अंग 1429

अंग
1429
राग Salok Mehl 9
राग: Salok Mehl 9 · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोक महला 9 का हिस्सा। पूरे 57 सलोक की commentary /salok-mahalla-9/ पर है।
ਨਿਜ ਕਰਿ ਦੇਖਿਓ ਜਗਤੁ ਮੈ ਕੋ ਕਾਹੂ ਕੋ ਨਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਥਿਰੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਹੈ ਤਿਹ ਰਾਖੋ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥੪੮॥
निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥
नानक थिरु हरि भगति है तिह राखो मन माहि ॥४८॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) मैं जगत को अपना समझ के (ही अब तक) देखता रहा। (पर। यहाँ तो) कोई किसी का भी (सदा के लिए अपना) नहीं। सदा कायम रहने वाली तो परमात्मा की भगती ही है। इस (भगती) को (अपने) मन में परो के रख। 48।
ਜਗ ਰਚਨਾ ਸਭ ਝੂਠ ਹੈ ਜਾਨਿ ਲੇਹੁ ਰੇ ਮੀਤ ॥
ਕਹਿ ਨਾਨਕ ਥਿਰੁ ਨਾ ਰਹੈ ਜਿਉ ਬਾਲੂ ਕੀ ਭੀਤਿ ॥੪੯॥
जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥
कहि नानक थिरु ना रहै जिउ बालू की भीति ॥४९॥

हिन्दी अर्थ: नानक कहता है- हे मित्र ! यह बात सच्ची जान कि जगत की सारी रचना ही नाशवंत है। रेत की दीवार की तरह (जगत में) कोई भी चीज़ सदा कायम रहने वाली नहीं। 49।
ਰਾਮੁ ਗਇਓ ਰਾਵਨੁ ਗਇਓ ਜਾ ਕਉ ਬਹੁ ਪਰਵਾਰੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਥਿਰੁ ਕਛੁ ਨਹੀ ਸੁਪਨੇ ਜਿਉ ਸੰਸਾਰੁ ॥੫੦॥
रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥
कहु नानक थिरु कछु नही सुपने जिउ संसारु ॥५०॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई ! श्री) राम (चंद्र) कूच कर गया। रावण भी चल बसा जिसको बड़े परिवार वाला कहा जाता है। (यहाँ) कोई भी सदा कायम रहने वाला पदार्थ नहीं। (यह) जगत सपने जैसा (ही) है। 50।
ਚਿੰਤਾ ਤਾ ਕੀ ਕੀਜੀਐ ਜੋ ਅਨਹੋਨੀ ਹੋਇ ॥
ਇਹੁ ਮਾਰਗੁ ਸੰਸਾਰ ਕੋ ਨਾਨਕ ਥਿਰੁ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥੫੧॥
चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥
इहु मारगु संसार को नानक थिरु नही कोइ ॥५१॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई ! मौत आदिक तो) उस (घटना) की चिंता करनी चाहिए जो कभी घटित होने वाली ना हो। जगत की तो चाल ही यह है कि (यहाँ) कोई जीव (भी) सदा कायम रहने वाला नहीं। 51।
ਜੋ ਉਪਜਿਓ ਸੋ ਬਿਨਸਿ ਹੈ ਪਰੋ ਆਜੁ ਕੈ ਕਾਲਿ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ਲੇ ਛਾਡਿ ਸਗਲ ਜੰਜਾਲ ॥੫੨॥
जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥
नानक हरि गुन गाइ ले छाडि सगल जंजाल ॥५२॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई ! जगत में तो) जो भी पैदा हुआ है वह (अवश्य) नाश हो जाएगा (हर कोई यहाँ से) आज या कल कूच कर जाने वाला है। (इसलिए माया के मोह के) सारे फंदे उतार के परमात्मा के गुण गाया कर। 52।
ਦੋਹਰਾ ॥
ਬਲੁ ਛੁਟਕਿਓ ਬੰਧਨ ਪਰੇ ਕਛੂ ਨ ਹੋਤ ਉਪਾਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਅਬ ਓਟ ਹਰਿ ਗਜ ਜਿਉ ਹੋਹੁ ਸਹਾਇ ॥੫੩॥
दोहरा ॥
बलु छुटकिओ बंधन परे कछू न होत उपाइ ॥
कहु नानक अब ओट हरि गज जिउ होहु सहाइ ॥५३॥

हिन्दी अर्थ: दोहा ॥ हे भाई ! (प्रभू से विछुड़ के जब माया के मोह के) फंदे (मनुष्य को) आ पड़ते हैं (उन फंदों को काटने के लिए मनुष्य के अंदर से आत्मिक) शक्ति समाप्त हो जाती है (माया का मुकाबला करने के लिए मनुष्य से) कोई भी उपाय नहीं किया जा सकता। हे नानक ! कह- हे हरी ! इस (संकट भरे) वक्त में (अब) तेरा ही आसरा है। जैसे तू (तेंदूए से छुड़ाने के लिए) हाथी का मददगार बना। वैसे ही सहाई बन। (भाव। माया के मोह के बँधनों से खलासी पाने के लिए परमातमा के दर पर अरदास ही एक मात्र वसीला है)। 53।
ਬਲੁ ਹੋਆ ਬੰਧਨ ਛੁਟੇ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੋਤ ਉਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਮਰੈ ਹਾਥ ਮੈ ਤੁਮ ਹੀ ਹੋਤ ਸਹਾਇ ॥੫੪॥
बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥
नानक सभु किछु तुमरै हाथ मै तुम ही होत सहाइ ॥५४॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (जब मनुष्य प्रभू के दर पर गिरता है। और माया से मुकाबला करने के लिए उसके अंदर आत्मिक) बल पैदा हो जाता है (तब माया के मोह के) बंधन टूट जाते हैं (मोह का मुकाबला करने के लिए) हरेक उपाय सफल हो सकता है। सो। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) सब कुछ तेरे हाथ में है (तेरी पैदा की हुई माया भी तेरे ही अधीन है। इससे बचने के लिए) तू ही मददगार हो सकता है। 54।
ਸੰਗ ਸਖਾ ਸਭਿ ਤਜਿ ਗਏ ਕੋਊ ਨ ਨਿਬਹਿਓ ਸਾਥਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਪਤਿ ਮੈ ਟੇਕ ਏਕ ਰਘੁਨਾਥ ॥੫੫॥
संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥
कहु नानक इह बिपति मै टेक एक रघुनाथ ॥५५॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (जब अंत के समय) सारे संगी-साथी छोड़ जाते हैं। जब कोई भी साथ नहीं निभा सकता। उस (अकेलेपन की) मुसीबत के समय भी सिर्फ परमात्मा का ही सहारा होता है (सो। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम सिमरा करो)। 55।
ਨਾਮੁ ਰਹਿਓ ਸਾਧੂ ਰਹਿਓ ਰਹਿਓ ਗੁਰੁ ਗੋਬਿੰਦੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਜਗਤ ਮੈ ਕਿਨ ਜਪਿਓ ਗੁਰ ਮੰਤੁ ॥੫੬॥
नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥
कहु नानक इह जगत मै किन जपिओ गुर मंतु ॥५६॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे भाई ! इस दुनिया में जिस किसी (मनुष्य) ने (हरी-नाम सिमरन वाला) गुरू का उपदेश अपने अंदर बसाया है (और नाम जपा है। अंत के समय भी परमात्मा का) नाम (उसके) साथ (रहता) है। (बाणी के रूप में) गुरू उसके साथ रहता है। अकाल-पुरख उसके साथ है। 56।
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਉਰ ਮੈ ਗਹਿਓ ਜਾ ਕੈ ਸਮ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਤ ਸੰਕਟ ਮਿਟੈ ਦਰਸੁ ਤੁਹਾਰੋ ਹੋਇ ॥੫੭॥੧॥
राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइ ॥५७॥१॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जिस मनुष्य ने तेरा वह नाम अपने हृदय में बसाया है जिसके बराबर का और कोई नहीं और जिसको सिमरने से हरेक दुख-कलेश दूर हो जाता है। उस मनुष्य को तेरा दर्शन भी हो जाता है। 57। 1।
ਮੁੰਦਾਵਣੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਥਾਲ ਵਿਚਿ ਤਿੰਨਿ ਵਸਤੂ ਪਈਓ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਵੀਚਾਰੋ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਪਇਓ ਜਿਸ ਕਾ ਸਭਸੁ ਅਧਾਰੋ ॥
ਜੇ ਕੋ ਖਾਵੈ ਜੇ ਕੋ ਭੁੰਚੈ ਤਿਸ ਕਾ ਹੋਇ ਉਧਾਰੋ ॥
ਏਹ ਵਸਤੁ ਤਜੀ ਨਹ ਜਾਈ ਨਿਤ ਨਿਤ ਰਖੁ ਉਰਿ ਧਾਰੋ ॥
ਤਮ ਸੰਸਾਰੁ ਚਰਨ ਲਗਿ ਤਰੀਐ ਸਭੁ ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਪਸਾਰੋ ॥੧॥
मुंदावणी महला ५ ॥
थाल विचि तिंनि वसतू पईओ सतु संतोखु वीचारो ॥
अंम्रित नामु ठाकुर का पइओ जिस का सभसु अधारो ॥
जे को खावै जे को भुंचै तिस का होइ उधारो ॥
एह वसतु तजी नह जाई नित नित रखु उरि धारो ॥
तम संसारु चरन लगि तरीऐ सभु नानक ब्रहम पसारो ॥१॥

हिन्दी अर्थ: थाल में तीन वस्तुएँ परोसी हुई हैं- सत्य, संतोष एवं विचार। हे भाई ! (उस मनुष्य के हृदय-) थाल में ऊँचा आचरण। संतोख और आत्मिक जीवन की सूझ – ये तीनों वस्तुएं टिकी रहती हैं। (जिस मनुष्य के हृदय-थाल में) परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम आ बसता है (ये ‘अमृत-नाम’ ऐसा है) कि इसका आसरा हरेक जीव के लिए (जरूरी) है। (इस आत्मिक भोजन को) अगर कोई मनुष्य सदा खाता रहता है। तो उस मनुष्य का विकारों से बचाव हो जाता है। हे भाई ! (अगर आत्मिक उद्धार की आवश्यक्ता है तो) आत्मिक प्रसन्नता देने वाली ये नाम-वस्तु त्यागी नहीं जा सकती। इसको सदा ही अपने हृदय में संभाल के रख। हे नानक ! (इस नाम-वस्तु की बरकति से) प्रभू की चरणी लग के घोर अंधकार भरा संसार-समुंद्र तैरा जा सकता है और हर जगह परमात्मा के स्वै का प्रकाश ही (दिखाई देने लग जाता है)। 1।
ਸਲੋਕ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੇਰਾ ਕੀਤਾ ਜਾਤੋ ਨਾਹੀ ਮੈਨੋ ਜੋਗੁ ਕੀਤੋਈ ॥
ਮੈ ਨਿਰਗੁਣਿਆਰੇ ਕੋ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਆਪੇ ਤਰਸੁ ਪਇਓਈ ॥
ਤਰਸੁ ਪਇਆ ਮਿਹਰਾਮਤਿ ਹੋਈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਜਣੁ ਮਿਲਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਤਾਂ ਜੀਵਾਂ ਤਨੁ ਮਨੁ ਥੀਵੈ ਹਰਿਆ ॥੧॥
सलोक महला ५ ॥
तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोई ॥
मै निरगुणिआरे को गुणु नाही आपे तरसु पइओई ॥
तरसु पइआ मिहरामति होई सतिगुरु सजणु मिलिआ ॥
नानक नामु मिलै तां जीवां तनु मनु थीवै हरिआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं तेरे किए हुए उपकारों की कद्र नहीं समझ सकता। (उपकार की दाति संभालने के लिए) तूने (खुद ही) मुझे योग्य बर्तन बनाया है। मुझ गुण-हीन में कोई गुण नहीं। तुझे स्वयं ही मुझ पर तरस आ गया। हे प्रभू ! तेरे मन में मेरे लिए दया पैदा हुई। मेरे पर तेरी मेहर हुई। तब मुझे मित्र गुरू मिला (तेरा यह उपकार भुलाया नहीं जा सकता)। (अब प्यारे गुरू से) जब मुझे (तेरा) नाम मिलता है। तो मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है। मेरा तन मेरा मन (उस आत्मिक जीवन की बरकति से) खिल उठता है। 1।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ॥
ਰਾਗ ਮਾਲਾ ॥
ਰਾਗ ਏਕ ਸੰਗਿ ਪੰਚ ਬਰੰਗਨ ॥
ਸੰਗਿ ਅਲਾਪਹਿ ਆਠਉ ਨੰਦਨ ॥
ਪ੍ਰਥਮ ਰਾਗ ਭੈਰਉ ਵੈ ਕਰਹੀ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
राग माला ॥
राग एक संगि पंच बरंगन ॥
संगि अलापहि आठउ नंदन ॥
प्रथम राग भैरउ वै करही ॥

हिन्दी अर्थ: वह अद्वितीय परब्रहा जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। राग माला ॥ भैरव राग की पाँच रागनियाँ। भैरवी। बिलावली। पुंनिआ। बंगली और असलेखी। राग के आठ पुत्र भी साथ ही गाते हैं। रागी संगीतकार प्रथम राग भैरब को मानते हैं,

संदर्भ: यह अंग 1429 है, राग Salok Mehl 9 का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji।

दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 13 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1429” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Mehl 9 राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1430 →, पीछे का: ← अंग 1428

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।