अंग
1428
राग Salok Mehl 9
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਜਨ ਹਰਿ ਅੰਤਰੁ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਮਾਨੁ ॥੨੯॥
हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥२९॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई !) यह बात सच्ची मानो कि परमात्मा के भगत और परमात्मा में कोई फर्क नहीं। 29।
ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਮੈ ਫਧਿ ਰਹਿਓ ਬਿਸਰਿਓ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਮੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਜੀਵਨ ਕਉਨੇ ਕਾਮ ॥੩੦॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਜੀਵਨ ਕਉਨੇ ਕਾਮ ॥੩੦॥
मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन जीवन कउने काम ॥३०॥
कहु नानक बिनु हरि भजन जीवन कउने काम ॥३०॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! जिस मनुष्य का) मन (हर समय) माया (के मोह) में फसा रहता है (जिसको) परमात्मा का नाम (सदा) भूला रहता है हे नानक ! कह- परमात्मा के भजन के बिना (उसका) जीना किस काम का। 30।
ਪ੍ਰਾਨੀ ਰਾਮੁ ਨ ਚੇਤਈ ਮਦਿ ਮਾਇਆ ਕੈ ਅੰਧੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਪਰਤ ਤਾਹਿ ਜਮ ਫੰਧ ॥੩੧॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਪਰਤ ਤਾਹਿ ਜਮ ਫੰਧ ॥੩੧॥
प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु परत ताहि जम फंध ॥३१॥
कहु नानक हरि भजन बिनु परत ताहि जम फंध ॥३१॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई !) माया के मोह में (फस के आत्मिक जीवन से) अंधा हुआ (जो) मनुष्य परमात्मा का नाम याद नहीं करता। परमात्मा के भजन के बिना उसको (उसके गले में) जमों के फंदे पड़े रहते हैं। 31।
ਸੁਖ ਮੈ ਬਹੁ ਸੰਗੀ ਭਏ ਦੁਖ ਮੈ ਸੰਗਿ ਨ ਕੋਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜੁ ਮਨਾ ਅੰਤਿ ਸਹਾਈ ਹੋਇ ॥੩੨॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜੁ ਮਨਾ ਅੰਤਿ ਸਹਾਈ ਹੋਇ ॥੩੨॥
सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥
कहु नानक हरि भजु मना अंति सहाई होइ ॥३२॥
कहु नानक हरि भजु मना अंति सहाई होइ ॥३२॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे मन ! परमात्मा का भजन किया कर (परमातमा) अंत समय (में भी) मददगार बनता है। (दुनिया में तो) सुख के समय अनेकों मिलने-जुलने वाले बन जाते हैं। पर दुख में कोई भी साथ नहीं होता। 32।
ਜਨਮ ਜਨਮ ਭਰਮਤ ਫਿਰਿਓ ਮਿਟਿਓ ਨ ਜਮ ਕੋ ਤ੍ਰਾਸੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜੁ ਮਨਾ ਨਿਰਭੈ ਪਾਵਹਿ ਬਾਸੁ ॥੩੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜੁ ਮਨਾ ਨਿਰਭੈ ਪਾਵਹਿ ਬਾਸੁ ॥੩੩॥
जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥
कहु नानक हरि भजु मना निरभै पावहि बासु ॥३३॥
कहु नानक हरि भजु मना निरभै पावहि बासु ॥३३॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (परमात्मा का सिमरन भुला के जीव) अनेकों जन्मों में भटकता फिरता है। जमों का डर (इसके अंदर से) खत्म नहीं होता। हे नानक ! कह- हे मन ! परमातमा का भजन करता रहा कर। (भजन की बरकति से) तू उस प्रभू में निवास प्राप्त कर लेगा जिसको कोई डर छू नहीं सकता। 33।
ਜਤਨ ਬਹੁਤੁ ਮੈ ਕਰਿ ਰਹਿਓ ਮਿਟਿਓ ਨ ਮਨ ਕੋ ਮਾਨੁ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਸਿਉ ਨਾਨਕ ਫਧਿਓ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਭਗਵਾਨ ॥੩੪॥
ਦੁਰਮਤਿ ਸਿਉ ਨਾਨਕ ਫਧਿਓ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਭਗਵਾਨ ॥੩੪॥
जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥
दुरमति सिउ नानक फधिओ राखि लेहु भगवान ॥३४॥
दुरमति सिउ नानक फधिओ राखि लेहु भगवान ॥३४॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे भगवान ! मैं अनेकों (और-और) यतन कर चुका हूँ (उन प्रयत्नों से) मन का अहंकार दूर नहीं होता। (यह मन) खोटी मति से चिपका रहता है। हे भगवान ! (तू स्वयं ही) रक्षा कर। 34।
ਬਾਲ ਜੁਆਨੀ ਅਰੁ ਬਿਰਧਿ ਫੁਨਿ ਤੀਨਿ ਅਵਸਥਾ ਜਾਨਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਬਿਰਥਾ ਸਭ ਹੀ ਮਾਨੁ ॥੩੫॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਬਿਰਥਾ ਸਭ ਹੀ ਮਾਨੁ ॥੩੫॥
बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु बिरथा सभ ही मानु ॥३५॥
कहु नानक हरि भजन बिनु बिरथा सभ ही मानु ॥३५॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) बाल-अवस्था। जवानी की अवस्था। और फिर बुढ़ापे की अवस्था- (उम्र की ये) तीन अवस्थाएं समझ ले (जो मनुष्य पर आती है)। (पर। ये) याद रख (कि) परमात्मा के भजन के बिना ये सारी ही व्यर्थ ही जाती हैं। 35।
ਕਰਣੋ ਹੁਤੋ ਸੁ ਨਾ ਕੀਓ ਪਰਿਓ ਲੋਭ ਕੈ ਫੰਧ ॥
ਨਾਨਕ ਸਮਿਓ ਰਮਿ ਗਇਓ ਅਬ ਕਿਉ ਰੋਵਤ ਅੰਧ ॥੩੬॥
ਨਾਨਕ ਸਮਿਓ ਰਮਿ ਗਇਓ ਅਬ ਕਿਉ ਰੋਵਤ ਅੰਧ ॥੩੬॥
करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥३६॥
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥३६॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- माया के मोह में) अंधे हो रहे मनुष्य ! जो कुछ तूने करना था। वह तूने नहीं किया (सारी उम्र) तू लोभ के फंदे में (ही) फसा रहा। (जिंदगी का सारा) समय (इसी तरह ही) गुजर गया। अब रोता क्यों है। (अब पछताने से क्या फायदा। )। 36।
ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਮੈ ਰਮਿ ਰਹਿਓ ਨਿਕਸਤ ਨਾਹਿਨ ਮੀਤ ॥
ਨਾਨਕ ਮੂਰਤਿ ਚਿਤ੍ਰ ਜਿਉ ਛਾਡਿਤ ਨਾਹਿਨ ਭੀਤਿ ॥੩੭॥
ਨਾਨਕ ਮੂਰਤਿ ਚਿਤ੍ਰ ਜਿਉ ਛਾਡਿਤ ਨਾਹਿਨ ਭੀਤਿ ॥੩੭॥
मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥
नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहिन भीति ॥३७॥
नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहिन भीति ॥३७॥
हिन्दी अर्थ: हे मित्र ! जो मन माया (के मोह) में फस जाता है। (वह इस मोह में से अपने आप ही) नहीं निकल सकता वैसे ही । हे नानक ! (कह-) जैसे (दीवार पर किसी) मूर्ति का बनाया हुआ चित्र दीवार को नहीं छोड़ता। दीवार के साथ ही चिपका रहता है। 37।
ਨਰ ਚਾਹਤ ਕਛੁ ਅਉਰ ਅਉਰੈ ਕੀ ਅਉਰੈ ਭਈ ॥
ਚਿਤਵਤ ਰਹਿਓ ਠਗਉਰ ਨਾਨਕ ਫਾਸੀ ਗਲਿ ਪਰੀ ॥੩੮॥
ਚਿਤਵਤ ਰਹਿਓ ਠਗਉਰ ਨਾਨਕ ਫਾਸੀ ਗਲਿ ਪਰੀ ॥੩੮॥
नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥
चितवत रहिओ ठगउर नानक फासी गलि परी ॥३८॥
चितवत रहिओ ठगउर नानक फासी गलि परी ॥३८॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे भाई ! (माया के मोह में फस के) मनुष्य (प्रभू-सिमरन की जगह) कुछ और ही (भाव। माया ही माया) मांगता रहता है। (पर। करतार की रजा में) और की और ही हो जाती है (मनुष्य सोचता कुछ है हो कुछ जाता है)। (मनुष्य औरों को) ठगने की सोचें सोचता है (लेकिन मौत का) फंदा (उसके) गले में आ पड़ता है। 38।
ਜਤਨ ਬਹੁਤ ਸੁਖ ਕੇ ਕੀਏ ਦੁਖ ਕੋ ਕੀਓ ਨ ਕੋਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਸੋ ਹੋਇ ॥੩੯॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਸੋ ਹੋਇ ॥੩੯॥
जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥
कहु नानक सुनि रे मना हरि भावै सो होइ ॥३९॥
कहु नानक सुनि रे मना हरि भावै सो होइ ॥३९॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे मन ! जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है (अवश्य ही) वह (ही) होता है (जीव भले ही) सुखों (की प्राप्ति) के लिए अनेकों जतन करता रहता है। और दुखों के लिए यतन नहीं करता (पर। फिर भी रजा के अनुसार दुख भी आ ही पड़ते हैं। सुख भी तब ही मिलता है जब प्रभू की रज़ा हो)। 39।
ਜਗਤੁ ਭਿਖਾਰੀ ਫਿਰਤੁ ਹੈ ਸਭ ਕੋ ਦਾਤਾ ਰਾਮੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮਨ ਸਿਮਰੁ ਤਿਹ ਪੂਰਨ ਹੋਵਹਿ ਕਾਮ ॥੪੦॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮਨ ਸਿਮਰੁ ਤਿਹ ਪੂਰਨ ਹੋਵਹਿ ਕਾਮ ॥੪੦॥
जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥
कहु नानक मन सिमरु तिह पूरन होवहि काम ॥४०॥
कहु नानक मन सिमरु तिह पूरन होवहि काम ॥४०॥
हिन्दी अर्थ: जगत भिखारी (हो के) भटकता फिरता है (ये याद नहीं रखता कि) सारे जीवों को दातें देने वाला परमात्मा स्वयं है। हे नानक ! कह- हे मन ! उस दातार प्रभू का सिमरन करता रहा कर। तेरे सारे काम सफल होते रहेंगे। 40।
ਝੂਠੈ ਮਾਨੁ ਕਹਾ ਕਰੈ ਜਗੁ ਸੁਪਨੇ ਜਿਉ ਜਾਨੁ ॥
ਇਨ ਮੈ ਕਛੁ ਤੇਰੋ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਕਹਿਓ ਬਖਾਨਿ ॥੪੧॥
ਇਨ ਮੈ ਕਛੁ ਤੇਰੋ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਕਹਿਓ ਬਖਾਨਿ ॥੪੧॥
झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥
इन मै कछु तेरो नही नानक कहिओ बखानि ॥४१॥
इन मै कछु तेरो नही नानक कहिओ बखानि ॥४१॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (पता नहीं मनुष्य) नाशवंत दुनिया का मान क्यों करता रहता है। हे भाई ! जगत को सपने (में देखे हुए पदार्थों) की तरह (ही) समझो। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मैं तुझे ठीक बता रहा हूँ कि इन (दिखाई देते पदार्थों) में तेरा (असल साथी) कोई भी पदार्थ नहीं। 41।
ਗਰਬੁ ਕਰਤੁ ਹੈ ਦੇਹ ਕੋ ਬਿਨਸੈ ਛਿਨ ਮੈ ਮੀਤ ॥
ਜਿਹਿ ਪ੍ਰਾਨੀ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਿਓ ਨਾਨਕ ਤਿਹਿ ਜਗੁ ਜੀਤਿ ॥੪੨॥
ਜਿਹਿ ਪ੍ਰਾਨੀ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਿਓ ਨਾਨਕ ਤਿਹਿ ਜਗੁ ਜੀਤਿ ॥੪੨॥
गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥
जिहि प्रानी हरि जसु कहिओ नानक तिहि जगु जीति ॥४२॥
जिहि प्रानी हरि जसु कहिओ नानक तिहि जगु जीति ॥४२॥
हिन्दी अर्थ: हे मित्र ! (जिस) शरीर का (मनुष्य सदा) माण करता रहता है (कि यह मेरा अपना है। वह शरीर) एक छिन में ही नाश हो जाता है। (और पदार्थों का मोह तो कहां रहा। अपने इस शरीर का मोह भी झूठा ही है)। हे नानक ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की सिफतसालाह करनी शुरू कर दी। उसने जगत (के मोह) को जीत लिया। 42।
ਜਿਹ ਘਟਿ ਸਿਮਰਨੁ ਰਾਮ ਕੋ ਸੋ ਨਰੁ ਮੁਕਤਾ ਜਾਨੁ ॥
ਤਿਹਿ ਨਰ ਹਰਿ ਅੰਤਰੁ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਮਾਨੁ ॥੪੩॥
ਤਿਹਿ ਨਰ ਹਰਿ ਅੰਤਰੁ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਮਾਨੁ ॥੪੩॥
जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥४३॥
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥४३॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का सिमरन (टिका रहता है) उस मनुष्य को (मोह के जाल से) बचा हुआ समझ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) यह बात ठीक मान कि उस मनुष्य और परमात्मा में कोई फर्क नहीं। 43।
ਏਕ ਭਗਤਿ ਭਗਵਾਨ ਜਿਹ ਪ੍ਰਾਨੀ ਕੈ ਨਾਹਿ ਮਨਿ ॥
ਜੈਸੇ ਸੂਕਰ ਸੁਆਨ ਨਾਨਕ ਮਾਨੋ ਤਾਹਿ ਤਨੁ ॥੪੪॥
ਜੈਸੇ ਸੂਕਰ ਸੁਆਨ ਨਾਨਕ ਮਾਨੋ ਤਾਹਿ ਤਨੁ ॥੪੪॥
एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥
जैसे सूकर सुआन नानक मानो ताहि तनु ॥४४॥
जैसे सूकर सुआन नानक मानो ताहि तनु ॥४४॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा की भगती नहीं। उसका शरीर वैसा ही समझ जैसा (किसी) सूअर का शरीर है (या किसी) कुत्ते का शरीर है। 44।
ਸੁਆਮੀ ਕੋ ਗ੍ਰਿਹੁ ਜਿਉ ਸਦਾ ਸੁਆਨ ਤਜਤ ਨਹੀ ਨਿਤ ॥
ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਹਰਿ ਭਜਉ ਇਕ ਮਨਿ ਹੁਇ ਇਕ ਚਿਤਿ ॥੪੫॥
ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਹਰਿ ਭਜਉ ਇਕ ਮਨਿ ਹੁਇ ਇਕ ਚਿਤਿ ॥੪੫॥
सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥
नानक इह बिधि हरि भजउ इक मनि हुइ इक चिति ॥४५॥
नानक इह बिधि हरि भजउ इक मनि हुइ इक चिति ॥४५॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) एक-मन हो के एक-चिक्त हो के परमात्मा का भजन इसी तरीके से किया करो (कि उसका दर कभी छूटे ही ना)। जैसे कुक्ता (अपने) मालिक का घर (घर का दरवाजा) सदा (पकड़े रखता है) कभी भी नहीं छोड़ता। 45।
ਤੀਰਥ ਬਰਤ ਅਰੁ ਦਾਨ ਕਰਿ ਮਨ ਮੈ ਧਰੈ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਿਹਫਲ ਜਾਤ ਤਿਹ ਜਿਉ ਕੁੰਚਰ ਇਸਨਾਨੁ ॥੪੬॥
ਨਾਨਕ ਨਿਹਫਲ ਜਾਤ ਤਿਹ ਜਿਉ ਕੁੰਚਰ ਇਸਨਾਨੁ ॥੪੬॥
तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु ॥४६॥
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु ॥४६॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई ! परमात्मा का भजन छोड़ के मनुष्य) तीर्थ-स्नान करके व्रत रख के। दान-पुन्य कर के (अपने) मन में अहंकार करता है (कि मैं धर्मी बन गया हूँ। पर) उसके (ये सारे किए हुए कर्म इस प्रकार) व्यर्थ (चले जाते हैं) जैसे हाथी का (किया हुआ) स्नान । 46। (नोट। हाथी नहा के राख मिट्टी अपने ऊपर डाल लेता है)।
ਸਿਰੁ ਕੰਪਿਓ ਪਗ ਡਗਮਗੇ ਨੈਨ ਜੋਤਿ ਤੇ ਹੀਨ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਭਈ ਤਊ ਨ ਹਰਿ ਰਸਿ ਲੀਨ ॥੪੭॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਭਈ ਤਊ ਨ ਹਰਿ ਰਸਿ ਲੀਨ ॥੪੭॥
सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥
कहु नानक इह बिधि भई तऊ न हरि रसि लीन ॥४७॥
कहु नानक इह बिधि भई तऊ न हरि रसि लीन ॥४७॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई ! बुढ़ापा आ जाने पर मनुष्य का) सिर काँपने लग जाता है (चलते हुए) पैर थिड़कने लगते हैं। आँखों की जोति मारी जाती है (बुढ़ापे से शरीर की) यह हालत हो जाती है। फिर भी (माया का मोह इतना प्रबल होता है कि मनुष्य) परमात्मा के नाम के स्वाद में मगन नहीं होता। 47।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1428 है, राग Salok Mehl 9 का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji।
Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 19 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1428” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Mehl 9 राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1429 →, पीछे का: ← अंग 1427।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।