Chapter 16: देवासुर संपद विभाग योग

Written by

in

अध्याय 16

दैवासुर सम्पद विभाग योग

दैवी और आसुरी गुण
मनुष्य की दो तरह की प्रकृति होती है, दैवी और आसुरी। दोनों की लंबी सूची। यह एक पहचान-पुस्तिका है।
24 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

काम, क्रोध, लोभ, ये तीन नरक के द्वार हैं, आत्मा का नाश करने वाले। इसलिए इन तीनों को त्यागना चाहिए।

गीता 16.21

Chapter 16 panel 8
Chapter 16 panel 1

पाठ-संदर्भ

सोलहवाँ अध्याय दैवी-आसुरी-सम्पद्-विभाग-योग है, चौबीस श्लोक। मूल-विभाजन दो-प्रवृत्तियों का है, दैवी और आसुरी। यह विभाजन मानवीय-स्वभाव का है, बाहरी-दुश्मनों का नहीं। श्लोक छह में, “द्वौ भूत-सर्गौ लोके अस्मिन्” (इस-लोक में दो-तरह की प्रवृत्तियाँ बनाई गयी हैं)। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में इसे व्यक्तित्व-वर्गीकरण कहा गया है। बीसवीं सदी के मनोवैज्ञानिक एरिख फ्रॉम और कार्ल युंग ने इस-तरह के द्विविध-विभाजनों पर विस्तृत-लेखन किया, हालाँकि गीता से सीधा-संदर्भ नहीं था।

अध्याय का सार

इस अध्याय का विषय बहुत साफ़ है: मनुष्य की प्रकृति दो तरह की होती है। दैवी और आसुरी।

Chapter 16 panel 2

दैवी गुणों की एक लंबी सूची: अभय, चित्त की पवित्रता, ज्ञान-योग में स्थिरता, दान, संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध-मुक्ति, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (दूसरों की चुगली नहीं), दया, लोभ-मुक्ति, सौम्यता, ह्री (विनम्र-लज्जा), अचापलम् (स्थिरता), तेज, क्षमा, धृति, शौचम्, अद्रोह, अमानित्व।

Chapter 16 panel 3

आसुरी गुणों की भी सूची: दम्भ, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान। ये गुण मनुष्य को बाँधते हैं।

Chapter 16 panel 4

अंत में ‘काम-क्रोध-लोभ’ को कृष्ण ‘त्रिविधं नरकस्य द्वारम्’ (नरक के तीन दरवाज़े) कहते हैं। इन्हें छोड़ने वाला अपना कल्याण करता है।

Chapter 16 panel 5

मुख्य श्लोक

श्लोक 16.1-3

श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
साधारण अनुवाद‘अभय, चित्त की शुद्धि, ज्ञान-योग में स्थिरता, दान, संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध-मुक्ति, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (चुगली नहीं), जीवों पर दया, लोभ-मुक्ति, सौम्यता, विनम्रता, स्थिरता, तेज, क्षमा, धृति, शुद्धता, अद्रोह, अति-मान न होना, हे भारत, ये दैवी सम्पदा में जन्मे व्यक्ति के गुण हैं।’

छब्बीस गुणों की सूची। हर एक एक अभ्यास है। सब साथ नहीं आते, मगर एक-एक करके बढ़ाए जा सकते हैं।

Chapter 16 panel 6

श्लोक 16.21

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
साधारण अनुवाद‘नरक के तीन दरवाज़े हैं, जो आत्म-नाश करते हैं: काम, क्रोध, और लोभ। इन तीनों को त्याग देना चाहिए।’

तीन सबसे ख़तरनाक शत्रु। काम (इच्छा), क्रोध, लोभ। इन्हें पहचानिए और दूर रखिए, यही पूरा संदेश।

Chapter 16 panel 7
सारएक वाक्य में: दो तरह के लोग होते हैं, एक जो अपने अंदर का प्रकाश बढ़ाते हैं, दूसरे जो अंधेरा। यह चुनाव रोज़ का है।