Chapter 17: श्रद्धा त्रय विभाग योग

Written by

in

अध्याय 17

श्रद्धा-त्रय विभाग योग

श्रद्धा के तीन प्रकार
हर एक की एक श्रद्धा होती है, और वो श्रद्धा उसके गुण के अनुसार होती है। तो जिसकी जैसी श्रद्धा, उसका वैसा भगवान।
28 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकमुच्यते ॥

देना कर्तव्य है, ऐसा मान कर जो दान बिना उपकार की अपेक्षा के, उचित देश-काल-पात्र को दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहलाता है।

गीता 17.20

Chapter 17 panel 8
Chapter 17 panel 1

पाठ-संदर्भ

सत्रहवाँ अध्याय श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग है, अट्ठाईस श्लोक। श्रद्धा के तीन प्रकार, सात्त्विक, राजसिक, तामसिक। यह विभाजन तीन-गुणों के अनुसार है, जो चौदहवें अध्याय में बताए गए। तीसरे-श्लोक की एक प्रसिद्ध पंक्ति है, “श्रद्धा-मयो अयं पुरुषः, यो यच्छ्रद्धः स एव सः” (मनुष्य श्रद्धा-मय है। जिसकी जो श्रद्धा, वो वैसा ही)। यह आधुनिक पहचान-सिद्धान्त से अद्भुत-तौर पर मेल खाता है, हालाँकि श्रद्धा शब्द का आधुनिक-शब्दावली में सही-अनुवाद कठिन है।

अध्याय का सार

अध्याय 16 में दैवी-आसुरी प्रकृति देखी। अब 17वें में पूछा जाता है: जो लोग शास्त्र-अनुसार नहीं चलते, मगर अपनी श्रद्धा से पूजा-यज्ञ करते हैं, उनकी निष्ठा कैसी है?

Chapter 17 panel 2

कृष्ण कहते हैं: ‘हर एक की श्रद्धा उसके अपने स्वभाव के अनुसार होती है। तो जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसा ही वो है।’

Chapter 17 panel 3

तीन गुणों के अनुसार तीन तरह की श्रद्धा, तीन तरह का भोजन, तीन तरह का यज्ञ, तीन तरह का तप, तीन तरह का दान। हर चीज़ का सात्त्विक, राजसिक, और तामसिक रूप।

Chapter 17 panel 4

और अंत में ‘ओम् तत् सत्’ का सूत्र, हर शुभ कर्म इन तीनों शब्दों से शुरू होता है, और बिना श्रद्धा के किया हुआ सब ‘असत्’ है।

Chapter 17 panel 5

मुख्य श्लोक

श्लोक 17.3

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
साधारण अनुवाद‘हे भारत, हर एक की श्रद्धा उसके स्वभाव (सत्त्व) के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसा ही वो है।’

आप जो मानते हैं, वही आप हैं। यही अंदर की पहचान है।

Chapter 17 panel 6

श्लोक 17.20

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
साधारण अनुवाद‘जो दान ”दिया जाना चाहिए” इस भाव से बिना बदले की उम्मीद के, सही देश, सही समय, और सही पात्र को दिया जाए, वो सात्त्विक दान है।’

सात्त्विक दान की पाँच शर्तें: कर्तव्य-भाव, बिना बदले की अपेक्षा, सही जगह, सही समय, सही व्यक्ति।

Chapter 17 panel 7
सारएक वाक्य में: जो आप मानते हैं, वही आप हैं। और श्रद्धा से किया हर शुभ काम भी तीन गुणों के अनुसार रंग पाता है।