गुणत्रय विभाग योग
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पाठ-संदर्भ
चौदहवाँ अध्याय गुण-त्रय-विभाग-योग है, सत्ताईस श्लोक। तीन-गुणों का सिद्धान्त सांख्य-दर्शन का आधारभूत-वाक्य है, सत्त्व, रजस्, तमस्। भगवान् श्रीकृष्ण इन्हें अपने स्वरूप से उत्पन्न बताते हैं। श्लोक छब्बीस का, “मां च योऽव्यभिचारेण भक्ति-योगेन सेवते” (जो मुझे अव्यभिचार-भक्ति से सेवा करता है), तेरहवीं सदी के मध्व-आचार्य के द्वैत-दर्शन का आधार-वचन बना। चैतन्य-परम्परा भी इसी श्लोक को अपनी भक्ति-व्याख्या का केन्द्र मानती है।
अध्याय का सार
अध्याय का विषय: सत्त्व, रजस, और तमस, ये तीन गुण जो प्रकृति में मिश्रित हैं। हर मनुष्य के अंदर तीनों होते हैं, मगर अनुपात अलग।

सत्त्व: स्वच्छता, प्रकाश, संतुलन। जब सत्त्व बढ़ता है, ज्ञान-विवेक बढ़ते हैं। रजस: गतिशीलता, इच्छा, आसक्ति। जब रजस बढ़ता है, बेचैनी, लोभ, और अनगिनत कर्मों की आदत बढ़ती है। तमस: जड़ता, अंधकार, मोह। जब तमस बढ़ता है, आलस्य, निद्रा, और बुद्धि का धूमिल होना बढ़ता है।

तीनों मिलकर मनुष्य को बाँधते हैं। मुक्ति का रास्ता है, तीनों से ऊपर उठना, ‘गुणातीत’ बनना। ऐसा साधक तीनों गुणों को देखता है, मगर उनसे बँधा नहीं होता।

अध्याय का अंत गुणातीत के लक्षणों पर है: जो हर्ष-शोक में समान, स्थिर, कर्म-कर्ता और कर्म-फल से अलग।

मुख्य श्लोक
श्लोक 14.5
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
श्लोक 14.22
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
गुणातीत का व्यावहारिक वर्णन। तीनों आते-जाते रहेंगे। बस इनके आने-जाने से प्रभावित न होइए।
तीन रस्सियाँ। हम सब इन्हीं से बँधे हैं। अंतर बस यह कि किस की पकड़ ज़्यादा है। पहचान पहली चीज़ है।