Chapter 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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अध्याय 13

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

क्षेत्र और क्षेत्र को जानने वाला
शरीर ”क्षेत्र” है, और जो उसे जानता है वो ”क्षेत्रज्ञ”। इस भेद को पहचानना ही ज्ञान का बीज है।
35 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 8 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥

जो सब भूतों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को देखता है, जो विनाशशील के बीच अविनाशी को देखता है, वही वस्तुतः देखता है।

गीता 13.27

Chapter 13 panel 1

पाठ-संदर्भ

तेरहवाँ अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग है, पैंतीस श्लोक। मूल-दर्शन क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का विभाजन है। श्लोक तेरह में, “सर्वतः पाणि-पादम्” (सब ओर हाथ-पैर वाला), जो ब्रह्म-स्वरूप का प्रसिद्ध श्लोक है, मूलतः श्वेताश्वतर उपनिषद् से लिया गया है। यह बहु-शास्त्रों से तत्त्व-सम्मेलन गीता की एक केन्द्रीय-विशेषता है। आदि शंकराचार्य ने इस अध्याय पर अपनी सबसे विस्तृत भगवद् गीता-भाष्य लिखी।

अध्याय का सार

गीता का तीसरा भाग शुरू होता है, जिसमें ज्ञान-योग प्रधान है। पहला सूत्र: शरीर ‘क्षेत्र’ है, और जो इसे जानता है वो ‘क्षेत्रज्ञ’।

Chapter 13 panel 2

क्षेत्र में क्या है? पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, दस इन्द्रियाँ, पाँच विषय, इच्छा-द्वेष, सुख-दुख, चेतना, धृति। यह सब क्षेत्र है।

Chapter 13 panel 3

और क्षेत्रज्ञ? वो शुद्ध चेतना है, जो इस क्षेत्र को देखती-परखती है। उसका कोई हाथ-पैर नहीं, मगर सब हाथ-पैर उसी में हैं। वो अंदर-बाहर, चर-अचर, पास-दूर सब में है।

Chapter 13 panel 4

अध्याय का अंत ‘समदर्शन’ पर है: जो सब प्राणियों में एक ही परम-आत्मा को देखता है, वो ख़ुद का नाश नहीं करता, और तब परम गति को पाता है।

Chapter 13 panel 5

मुख्य श्लोक

श्लोक 13.27

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥
साधारण अनुवाद‘जो सब प्राणियों में समान-स्थित, और नश्वर में अविनाशी रूप से स्थित परमेश्वर को देखता है, वही (असल में) देखता है।’

‘जो देखता है, वो देखता है’ दो बार। पहली ‘देख’ यह सूक्ष्म दर्शन है, दूसरी ‘देख’ यह सच्चा दर्शन। एक ही शब्द, दो अलग गहराइयाँ।

Chapter 13 panel 6
सारएक वाक्य में: यह शरीर एक खेत है, और इसे जानने वाला कोई और है। उस फ़र्क़ को समझना ही ज्ञान की शुरुआत है।