Chapter 15: पुरुषोत्तम योग

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अध्याय 15

पुरुषोत्तम योग

परम पुरुष
एक उल्टा पीपल का पेड़ है, जड़ें ऊपर, शाखाएँ नीचे। यह संसार है। और इसे काटने का औज़ार ”वैराग्य” है।
20 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

जीव-लोक में जीव-रूप मेरा ही सनातन अंश है। मन समेत छह इन्द्रियाँ प्रकृति में स्थित हैं, और जीव इन्हें खींचता है।

गीता 15.7

उल्टा पीपल का वृक्ष, जड़ें ऊपर, शाखाएँ नीचे
अश्वत्थ-वृक्ष, जड़ ब्रह्म में, शाखाएँ संसार में।

पाठ-संदर्भ

पन्द्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम-योग है, बीस श्लोक। प्रारम्भिक श्लोकों में अश्वत्थ-वृक्ष का दृष्टान्त आता है, “ऊर्ध्व-मूलम् अधः-शाखम्” (ऊपर मूल, नीचे शाखाएँ), जो कठोपनिषद् के एक श्लोक की सीधी-प्रतिध्वनि है। यह दृष्टान्त संसार-वृक्ष का है, उल्टा-खड़ा हुआ। दान्ते की “इन्फर्नो” (1320 के क़रीब इटली में लिखी) में एक मिलती-जुलती कल्पना है, हालाँकि सीधा-प्रभाव नहीं माना जाता। पन्द्रहवें श्लोक का, “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः” (मैं सब के हृदय में बैठा हूँ), अद्वैत-वेदान्त का मूल-कथन है।

अध्याय का सार

अध्याय की शुरुआत एक प्राचीन रूपक से होती है, उल्टा अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे। यह रूपक कठोपनिषद् 2.3.1 में भी आता है। यानी असली स्रोत ऊपर (ब्रह्म) है, और संसार उसकी शाखाओं की तरह नीचे फैला है।

इसे काटने का औज़ार क्या है? वैराग्य का तेज़ कुल्हाड़ा। एक बार जड़ काट दी जाए, सब शाखाएँ अपने आप गिर जाती हैं।

फिर कृष्ण ‘पुरुषोत्तम’ की परिभाषा देते हैं: संसार में दो पुरुष हैं, क्षर (बदलने वाला) और अक्षर (न बदलने वाला)। दोनों से परे एक तीसरा है, उत्तम पुरुष, यानी कृष्ण स्वयं।

और अंत में एक सुंदर पंक्ति: ‘मैं ही सब हृदयों में बैठा हूँ, स्मृति-ज्ञान-अपोहन (भूलना) मुझ से ही होते हैं।’

मुख्य श्लोक

श्लोक 15.1

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
साधारण अनुवाद‘ऊपर मूल वाले, नीचे शाखाओं वाले अश्वत्थ-वृक्ष को अव्यय (अविनाशी) कहा गया है। उसकी पत्तियाँ वेद-छंद हैं। जो इसे जानता है, वही वेद-ज्ञानी है।’

उपनिषदों से सीधा उठाया गया रूपक। जड़ें ऊपर, उसके पार है।

श्लोक 15.7

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
साधारण अनुवाद‘इस जीव-लोक में जीव-रूप में मेरा ही एक सनातन अंश है। वो प्रकृति में स्थित छह इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ + मन) को आकर्षित करता है।’

हर जीव कृष्ण का अंश है। पूरा नहीं, बस एक हिस्सा। और वो हिस्सा शरीर की इन्द्रियों के साथ काम करता है।

श्लोक 15.15

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
साधारण अनुवाद‘मैं सब के हृदय में स्थित हूँ। स्मृति, ज्ञान, और भूलना, सब मुझ से ही होते हैं। सब वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। मैं ही वेदान्त का रचयिता हूँ, और वेदों को जानने वाला भी।’

एक श्लोक में कृष्ण की पूरी पहचान। हर याद, हर ज्ञान, हर भूलना उन्हीं से आता है।

सारएक वाक्य में: संसार एक उल्टा पेड़ है, जिसकी जड़ ब्रह्म में है। और हर जीव उस ब्रह्म का ही एक छोटा सा अंश।