सलोक भगत कबीर जी (समाप्ति), अंग 1377

SGGS, Ang
1377
सलोक भगत कबीर जी (समाप्ति) → सलोक शेख़ फ़रीद जी (प्रारम्भ)
राग: सलोक खण्ड · रचयिता: भगत कबीर जी (समाप्ति) + शेख़ फ़रीद जी (प्रारम्भ)
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सलोक 161 ॥ कबीर साकत ते सूकर भलो राखै आछा गांउ ॥ उहु साकतु बपुरा मरि गइआ कोइ न लैहै नांउ ॥161॥

कबीर का सबसे harsh comparison। “साकत ते सूकर भलो।” साकत से सूकर (सूअर) “भलो” (बेहतर)।

यानी हरि-विमुख व्यक्ति से, सूअर बेहतर। यह कबीर का sharpest insult है। सूअर! क्यों?

“राखै आछा गांउ।” “अच्छा” “गाँव” “रखता” है (गाँव में सफ़ाई का काम)।

कबीर का point: सूअर तो गाँव की सफ़ाई करता है। कुछ काम का है, gाँव के लिए।

“उहु साकतु बपुरा मरि गइआ।” वो “साकत बेचारा” मर गया। “कोइ न लैहै नांउ।” कोई “नाम” नहीं “लेगा” (याद नहीं करेगा)।

कबीर का devastating verdict: साकत मर जाता है, और कोई याद भी नहीं करता। मगर सूअर के बारे में कुछ कहा जाता है कम-से-कम।

यह harsh है, मगर कबीर का message: यदि हरि-विमुख ज़िंदगी जीते हो, तो अंत में तुम्हारा कोई trace नहीं रहता। यह heavy reality है। दिल्ली में बहुत लोग इसी way जी रहे हैं, “well-off,” “well-educated,” मगर हरि-विमुख। कबीर पूछते हैं: 100 साल बाद कौन तुम्हारा नाम लेगा?

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सलोक 162 ॥ कबीर कउडी कउडी जोरि कै जोरे लाख करोरि ॥ चलती बार न कछु मिलिओ ले संगि न लागे रोरि ॥162॥

कबीर का famous wealth-warning। “कउडी कउडी जोरि कै।” “कौड़ी-कौड़ी” “जोड़” कर। “जोरे लाख करोरि।” “लाख-करोड़” जोड़े।

यानी पाई-पाई जोड़ी, लाखों-करोड़ों कमाए।

“चलती बार न कछु मिलिओ।” “चलती बार” (जाते वक़्त, मरते वक़्त) कुछ नहीं मिला (साथ नहीं गया)। “ले संगि न लागे रोरि।” “संग” में “रोड़ी” (छोटी पत्थर भी) नहीं “लागी” (साथ चली)।

कबीर का devastating image: इतनी संपत्ति, मगर मरने वक़्त एक छोटी कंकड़ भी साथ नहीं जाती।

दिल्ली के HNIs के लिए सबसे direct message। 100 करोड़ हों या 1000 करोड़, अंत में एक रुपया भी साथ नहीं जाएगा।

मगर यह depressing नहीं है। यह wake-up call है। पैसे कमाओ, मगर साथ साथ हरि-नाम भी “कमाओ” (लूटो, 1375 का 147 सलोक)। दूसरा साथ जाएगा।

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सलोक 163 ॥ कबीर तैसी कौ अब किआ करै कै घर सुख कै घर खेद ॥ जइ घरि सुख दुख दूकहिं वुहु बुडसी मन हन भेद ॥163॥

कबीर का binary। “तैसी कौ अब किआ करै।” “तैसी” (वैसी, that kind) “अब क्या करे”। “कै घर सुख कै घर खेद।” “कै” (या) घर सुख, “कै घर खेद” (कठिनाई)।

यानी एक ज़िंदगी जिसमें सिर्फ़ “सुख का घर” या “खेद का घर” है, ऐसा क्या करे।

“जइ घरि सुख दुख दूकहिं।” जिस घर में सुख और दुख दोनों “दूकहिं” (देखे)। “वुहु बुडसी मन हन भेद।” वो “बुडसी” (डूब जाता है) “मन” में “भेद” (भेदभाव, divide)।

कबीर का insight: जो आदमी सुख-दुख के बीच भेद करता है (सुख चाहता है, दुख से भागता है), वो अंत में डूब जाता है।

यह गीता का “समत्व” है। सुख-दुख दोनों एक जैसे लो। तब free रहो।

दिल्ली में हम सब बहुत “happiness pursuit” में हैं। हर बात में “feel good” चाहिए। कबीर कह रहे हैं, यह divide ही problem है। दोनों को बराबर लो।

देखें: गीता 2.38, “सुख-दुःखे समे कृत्वा”
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सलोक 164 ॥ कबीर कारन कउतक पारब्रहम कीआ ले सिमरि सरीरि ॥ खेलि गइआ अकाल पुरख का बंदा बनाइ बनाइ शरीरि ॥164॥

कबीर एक mystic celebration। “कारन कउतक पारब्रहम कीआ।” “कारण” (cause) और “कौतुक” (drama, play) पारब्रह्म ने “किया”। “ले सिमरि सरीरि।” “ले” (ले), “सिमरि” (सिमरन), “शरीर” में।

यानी सब कारण और सब drama पारब्रह्म का है। और तू उसका सिमरन शरीर में कर।

“खेलि गइआ अकाल पुरख का।” “अकाल पुरख” (timeless हरि) ने खेल “खेला” गया। “बंदा बनाइ बनाइ शरीरि।” “बंदा” (servant) बना-बना कर शरीर में।

कबीर का philosophical statement: यह सब हरि का खेल है। उसने हम सब को “बंदा” (servant) बना कर इस शरीर में डाला।

यह कबीर का most positive view of life है। यह सब “खेल” है, “drama” है। तो enjoy करो, मगर “बंदा” बनो, master नहीं।

गीता का “लीला” concept वही है। हरि leela कर रहे हैं, हम पात्र हैं।

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सलोक 165 ॥ कबीर पंडित मन पाधा हीआ हैरानु ॥ रिस्ता खोल खोल कै देखि अकैजांउ अकैस्थांउ ॥165॥

कबीर का educated class को। “पंडित मन पाधा।” “पंडित” का “मन” “पाधा” (पथिक, traveller)। “हीआ हैरानु।” “हृदय” “हैरान” (perplexed)।

यानी पंडित का मन भटक रहा है, हृदय हैरान है।

“रिस्ता खोल खोल कै देखि।” “रिश्ते” खोल-खोल कर देख। “अकैजांउ अकैस्थांउ।” “एक” “जाँउ” (जाना), “एक” “स्थान” (place)।

कबीर का mystic instruction: सारे rishtey खोल कर देख। तू “एक” से आया, “एक” को जाएगा।

पंडित को directly: तेरा बहुत knowledge है, मगर हृदय हैरान है। क्योंकि तू “एक” को नहीं देख रहा। हर रिश्ते, हर category के पीछे एक ही “स्थान” है। एक ही “गंतव्य।”

दिल्ली के educated में यह applicable है। हम बहुत books पढ़ते हैं, बहुत philosophies जानते हैं। मगर हृदय हैरान। क्योंकि “एक” नहीं देखा।

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सलोक 166 ॥ कबीर सांची कारणी राम बिनु लडे जान ॥ कामि क्रोधि माइआ बिखै बिरला साधु बखानि ॥166॥

कबीर का sharp differentiation। “सांची कारणी।” “सच्ची कार्य” (genuine work)। “राम बिनु लडे जान।” राम-बिना “लडे” (struggle), जा।

यानी असली काम, राम के बिना struggle है।

“कामि क्रोधि माइआ बिखै।” काम, क्रोध, माया – “बिख” (poison)। “बिरला साधु बखानि।” “बिरला” साधु ही समझता है।

कबीर का verdict: काम-क्रोध-माया तीनों ज़हर हैं। मगर “बिरला” (rare) साधु ही यह समझता है।

बाक़ी सब क्या करते हैं? इन्हें “जीवन” मानते हैं। काम (desire) = जीवन। क्रोध (anger) = self-expression। माया (illusion) = सच्चाई।

कबीर कह रहे हैं: नहीं। यह सब ज़हर हैं। मगर genuine साधू ही यह admit करता है।

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सलोक 167 ॥ कबीर पाणी पीवते किसक कीआ मीठा बहु बादु ॥ भूले हरि बिसाइ कै दूजै लागै सादु ॥167॥

कबीर का closing-line on तृष्णा। “पाणी पीवते किसक कीआ।” पानी पीते-पीते “किसक” (कौन) ने “किया”। “मीठा बहु बादु।” “मीठा” बहुत “बाद” में (बाद का)।

यानी पानी प्यास बुझाता है। मगर हम “मीठा” चाहते हैं। पानी से ज़्यादा।

“भूले हरि बिसाइ कै।” हरि को “बिसार” कर भूले। “दूजै लागै सादु।” “दूसरे” में “स्वाद” लगा।

कबीर का diagnosis: हरि छोड़ कर हम “दूसरे” स्वादों में लगते हैं। मीठा, salt, मसाला, sensation। मगर हरि का “स्वाद” forget कर गए।

यह दिल्ली में बहुत आसानी से देखा जा सकता है। हम सब “experiences” ढूँढ़ते हैं, हर रोज़ नया स्वाद। मगर वो स्वाद जो स्थायी है (हरि-स्वाद), उसको miss करते हैं।

यह कबीर के closing सलोक की तरह है। उनकी कुल 167+ सलोक यहाँ ख़त्म होती हैं। आगे फ़रीद से जुड़े सलोक भी हैं इस अंग पर।

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(कबीर जी की सलोक यहाँ समाप्त। आगे फ़रीद जी और भगत बेणी जी की कुछ सलोक भी इसी अंग पर। और फिर अगले अंगों पर “सलोक शेख़ फ़रीद जी” शुरू।)

अंग 1377 कबीर जी की सलोक के closing point पर है। यहाँ से next page (1378) पर “सलोक शेख़ फ़रीद जी” formally शुरू।

यह transition important है। ग्रंथ साहिब में अलग-अलग भगतों के सलोक एक के बाद एक रखे गए हैं, बिना hierarchical distinction के। यह सबसे inclusive तरीक़ा है।

कबीर हिन्दू भक्त (जुलाहा caste)। फ़रीद मुस्लिम सूफ़ी। दोनों एक ही ग्रंथ में, एक ही status पर।

यह सिख तत्त्वज्ञान का सबसे beautiful aspect है: सच एक है, अलग-अलग traditions से आता है, और सब को honor किया जा सकता है।

जो लोग आज भी “हिन्दू-मुस्लिम” divide में फँसते हैं, उनको यह ग्रंथ पढ़ना चाहिए। यहाँ दोनों side by side हैं, एक दूसरे को complement करते।