पुरुषोत्तम योग
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पाठ-संदर्भ
पन्द्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम-योग है, बीस श्लोक। प्रारम्भिक श्लोकों में अश्वत्थ-वृक्ष का दृष्टान्त आता है, “ऊर्ध्व-मूलम् अधः-शाखम्” (ऊपर मूल, नीचे शाखाएँ), जो कठोपनिषद् के एक श्लोक की सीधी-प्रतिध्वनि है। यह दृष्टान्त संसार-वृक्ष का है, उल्टा-खड़ा हुआ। दान्ते की “इन्फर्नो” (1320 के क़रीब इटली में लिखी) में एक मिलती-जुलती कल्पना है, हालाँकि सीधा-प्रभाव नहीं माना जाता। पन्द्रहवें श्लोक का, “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः” (मैं सब के हृदय में बैठा हूँ), अद्वैत-वेदान्त का मूल-कथन है।
अध्याय का सार
अध्याय की शुरुआत एक प्राचीन रूपक से होती है, उल्टा अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे। यह रूपक कठोपनिषद् 2.3.1 में भी आता है। यानी असली स्रोत ऊपर (ब्रह्म) है, और संसार उसकी शाखाओं की तरह नीचे फैला है।
इसे काटने का औज़ार क्या है? वैराग्य का तेज़ कुल्हाड़ा। एक बार जड़ काट दी जाए, सब शाखाएँ अपने आप गिर जाती हैं।
फिर कृष्ण ‘पुरुषोत्तम’ की परिभाषा देते हैं: संसार में दो पुरुष हैं, क्षर (बदलने वाला) और अक्षर (न बदलने वाला)। दोनों से परे एक तीसरा है, उत्तम पुरुष, यानी कृष्ण स्वयं।
और अंत में एक सुंदर पंक्ति: ‘मैं ही सब हृदयों में बैठा हूँ, स्मृति-ज्ञान-अपोहन (भूलना) मुझ से ही होते हैं।’
मुख्य श्लोक
श्लोक 15.1
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
श्लोक 15.7
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
हर जीव कृष्ण का अंश है। पूरा नहीं, बस एक हिस्सा। और वो हिस्सा शरीर की इन्द्रियों के साथ काम करता है।
श्लोक 15.15
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
एक श्लोक में कृष्ण की पूरी पहचान। हर याद, हर ज्ञान, हर भूलना उन्हीं से आता है।
उपनिषदों से सीधा उठाया गया रूपक। जड़ें ऊपर, उसके पार है।