Chapter 14: गुणत्रय विभाग योग

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अध्याय 14

गुणत्रय विभाग योग

तीन गुणों का विभाग
हर मनुष्य तीन रस्सियों से बँधा है, सत्त्व, रजस, तमस। तीनों को पहचानना और तीनों के पार जाना, यही गुणातीत बनना है।
27 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥

इन तीनों गुणों के पार जा कर देही जन्म-मृत्यु-जरा-दुख से मुक्त हो कर अमृत को प्राप्त करता है।

गीता 14.20

Chapter 14 panel 1

पाठ-संदर्भ

चौदहवाँ अध्याय गुण-त्रय-विभाग-योग है, सत्ताईस श्लोक। तीन-गुणों का सिद्धान्त सांख्य-दर्शन का आधारभूत-वाक्य है, सत्त्व, रजस्, तमस्। भगवान् श्रीकृष्ण इन्हें अपने स्वरूप से उत्पन्न बताते हैं। श्लोक छब्बीस का, “मां च योऽव्यभिचारेण भक्ति-योगेन सेवते” (जो मुझे अव्यभिचार-भक्ति से सेवा करता है), तेरहवीं सदी के मध्व-आचार्य के द्वैत-दर्शन का आधार-वचन बना। चैतन्य-परम्परा भी इसी श्लोक को अपनी भक्ति-व्याख्या का केन्द्र मानती है।

अध्याय का सार

अध्याय का विषय: सत्त्व, रजस, और तमस, ये तीन गुण जो प्रकृति में मिश्रित हैं। हर मनुष्य के अंदर तीनों होते हैं, मगर अनुपात अलग।

Chapter 14 panel 2

सत्त्व: स्वच्छता, प्रकाश, संतुलन। जब सत्त्व बढ़ता है, ज्ञान-विवेक बढ़ते हैं। रजस: गतिशीलता, इच्छा, आसक्ति। जब रजस बढ़ता है, बेचैनी, लोभ, और अनगिनत कर्मों की आदत बढ़ती है। तमस: जड़ता, अंधकार, मोह। जब तमस बढ़ता है, आलस्य, निद्रा, और बुद्धि का धूमिल होना बढ़ता है।

Chapter 14 panel 3

तीनों मिलकर मनुष्य को बाँधते हैं। मुक्ति का रास्ता है, तीनों से ऊपर उठना, ‘गुणातीत’ बनना। ऐसा साधक तीनों गुणों को देखता है, मगर उनसे बँधा नहीं होता।

Chapter 14 panel 4

अध्याय का अंत गुणातीत के लक्षणों पर है: जो हर्ष-शोक में समान, स्थिर, कर्म-कर्ता और कर्म-फल से अलग।

Chapter 14 panel 5

मुख्य श्लोक

श्लोक 14.5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
साधारण अनुवाद‘सत्त्व, रजस, तमस, ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं। ये हे महाबाहो, इस शरीर में रहने वाले अव्यय (अमर) आत्मा को बाँध देते हैं।’

तीन रस्सियाँ। हम सब इन्हीं से बँधे हैं। अंतर बस यह कि किस की पकड़ ज़्यादा है। पहचान पहली चीज़ है।

Chapter 14 panel 6

श्लोक 14.22

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
साधारण अनुवाद‘हे पाण्डव, (गुणातीत वो है जो) प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रजस), और मोह (तमस), इनके आने पर इनसे द्वेष नहीं करता, और न जाने पर इनकी चाह करता है।’

गुणातीत का व्यावहारिक वर्णन। तीनों आते-जाते रहेंगे। बस इनके आने-जाने से प्रभावित न होइए।

सारएक वाक्य में: तीन रस्सियों को पहचानिए, सत्त्व, रजस, तमस, और तीनों के आने-जाने का दर्शक बनिए। यही मुक्ति है।