादेव, अब इस युद्ध से निवृत्त हो जाइए, और मुझे इसका गर्व मिटाने की आज्ञा दीजिए।”
महेश्वर ने कहा, “तात, आपने ठीक ही कहा। शाप मैंने ही इसे दिया है, और मेरी ही आज्ञा से आप इसकी भुजाएँ काटने आए हैं। पर मैं तो सदा भक्तों के अधीन रहता हूँ; मेरे देखते-देखते बाण की भुजाएँ कैसे कटें? इसलिए आप जृम्भणास्त्र से पहले मुझे ही जृम्भित कर दीजिए, फिर अपना अभीष्ट कार्य पूरा कीजिए।” शिव के इस वचन पर शार्ङ्गपाणि श्रीहरि को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने तुरंत धनुष पर जृम्भणास्त्र चढ़ाकर पिनाकपाणि पर छोड़ दिया, और जँभाई से मोहित होकर मोहनिद्रा में पड़े शंकर को देख, गदा आदि से बाण की सेना का संहार करने लगे।
चार भुजाएँ
अब बाण स्वयं युद्ध को आगे बढ़ा; कुम्भाण्ड उसके घोड़ों की बागडोर सँभाले था। कृष्ण और बाण में चिरकाल तक घोर संग्राम चला, क्योंकि विष्णु के अवतार कृष्ण शिवरूप ही थे और बाण भी उत्तम शिवभक्त। अन्त में कुपित होकर श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से बाण की बहुत-सी भुजाएँ काट डालीं; केवल चार सुन्दर भुजाएँ शेष रहीं, और शंकर की कृपा से उसकी पीड़ा भी मिट गई। जब बाण की सुध जाती रही और श्रीकृष्ण उसका सिर काटने को उद्यत हुए, तब शंकर मोहनिद्रा त्यागकर उठे और बोले, “देवकीनन्दन! जिस काम की आज्ञा मैंने दी थी, वह आपने पूरा कर दिया। अब बाण का शिरच्छेदन मत कीजिए, सुदर्शन को लौटा लीजिए। मैंने इसे वर दे रखा है कि इसे मृत्यु का भय नहीं; मेरा वह वचन सत्य रहना चाहिए।” फिर बाण की ओर देखकर कहा, “मेरी ही आज्ञा से आपकी भुजाएँ काटने ये श्रीहरि आए थे।” इतना कहकर महेश्वर ने दोनों में मित्रता करा दी। श्रीकृष्ण ने चक्र लौटा लिया, ऊषा सहित अनिरुद्ध को आश्वासन दिया, बाण के दिए रत्न ग्रहण किए, योगिनी चित्रलेखा को पाकर प्रसन्न हुए, और वर-वधू तथा परिवार सहित द्वारका लौट गए।
महाकाल का वरदान
बाण अब अकेला रह गया, पर टूटा नहीं। नन्दीश्वर ने उसे समझाया, “भक्तशार्दूल! आदिगुरु शंकर में मन लगाकर नित्य उनका स्मरण कीजिए।” वैर से रहित होकर बाण शिवस्थान गया, स्तोत्रों से स्तुति की, और फिर पाँव से थाप देता, हाथ घुमाता, भौंहें मटकाता और सिर हिलाता हुआ प्रधान ताण्डव नृत्य करने लगा। मुख से सहस्रों प्रकार का बाजा बजाता वह भक्त इतने भाव से नाचा कि त्रिशूलधारी चन्द्रशेखर प्रसन्न हो गए। हर्षित होकर हर बोले, “प्यारे बाण! आपके नृत्य से मैं संतुष्ट हूँ; जो अभिलाषा हो, वर माँग लीजिए।”
बाण ने माँगा, “कटी भुजाओं के घाव भर जाएँ, बाहुयुद्ध की क्षमता बनी रहे, मुझे अक्षय गणनायकत्व मिले, शोणितपुर का राज्य ऊषा के पुत्र, मेरे दौहित्र को मिले, देवताओं से और विशेषकर विष्णु से मेरा वैर मिट जाए, मुझमें फिर कभी दूषित दैत्यभाव न जागे, सदा निर्विकार शम्भु-भक्ति बनी रहे, और शिवभक्तों पर स्नेह तथा समस्त प्राणियों पर मेरी दया बनी रहे।” यह वर माँगकर, प्रेम के आँसू भरे और रोमांचित बाण महेश्वर को प्रणाम कर मौन हो गया। “आपको सब कुछ प्राप्त हो,” यों कहकर शंकर वहीं अन्तर्धान हो गए। और वह कभी का गर्वीला दैत्यराज बाण महाकालत्व पाकर रुद्र के गणों में गिना जाने लगा।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता, पञ्चम (युद्ध) खण्ड