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अंग 1428 · सलोक महला 9

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अंग
1428
सलोक महला 9
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  1. हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥29॥
  2. मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥
  3. प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
  4. सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥
  5. जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥
  6. जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥
  7. बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥
  8. करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥
  9. मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥
  10. नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥
  11. जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥
  12. जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥
  13. झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥
  14. गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥
  15. जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥
  16. एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥
  17. सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥
  18. तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥
  19. सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥29॥

अंग 1427 से चला आ रहा अंश

हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥29॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (हे भाई!) यह बात सच्ची मानिए कि परमात्मा के भगत और परमात्मा में कोई फर्क नहीं। 29।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥

मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन जीवन कउने काम ॥30॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई! जिस मनुष्य का) मन (हर समय) माया (के मोह) में फसा रहता है (जिसको) परमात्मा का नाम (सदा) भूला रहता है हे नानक! कहें: परमात्मा के भजन के बिना (उसका) जीना किस काम का। 30।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥

प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु परत ताहि जम फंध ॥31॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (हे भाई!) माया के मोह में (फस के आत्मिक जीवन से) अंधा हुआ (जो) मनुष्य परमात्मा का नाम याद नहीं करता। परमात्मा के भजन के बिना उसको (उसके गले में) जमों के फंदे पड़े रहते हैं। 31।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥

सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥
कहु नानक हरि भजु मना अंति सहाई होइ ॥32॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: हे मन! परमात्मा का भजन किया करें (परमातमा) अंत समय (में भी) मददगार बनता है। (दुनिया में तो) सुख के समय अनेकों मिलने-जुलने वाले बन जाते हैं। पर दुख में कोई भी साथ नहीं होता। 32।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥

जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥
कहु नानक हरि भजु मना निरभै पावहि बासु ॥33॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! (परमात्मा का सिमरन भुला के जीव) अनेकों जन्मों में भटकता फिरता है। जमों का डर (इसके अंदर से) खत्म नहीं होता। हे नानक! कहें: हे मन! परमातमा का भजन करते रहें। (भजन की बरकति से) आप उस प्रभू में निवास प्राप्त कर लेंगे जिसको कोई डर छू नहीं सकता। 33।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥

जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥
दुरमति सिउ नानक फधिओ राखि लेहु भगवान ॥34॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें:) हे भगवान! मैं अनेकों (और-और) यतन कर चुका हूँ (उन प्रयत्नों से) मन का अहंकार दूर नहीं होता। (यह मन) खोटी मति से चिपका रहता है। हे भगवान! (आप स्वयं ही) रक्षा करें। 34।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥

बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु बिरथा सभ ही मानु ॥35॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: हे भाई!) बाल-अवस्था। जवानी की अवस्था। और फिर बुढ़ापे की अवस्था, (उम्र की ये) तीन अवस्थाएँ समझ लें (जो मनुष्य पर आती हैं)। (पर, ये) याद रखें (कि) परमात्मा के भजन के बिना ये सारी ही व्यर्थ ही जाती हैं। 35।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥

करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥36॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: माया के मोह में) अंधे हो रहे मनुष्य! जो कुछ आपने करना था। वह आपने नहीं किया (सारी उम्र) आप लोभ के फंदे में (ही) फँसे रहे। (जिंदगी का सारा) समय (इसी तरह ही) गुजर गया। अब रोते क्यों हैं? (अब पछताने से क्या फायदा।)। 36।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥

मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥
नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहिन भीति ॥37॥

हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: हे मित्र! जैसे दीवार पर बना चित्र दीवार को छोड़ नहीं सकता, वैसे ही माया के मोह में फँसा मन अपने आप इस मोह से नहीं निकल पाता। 37।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥

नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥
चितवत रहिओ ठगउर नानक फासी गलि परी ॥38॥

हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: हे भाई! माया के मोह में फँसा मनुष्य कुछ और चाहता है, पर करतार की रज़ा में कुछ और ही हो जाता है। वह दूसरों को ठगने की योजनाएँ बनाता रहता है, और तभी मृत्यु का फंदा उसके गले में आ पड़ता है। 38।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥

जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥
कहु नानक सुनि रे मना हरि भावै सो होइ ॥39॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: हे मन! जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है (अवश्य ही) वह (ही) होता है (जीव भले ही) सुखों (की प्राप्ति) के लिए अनेकों जतन करता रहता है। और दुखों के लिए यतन नहीं करता (पर, फिर भी रजा के अनुसार दुख भी आ ही पड़ते हैं। सुख भी तब ही मिलता है जब प्रभू की रज़ा हो)। 39।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥

जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥
कहु नानक मन सिमरु तिह पूरन होवहि काम ॥40॥

हिन्दी अर्थ: जगत भिखारी (हो के) भटकता फिरता है (ये याद नहीं रखता कि) सारे जीवों को दातें देने वाला परमात्मा स्वयं है। हे नानक! कहें: हे मन! उस दातार प्रभू का सिमरन करते रहें। आपके सारे काम सफल होते रहेंगे। 40।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥

झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥
इन मै कछु तेरो नही नानक कहिओ बखानि ॥41॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! (पता नहीं मनुष्य) नाशवंत दुनिया का मान क्यों करता रहता है। हे भाई! जगत को सपने (में देखे हुए पदार्थों) की तरह (ही) समझिए। हे नानक! (कहें: हे भाई!) मैं आपको ठीक बता रहा हूँ कि इन (दिखाई देते पदार्थों) में आपका (असल साथी) कोई भी पदार्थ नहीं। 41।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥

गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥
जिहि प्रानी हरि जसु कहिओ नानक तिहि जगु जीति ॥42॥

हिन्दी अर्थ: हे मित्र! (जिस) शरीर का (मनुष्य सदा) माण करता रहता है (कि यह मेरा अपना है। वह शरीर) एक छिन में ही नाश हो जाता है। (और पदार्थों का मोह तो कहां रहा। अपने इस शरीर का मोह भी झूठा ही है)। हे नानक! जिस मनुष्य ने परमात्मा की सिफतसालाह करनी शुरू कर दी। उसने जगत (के मोह) को जीत लिया। 42।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥

जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥43॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का सिमरन (टिका रहता है) उस मनुष्य को (मोह के जाल से) बचा हुआ समझें। हे नानक! (कहें: हे भाई!) यह बात ठीक मानें कि उस मनुष्य और परमात्मा में कोई फर्क नहीं। 43।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥

एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥
जैसे सूकर सुआन नानक मानो ताहि तनु ॥44॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: हे भाई!) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा की भगती नहीं। उसका शरीर वैसा ही समझें जैसा (किसी) सूअर का शरीर है (या किसी) कुत्ते का शरीर है। 44।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥

सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥
नानक इह बिधि हरि भजउ इक मनि हुइ इक चिति ॥45॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: हे भाई!) एक-मन हो के एक-चित्त हो के परमात्मा का भजन इसी तरीके से किया करें (कि उसका दर कभी छूटे ही ना)। जैसे कुत्ता (अपने) मालिक का घर (घर का दरवाजा) सदा (पकड़े रखता है) कभी भी नहीं छोड़ता। 45।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥

तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु ॥46॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: हे भाई! परमात्मा का भजन छोड़ के मनुष्य) तीर्थ-स्नान करके व्रत रख के, दान-पुन्य कर के (अपने) मन में अहंकार करता है (कि मैं धर्मी बन गया हूँ। पर) उसके (ये सारे किए हुए कर्म इस प्रकार) व्यर्थ (चले जाते हैं) जैसे हाथी का (किया हुआ) स्नान। 46। (नोट। हाथी नहा के राख मिट्टी अपने ऊपर डाल लेता है)।

गुरु तेग बहादुर जी · सलोक

सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥

सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥
कहु नानक इह बिधि भई तऊ न हरि रसि लीन ॥47॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (हे भाई! बुढ़ापा आ जाने पर मनुष्य का) सिर काँपने लग जाता है (चलते हुए) पैर थिड़कने लगते हैं। आँखों की जोति मारी जाती है (बुढ़ापे से शरीर की) यह हालत हो जाती है। फिर भी (माया का मोह इतना प्रबल होता है कि मनुष्य) परमात्मा के नाम के स्वाद में मगन नहीं होता। 47।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 9: गुरु तेग बहादुर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1428 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।