अंग 1428

अंग
1428
राग Salok Mehl 9
राग: Salok Mehl 9 · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोक महला 9 का हिस्सा। पूरे 57 सलोक की commentary /salok-mahalla-9/ पर है।
हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥२९॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई !) यह बात सच्ची मानो कि परमात्मा के भगत और परमात्मा में कोई फर्क नहीं। 29।
मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन जीवन कउने काम ॥३०॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! जिस मनुष्य का) मन (हर समय) माया (के मोह) में फसा रहता है (जिसको) परमात्मा का नाम (सदा) भूला रहता है हे नानक ! कह- परमात्मा के भजन के बिना (उसका) जीना किस काम का। 30।
प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु परत ताहि जम फंध ॥३१॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई !) माया के मोह में (फस के आत्मिक जीवन से) अंधा हुआ (जो) मनुष्य परमात्मा का नाम याद नहीं करता। परमात्मा के भजन के बिना उसको (उसके गले में) जमों के फंदे पड़े रहते हैं। 31।
सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥
कहु नानक हरि भजु मना अंति सहाई होइ ॥३२॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे मन ! परमात्मा का भजन किया कर (परमातमा) अंत समय (में भी) मददगार बनता है। (दुनिया में तो) सुख के समय अनेकों मिलने-जुलने वाले बन जाते हैं। पर दुख में कोई भी साथ नहीं होता। 32।
जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥
कहु नानक हरि भजु मना निरभै पावहि बासु ॥३३॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (परमात्मा का सिमरन भुला के जीव) अनेकों जन्मों में भटकता फिरता है। जमों का डर (इसके अंदर से) खत्म नहीं होता। हे नानक ! कह- हे मन ! परमातमा का भजन करता रहा कर। (भजन की बरकति से) आप उस प्रभू में निवास प्राप्त कर लेगा जिसको कोई डर छू नहीं सकता। 33।
जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥
दुरमति सिउ नानक फधिओ राखि लेहु भगवान ॥३४॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे भगवान ! मैं अनेकों (और-और) यतन कर चुका हूँ (उन प्रयत्नों से) मन का अहंकार दूर नहीं होता। (यह मन) खोटी मति से चिपका रहता है। हे भगवान ! (आप स्वयं ही) रक्षा कर। 34।
बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु बिरथा सभ ही मानु ॥३५॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) बाल-अवस्था। जवानी की अवस्था। और फिर बुढ़ापे की अवस्था- (उम्र की ये) तीन अवस्थाएं समझ ले (जो मनुष्य पर आती है)। (पर। ये) याद रख (कि) परमात्मा के भजन के बिना ये सारी ही व्यर्थ ही जाती हैं। 35।
करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥३६॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- माया के मोह में) अंधे हो रहे मनुष्य ! जो कुछ तूने करना था। वह तूने नहीं किया (सारी उम्र) आप लोभ के फंदे में (ही) फसा रहा। (जिंदगी का सारा) समय (इसी तरह ही) गुजर गया। अब रोता क्यों है। (अब पछताने से क्या फायदा।)। 36।
मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥
नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहिन भीति ॥३७॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे मित्र ! जो मन माया (के मोह) में फस जाता है। (वह इस मोह में से अपने आप ही) नहीं निकल सकता वैसे ही । हे नानक ! (कह-) जैसे (दीवार पर किसी) मूर्ति का बनाया हुआ चित्र दीवार को नहीं छोड़ता। दीवार के साथ ही चिपका रहता है। 37।
नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥
चितवत रहिओ ठगउर नानक फासी गलि परी ॥३८॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे भाई ! (माया के मोह में फस के) मनुष्य (प्रभू-सिमरन की जगह) कुछ और ही (भाव। माया ही माया) मांगता रहता है। (पर। करतार की रजा में) और की और ही हो जाती है (मनुष्य सोचता कुछ है हो कुछ जाता है)। (मनुष्य औरों को) ठगने की सोचें सोचता है (लेकिन मौत का) फंदा (उसके) गले में आ पड़ता है। 38।
जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥
कहु नानक सुनि रे मना हरि भावै सो होइ ॥३९॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे मन ! जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है (अवश्य ही) वह (ही) होता है (जीव भले ही) सुखों (की प्राप्ति) के लिए अनेकों जतन करता रहता है। और दुखों के लिए यतन नहीं करता (पर। फिर भी रजा के अनुसार दुख भी आ ही पड़ते हैं। सुख भी तब ही मिलता है जब प्रभू की रज़ा हो)। 39।
जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥
कहु नानक मन सिमरु तिह पूरन होवहि काम ॥४०॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: जगत भिखारी (हो के) भटकता फिरता है (ये याद नहीं रखता कि) सारे जीवों को दातें देने वाला परमात्मा स्वयं है। हे नानक ! कह- हे मन ! उस दातार प्रभू का सिमरन करता रहा कर। आपके सारे काम सफल होते रहेंगे। 40।
झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥
इन मै कछु तेरो नही नानक कहिओ बखानि ॥४१॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (पता नहीं मनुष्य) नाशवंत दुनिया का मान क्यों करता रहता है। हे भाई ! जगत को सपने (में देखे हुए पदार्थों) की तरह (ही) समझो। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मैं आपको ठीक बता रहा हूँ कि इन (दिखाई देते पदार्थों) में आपका (असल साथी) कोई भी पदार्थ नहीं। 41।
गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥
जिहि प्रानी हरि जसु कहिओ नानक तिहि जगु जीति ॥४२॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे मित्र ! (जिस) शरीर का (मनुष्य सदा) माण करता रहता है (कि यह मेरा अपना है। वह शरीर) एक छिन में ही नाश हो जाता है। (और पदार्थों का मोह तो कहां रहा। अपने इस शरीर का मोह भी झूठा ही है)। हे नानक ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की सिफतसालाह करनी शुरू कर दी। उसने जगत (के मोह) को जीत लिया। 42।
जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥४३॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का सिमरन (टिका रहता है) उस मनुष्य को (मोह के जाल से) बचा हुआ समझ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) यह बात ठीक मान कि उस मनुष्य और परमात्मा में कोई फर्क नहीं। 43।
एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥
जैसे सूकर सुआन नानक मानो ताहि तनु ॥४४॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा की भगती नहीं। उसका शरीर वैसा ही समझ जैसा (किसी) सूअर का शरीर है (या किसी) कुत्ते का शरीर है। 44।
सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥
नानक इह बिधि हरि भजउ इक मनि हुइ इक चिति ॥४५॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) एक-मन हो के एक-चिक्त हो के परमात्मा का भजन इसी तरीके से किया करो (कि उसका दर कभी छूटे ही ना)। जैसे कुक्ता (अपने) मालिक का घर (घर का दरवाजा) सदा (पकड़े रखता है) कभी भी नहीं छोड़ता। 45।
तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु ॥४६॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई ! परमात्मा का भजन छोड़ के मनुष्य) तीर्थ-स्नान करके व्रत रख के। दान-पुन्य कर के (अपने) मन में अहंकार करता है (कि मैं धर्मी बन गया हूँ। पर) उसके (ये सारे किए हुए कर्म इस प्रकार) व्यर्थ (चले जाते हैं) जैसे हाथी का (किया हुआ) स्नान । 46। (नोट। हाथी नहा के राख मिट्टी अपने ऊपर डाल लेता है)।
सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥
कहु नानक इह बिधि भई तऊ न हरि रसि लीन ॥४७॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई ! बुढ़ापा आ जाने पर मनुष्य का) सिर काँपने लग जाता है (चलते हुए) पैर थिड़कने लगते हैं। आँखों की जोति मारी जाती है (बुढ़ापे से शरीर की) यह हालत हो जाती है। फिर भी (माया का मोह इतना प्रबल होता है कि मनुष्य) परमात्मा के नाम के स्वाद में मगन नहीं होता। 47।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।

इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह- (हे भाई !) यह बात सच्ची मानो कि परमात्मा के भगत और परमात्मा में कोई फर्क नहीं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।