अंग 192

अंग
192
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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गउड़ी महला 5 ॥
गुर का सबदु राखु मन माहि ॥
नामु सिमरि चिंता सभ जाहि ॥1॥
बिनु भगवंत नाही अन कोइ ॥
मारै राखै एको सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर के चरण रिदै उरि धारि ॥
अगनि सागरु जपि उतरहि पारि ॥2॥
गुर मूरति सिउ लाइ धिआनु ॥
ईहा ऊहा पावहि मानु ॥3॥
सगल तिआगि गुर सरणी आइआ ॥
मिटे अंदेसे नानक सुखु पाइआ ॥4॥61॥130॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई ! अगर उस भगवान का आसरा मन में दृढ़ करना है, तो) गुरू का शबद (अपने) मन में टिकाए रख। (गुरू-शबद की सहायता से भगवान का) नाम सिमर, आपके सारे चिंता-फिक्र दूर हैं जाएंगे। 1। हे भाई !) भगवान के बिना (जीवों का) और कोई आसरा नहीं। वह भगवान ही (जीवों को) मारता है। वह भगवान ही (जीवों को) पालता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! अगर भगवान का आसरा लेना है तो) अपने हृदय में दिल में गुरू के चरण बसा (भाव, निम्रता से गुरू की शरण पड़)। (गुरू के बताए हुए राह पर चल के परमात्मा का नाम) जप के आप (तृष्णा की) आग के समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 2। (हे भाई ! गुरू का शबद ही गुरू की मूरति है, गुरू का स्वरूप है) गुरू के शबद से अपनी सुरति जोड़, आप इस लोक में और परलोक में आदर हासिल करेगा। 3। हे नानक ! जो मनुष्य अन्य सारे आसरे छोड़ के गुरू की शरण आता है, उसके सारे चिंता-फिक्र समाप्त हो जाते हैं, वह आत्मिक आनंद भोगता है। 4। 61। 130।
गउड़ी महला 5 ॥
जिसु सिमरत दूखु सभु जाइ ॥
नामु रतनु वसै मनि आइ ॥1॥
जपि मन मेरे गोविंद की बाणी ॥
साधू जन रामु रसन वखाणी ॥1॥ रहाउ ॥
इकसु बिनु नाही दूजा कोइ ॥
जा की द्रिसटि सदा सुखु होइ ॥2॥
साजनु मीतु सखा करि एकु ॥
हरि हरि अखर मन महि लेखु ॥3॥
रवि रहिआ सरबत सुआमी ॥
गुण गावै नानकु अंतरजामी ॥4॥62॥131॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई ! उस गोबिंद की बाणी जप) जिसका सिमरन करने से हरेक किस्म के दुख दूर हो जाते हैं (और, बाणी की बरकति से) परमात्मा का अमोलक नाम मन में आ बसता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी का उच्चारण कर। (इस बाणी से ही) संत जन अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! उस गोबिंद की सिफत सालाह करता रह) जिसके बराबर का कोई नहीं है और, जिसकी मेहर की निगाह से सदा आत्मिक आनंद मिलता है। 2। (हे भाई ! उस) एक गोबिंद को अपना सज्जन-मित्र साथी बना, और उस हरी की सिफत सालाह के अक्षर (संस्कार) अपने मन में उकर ले (लिख)। 3। (हे भाई ! सारे जगत का वह) मालिक हर जगह व्यापक है और हरेक के दिल की जानता है, नानक (भी) उस अंतरजामी स्वामी के गुण गाता है। 4। 62। 131।
गउड़ी महला 5 ॥
भै महि रचिओ सभु संसारा ॥
तिसु भउ नाही जिसु नामु अधारा ॥1॥
भउ न विआपै तेरी सरणा ॥
जो तुधु भावै सोई करणा ॥1॥ रहाउ ॥
सोग हरख महि आवण जाणा ॥
तिनि सुखु पाइआ जो प्रभ भाणा ॥2॥
अगनि सागरु महा विआपै माइआ ॥
से सीतल जिन सतिगुरु पाइआ ॥3॥
राखि लेइ प्रभु राखनहारा ॥
कहु नानक किआ जंत विचारा ॥4॥63॥132॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) सारा संसार (किसी न किसी) डर-सहम के नीचे दबा रहता है, सिर्फ उस मनुष्य पर (कोई) डर अपना जोर नहीं डाल सकता जिसे (परमात्मा का) नाम (जीवन के वास्ते) सहारा मिला हुआ है। 1। हे प्रभू ! आपकी शरण पड़ने से (आपका पल्ला पकड़ने से) कोई डर अपना जोर नहीं डाल सकता (क्योंकि, फिर ये निष्चय बन जाता है कि) वही काम किया जा सकता है जो (हे प्रभू !) आपको ठीक लगता है। 1। रहाउ। दुख मानने में या खुशी मनाने में (संसारी जीव के वास्ते डर-सहम का) आना जाना बना रहता है। सिर्फ उस मनुष्य ने (स्थाई) आत्मिक आनंद प्राप्त किया है जो प्रभू को प्यारा लगता है (जो प्रभू की रजा में चलता है)। 2। (हे भाई ! ये संसार तृष्णा की) आग का समुंद्र है (इस में जीवों पे) माया अपना जोर डाले रखती है। जिन (भाग्यशालियों) को सत्गुरू मिल जाता है, वह (इस अग्नि सागर में विचरते हुए भी उनकी अंतरात्मा) शीतलता से (ठहराव) सहज में टिकी रहती है। 3। (पर) हे नानक ! (डर सहम से बचने के लिए) बचाने की ताकत रखने वाला परमात्मा स्वयं ही बचाता है (अग्नि सागर के विकारों के सेक से बचने के लिए) जीवों बिचारों की क्या बिसात है? (इस वास्ते हे नानक ! उस परमात्मा का पल्ला पकड़े रख)। 4। 63। 132।
गउड़ी महला 5 ॥
तुमरी क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥
तुमरी क्रिपा ते दरगह थाउ ॥1॥
तुझ बिनु पारब्रहम नही कोइ ॥
तुमरी क्रिपा ते सदा सुखु होइ ॥1॥ रहाउ ॥
तुम मनि वसे तउ दूखु न लागै ॥
तुमरी क्रिपा ते भ्रमु भउ भागै ॥2॥
पारब्रहम अपरंपर सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥3॥
करउ अरदासि अपने सतिगुर पासि ॥
नानक नामु मिलै सचु रासि ॥4॥64॥133॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे पारब्रह्म प्रभू !) आपकी मेहर से ही (आपका) नाम जपा जा सकता है। आपकी कृपा से ही आपकी दरगाह में (जीव को) आदर मिल सकता है। 1। हे पारब्रह्म प्रभू ! तरे बगैर (जीवों का और) कोई (आसरा) नहीं। आपकी कृपा से ही (जीव को) सदा के लिए आत्मिक आनंद मिल सकता है। 1। रहाउ। (हे पारब्रह्म प्रभू !) अगर आप (जीव के) मन में आ बसे तो (जीवों को कोई) दुख छू नहीं सकता। आपकी मेहर से जीव की भटकना दूर हैं जाती है, जीव का डर सहम भाग जाता है। 2। हे पारब्रह्म प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! हे जगत के मालिक प्रभू ! हे सारे जीवों के दिल की जानने वाले प्रभू !। 3। (अगर आपकी मेहर हैं तो ही) मैं अपने गुरू के आगे (ये) अरदास कर सकता हूँ कि मुझे नानक को प्रभू का नाम मिले (नानक वास्ते नाम ही) सदा कायम रहने वाला सरमाया है। 4। 64। 133।
गउड़ी महला 5 ॥
कण बिना जैसे थोथर तुखा ॥
नाम बिहून सूने से मुखा ॥1॥
हरि हरि नामु जपहु नित प्राणी ॥
नाम बिहून ध्रिगु देह बिगानी ॥1॥ रहाउ ॥
नाम बिना नाही मुखि भागु ॥
भरत बिहून कहा सोहागु ॥2॥
नामु बिसारि लगै अन सुआइ ॥
ता की आस न पूजै काइ ॥3॥
करि किरपा प्रभ अपनी दाति ॥
नानक नामु जपै दिन राति ॥4॥65॥134॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) जैसे दानों के बगैर खाली तोह (किसी काम नहीं आते, इसी तरह) वो मुँह सूने हैं जो परमात्मा का नाम जपने के बिना हैं। 1। अर्थ: हे प्राणी ! सदा परमात्मा का नाम सिमरते रहो। परमात्मा के नाम के बिना ये शरीर जो आखिर पराया हैं जाता है (जो मौत आने पर छोड़ना पड़ता है) धिक्कार-योग (कहा जाता) है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम जपे बिना किसी के माथे के भाग्य नहीं खुलते। पति के बिना (स्त्री का) सुहाग नहीं हो सकता। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के और ही स्वादों में उलझा रहता है, उसकी कोई उम्मीद सिरे नहीं चढ़ती। 3। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! मेहर करके आप जिस मनुष्य को अपने नाम की दाति बख्शता है वही दिन रात आपका नाम जपता है। 4। 65। 134।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई ! अगर उस भगवान का आसरा मन में दृढ़ करना है, तो) गुरू का शबद (अपने) मन में टिकाए रख।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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