श्रद्धा-त्रय विभाग योग
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पाठ-संदर्भ
सत्रहवाँ अध्याय श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग है, अट्ठाईस श्लोक। श्रद्धा के तीन प्रकार, सात्त्विक, राजसिक, तामसिक। यह विभाजन तीन-गुणों के अनुसार है, जो चौदहवें अध्याय में बताए गए। तीसरे-श्लोक की एक प्रसिद्ध पंक्ति है, “श्रद्धा-मयो अयं पुरुषः, यो यच्छ्रद्धः स एव सः” (मनुष्य श्रद्धा-मय है। जिसकी जो श्रद्धा, वो वैसा ही)। यह आधुनिक पहचान-सिद्धान्त से अद्भुत-तौर पर मेल खाता है, हालाँकि श्रद्धा शब्द का आधुनिक-शब्दावली में सही-अनुवाद कठिन है।
अध्याय का सार
अध्याय 16 में दैवी-आसुरी प्रकृति देखी। अब 17वें में पूछा जाता है: जो लोग शास्त्र-अनुसार नहीं चलते, मगर अपनी श्रद्धा से पूजा-यज्ञ करते हैं, उनकी निष्ठा कैसी है?

कृष्ण कहते हैं: ‘हर एक की श्रद्धा उसके अपने स्वभाव के अनुसार होती है। तो जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसा ही वो है।’

तीन गुणों के अनुसार तीन तरह की श्रद्धा, तीन तरह का भोजन, तीन तरह का यज्ञ, तीन तरह का तप, तीन तरह का दान। हर चीज़ का सात्त्विक, राजसिक, और तामसिक रूप।

और अंत में ‘ओम् तत् सत्’ का सूत्र, हर शुभ कर्म इन तीनों शब्दों से शुरू होता है, और बिना श्रद्धा के किया हुआ सब ‘असत्’ है।

मुख्य श्लोक
श्लोक 17.3
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
श्लोक 17.20
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
सात्त्विक दान की पाँच शर्तें: कर्तव्य-भाव, बिना बदले की अपेक्षा, सही जगह, सही समय, सही व्यक्ति।

आप जो मानते हैं, वही आप हैं। यही अंदर की पहचान है।