क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
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पाठ-संदर्भ
तेरहवाँ अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग है, पैंतीस श्लोक। मूल-दर्शन क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का विभाजन है। श्लोक तेरह में, “सर्वतः पाणि-पादम्” (सब ओर हाथ-पैर वाला), जो ब्रह्म-स्वरूप का प्रसिद्ध श्लोक है, मूलतः श्वेताश्वतर उपनिषद् से लिया गया है। यह बहु-शास्त्रों से तत्त्व-सम्मेलन गीता की एक केन्द्रीय-विशेषता है। आदि शंकराचार्य ने इस अध्याय पर अपनी सबसे विस्तृत भगवद् गीता-भाष्य लिखी।
अध्याय का सार
गीता का तीसरा भाग शुरू होता है, जिसमें ज्ञान-योग प्रधान है। पहला सूत्र: शरीर ‘क्षेत्र’ है, और जो इसे जानता है वो ‘क्षेत्रज्ञ’।

क्षेत्र में क्या है? पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, दस इन्द्रियाँ, पाँच विषय, इच्छा-द्वेष, सुख-दुख, चेतना, धृति। यह सब क्षेत्र है।

और क्षेत्रज्ञ? वो शुद्ध चेतना है, जो इस क्षेत्र को देखती-परखती है। उसका कोई हाथ-पैर नहीं, मगर सब हाथ-पैर उसी में हैं। वो अंदर-बाहर, चर-अचर, पास-दूर सब में है।

अध्याय का अंत ‘समदर्शन’ पर है: जो सब प्राणियों में एक ही परम-आत्मा को देखता है, वो ख़ुद का नाश नहीं करता, और तब परम गति को पाता है।

मुख्य श्लोक
श्लोक 13.27
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥
‘जो देखता है, वो देखता है’ दो बार। पहली ‘देख’ यह सूक्ष्म दर्शन है, दूसरी ‘देख’ यह सच्चा दर्शन। एक ही शब्द, दो अलग गहराइयाँ।