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1429
सलोक महला 9 · मुंदावणी · रागमाला
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- निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥
- जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥
- रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥
- चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥
- जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥
- दोहरा ॥
- बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥
- संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥
- नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥
- राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥
- थाल विचि तिंनि वसतू पईओ सतु संतोखु वीचारो ॥
- तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोई ॥
- राग माला ॥
· सलोक
निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥
निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥
नानक थिरु हरि भगति है तिह राखो मन माहि ॥48॥
नानक थिरु हरि भगति है तिह राखो मन माहि ॥48॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: हे भाई!) मैं जगत को अपना समझ के (ही अब तक) देखता रहा। (पर, यहाँ तो) कोई किसी का भी (सदा के लिए अपना) नहीं। सदा कायम रहने वाली तो परमात्मा की भगती ही है। इस (भगती) को (अपने) मन में परो के रखें। 48।
· सलोक
जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥
जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥
कहि नानक थिरु ना रहै जिउ बालू की भीति ॥49॥
कहि नानक थिरु ना रहै जिउ बालू की भीति ॥49॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहता है: हे मित्र! यह बात सच्ची जानें कि जगत की सारी रचना ही नाशवंत है। रेत की दीवार की तरह (जगत में) कोई भी चीज़ सदा कायम रहने वाली नहीं। 49।
· सलोक
रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥
रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥
कहु नानक थिरु कछु नही सुपने जिउ संसारु ॥50॥
कहु नानक थिरु कछु नही सुपने जिउ संसारु ॥50॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (हे भाई! श्री) राम (चंद्र) कूच कर गया। रावण भी चल बसा जिसको बड़े परिवार वाला कहा जाता है। (यहाँ) कोई भी सदा कायम रहने वाला पदार्थ नहीं। (यह) जगत सपने जैसा (ही) है। 50।
· सलोक
चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥
चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥
इहु मारगु संसार को नानक थिरु नही कोइ ॥51॥
इहु मारगु संसार को नानक थिरु नही कोइ ॥51॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: चिंता तो उस बात की की जाए जो अनहोनी हो। संसार का मार्ग यही है कि यहाँ कोई सदा रहने वाला नहीं है। 51।
· सलोक
जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥
जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥
नानक हरि गुन गाइ ले छाडि सगल जंजाल ॥52॥
नानक हरि गुन गाइ ले छाडि सगल जंजाल ॥52॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (हे भाई! जगत में तो) जो भी पैदा हुआ है वह (अवश्य) नाश हो जाएगा (हर कोई यहाँ से) आज या कल कूच कर जाने वाला है। (इसलिए माया के मोह के) सारे फंदे उतार के परमात्मा के गुण गाया करें। 52।
· सलोक
दोहरा ॥
दोहरा ॥
बलु छुटकिओ बंधन परे कछू न होत उपाइ ॥
कहु नानक अब ओट हरि गज जिउ होहु सहाइ ॥53॥
बलु छुटकिओ बंधन परे कछू न होत उपाइ ॥
कहु नानक अब ओट हरि गज जिउ होहु सहाइ ॥53॥
हिन्दी अर्थ: दोहा ॥ हे भाई! (प्रभू से विछुड़ के जब माया के मोह के) फंदे (मनुष्य को) आ पड़ते हैं (उन फंदों को काटने के लिए मनुष्य के अंदर से आत्मिक) शक्ति समाप्त हो जाती है (माया का मुकाबला करने के लिए मनुष्य से) कोई भी उपाय नहीं किया जा सकता। हे नानक! कहें: हे हरी! इस (संकट भरे) वक्त में (अब) आपका ही आसरा है। जैसे आप (तंदुए नामक जलचर से छुड़ाने के लिए) हाथी के मददगार बने, वैसे ही सहायक बनिए। (भाव, माया के मोह के बँधनों से खलासी पाने के लिए परमातमा के दर पर अरदास ही एक मात्र वसीला है)। 53।
· सलोक
बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥
बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥
नानक सभु किछु तुमरै हाथ मै तुम ही होत सहाइ ॥54॥
नानक सभु किछु तुमरै हाथ मै तुम ही होत सहाइ ॥54॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! (जब मनुष्य प्रभू के दर पर गिरता है। और माया से मुकाबला करने के लिए उसके अंदर आत्मिक) बल पैदा हो जाता है (तब माया के मोह के) बंधन टूट जाते हैं (मोह का मुकाबला करने के लिए) हरेक उपाय सफल हो सकता है। सो, हे नानक! (कहें: हे प्रभू!) सब कुछ आपके हाथ में है (आपकी पैदा की हुई माया भी आपके ही अधीन है। इससे बचने के लिए) आप ही मददगार हो सकते हैं। 54।
· सलोक
संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥
संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥
कहु नानक इह बिपति मै टेक एक रघुनाथ ॥55॥
कहु नानक इह बिपति मै टेक एक रघुनाथ ॥55॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (जब अंत के समय) सारे संगी-साथी छोड़ जाते हैं। जब कोई भी साथ नहीं निभा सकता। उस (अकेलेपन की) मुसीबत के समय भी सिर्फ परमात्मा का ही सहारा होता है (सो, हे भाई! सदा परमात्मा का नाम सिमरा करें)। 55।
· सलोक
नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥
नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥
कहु नानक इह जगत मै किन जपिओ गुर मंतु ॥56॥
कहु नानक इह जगत मै किन जपिओ गुर मंतु ॥56॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: हे भाई! इस दुनिया में जिस किसी (मनुष्य) ने (हरी-नाम सिमरन वाला) गुरू का उपदेश अपने अंदर बसाया है (और नाम जपा है। अंत के समय भी परमात्मा का) नाम (उसके) साथ (रहता) है। (बाणी के रूप में) गुरू उसके साथ रहता है। अकाल-पुरख उसके साथ है। 56।
· सलोक
राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥
राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइ ॥57॥1॥
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइ ॥57॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू! जिस मनुष्य ने आपका वह नाम अपने हृदय में बसाया है जिसके बराबर का और कोई नहीं और जिसको सिमरने से हरेक दुख-कलेश दूर हो जाता है। उस मनुष्य को आपका दर्शन भी हो जाता है। 57। 1।
· मुंदावणी
थाल विचि तिंनि वसतू पईओ सतु संतोखु वीचारो ॥
मुंदावणी महला 5 ॥
थाल विचि तिंनि वसतू पईओ सतु संतोखु वीचारो ॥
अंम्रित नामु ठाकुर का पइओ जिस का सभसु अधारो ॥
जे को खावै जे को भुंचै तिस का होइ उधारो ॥
एह वसतु तजी नह जाई नित नित रखु उरि धारो ॥
तम संसारु चरन लगि तरीऐ सभु नानक ब्रहम पसारो ॥1॥
थाल विचि तिंनि वसतू पईओ सतु संतोखु वीचारो ॥
अंम्रित नामु ठाकुर का पइओ जिस का सभसु अधारो ॥
जे को खावै जे को भुंचै तिस का होइ उधारो ॥
एह वसतु तजी नह जाई नित नित रखु उरि धारो ॥
तम संसारु चरन लगि तरीऐ सभु नानक ब्रहम पसारो ॥1॥
हिन्दी अर्थ: मुंदावणी महला 5। हे भाई! हृदय रूपी थाल में सत्य अर्थात सच्चा आचरण, संतोष और आत्मिक जीवन का विचार, ये तीन वस्तुएँ हैं। इसमें प्रभु का अमृत नाम भी है, जो सबका आधार है। जो इस आत्मिक भोजन को ग्रहण करता है, उसका विकारों से उद्धार होता है। इस नाम रूपी वस्तु को छोड़ा नहीं जा सकता; इसे सदा अपने हृदय में सँभालकर रखें। नानक कहते हैं: प्रभु के चरणों का सहारा लेकर अंधकार भरे संसार समुद्र को पार किया जा सकता है। सारा जगत परमात्मा का ही विस्तार दिखाई देता है। 1।
· सलोक
तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोई ॥
सलोक महला 5 ॥
तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोई ॥
मै निरगुणिआरे को गुणु नाही आपे तरसु पइओई ॥
तरसु पइआ मिहरामति होई सतिगुरु सजणु मिलिआ ॥
नानक नामु मिलै तां जीवां तनु मनु थीवै हरिआ ॥1॥
तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोई ॥
मै निरगुणिआरे को गुणु नाही आपे तरसु पइओई ॥
तरसु पइआ मिहरामति होई सतिगुरु सजणु मिलिआ ॥
नानक नामु मिलै तां जीवां तनु मनु थीवै हरिआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक! (कहें: हे प्रभू!) मैं आपके किए हुए उपकारों की कद्र नहीं समझ सकता। (उपकार की दाति संभालने के लिए) आपने (खुद ही) मुझे योग्य बर्तन बनाया है। मुझ गुण-हीन में कोई गुण नहीं। आपको स्वयं ही मुझ पर तरस आ गया। हे प्रभू! आपके मन में मेरे लिए दया पैदा हुई। मेरे पर आपकी मेहर हुई। तब मुझे मित्र गुरू मिला (आपका यह उपकार भुलाया नहीं जा सकता)। (अब प्यारे गुरू से) जब मुझे (आपका) नाम मिलता है, तो मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है। मेरा तन मेरा मन (उस आत्मिक जीवन की बरकति से) खिल उठता है। 1।
रागमाला
राग माला ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
राग माला ॥
राग एक संगि पंच बरंगन ॥
संगि अलापहि आठउ नंदन ॥
प्रथम राग भैरउ वै करही ॥
राग माला ॥
राग एक संगि पंच बरंगन ॥
संगि अलापहि आठउ नंदन ॥
प्रथम राग भैरउ वै करही ॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। राग माला ॥ भैरव राग की पाँच रागनियाँ। भैरवी, बिलावली, पुंनिआ, बंगली और असलेखी। राग के आठ पुत्र भी साथ ही गाते हैं। रागी संगीतकार प्रथम राग भैरब को मानते हैं,
रचयिता और स्रोत
इस अंग पर सलोक महला 9 का समापन, फिर मुंदावणी और सलोक महला 5, और फिर रागमाला का आरम्भ है। ये एक ही रचयिता के नाम के नीचे रखे जाने वाले पाठ नहीं हैं।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; महला 9: गुरु तेग बहादुर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1429 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।